सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

कहानी -   पोशाक

उसके लिए पति और पति -भाव अब दो अलग अलग चीज हो गए थे।
थे तो वे पहले से ही अलग पर उसे यह मालूम नहीं था या कहें उसे यह मालूम होने से बचाया गया था। बचाने वाले लोग बड़े ही आत्मीय और उसका सदैव हित चाहने वाले ,हिताकांशी जन थे ,इसलिए उसे कभी कुछ शुबहा भी नहीं हुआ कि कोई बड़े हित की ऐसी बात है जिसे उसे मालूम होने से बचाया जा रहा है।
या कहें कि हिताकांशी जन स्वयं गफलत में थे या रहे होंगे। क्या मालूम?  कुछ कह नहीं सकते।
दरअसल वह लड़की जहाँ रहती थी उस देश की रिवाज ही ऐसी थी ।वहां सदियों की मेहनत के बाद असंख्य स्त्री- पुरुष जनों ने मिलकर पति- भाव नामक एक ऐसी पोशाक तैयार की थी जिसे पहनते ही पुरुष पूर्ण पुरुषत्व के भाव में आ जाते थे। बल ,शौर्य ,वीरता ,पराक्रम आदि पुरुषोचित भावों के स्वयमेव स्वामी हो जाते थे। ऐसी चमत्कारी पोशाक थी वह।
इस पोशाक की एक और खासियत थी। प्रचलित कायदा यह है कि व्यक्ति की नाप के हिसाब से पोशाक तैयार की जाती है पर यहाँ पोशाक के हिसाब से व्यक्ति तैयार किये जाते थे। यही नहीं पोशाक तैयार करने वाला व्यक्ति भी इस के अनुसार स्वयं को तैयार करता था |
सदियों से माएँ अपनी बेटियों के लिए पोशाक और पोशाक के लिए बेटियां तैयार करती आयी थीं। इस नये ज़माने में बेटियों ने यह जिम्मा स्वयं उठा लिया था।
ऐसा नहीं था कि पोशाक की नाप और डिजाइन सदा काल एक सी रही हो। नहीं  ,काल और स्थान परिवर्तन के साथ इसकी डिज़ाइन बदलती गयी थी। यह और अधिक चुस्त और आकर्षक होती गयी थी। आजकल यह पोशाक कोटनुमा शक्ल में ,बढ़िया सूटलेंथ के कपडे में ,गले और बाजु पर गोल्ड या सिल्वर की ज़री में उपलब्ध थी।
उस लड़की के घरवाले भी यह चाहते थे कि  उसके लिए एक पोशाक तैयार हो। पर वह लड़की खिलंदड़ी सी थी। उसके आत्मीयजनों ,विशेषकर उसके पिता को यह भरोसा नहीं था कि वह लड़की कभी अपने लिए कोई पोशाक तैयार कर पाएगी। इसलिए उन्होंने उसे कुछ इधर उधर के कामों में डाल दिया था ,कुछ पढ़ा लिखा दिया था कि चलो ! और कुछ नहीं तो अपना गुज़ारा तो कर ही लेगी।  
लड़की जैसा पहले कह आयें हैं ,खिलंदड़ी थी। उसने खेल खेल में ही कई काम सीख लिए थे। कुछ लिखना पढ़ना करने लगी थी। वह लड़की अपने आस पास की जगहों पर सारा दिन डोलती फिरती थी। धूप,बारिश,भूख प्यास का ज़रा भी ख्याल नहीं था उसे। या कहें ये सब महज़ शब्द नहीं थे उसके लिए ,इन शब्दों की दैहिक वास्तविकता को वह भली भांति समझती थी। उसकी समझ कुछ अलग तरह की थी। अमूमन किसी से मेल नहीं कहती थी |जो भी हो |अपने समय की लड़कियों जैसा एक भी शऊर नहीं था उसमे ,पूरी रवल्ली थी।
