आज शकट चौथ है । 😊
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यह पोस्ट reels के लिए भी उतनी मौजूं है ।
Ask urself one simple question. What exactly was that chull- चुल्ल -vibe , that led you to read history ,an otherwise considered boring thing .Can u transfer it to others ?
If one is not scholar even . I mean one is not
making money out of it .
If one has content, has a way to see things ,has a style of writing, rest can be learned easily or patiently .
Be compassionate to ur readers/ viewers. Remember they are normal ppl . They may not hv that chull .😊
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#old post
You tube पर कैसा कन्टेन्ट चलता है ,इसे गूगल करो तो -
How to guide tutorials
Fun content
Educational
वगैरह बहुत जानकारी है ।सारी लगभग सही है ।
मै तो दृष्टि को महत्व देती हूं । वे ही चीजे ज्ञान की प्रसारक हैं ,वे ही अज्ञान की ।
उदाहरण के लिए एक फन सेग्मेंट अमीर-गरीब की असमानता की है ।मुझे तो बेहूदा लगती है ।
उनके यहाँ तो हर कमरे मे एसी ।हमारे यहाँ एसी कमरे मे सब एटसेटरा।
इसे देखकर अच्छा भला व्यूअर भी काम्प्लेक्स मे आ जाए।
कुछ हद तक अमीरी -गरीबी भौतिक है ,पर उसके आगे यह मानसिक है ।
अगर यह न हो तो हम संतों के आनन्द को कैसे समझेंगे।
खैर
Some ideas :
1 मुझे एक बार ऐसा विडिओ पसन्द आया था ।एक सुन्दर ,युवा लड़की जल्दी जल्दी ,तुरन्त वाहन से उतरकर किसी खाने की जगह का परिचय करा रही है ।
Hit point in that video was -speed and background music .
मैने सोचा था कि टीम मे हम ऐसे विडिओ किताबों को promote करने के लिए बनाएंगे।
I am hiding the secret behind this idea to save it from being stolen.
2 funny videos पसन्द आते है ।I hv an idea related politics .
Relax .concentrate. see your own previous work .and say to yourself-मैं नही तो कौन बे ।
अहिंसा की शक्ति ऐसी है जिसे शक्तिशाली ही मानते हैं । आम इन्सान तो धन , परिवार , समूह में होने को शक्ति मानते हैं।
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हिस्ट्री का शार्ट रील्स में बनाकर दिखाना चाहिए। रीच ज्यादा होगी।
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https://www.facebook.com/reel/331https://www.facebook.com/reel/331628503075262/628503075262/
आज मकर संक्रांति है ।
गुरुदेवों की परम्परा में , संक्रांति सुनाने की परंपरा है।
'संक्रांति सुनना' शुभ माना जाता है। जब मैंने पहले इसके बारे में सुना था तो मुझे बहुत अचरज हुआ था। क्या होता है संक्रांति सुनना। हो सकता है इस दिन कोई पवित्र पाठ या कहानी या इस दिन से जुड़ी कोई महत्वपूर्ण मान्यता होगी । मैंने ऐसे समझा था।
ऐसा कुछ नहीं है।
'संक्रांति सुनाना' का अर्थ है की गुरुदेव अपने मुखारविंद से ये कह देते हैं कि आज मकर संक्रांति है । वार बता देते हैं ।तारीख बता देते हैं ।महीना बता देते हैं । बस । इसे ही संक्रांति सुनाना कहते हैं।
लोग बहुत दूर- दूर से आते हैं, अपने स्नेही गुरुदेवों के पास संक्रांति सुनने के लिए।😊#BJNY
