मंगलवार, 3 दिसंबर 2024

 यह कोई डील नही थी । 

अच्छा है , हम यह पहले ही समझते थे ।😊

यह समझने से , ... फ्रस्ट्रेशन नही है  । थोड़ी है भी , पर अपने लिए नही।

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सोमवार, 2 दिसंबर 2024

 


 

बहन के यहां फंक्शन था 28 को । 29 बाद से ठंड लगी है । मीकू को भी । 

अब जाकर थोड़ा रीलीफ है । शरीर बहुत कमजोर है । 

ऐसे ऊपर से दिखता है मोटा ,अंदर से कमजोर है ।

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सुबह कुआं पूजन था । रात को कान्हा नाइट थी । सब भजन मनपसन्द ।

मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है

छाप तिलक सब लीनी

दमादम मस्त कलंदर

किशोरी कुछ ऐसा इंतजाम हो जाए 

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एक नया भजन सीखा

तीन बाण के धारी तीनों बाण चलाओ ना 

 बहुत मजा आया सुनकर। और भी अन्य। 

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भक्त ये फरियाद करता है कि उस पर कृपा हो जाए।  पर मेरे जैसे इने -गिने अपने मन के भाव कैसे व्यक्त करें ,जिन पर कृपा हो चुकी है ।

थैंक्स गिविंग में वे तो यही गाएंगें-

तीन बाण के धारी ने तीनों बाण चलाए हैं 

मुश्किल में था दास तेरा, प्रभु जल्दी आयें हैं ,

हारे के सहारे मेरे हारे के सहारे,

हारे के सहारे ने , मेरी हार हराई है ।

पुनश्च- पाठक तीन बाण से सम्यक ज्ञान ,दर्शन, चारित्र समझें । वैसे ये चार होते हैं ।सम्यक तप भी होता है । पर गुरुजी कहते थे -तीन संख्या ज्यादा चलती है । त्रि रत्न कहते हैं इन्हें ।

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मंगलवार, 26 नवंबर 2024

अबकी बार हमारे यहां श्री ज्ञान मुनि जी महाराज का चातुर्मास हुआ था , तो यह बात मेरे लिए कई मायनों मे फलदाई रही है ।

सभी प्रकार के पुरुषों* में , जिनमें पत्रकारिता ,साहित्य,  कला, फिल्म ,राजनीति से जुड़े लोग हैं -  मीडीया के जरिये हम उन्हें , और उनके जीवन को देखते हैं ।

सबका कार्य अपनी अपनी जगह हैं  , 

अपनी रूचि के कारण अब मुझे धार्मिक पुरुषों के प्रयत्न देखकर विशेष प्रसन्नता होती है ।

आश्चर्य की बात भी है । वर्तमान समय किस हद तक उनकी चर्या के प्रतिकूल है । फिर भी वे एक सिपाही के - से  अनुशासन और निष्ठा से लगे ही रहते है । हैरानी है ।

पहली बार मुझे कर्म करने की अनासक्ति की शक्ति का अनुभव हुआ। ...

*इनमें इन क्षेत्रों से जुड़ी महिलाएं भी है ।



सोमवार, 25 नवंबर 2024

 कल शारदा सिन्हा जी के गीत सुने । 

मैं कई बार यह सोचती हूं लेखकों का एसेट क्या है ?

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गुरुवार, 21 नवंबर 2024

भारत जिनके हाथों में सेफ है।  

#मेरे नेता राहुल गांधी जी 

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रविवार, 17 नवंबर 2024

 सुनील होर तीन भाई हैं । इनकी बहन नहीं है । ताऊ -चाचा की लड़कियां ही बहन हैं । इनकी बहन के बेटे की शादी थी ,इसलिए शोक जल्दी खोलना पड़ा । एटसेटरा एटसेटरा 

जिसे हम आम लोगों का जीवन कहते हैं , वह ऐसा ही घिसटेला जीवन होता है । इसमें सब कुछ होता है -भावना ,कामना,मेहनत,तप......पर सब कुछ अंततः एक विराट व्यर्थ हीनता की ओर बढ़ता/समाप्त होता हुआ। 

गुरुओं की दी हुई दृष्टि ही है , जो इस विराट व्यर्थ हीनता में कुछ सार देखने की समझ दे जाती है ।

😔

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रविवार, 10 नवंबर 2024

महावीर वाणी :स्वाध्याय अनुमोदना

आज उत्तराध्ययन सूत्र के अध्ययन याद करने वाले भाई -बहनो को सुनील जैन - नीरू जैन( लक्ष्मीनारायण जैन - कान्ही वालों का परिवार)  की ओर से प्रभावना दी गई।