खिलंदड़ी थी ,रवल्ली थी ;पर थी तो लड़की। ऐसा कैसे सम्भव था कि उसके समय की लड़कियां जिस कार्य में इतने जोर शोर जुटी थी या यूँ कह लें कि यही कार्य उनके  जीवन का एकमात्र कार्य था ,उस कार्य की महत्वपूर्णता को वह अनदेखा कर देती। इसलिए इधर उधर की देख सुनकर उसने भी उस पोशाक पर काम करना शुरू किया ,जो उसकी माँ ने एक पुराने संदूक में से निकाल कर दी थी।
वह पोशाक क्रीम कलर का ,थ्री पीस सादा सूट था ,जिस पर कोई डिजाइन नहीं था। उस लड़की ने उस पर अपनी मनपसंद कशीदाकारी की थी। पुरुष छवि के जितने भी रूप वह देखती ,उनको अपनी कल्पना के रंगीन धागों से पोशाक पर काढ़ देती। टी वी पर ,सिनेमा में वह प्रेमी पुरुषों की जिस जिस अदा पर फ़िदा होती ,उस अदा को बड़ी सफाई से पोशाक पर टांक देती थी। जैसी पुरुषोचित अदा वह पोशाक पर टांकती थी ठीक उसका संपूरक स्त्रियोचित भाव उसके भीतर उग जाता था। यह उस चमत्कारी पोशाक की एक और चमत्कारी विशेषता थी।
इस प्रकार उसने पोशाक पर तरह तरह की मनभावन अदाएं ,हाव- भाव टांक दिए थे ,जिन्हें देख देखकर वह फूली नहीं समाती थी। फूली फूली सी वह सारा दिन इतराई हुई ,इधर उधर डोलती फिरती थी।
एक बात और हुई थी। यह बात ठीक उस बात की रिवर्स थी जो वह बाहरी प्रभावों के टीमटाम पोशाक पर लगा रही थी। नहीं, यह भाव उसके भीतर से उगा था ,जिसकी कृत्रिम प्रतिकृति उसने बाजार से खोजकर पोशाक में लगाई थी।
कहाँ से ?कैसे? कब? ,ठीक ठीक कह नही सकते पर यह भाव जब उसके भीतर उगने लगा था तो एक विशेष प्रकार की चिकनाई उसके चेहरे पर ,उसके स्वभाव में और उसके बर्ताव में आने लगी थी। गुजरते वक्त के साथ यह स्निग्धता उसके भीतर इस कदर रच पच गयी ,इतनी अभिन्न हो गयी जैसे फूलों की कोमलता ,पानी की तरलता उनके द्रवत्व से अभिन्न है।  
स्निग्धता के इस भाव ने उसके हृदय को गहरा कर सागर- सम बना दिया था। सपनो में वह नीला ,विस्तृत ,गहरा समुद्र देखती थी।  जिसका ओर था न छोर। कभी अपने आपको नीले, विस्तृत, आकाश में  उड़ता हुआ देखती थी।
 प्रारंभिक यौवन वय ही रही होगी उसकी उस वक्त। चपल तो थी ही। इस आसमानी गहराई लिए हुए नीले रंग ने उसे बेचैन बना दिया था। साफ- शफ्फाक आसमानी नीला रंग !!!,जिसमे विस्तार के साथ गहराई भी थी। मैदानों के ऊपर आसमान का रंग तो हल्का सलेटी होता है | हाँ ,बर्फीले पहाड़ों की तरफ आसमान का रंग वैसा ही नीला था ,जैसा वह सपनो में देखती थी |
अपने मन में उगे भाव के अनुरूप वस्तुरुप को पोशाक में सज्जित करने के लिए वह व्यग्र रहती। उसकी आँखें अपने सामने आ पड़ने वाली छवियों को तलाशती रहती।टी वी देखते हुए ,कोई मैगजीन पलटते हुए ,फिल्म देखते हुए या बाजार में कहीं सामान खरीदते हुए - आँखों की अनवरत तलाश जारी रहती।
“क्या हो  सकती है वह चीज़ ?” वह सोचती | -नीली आभा लिए कोई कीमती पत्थर ,नीला कांच ,नीला चाँद ,नीली आंखें ,नीला कमल ,  नीली मुस्कान, नीली चितवन ,नीली अदा -नीलेपन की मारी उस लड़की ने उन वस्तुओं पर भी नीलापन आरोपित कर दिया था जो नीली या किसी भी रंग की नहीं होती।
 आँखें !!!!!!