पहले - पहल देखने पर 12th फेल फैमिली के पात्र संदिग्ध लगते हैं। " ऐसा हो ही नहीं सकता कि इतने कठोर संघर्षों से गुजरते हुए लोग आपस में प्रेमपूर्ण रह जाएं । बहुधा तो वे आपस में ही कटखाने हो जाते हैं " -दिमाग सोचता है। ऐसा सोचना गलत भी नहीं है क्योंकि ऐसी फ़िल्में भी हैं, जिनमें लगभग ऐसी ही परिस्थितियों में फैमिली वैल्यूज डीकंस्ट्रक्ट हो चुकी हैं।
दर्शक के सोचने से कुछ नहीं होता। उसे तो देखना है और देखते हुए यकीन करना है। फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ती है तो एहसास होता है कि केवल पिता ही नहीं, दादी भी, माँ भी अपने-अपने ढंग के आदर्शवादी है। बल्कि आदर्शवाद इस फैमिली की परंपरा में रहा है। इनके दादा ने भी देश के लिए जान दी थी।( सूचना)
देखने की दृष्टियाँ हो सकती हैं और कोई इन पात्रो की वैल्यूज को थोथा आदर्शवाद , माँ के जीवन की फेमिनिस्ट दृष्टि से व्याख्या इत्यादि, कर सकता है। अपनी जगह वे भी गलत नहीं क्योंकि आखिरी बात इंसान के चुनाव की स्वतंत्रता की होती है।
मनोज के पास चुनाव नहीं है। वह जिस जगह पर, और जैसे लोगों में पैदा हो गया है, उसने अपने घर में जैसा माहौल देखा है, उसे तो उसके बीच में से ही अपनी राह निकालनी है। उसके पास एक ही पूंजी है - आदर्शवादी मूल्यों की पूंजी। पर इस पूंजी का वह करे क्या?, जो आत्मा को धनवान/ समृद्ध बनाने में तो सक्षम है पर बाहर दुनिया में इसके बल पर कुछ रुपए कमा पाना भी कितना कठिन है। वे दोनों भाई तो ड्राइवर - कंडक्टर बनकर भी खुश थे। पर व्यवस्था में मेहनत की सूखी रोटी पर भी दुष्टों की नजर लगी है। इसलिए मनोज परेशान -अवाक् है और यह एक्स्प्रेशन पूरी फ़िल्म में 'थ्रूआउट' उसके चेहरे पर चिपका हुआ है।
पहले पात्रो की असाधारणता को देख लेते हैं। पिताजी की 'तेजी' तो साधारण नहीं है। बताओ! उसे चप्पल मार आए । दादी के तेवर भी बाहुबली की शिवगामिनी से कम नहीं है। घर में ऐसे तूफानी किरदारों के बीच माँ की सहनशीलता और घर को चलाए रखने की चिंता ने घर को संभाला हुआ है । वह इस घर का न्यूक्लियस है। बड़ा भाई भी तेवरों में अपने खानदान पर गया है, पर घर चलाने की चिंता में अपनी गऊ माँ का बैलबुद्धि पुत्र प्रतीत होता है। कन्या जो मात्र एक बार ही दिखी है पूरी फ़िल्म में, एक स्नेह शील बहन एवं बेटी है। उसके हृदय में एक बार भी यह अविश्वास नहीं उभरता कि मनोज शहर में पढ़ लिखकर वहीं का हो रहेगा और वे गरीबी में धंसे रह जाएंगे। "घर का तेज लड़का शहर जाकर बदल गया" - यह कॉन्सेप्ट 70- 80 की फिल्मों में बड़ा पॉपुलर था।
बदलते हुए जमाने के तमाम विचलनों के बावजूद भारतीय संदर्भ में ऐसे पारिवारिक मूल्यों वाले लोग होना अभी भी नॉर्मल है। ऐसे लोग मानो असल जीवन में बताये गये किसी आदर्श का किरदार निभा रहे होते हैं। सुनने में ये बात विचित्र है। पर यह सच है। पाठक इस बात के सच को अपने अनुभवों में टटोलकर देखेंगे तो इस बात का प्रमाण वे स्वयं पा लेंगे।
ऐसे लोग किसी आदर्श की साधना में रत , अनवरत एक आचार व्यवस्था में जीते हैं। पति- पत्नी, माता- पिता, भाई- बहन, रिश्ते नातेदार की बनी आचार प्रणालियाँ, वफादारी, काम का विभाजन,समय की पाबन्दी , जल्दी उठना, मेहनत करना इत्यादि। गृहस्थों की यह आचार व्यवस्था, साधुओं की आचार व्यवस्था की अनुगामी है,जो चरित्र पालन के आधार पर चलती है।