गुरूदेव श्री ज्ञान मुनि जी म एवं गुरुणी जी म के पावन सानिध्य मे यह अति संक्षिप्त पुरस्कार वितरण (11 को) संपन्न हुआ ।

अभी 4-5 लोगों  को अध्ययन सुनाने बाकी हैं ।

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FIL  की हालत सीरीयस है ।

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गुरुवार, 7 नवंबर 2024

 😊

प्रेम को अनिर्वचनीय कहा गया है , ज्ञान तर्क की वस्तु ।

प्रेम के मार्ग पर चलते चलते यह प्रकट होता है कि ज्ञान भी अनिर्वचनीय है ।

प्रेम भी ज्ञान ही है ।

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बुधवार, 6 नवंबर 2024

 भीरूता

भीरुता को वैसे तो मनुष्य की कमजोरी माना गया है । पर शक्तिशाली (राजनीति)के परिप्रेक्ष्य में ,  लोकलाज का डर

और 

शक्तिशाली (धर्म )के परिप्रेक्ष्य में , चतुर्गति संसार में भटकने का डर

शुभ है ।

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मंगलवार, 5 नवंबर 2024

'Sovereign ' यह आधुनिक राष्ट्रों द्वारा अपनाया गया सर्वाधिक महत्व का सिद्धांत है , जिस पर आधुनिक राष्ट्रों की अवधारणा टिकी है ।

मेरे ख्याल में , चल रही बहस का उत्तर इसमें है ।
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व्यवस्थाओं को चलाने की पेचिदगियां वे लोग बेहतर जानते हैं , जो उसके भीतर रहकर चला रहे होते हैं ।
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 भारत की सीमा में चीन की घुसपैठ पर राहुल गांधी जी कई बार हैरानी जता चुके हैं ।
How is this possible in modern world order!
पर हैरानी की बात है कि उनकी हैरानी पर कोई हैरान ही नही होता 😊।
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सोमवार, 4 नवंबर 2024

मैं बौद्धिकता की उपयोगिता यह मानती हूं कि वह सन्मति को तेज धार से तराश दे , 

इस तरह कि एक मूल्यवान रत्न की भांति उसमें अहिसा के सब आयाम उद्भासित हो उठें , 

सन्मति की मूल उद्गम अहिंसा है ।

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शनिवार, 2 नवंबर 2024


 

आजकल तो जनतंत्र है । नेताओं को वोट लेने के लिए लोगों के पास जाना पड़ता है ,तो चाहे ना चाहे एक अनकही ,अदृश्य ऑब्लिगेशन हो  ही जाती है , 

पर लोक का दवाब राजतंत्र में भी रहा है , राजा के कर्तव्यों के रूप मे ,जिसकी रक्षा ज्ञान-विचार के संरक्षकों ने की है । 

मेरा मन कहता है कि राहुल गांधी  जी राजा युग में भी इस लोक धारा के समर्थक राजा होते ।

#राहुल गांधी जी के विडिओ 

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हमारे यहां 11 लोगों ने उत्तराध्ययन के अध्ययन याद करके सुनाए 😊।

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शनिवार, 26 अक्टूबर 2024

मेरे साथ तो बहुत बार ऐसा हुआ है कि कोई बात थी गंभीर टाइप  ,उसका महत्व है आज के लिए भी ,मतलब वह एक सर्वकालिक महत्व की ,ध्यान में रखे जाने योग्य बात थी /है ,
बट उसे कहने की फील ही गायब है ,मन के ऊपर से भी और मौसम के ऊपर से भी, मतलब त्यौहार का समय है ,सब इतने फेस्टिव मूड में है ,
तब ज्यादा गम्भीर बातों का क्या जिक्र करना ।😊
#धत तेरे की
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 आप सभी को महावीर निर्वाण दिवस और दीपावली की शुभकामनाएं
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रविवार, 20 अक्टूबर 2024

 

तृतीय प्राकृत गोष्ठी -गोहाना ,  में मेरे द्वारा पढ़े गए पेपर का एक विडिओ अंश ।

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एक कमी रह गई, गुरुदेव सेठ जी म आदि के दर्शन करने नही जा पाए। 
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गुरुवार, 17 अक्टूबर 2024

 

  

 प्राकृत गोष्टी कल से शुरु हो रही है । हम परसों , शनिवार को जायेंगे। fingers crossed. 