वह ख़ुशी से चिल्लाई।
हाँ ! आँखें ही हो सकती हैं वह चीज जो आत्मा में गहरे अनुभूत किये किसी भाव को साफ साफ दिखाती हैं। यह ख्याल आते ही वह तुरंत ,सब्र तो उसमे था ही नहीं ,बाजार से दो बड़े ,चमकते हुए ,आसमानी नीली आभा लिए हुए कांच के टुकड़े ले खरीद लायी थी। ये टुकड़े अपने साफपन में आँखों से दिखाई पड़ते थे। इन टुकड़ो को चांदी में मंडवाकर उसने कॉलर लिंक बनाकर पोशाक में लगा लिया था ,ताकि ऐन सामने होने से ये सबको दूर से ही नज़र आ जाएँ। बेशक इन लिंक्स से पोशाक की शोभा दोगुनी हो गयी थी। इन्हें देखकर देखकर वह फूली नहीं समाती थी। इन्हें देखकर उसके भीतर का स्निग्ध भाव और पुष्ट होता था मानो वे कांच के निर्जीव टुकड़े न होकर सजीव अलंकरण हों।
इस पोशाक को वह सभी नज़रों से छिपाकर रखती थी। किसी को भी दिखाती नहीं थी। सहेलियां हंसकर कहती ,”हमें तो दिखा दो ,कैसी बनाई है।“ पर वह किसी की नहीं सुनती थी। वह जानती थी कि वे भी अपनी पोशाकें तैयार कर रही हैं।
“जब वे नहीं दिखाती तो मैं ही क्यों अपनी पोशाक दिखाकर पुरानी करूँ “ -वह स्त्री सुलभ ईर्ष्या में सोचती।
इस बीच उसे कहीं से भी पता चलता कि आजकल पोशाक में फलां बटन या वर्क लगाने का रिवाज चला है तो वह फ़ौरन बाजार जाती और जब तक नए रिवाज़ के बटन ,बेल -बूटे ,जरी पोशाक में काढ़ नहीं लेती ,तब तक उसे चैन नहीं पड़ता था। इस काम में वह रात दिन ,भूख प्यास सब भूल जाती थी। माँ टोकती थी “खाना तो खा ले। थोड़ा आराम कर ले।“ पर वह किसी की नहीं सुनती थी। बडी मेहनत ,मन और वक्त लगाकर उसने पोशाक तैयार की थी।
उस पोशाक को उस लड़की ने शादी होने तक बड़े ही अरमानों के साथ सहेजा था। इस विश्वास के साथ कि इसे वह अपने भावी पति को पहनाकर ताजिंदगी सुखों की छाया में रहेगी। और हालाँकि भावी पति को पहली बार देखने पर वह कुछ सशंकित हुई थी कि इन्हें यह पोशाक फिट होगी या नही |पर पार्क की बेंच पर ‘उनके’ साथ काजू की बर्फी का छोटा टुकड़ा मुँह में डालते हुए उसने अपने संशयों को दरकिनार कर दिया। उसे पोशाक के चमत्कार पर पूरा भरोसा था।
विवाह के समय अन्य कीमती सामान के साथ वह पोशाक भी लायी थी ,जिसे उस समय दहेज़ देखने वाले किसी भी संबंधी जन ने देखा नहीं था। पर सब जानते थे कि  वह पोशाक लायी है। दरअसल सभी की नज़रों से बचाकर उसने बड़ी सफाई और तत्परता से वह पोशाक अपनी ब्लाऊज़ के बाएं हिस्से में ,हृदय के पास पहले ही रख ली थी कि शादी की भीड़भाड़  में इतनी कीमती चीज के इधर उधर हो जाने का शुबहा न रहे।
भाभियों ने मुस्कुराकर इशारों में पूछा पोशाक कहाँ है? कहाँ छुपाई है? पर वह शर्म से आँखें नीची किये बैठी रही। उसका जवाब मौन था।