भारत की भूमि पर मनुष्य जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में मोक्ष प्राप्ति का लक्ष्य सदियों से /अनंत काल से गड़ा हुआ है । तमाम धार्मिक परम्पराएं, विधि -विधान इसी के इर्द गिर्द बसे हुए है।
साधुओं की आचार व्यवस्था इस अनुत्तर लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है। इस व्यवस्था के अनुसार गृहस्थ जीवन भी मर्यादित रूप में इसे अनुत्तर लक्ष्य की ओर होना चाहिए।
बदलते हुए जमाने में, यह लक्ष्य शिफ्ट हो चुका है। जिस विपुल चारित्र बल का उपयोग मोक्ष प्राप्ति था, वह साधारण सांसारिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में उपयोग हो रहा है। यह समय और बदलते हुए जमाने पर आक्षेप नहीं है, बल्कि एक वस्तुपरक आलोचना है। (शब्द व्युत्पत्ति - लुच् धातु - अर्थ देखना)।
चान्स की बात है कि मनोज का इंटरव्यू निकल गया । पांडे जैसे दोस्तों के अनुभव अपनी जगह सही हो सकते हैं , मनोज को श्रद्धा का मिलना भी तो हकीकत है ।
देखने में मनोज लल्लू लगता है। शक्ल तो जैसी है वैसी है। सबके आगे ' हाँ जी भैया ,हाँ जी भैया ' करता हुआ, कुछ भी काम करने को तैयार इत्यादि। पर उसकी समझ वस्तुनिष्ठ है। पांडे द्वारा गलत फ़ोन करने के प्रसंग में वह पहले श्रद्धा के फ़ोन पर उसकी कॉल चेक करता है,पाण्डे की शुरुआती सहृदयता को वह कभी नहीं भूलता इत्यादि उसके व्यक्तित्व के पहलू है, जो उसे विशिष्ट बनाते हैं।
( यहीं तक लिखा गया है मुझसे । पता नही क्या हो रहा है । लिखते लिखते interest loose कर देती हूं . Don't know )
वैसे इससे आगे मैं- राहुल गाँधी जी के विडिओ-1, का यह हिस्सा जोडना चाहूंगी-
इस वीडियो में वे माॅरिस नगर, दिल्ली के ias aspirants से बातचीत कर रहे हैं । भारत की शिक्षा प्रणाली की यह खामी है वह अधिकांश बच्चों को टाॅप पाँच जॉब का लक्ष्य देती है । जो उनमे सफल हैं , वे सफल हो जाते हैं। बाकी असफल मान लिए जाते हैं ।
यही मुद्दा वे छात्रों के आगे रख रहे हैं । छात्रों के जवाब और राहुल गांधी जी के प्रतिप्रश्नों (counter question )से इस मुददे से जुड़े कई दिलचस्प पहलू दर्शकों के सामने खुलते हैं ।
आपने यह कैरियर क्यों चुना ? जवाब में अधिकांश छात्रों का जवाब था । इस नौकरी में इज्जत है , पैसा है ।
चलो! यहां तक तो ठीक है। मां -बाप अपने बच्चों के उत्कृष्ट भविष्य की सोचते है । प्रशासनिक सेवा का कैरियर सर्वोत्तम माना जाता है ।अगर ये छात्र मां-बाप या समाज के दवाब में भी आ गए तो यह कोई बुरी बात नहीं है।
बैकअप क्या ? अगर यहां सफल नहीं हुए तो आपका बैकअप क्या है ।आपका प्लान बी क्या है? पूछने पर सब चुप थे । एक छात्र ने कहा कि प्लान बी बनाना ही नहीं है ।
बस यही मुद्दा इस बातचीत का मुख्य मुद्दा है । अगर हम ias coaching कराने वालों या मोटिवेशनल स्पीच देने वालों के व्याख्यान सुने तो वे एकलक्ष्ता, फोकस रहना, एकाग्रता को सफल होने का मंत्र बताते हैं । अगर जीवन में सफल होना है तो प्लान बी ना बनाओ । इससे तुम्हारे प्रयास की एक निष्ठता टूटेगी । विकल्पों मे फँसकर तुम्हारे मन की एकाग्रता खंडित हो जाएगी।