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बुधवार, 16 अक्टूबर 2024

सोमवार, 14 अक्टूबर 2024

विचारधाराएं स्थायी नही होती , सफल होने की कामना स्थायी होती है । फिर चाहे युग कोई भी  हो । विचारधारा का चोला तो रूख देखकर ओढ़ लिया जाता है ।

सफल होने की कामना में अ-बुद्धिमत्ता कुछ भी नही । 

असफल होने की कीमत पर विचारधारा को पकड़े रहना , यह बहुत बड़ा दांव है । 

दुनिया में कुछ ही दुर्लभ हैं ,जो इसे खेलने (झेलने 😊) में सक्षम हैं । 'वह '  अपने बच्चों की रक्षा करता है 

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अहिंसा की विचारधारा राग से वीतरागता की साधना है ।

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मैंने कई लेखकों के अनुभवों में उपहास , तल्खी, कड़वाहट,  और अवसाद को देखा है ,जो उन्हे सरस्वती शिशु मंदिर टाइप स्कूल संस्थानों में हुए।

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रविवार, 13 अक्टूबर 2024

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024

सम्यक दर्शन =2 शब्द

समकित = 1 शब्द  , दोनों सेम हैं । 

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दुनिया में  जैन धर्म की मुख्य पहचान तपस्या की है । जैनी तपस्या बहुत करते हैं , या प्याज-आलू के नही खाने की या दिन से खाने की । 

सही है ,ये सब बातें जैन धर्म  का अंग हैं ।

पर मैं बताऊं आपको , जैन दर्शन का मर्म समकित है । यह सबसे कीमती  चीज है । 

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संसार की सभी वस्तुओं में रत्नों को बहुत कीमती माना गया है । जैन दर्शन में रत्नों से भी ज्यादा कीमती हैं समकित  ,

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समकित है तो ज्ञान और चारित्र भी रत्न के समान कीमती हैं , ये तीनों त्रिरत्न हैं । 

#महावीर वाणी 



 शरद ऋतु का आगमन है । शाम के बाद हवा में नरगिस की महक है । प्रकृति कितनी मनभावन है ।😊

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गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

 सच्चा विश्वासी वह अविश्वासी है जो ईश्वर को प्राप्त हो गया है ।जिसने उसका दर्शन प्राप्त कर लिया है , जिसे उसका ज्ञान है।

अविश्वासी वह है जो विश्वासी ( ईमानदार)है जो ईश्वर को प्राप्त नही है ।जिसने उसका दर्शन प्राप्त नही किया है , जिसे उसका ज्ञान नही है।

दारा शिकोह - मजूमदार

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Whenever I see conflict between faith-non faith , I always remember these lines.

Being a faithful person I never doubted my faith. Nor do I doubt now . 

Bt Being a reader of various things , when I came to know Dara shikoh's quest in religion,  

I hv some glimpse of non -faithful ppl. May be .

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These are very powerful thoughts. One shd memorise it like a mantra, 

And ponder over these lines again and again, day n night, months ,years, 

May be then one can know it's meaning . If ,  HE is kind enough on him .

 जैन दर्शन में - 

5 ज्ञान हैं - मति ,श्रुत, अवधि,मनःपर्याय , केवल ज्ञान । 

4अज्ञान हैं - मति ,श्रुत, अवधि,मनःपर्याय  ।

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आम समझ में अनपढ़ता को अज्ञानता मानते हैं । 

सामान्यतः पढ़े -लिखों में ज्ञान के अभाव को अज्ञान कहते हैं ।

विशेष ज्ञानियों ने ज्ञान की सम्यकता को ज्ञान कहा है , उसकी असम्यकता को अज्ञान कहा है , फिर वह कितना ही बड़ा डिग्रीधारी हो । 

#महावीर वाणी

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बुधवार, 2 अक्टूबर 2024

बापू जी के जन्मदिन की शुभकामनाएँ ।

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ये विषाद ही है ,  कि जिसका ज्ञानपूर्ण बोध (महावीर वाणी की कृपा से ) उदासीनता की वजह है कि मैं होकर भी 'नही हूं ' दिखती हूं , करते हुए भी 'नही करती ' दिखती हूं । 

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बापू जी के जन्मदिन की पुनः शुभकामनाएँ ।

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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

लेखकों में धर्म के शुद्धतावादी नजरिए की बहुत आलोचना होती है ।अक्सर  साहित्य और कलाओं में यह व्यंग्य का विषय बन कर आता है । omg फिल्म में मिथुन* के स्त्रियों से बचकर चलने के स्टाइल को याद कीजिए, 

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यह सही है ,कि यह पाखंड भी हो सकता है ।

पर

धर्म के अपने क्षेत्र मे रहे हुए सत्य और झूठ के , पहाड़ - समुद्र जैसे तुलनात्मक अंतर को देखते हुए विशुद्धतम चारित्रिक शुद्धता के आग्रह अनुचित नही दिखते ।

 .