अंततः उसने वह पोशाक ,सिर्फ और सिर्फ ,अपने पति को सुहागरात की अतिप्रतीक्षित बेला में दिखाई थी ,इस शर्त के साथ कि वह उसे पाने का हक़दार तभी होगा जब वह पोशाक पहन लेगा। पति ने कुछ आश्चर्य से ,कुछ विस्मय से पोशाक को देखा। पोशाक की भव्यता में उसे मंत्रमुग्ध कर दिया।
और हालांकि एक ढीले नाप की, झालर लगी हुई एक पोशाक वह भी उसके लिए लाया था पर एक तो उसकी लाई हुई पोशाक की भव्यता देख कर ,दूसरे उसके भीतर से चमक रही नए रिवाज की चुस्त पोशाक देखकर वह कुछ घबरा गया और उसने अपनी लायी पोशाक तकिये के नीचे ही रहने दी ,निकाली नहीं। लड़की ने कनखियों में वह पुरानी पोशाक देख ली थी |उसे हंसी आयी |पर वह कुछ बोली नहीं।
पति एक पुरानी ,हलके कपडे की तंग नाप की पोशाक पहले से पहने था। वह कमीजनुमा पोशाक इतनी तंग थी कि उसके शरीर से चिपक ही गयी थी। उसने कोशिश भी की उतारने की पर वह उतरी नहीं। इसलिए उसने वह नयी पोशाक उसके ऊपर ही पहन ली|
वाह !!!!!
पोशाक एकदम फिट थी। वह खुशी से मदमस्त हो गयी। पति ने पोशाक पहने पहने  ही उसे बाँहों में भर लिया। उन मदहोशी के क्षणों में उसने भी बुरा नहीं माना कि इतनी कीमती पोशाक में सिलवट पड जायेगी।
अगले दिन घरवालों ने उसे नयी पोशाक में देखा तो आँखें बदली। पर ये कोई खास बात नहीं थी। इसे अपनी विजय का चिन्ह समझकर वह हँसता हुआ बाहर निकल गया।
आने वाले दिन नीले आसमानों में उड़ने के थे। आसमान में उड़ते हुए वे किसी हिल स्टेशन पर गए और आसमान में उड़ते हुए ही वापस आये। वहां बैलून में ,ट्राली पर उन्होंने आसमान की खूब सैर करी। नदी के बीचों बीच पड़े एक पत्थर पर जब वह फोटो क्लिक कर रही थी तो उसने एंगल इस प्रकार रखा कि फोटो में सिर्फ पति और बैकग्राउंड में नीला आसमान रहे। रुमानियत से भरे दिनों की उमंग में दोनों उड़ रहे थे। ऐसे ही एक मौके पर पहाड़ी फिसलन से बचाते हुए पति ने उसका हाथ इस अदा  से पकड़ा कि वह लट्टू ही हो गयी। उस दिन उसके पैर जमीन पर पड़े ही नहीं।
इस दौरान वे जहाँ भी जाते ,पति अपनी नयी पोशाक पहनता था। पोशाक की भव्यता उस पर असर कर रही थी। वह पहले से अधिक जिम्मेदार ,जागरूक और गंभीर नज़र आता था। उसके हाथों में हाथ डालकर मॉल रोड पर घूमते हुए वह अवर्णनीय तृप्ति का सुख अनुभव करता था। इस बीच पहाड़ों से उतरते हुए या पानी में खेलते हुए पोशाक पर के कुछ अलंकरण कहीं गिर भी गये थे तो दोनों ने इसकी परवाह नहीं की थी। वे पहाड़ के ऊपर नीले आसमान में खो जा रहे थे।
इस बीच एक महत्वपूर्ण बात और हुई थी। वे भाव जिनके कारण वह लड़की फूली  फूली सी महसूस करती थी ,अब भाव रूप न रहकर स्थूल रूप होकर उसके शरीर की फुलावट में दिखने लगे थे। वह पहले से भरी हुई ,विशेष काँति युक्त ,आकर्षक नज़र आती थी। यही हाल पति का भी था।