मन की शक्ति को केंद्रित करने की यह बातें अपनी जगह सही हो सकती हैं। लेकिन इनसे परिक्षा का गणित तो नहीं बदल जाएगा । अगर 500 सीटों के लिए 10,000 बच्चे आ रहे हैं तो 9500 का असफल होना निश्चित है। तब वे क्यों जीवन भर अपने आपको असफल मानकर निराशा और फ्रस्ट्रेशन में जीएं ।
जिंदगी गणित है - राहुल गांधी जी छात्रों को यही गणित समझा रहे हैं ।आप कहेंगे - सर जी ! ऑलरेडी भी तो यही हो रहा है । जो असफल होते हैं वे कहीं ना कहीं दूसरी जगह पर चले जाते हैं । जिन्दगी अपने आप इंसान के प्लान बी सी डी ..... बनवा ही देती है ।
हम कहेंगे- हां जी! आपकी बात ठीक है । मगर इस तरह असफल होकर, मन मारकर, उल्टे सीधे गलत समझौते करके , आप एक फ्रस्ट्रेटेड जिंदगी गुजारोगे। खुद अपने पर ,परिवार पर और समाज पर निराशाओं का बोझ उतारोगे । अपने पूरे पोटेंशियल को जाने बिना एक कामचलाऊ नौकरी करोगे और यह सब इसलिए होगा क्योंकि आप इतना गणित नहीं समझ पाए, स्वीकार नही कर पाए कि अगर 500 सीटों के लिए 10, 000 बच्चे आ रहे हैं तो 9500 का असफल होना निश्चित है । इसका यह अर्थ यह नही है कि 9500 अयोग्य हैं ।
बस! एक इस बात से ही जिंदगी ने आपको चलाया या आपने जिंदगी को चलाया ; कर्ता कौन ? का मसला तय हो जाता है ।
मन के रहस्य गहन होते हैं । गलत जानकारी , गलत विश्वास दीर्घकाल तक मनुष्य को सालते रहते हैं । खुशी की बात है कि अंत में एक छात्रा ने इस बात को ज्यों का त्यों समझा ।
All the very best #BJNY. Weather is all fine .
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normally i am unexpressive . बट आज मनीषा कुलश्रेष्ठ ने जो शेयर किया मुझे बहुत पसंद आया है । इसे मौसम का असर समझा जाए ।
कहने वाले भी क्या बारीक बातें खोज कर लाते हैं । हैरत है । चम्भा (अचरज)है ।
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जब मै शास्त्र पढ़ती थी , और दूसरे अनुशासन की किताबें भी ;तब एक तरह की शिकायत मुझे भारतीय चिन्तकों से थी । बड़ी गहरी शिकायत।
कि क्या भारत मे सिर्फ आत्मा-परमात्मा-मोक्ष आदि चिन्तन ही हुआ है ! क्या उनमें objectivity नाम की कोई चीज नही थी ।अरे जरा आँखे खोलकर बाहर दुनिया की तरफ भी देख लो ।etc .... and then one day I realise that all these aatma-parmatma-moksh thing is actually objective in its understanding. Quite a tricky thing .🤪
So exilerating!
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Why don't u ppl comment here. Sab hi-fi ho kya!
1996 में मै 20 साल की थी । गुरूदेवों के चातुर्मास के बाद मेरी रूचि धर्म की ओर हो गई। ये स्टडीज का असर तो होता ही है ।कभी मुझे भी ख्याल होता था कि यह सब तो बुढ़ापे के काम है । खुद पे शंका होती थी । प्रवचन मे एक बार गुरूदेव ने फरमाया ' मेरे देश के युवा ऐसे हो जिनमे जवानों का उत्साह और बूढ़ों का विवेक हो ', तब के बाद मैने ये बात दिमाग से निकाल दी '।
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सुना है चीन की धरती इन्डिया से पाँच गुना है । # कहना आए या ना आए कहना चाहिए ।
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