आप सोचकर देखिए,  कहां अहिसा -सत्य आदि आचार धर्म और कहां बलि आदि कु-आचार। 

दोनों प्रोडक्ट कामनाओं में विभाजित जनता में 'धर्म 'के लेबल से जाएंगे ,

तो उनमें 'ऑथेंटिक ' जज करने के तरीके को सख्त तो होना ही होगा । नहीं तो धोखाधड़ी की गुंजाइश कम कैसे होगी ।

यही कारण है कि धर्म के क्षेत्र मे चारित्र पर इतना बल दिया जाता है । जब तक साधक का मन अभ्यास में है , वह इसे एक 'आदेश'समझ कर पालन करता है ।

 परिपक्वता आने पर , जब वह इसके पीछे के ज्ञान की सतर्कता को जान लेता है , तो स्वयं ही इसमें दृढ़ हो जाता है ।

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सबसे घृणित किस्म की धोखेबाजी धर्म के क्षेत्र में होती है । यही धर्मपुरुषों के महान विषाद कारण भी हैं । धर्म को बचाने के लिए ही वे सतत संघर्ष के कठिन मार्ग पर चलना चुनते हैं ।

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*I wrote this post yesterday.  And surprisingly after some time saw mithun post on Manish singh's timeline. coincidence .

Earlier also . Chai.



शुक्रवार, 27 सितंबर 2024

वस्तुवादी दार्शनिक दृष्टि दर्शन का गहरा तल है । फिजिक्स, एस्ट्रो फिजिक्स टाइप्स । 

चीजें अपनी गति से घूम रही हैं । आप मात्र दृष्टा हो ।स्थितप्रज्ञ। 

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बुधवार, 25 सितंबर 2024

इंसानों को मालूम नही है कि उनकी समस्या क्या है , और उपाय क्या है । 

जैसे ये कहा -अनंत लोभ।  यह एक आध्यात्मिक दोष है । उपाय है -मर्यादा । 

बट कितनी ?क्या?  यह पेचीदा पहेली है । 

इसका गणित इंसान स्वयं सुलझा सकता है । यह आत्म-संयम का विषय है ।

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यह दो जोडी कपड़े रखने का सुझाव नही है । 

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बहुत पहले मैने कभी(संभवतः राहुल गांधी जी की )स्टेटमेंट पढ़ी थी , कि एक सांसद  के हाथ में यही है कि वह 8 किमी की रोड बनवा दे । ।😂

मुझे ऐसी ओनेस्टी भाती है । सब बंदों को वस्तुस्थिति का मालूम होना चाहिए। 

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मंगलवार, 24 सितंबर 2024

ऐसा सुनते थे कि पॉलिटिशियन्स होने के लिए गैंडे की खाल होनी चाहिए , तभी आप सर्वाइव करते हो ।

विरोधियों के प्रहार का तो पता नहीं , बट लोगों की दर्दनाक बातें देखकर ये अवश्य लगता है कि उनका दिल भी जरूर  गैंडे की खाल जैसा अति कड़ा होना चाहिए,  नहीं तो आप कैसे सर्वाइव करते हो ।

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ब्रूटल आलोचना के समय में लोग कह देते हैं , एक्टिंग है । मैं कहती हूं आप भी कर लो । कम से कम लोगों का दर्द तो सुना जाएगा ।

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बेरोजगारी वाकई में भारत भर की कितनी बड़ी समस्या है , लेकिन इसके समाधान का कोई सिलसिलेवार सामूहिक चिंतन-प्रयास नही है  ।

# राहुल गांधी जी के विडियोज़

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उपर्युक्त विडियो की मल्टीलेयर आलोचना - 

आम आलोचना - भईया  ! जो जिसकी समस्या है , वो उसकी समस्या  है । 

पुरूष आलोचना (निन्दा -चुगली टाइप) - हाँ ! सब पता है । डाॅलर मे कमाणा चांवें सब । 

स्त्री आलोचना (निन्दा -चुगली टाइप) - सारी नए सूट पहन री थी ।राहुल जी से मिलने के उपलक्ष्य में ।

ब्रूटल स्त्री-पुरुष आलोचना (निन्दा -चुगली टाइप) - जब नही पलते तो इतने बालक पैदा करने जरूरी हैं ।

वस्तुवादी आलोचना - भारत मे समस्यायों को ऑब्जेक्टिवली देखने की व्यवस्था ही नही है ।

दार्शनिक आलोचना - (मुझे इस पर श्रद्धा है ) - जो जहर इंसानों के जीवन को महान दुखों से भर देता है , उसका नाम है - अनंत लोभ ।