ऐसे ही रंगीन दिनों की रंगीन शाम का एक वाकया है। तब वे अपने घर लौट आये थे।दोनों बाहर कहीं , बाइक पर घूमने जा रहे थे।वह पति की कमर में हाथ डाले पीछे बैठी थी कि एक दोराहे पर उनकी बाइक दूसरी बाइक से टकरा गयी। टक्कर तो मामूली थी |पर वह आदमी बड़ा जबरदस्त था। बात की बात में उसने बाइक साइड में  लगवाकर जो धमकाना शुरू किया तो पति की तो सिट्टी पिट्टी गुम। वे लगे सफाई देने। और हालाँकि उस समय भी उन्होंने पोशाक पहन राखी थी ,जिसके मुताबिक यह चमत्कार होना चाहिए था कि पति रोबदार आवाज़ मे उस आदमी को चुप करा देते या पति की रोबदार आवाज़ सुनकर वह खुद चुप हो जाता ,पर ऐसा कुछ हो नहीं रहा था |उस आदमी के आगे अपने पति को कूतरु तईं मिमियाते देख उसके गर्व को ठेस सी लगी।  उस का वह खास विनय और शर्म वाला   भाव जो एक रोबदार पति की पत्नी होने के भाव का संपूरक था ,वह भाव ,उस दिन ,उसके भीतर से गायब हो गया। और हालाँकि चेहरे की कमनीयता और कोमलता ज्यों की त्यों बरक़रार रही पर वह खास विनय और शर्म वाला   भाव अब नहीं था |

इस बात को पति ने भी नोट किया। वह बड़ी व्यग्रता के साथ पोशाक संभाल रहा था कि तभी उसने देखा कोहनी का हिस्सा उधड़ गया है। घर आकर उसने उधड़े हिस्से की सिलाई कर दी। उस दिन देर रात तक उसका मूड ख़राब रहा।
फिर ऐसा हुआ कि कई महीनों के बाद पति पोशाक में असहज महसूस करने लगा था। वह भारी कपडे की कीमती पोशाक थी जिसे सारा दिन पहने पहने वह अकड़ सा जाता था। वह चाहता था कि वह आज़ादी से अपने हाथ पैर चलाए ,पर पोशाक की भव्यता उसे एक खास तरीके से उठने ,बैठने ,खड़े होने ,चलने को बाध्य करती थी। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था। पर पोशाक की फॉर्मेलिटी उसके बोलने के तरीके ,लफ़्ज़ों के चुनाव ,बातचीत में विषयों के चुनाव ,सिगरेट पकड़ने के तरीके तक को नियंत्रित कर रही थी। इन सबसे अब वह खीजने लगा था।
और अक्सर डिनर के समय या बाहर आउटिंग के वक्त पति की खीज को उसने भी नोटिस तो किया था ;वह इस बात से विचलित भी हुई थी कि ‘ये’ ढंग से बिहेव क्यों नहीं करते पर फिर अन्य जनों के सामने वह बात को संभाल लेती थी कि कहीं वह स्वयं सबके आगे उपहास की पात्र न बन जाए कि उसकी पोशाक सही नहीं बनी है।
ऐसे ही एक अवसर पर दूसरा वाकया हो गया। असल में तो वह घटना पहले भी घट चुकी थी पर वाकये  के तौर पर याद रखे जाने लायक उसने नोटिस , उस दिन की थी। क्या हुआ था कि अपने घरवालों के साथ डिनर के बाद उसने देखा ऐन बिल अदायगी के वक्त पति सहसा व्यस्त हो गया था। कभी पानी पी रहा था। कभी मोबाइल पर बात कर रहा था। इस बीच वह नयी पोशाक के भीतर पड़ी पुरानी  कमीज को बार बार छू रहा था।