इन्सानों का एकमात्र कर्तव्य है कि वे इससे छुटकारा पाएं ।

वस्तुवादी दार्शनिक आलोचना  (matter of truth ) - अज्ञानता सबसे बड़ा पाप है ।

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ब्रूटल आलोचना दर्दनाक होने पर भी अंततः शुभ वस्तु है । क्योंकि  इसमें अज्ञान को खत्म करने की शक्ति है ।

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रविवार, 22 सितंबर 2024

इतना अधिक मीडिया में बताया जाता है कि ये खाओ-वो खाओ ।

अंत में समझ में आता है कि तप श्रेष्ठ है ।

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शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

कई बार मन अकारण ही बहुत खुशी महसूस करता है ।.... वैसे मेरे साथ तो यह होता रहता है । मैं तो मौसम के बदलाव देखकर भी खुश हो जाती हूं ।

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अभी गोहाना मे एक पुरानी परिचित से 22 साल बाद मिलना हुआ।  उन्हें भी स्वाध्याय की रुचि है । वो भी अक्टूबर मे हो रही गोष्ठी मे भाग ले रही हैं । उनका नाम है लीना जैन ।

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सोमवार, 16 सितंबर 2024

गुरूदेव श्री सुंदर मुनि जी म के जन्मदिन की शुभकामनाएँ। 

कल हम गोहाना गए थे । एफ बी की मेमरी कह रही है 2022 मे भी इसी दिन गए थे ।😊

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गुरुवार, 12 सितंबर 2024

लेखक की भाषा में जिसे सोपान कहते हैं , शास्त्र की भाषा में इसे गुणस्थान कहते है । गुणस्थान 14 होते हैं ।

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मैं बातों के बीच में शास्त्र की भाषा को इसलिए लाती हूं ताकि सब उस यूनिवर्सल कोड को पहचानना सीखे । कि कम्प्यूटर की भाषा के समान प्रोग्राम अलग है , पर पीछे काम कर रहा कोड तो वही है ।

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मनीष सिंह की खेती वाली पोस्ट अच्छी थी ।

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मैं उत्तराध्ययन का 25वां अध्ययन याद कर रही थी न । वह ऑलमोस्ट पूरा हो गया है ।

मजेदार है ।

यह एक संवाद है ,दो ब्राह्मणों के बीच में ।

यह लाइन पसंद आई -  रमई अज्ज वयणम्मि । आर्य वचनों मे रमता है जो ।

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बुधवार, 11 सितंबर 2024

I don't hate Mr modi ......etc

When u fight a person for a very long time , u come over to the bitterness of it . After all , for how long u can be bitter . More than the opponent , it harms yourself .it is not a good place to live in .

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That is the characteristics of a 'lighter person ' ,so to say in aagam language. 😊

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जब हम ऐसी बातें सुनते हैं , तभी हम इस तरह की बात को समझने के काबिल होते हैं कि हर कोई एक सोपान में रहकर एक दूसरे से मुखातिब है ।

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रविवार, 8 सितंबर 2024

शुक्रवार, 30 अगस्त 2024

मैं जब भी बीमार होती हूं ,लगता है निकलने का टाइम आ लिया ।
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मंगलवार, 27 अगस्त 2024

कितने उत्तम मुनिराज हैं सब । श्री ज्ञान चन्द्र जी म सा आदि ठाणे - 5 । 

एक तारीख से पर्युषण पर्व लग रहे हैं । 

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रविवार, 25 अगस्त 2024

आज मौसम खिला- खिला है । लगता है सितम्बर आ गया है।

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शुक्रवार, 23 अगस्त 2024

कल की पोस्ट की पुनः समीक्षा -

एक बहुत बड़ा गैप होता है ,इन्सान की समझ और चाहत में । शास्त्रीय भाषा में ज्ञान और काम-भोग कहा गया है ।

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बचपन अवस्था में ,जब स्वयं की चाहतें मिनिमम होती हैं , तब ज्ञान सीखना बोझ नही होता । आपने देखा होगा बच्चे कैसे मजे मजे में लम्बे लम्बे पाठ याद करके सुना देते हैं ।

मुझे खूब शौक था -कैलीग्राफी का, कढ़ाई वगैरह का ।

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जब बड़े होते हैं ,तब झमेला शुरु होता है ।

अच्छा!यह झमेला भी है , अपनी क्षमता की आजमाइश भी है ।

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शांति तब प्रकट होती है जब इंसान इस गैप को भरने की काॅर्ड सेट कर लेता है ।

यह आत्म-संयम से ही संभव होता है । 

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गुरुवार, 22 अगस्त 2024

कल की पोस्ट की समीक्षा -

यह भी मेरे लिखने की शैली का एक आयाम है । यूं तो ऐसे मौके कम आते हैं ;  जब पोस्ट लिखकर कोई महत्वपूर्ण बात क्लिक कर जाती है ।उसे मै अगले दिन दर्ज कर देती हूं।

छन्द अनुशासन वगैरह का ज्ञान काव्य शास्त्र के अन्तर्गत आता है। यह सब अब पॉपुलर ज्ञान की श्रेणी मे नही आते ।

मैं देखती हूं ज्ञान का बहुत हिस्सा प्रायः एक व्यापक निगलेक्ट का शिकार है । इनसे जुड़े लोग 'बचाने' की आत्म-शांति विनाशिनी चिंता से ग्रस्त रहते हैं । धर्म वालों का भी यही हाल है ।

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एक ओर दुनिया में/सब जगह में अशान्ति बढ़ रही है , दूसरी ओर .....

पता नही काॅर्ड कहाँ मिसिंग है ।

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बुधवार, 21 अगस्त 2024

हमारे यहाँ गुरुदेवों के सानिध्य मे उत्तराध्ययन के अध्ययन याद कराने का प्रोग्राम चल रहा है । मुझे 25वां अध्ययन मिला है । इसमें 45 गाथाएं हैं ।

गुरुदेव रामप्रसाद जी म फरमाते थे -संस्कृत में श्लोक और प्राकृत में गाथा ।गाथा प्राकृत का अपना छन्द है ।

मुझे  छन्द अनुशासन का ज्ञान नही है । जैन आगमों का अध्ययन छन्द की दृष्टि से भी हो सकता है ।

अभी तो याद करनी शुरू की हैं । सारी कच्ची हैं । ऐसा लगता है वापिस बच्ची हो गई हूं । 

याद करना ।सुनाना ।😊

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That's how I hv always been like .

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कम से कम शब्दों में अपनी बात कहना ,  प्राकृत में यह गुण कमाल का है । 

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रविवार, 18 अगस्त 2024

कल लिखा था । पोस्ट करने से पहले ही झपकी लग गई।  बाद में किया नही । 

पहले क्षोभ था ,आज पढ़कर हँसी आ रही है । पर क्षोभ हो या हँसी ट्रूथ रीमेन्स द सेम ।

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लेखकों के सतत क्लेश 

  • किताब नही छपी तो 'इसका कुछ काम ही नही है '।
  • जिसकी ज्यादा छपी है 'रद्दी मे बेचकर भी कमाई हो जाएगी ।
  • 'इस पर' बोले ,'उस पर' क्यों नही बोले ।
  • सिर्फ बोलते हो कुछ करते क्यों नही -एक्टिविज्म की मांग ।
  • जो थोड़े बहुत एक्टिविस्ट है ,ये तो बडी गेम मे है ।
  • विवाद मे खींचने का ट्रैप 'विवादास्पद मुद्दो पर राय बताइये । ओरगैज्म ,एलजीबीटी एटसेटरा। 
  • लेखन/साहित्यिक चोरी ऐसी गुप्त विद्या है जिसे पकड़ पाना और साबित कर पाना तो नामुमकिन ही है ।
  • बड़े से बड़े सत्ताधीश को ललकारने वाले , पर सम्पादक के आगे घिग्घि बन जाती है ।
  • बहुतों ने तो टाइपिंग को ही लेखन मान लिया है ।
  • इधर की मलाई खा ली , उधर की भी -यह कटाक्ष बहुत मारते हैं ।
  • सत्ता का पिछलग्गू -यह भी जाना -माना ताना है ।
दम्भी , दुर्विनीत, प्रशंसा के लोलुप, आत्मप्रशंसक, सतत क्लेश प्रिय ,उथले ,छिछले , असमाधि मन ,

ऐसा व्यक्ति अगर एक ही झेलना पड़े तो निबाह मुश्किल , आत्मीय दायरे मे पल्ले पड़ जाए तो नरक है , 
फिर अपरिचितों के समूह को कौन समझे ।
# observations 
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 इन्हें यह अहसास तक नही है कि ये कितने vulnerable हैं ।इन्हें इस नहीं तो -उस  , मुद्दे  पर भड़काना कितना आसान है ।

एक किताब के प्रसंग मे ही देखें , देखते ही देखते एक कमेंट के विरोध पर समूह मे ऐसी लिंच की प्यास हावी हो गई कि फिर किताब के कॉन्ट्रैक्ट के खत्म होने पर ही शान्त हुई । 
किसी का क्या बिगड़ा। 
लेखक लड़ता रहा । आर्थिक नुकसान झेला, वो अलग ।
फिर सब शांत ।
सब पुनः अपनी रवानी में ।

अएं ...

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क्या कोई मिनिमम अहिंसा रूल है , जिसे सब फाॅलो करते है ।
...
अगर दर्शन दुरस्त नही है  ,तो यूं ही आए -गए होता रहेगा।
...