पति की इस चीप हरकत से वह हैरान रह गयी। उसने तुरंत लज्जा को अवाइड किया और तटस्थ रहने का प्रयत्न किया ,जिसमें वह सफल भी हो गयी| तटस्थ भाव से अपने पति को निहारते हुए उसने दोबारा अपनी बनाई पोशाक को देखा। उसे महसूस हुआ की पोशाक पर लगा कपडा उतना मज़बूत नहीं था जितना उसे बताकर दिया गया था। पोशाक की मज़बूती के भाव के ख़त्म होते ही उसके भीतर वह खास अधिकार वाला भाव छिन्न भिन्न हो गया जिसके कारण वह एक गरिमामयी महिला होने का गौरव प्राप्त करती थी। उस भाव के ख़त्म होते ही उसने अपने आपको सर्वथा श्रीहीन ,कमजोर महसूस किया।
उस दिन वह बात को संभाल नही सकी और खेद जताकर लौट आयी।
उस दिन उनके कमरे में घमासान मचा था। नाराज़गी के अवसर तो पहले भी आये थे। अक्सर घर में हुई किसी बात पर या पति के लेट आने पर वह मुँह फुला लेती थी |पति पहले उसे मनाता था ,फिर बाँहों में भरे भरे ही बेड तक लाता था। मनौवल की अवधि गुस्से की अंत्यता पर निर्भर करती थी। कभी वह जल्दी तो कभी बहुत देर से मानती थी। धीरे धीरे उनकी लाइफ में इस बात का एक पैटर्न ही बन गया था । यहाँ तक की एक निश्चित अवधि के बीच यह प्रक्रिया बार बार दोहराई  जाने लगी थी। पति को इन सबसे अब ,ऊब होने लगी थी। 

उस दिन ऐसा ही हुआ था। वह बेहद गुस्से में थी और जोर जोर से बोले जा रही थी। पति का उसे मनाने का कोई मूड नहीं था। वह कुछ देर यूँ ही बैठा रहा। अपनी बातों का जवाब न मिलता देखकर वह गुस्से से पागल हो गयी। गुस्से की प्रचंड मुद्रा में मुख विकृत हो जाता है। पति को उसे देखकर विरक्ति सी हुई।  
‘कैसी लग रही है ?‘ - पति ने इतना कहा और दूसरी तरफ मुँह करके सो गया।
उस प्रचंड क्रोधित अवस्था में भी उसने पति की विरक्ति को देख लिया और आगे के लिए सावधान हो गयी। उस दिन के बाद से पति निरपेक्ष होता गया।
पति की निरपेक्षता ने उसे सकते में डाल दिया। वह अजीब से अवसाद का शिकार हो गयी। उसके बाद तीसरा, चौथा ,पांचवा ........ और भी वाकये हुए। पोशाक के ज़रीदार बेल- बूटे ,जिन्हें उसने इतने अरमानो से काढ़ा था ,उधड़ते गए ;सलमा सितारे जिन्हें एक एक कर टांकते हुए उसने कितनी रोमांटिक कल्पनाएं की थी ,उखड़ते गए। यहाँ तक की वह अब इतनी बदरंग हो गयी थी कि पति ने पहनना ही छोड़ दिया था। खूंटी पर टंगी उस पोशाक पर गर्द जमने लगी थी।
वह अपनी बनाई हुई पोशाक को देखती थी और आंसू बहाती थी। पोशाक की भाँती उसकी जिंदगी भी बदरंग होती जा रही थी। उसके चेहरे की कांति खत्म हो गयी थी। उसकी बातों की खिलखिलाहट कहीं गुम हो गयी थी। वह दिन भर चुप रहती। खाना ,पीना ,सोना ,घर का काम करना -जीवन की सारी क्रियाएं यंत्रवत करती थी।