 


शुक्रवार, 16 अगस्त 2024

भावना भी नही , भावना पर  सिर्फ श्रद्धा भी इतनी चमत्कारिक और शक्तिशाली और रक्षक होती है ,

फिर उस मार्ग पर चलना तो अवश्य सुख शांतिदायक है ।

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बाकी शब्दों के गैप को समझना अपनी खुद की जिम्मदारी है । 

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भावना एटसेटरा शब्दों को जितना चाहे ,उतना भ्रष्ट किया जा सकता है ।#अनुभव ज्ञान 

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लोगों के जीवन में प्रेम 

और

 मेरे अध्ययन मे आगम ज्ञान की भांति 

चर्चाओं मे तिरंगा कब आ गया ,पता ही नही चला ।😂

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यू ट्यूब भी स्रोत है लेखको की कमाई का । लेखक विंग, विमर्श विंग, दर्शन विंग एटसेटरा । 

पर सबसे पहली बात है क्षुद्रता का त्याग। 

लेने का नही ,देने का भाव।

हरेक लेखक एक विशाल लेखन परम्परा के बीच का बुलबुला है। अपने होने की अमरता का इतना मान ही काफी है ।

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बात ऐसे शुरु हुई थी कि लेखकों के गोष्ठी स्थल सूने क्यूं हैं । अन्यथा न लेना,  क्षुद्रताएं देखकर लगता है ;जितनी पूछ है , सो भी ज्यादा ही है । 

...

मैं तो बहुत शिद्दत से इस जरुरत को महसूस करती हूं कि लेखकों की किसी टीम से पहले ,

लेखकों से सावधान रहें ।

अपनी समझ के जिम्मेदार आप खुद हैं ।

ये बौनी समझ के देवता हैं ।

टाइप एडवाइजरी पहले प्रचलित की जानी चाहिए। 

...

महावीर स्वामी जी सबकी रक्षा करें ।

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बुधवार, 14 अगस्त 2024

4

In life , ppl fall in love and they do not know when did it happen ,

Similarly I became conscious of aagam knowledge without knowing it . 

I can point the moments , bt how did it happen is unexplainable. 

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जैन आगमो के अध्ययन ने मेरी दृष्टि को बदल दिया है । 

अब मेरे जीवन में चीजों का वरीयता क्रम यह है - कामना( धन , मुझे प्रसिद्धि की कभी कामना नही रही । )<भावना (प्रेम<परिवार<देश<गुरु-धर्म*)<विमर्श < सम्यक दर्शन <देश विरति श्रावक चारित्र। 

सच्चे सुख के आकांक्षी व्यक्ति के जीवन का यही वरीयता क्रम होना चाहिए। यह भूमिका बुद्धिजीवी वर्ग निभा सकता है । बट वहां तो आपस की जलन ,होड़ का ही आर-पार नही है ।खैर

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पहले इस क्रम में कुछ उल्ट -फेर थी । मैं भावना को सर्वाधिक महत्व देती थी । 

पर अनुभवों ने दिखाया कि चीजें वैसी नही होती , जैसी वे दिखती है 

।बट जो हुआ है बहुत शुभ हुआ है।

यह क्रम महावीर वाणी ने ही सीधा किया है ।

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मैने यह भी देखा है कि ज्यादातर लोगों के जीवन मे यह क्रम > इस निशान का होता है । इसमे आमजन तो हैं ही , बुद्धिजीवी भी आ जाते है ।

ऐसे लोगों को मेरी स्लो मोशन की बातें प्रवचन लग सकती हैं ।

...

मैं कोई संघर्ष महसूस नही करती । बल्कि मुझे तो लगता है महावीर स्वामी जी की कृपा से सभी संघर्ष समाप्त हो गए हैं  । चीजें जब होंगी , तब होंगी। 

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*मेरा देश प्रेम का नजरिया भी धर्म से प्रेम का फल है ।देश प्रेम की सोच एक सीमा के भीतर के मनुष्यों तक है ।धर्म की सोच में सभी जीवित प्राणी आ जाते हैं ।

जिसमे सबसे बढ़कर,  जैन धर्म मे तो छ जीवनिकाय की अहिंसा तक बात गई है ।

 


मंगलवार, 13 अगस्त 2024

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Sonam kapoor was the one ,who fought 'nepo kid' attack brilliantly .

Nowadays 'they almost made me feel apologetic of being daughter of my father ' is the repeated answer of her  , spoken at most platforms. 

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Aishwarya's puple lipstic at cannes .

The woman smashed years long labour of so many designers, their assistants, supporting staff, imagination, fabric selection, design selection, colors ,cuts ......and money ....