ऐसी उदास घड़ियों में वह पोशाक को देख देखकर और अधिक उदास हो जाती। उसकी वेदना के सबसे बड़े कारण थे -वे दो कांच के कॉलर लिंक ,जो अब भी वहीँ टंगे थे। उन टुकड़ों का संपूरक भाव जो उसके भीतर जब उगा था ,तो उसे जीवन ,जगत ,परिवार सब उसी की आभा की रंजित दिखाई देता था। उगने के बाद दिन से इनकी आभा उसके भीतर इस कदर व्याप्त हो गयी थी कि वह सोचती थी की अगर यह भी बुझ गयी तो वह जीवन की अंतहीन तमस गुफा में किस प्रकार रहेगी ? यह डर उसे चैन से बैठने नहीं देता था। अब उसे इनकी महत्वपूर्णता पर संदेह होने लगा था | उन टुकड़ों को उसने उतार कर अलमारी में रख दिया |

 रोज़ प्रति रोज़ उसकी उदासी गहराती जाती थी और यह तय था कि वह इस उदासी की गहराई में डूब जाती अगर वह खिलंदड़ी न होती। उस लड़की के स्वभाव की इस विशेषता को हम खिलंदड़ापन कह रहे हैं पर सच तो यह है कि वह लड़की इस राह से जीवन रस संचित करती थी।
हुआ यह था कि चरम उदासी के क्षणों में वह अक्सर बालकनी में आ खड़ी होती थी। बालकनी उसके क्रोध की ही नहीं ,अवसाद को रिलीव करने की आउटलेट भी थी। इन दिनों अक्सर ही वह स्त्री पुरुषों को रंग बिरंगी पोशाकों में देखा करती थी। जो रंग उसे पहले कभी नज़र नहीं आये थे इन दिनों वे उसे साफ साफ नज़र आते थे। उसने देखा कि सभी स्त्री पुरुषों ने अपनी अपनी पोशाकें बना रखी हैं ,जिन्हें वे अपने साथी को पहनाना चाहते हैं। कुछ लोगों ने स्वेच्छा से पहन लिया है ,कुछ ने अनिच्छा से लाद रखा है। विस्मय की बात थी की सामान्य कद काठी -रूप रंग -हाथ पैरों वाले मनुष्य उसे भिन्न भिन्न जानवरों के रूप में नज़र आते थे। उनका सामने का रूप तो मनुष्यों जैसा था पर पोशाक के भीतर से निकली हुई पूंछ देखकर वह पता लगा लेती थी कि यह गाय ,घोडा ,हाथी ,गधा ,शेर ,चूहा ,ऊंट इत्यादि में से क्या है ?
बालकनी में खड़ी इन दृश्यों को देखकर वह चकित रह जाती थी। हैरानी से आँखें मलकाती थी कि कहीं उसे भ्रम तो नहीं हो रहा। पर बालकनी के नीचे का दृश्य वही रहता था। यही नहीं ,किन्ही मनुष्यों को देखकर उसे लगता था मानों वे रबड़ का टुकडे हों या गोंद की शीशी।
“बालकनी दर्शन” के ये दृश्य देख देखकर वह खूब हंसती थी। इतना कि हँसते हँसते उसकी आँखों में से आंसू निकल आते थे। पेट दुखने लगता था। और हंसी भी कोई मामूली औरतों वाली हंसी नहीं जो मुँह पर हाथ रखकर दबा दी जाती है बल्कि ऐन मर्दों के जैसी ठहाका लगाकर ,आवाज़ निकालकर ,दिल-पेट की गहराइयों से निकल कर आने वाली हंसी। बेवक्त। बेवजह। वह कमरे में पड़ी पड़ी हंस हंस कर बेहाल हो जाती थी।
उसके कमरे से ऐसी आवाज़ें आती देख घरवाले चकित -चिंतित होते थे| वह भी अपनी पत्नी को अपने घरवालों के सामने ऐसी  हंसी से हँसते देखकर खासा शर्मिंदा होता था। पर उसकी हंसी थी कि एक बार जो शुरू हो तो रुकने का नाम न ले। यहाँ तक कि  ऐसे मौकों पर ,जब परिस्थिति के अनुसार विशेष गंभीर भाव दिखाना अति आवश्यक होता था ,ऐसे मौके भी वह बावली पूंछ जैसी कोई चीज देखकर बेतहाशा हंसने लगती थी।बेधड़क |बेलौस।
उसके स्वभाव की विचित्रता पर परिवार –चर्चा में चर्चाएं होती ,टीका टिप्पणी होती ,संदेह जताए जाते ,सलाह मशविरे किये जाते। पर अंततः परिवार वालों ने एकमत होकर इस बात पर संतोष कर लिया कि लड़की घर का काम तो ठीक से करती है ,किसी चीज़ का नुकसान नहीं करती। केवल दिमाग का कोई पुर्जा हिला हुआ है। वह कोई खास बात नहीं है।
गुज़रते वक्त के साथ वह प्रकृतिस्थ होती गयी । अब उसे अपने आस पास की चीजे ठीक उसी रंग रूप में दिखने लगी थी जैसी वे वास्तव  में थीं। वह समझ गयी थी कि पति अलग है ,पति भाव अलग है।
इस बदलाव ने उसकी आंतरिक प्रकृति में एक प्रकार की स्थिरता ला दी थी।आंतरिक प्रकृति में हुए इस बदलाव का प्रभाव उसके बाहरी बर्ताव पर भी पड रहा था। और सूक्ष्म ही सही पति भी इस बदलाव को नोट करता था ,पर कहता कुछ नहीं था। वह अपनी पुरानी पोशाक में ही संतुष्ट था।
इस बीच एक ज़रुरी काम उसने यह किया था कि उन नीले कांच के टुकड़ों को सोने में मंडवाकर टॉप्स बनवा लिए थे ,जिन्हें वह कानो में पहनने लगी थी | टॉप्स पहने हुए अपनी छवि जब वह शीशे में देखती थी तो उसे खुद का रूप हर बार नया लगता था | वह खुद अपनी छवि को देखकर विस्मित होती थी |
पति भी अपने वास्तविक रूप रंग में उसे बुरा नहीं लगता था |या कहें एक हाड-मांस के जीवित इंसान के रूप में उसकी सजीव उपस्थिति का अनुभव उसे इनहीं दिनों हो रहा था |पति की आवाज़ ,रूप ,गंध और स्पर्श से उत्त्पन्न प्रभावों को वह अपने भीतर उगता हुआ पाती थी |यह सब उसके लिए एक रोमांचक यात्रा करने जैसा था |अपने आपको इतना ‘भरा हुआ ‘उसने पहले कभी नहीं पाया था |पति उसे देखता था और विस्मित होता था |पर कहता कुछ नहीं था |उसे भी उसके कानों के चमकते हुए नीले कांच के टुकड़े अच्छे लगते थे |

रही पोशाक की बात ,तो केंचुल के जैसी उस पोशाक को उसने उतारकर एक लाल वेलवेट के बॉक्स में रख छोड़ा था कि एक परम्परा के जर्जरित ,निर्जीव मोमेंटो के रूप में उसे अपने बच्चों को दिखाएगी ,जिसकी उम्मीद अब हो रही थी |परम्परा कभी एक सी नहीं रहती |उसके हृदय का विश्वास एक नयी ,चमकीली ,स्पन्दंयुक्त त्वचा में उसके चेहरे पर खिल रहा था |    
पिछली कहानी के असली पाठक 7 से 12 वी तक के बच्चे हैं |
यह कहानी परिपक्व रूचि के पाठकों के लिए है , बौद्धिक अभिरुचि के पाठकों के लिए  |इस तरह की कहानियां थोड़ी हैवी होती हैं |
यह genre पर्सनली मुझे भी कम पसंद है |पर मैं बौद्धिकता को त्याज्य भी नहीं मानती |आज के जीवन के संक्लेशों को समझने के लिए बौद्धिक निर्ममता जरुरी है |उसी से साहित्य में धार बनती है |
स्त्री पुरुष के रिश्ते में महत्वकांक्षाओं का होना स्वाभाविक सा लगता है |पर जब महत्वकांक्षाएं रिश्ते को ख़त्म करने लगें तो .......
कहानी तो बनती है |enjoy reading