In one go ...

By wearing a purple lipstick and taking all headlines of media(at least of Indian side)to her side .

Who can question the sharpness and brilliance of a woman.

Defeated Sonam could only say - she succeeded in her effort.

I felt sorry for sonam bt what could anyone do . That's how their world goes.

Years later urvashi tried to copy her. Bt magic doesn't repeat itself.

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I hv given here two instances to show how keenly and passionately I used to follow things 😊. 

So it was not , only aagam that I hv read.

Bollywood news is a very sought-after thing in india  .anyway.

Those were years of 2012,13,14 . may be more .

Cont..

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सोमवार, 12 अगस्त 2024




अपनी इसी तरह की डायरी के लिए गुलजार ने हामिला शब्द का प्रयोग किया है।  

Honestly I didn't like the expression bt that's how things go in world.
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Earlier I used to find pleasure in seeing men working on construction sites.

Oh !what coordination , hard work , precision, sweat . 

And no sorrow at all . Smilingly they do all work.

 (We are living in Delhi for 35 years and more . And rohini ,pitampura and Shalimar bagh are quite new areas . Lot of construction keep on going here . Anyway)

Women also do work on these sites ,their work is only of labour kind . No mind application.

 ( the picture is quiet changed now . I know women who do carpenter/interior designer work.

 Here , women applies mind and men execute. 

I suppose india is witnessing a silent revolution in terms of working women force . )

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Later I recognize men efforts in many fields . Music ,art, sports , business,  politics, creating knowledge , science etc . 

And no recalling,  I was astonished to the depths of my being .

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ऐसा कहते हैं कि यह संसार माया चलाती है अर्थात स्त्रियां।

 एक अपेक्षा से यह बात सही हो सकती है कि पुरुष यह सब महिलाओं के लिए करते हैं ,

दूसरी अपेक्षा से देखो तो , ये सब काम करते तो पुरुष ही हैं । अतः संसार को चलाता तो उनका ज्ञान ही है ।

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I hv a diary where I hv written notes or Sometimes pasted newspaper(mostly bollywood news) cuttings on my reading and understanding of things. 

That diary is of zero value to me now.

Contd...



रविवार, 11 अगस्त 2024

 There are many men writers who are known to give words to women pain correctly.

For example-I hv find pain of upper household's women in rabindra naths literature written very well .

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I don't know about myself .

Bt I hv been very curious to see men working .

Most times I feel good .

I feel astonished to see their capacity , in particular. 

To see their joy in working, to see them facing challenges etc

And then 

Their naivety,  frustration etc

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What I hv find , that all men are driven by a very great sense,  to prove themselves. 

A certain kind of ego.

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 this feeling of ego is necessary to an extent, that this is the driving force in men .

Bt after certain limit , this force becomes , a hindrance in actual solution of things .

Only men of great learning can overcome the effects of these forces .

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#observations 



मंगलवार, 6 अगस्त 2024

In continuation with previous post - 

 मेरे तो पेट मे गुडगुड सी हो जाती है । संदेहवाद एटसेटरा सुनकर। 

शायद इसीलिए कहा गया है कि एक हद के बाद विद्वता बोझ हो जाती है ।

गुरूदेव रामप्रसाद जी म एक शेर सुनाते थे - 

गुजर जा अक्ल से आगे कि

 ये नूर  , चिरागे राह है मंजिल नही ।😊

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Belated friends day to all on fb . Here I feel peace . There , I hv many relatives also + likes ki problem. 

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जिसे हम सुनहरी सांझ मे छोड़कर जाना कहते हैं , उसी को शास्त्रीय भाषा मे मर्यादा कहते हैं ।

खाली समझ की बात है । 

यूं भी कोई सदा के लिए राज नही कर सकता । 

इस समझ को पहले ही ज्ञान के अभ्यास से प्राप्त कर लेना , पंडित  होने का लक्षण है ।

#मनीष सिंह की पोस्ट पढ़कर 

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श्रावक के पांचवे व्रत 'परिग्रह परिमाण व्रत ' के पालन की तीन तरतमता-

जघन्य -कम से कम -  अभी है नही । पर मेरे पास अमुक धन हो ,तो उससे आगे के परिग्रह का त्याग ।

मध्यम - बीच की अवस्था - जितना मेरे पास धन है , उससे आगे के परिग्रह का त्याग ।

उत्कृष्ट- उत्तम- जितना मेरे पास धन है , वह मेरी आवश्यकता से ज्यादा है । जरुरत अनुसार, रखकर  बाकी का त्याग। 

 - प्रवचन अंश - गुरूदेव श्री ज्ञान मुनि जी म - 5.8.24 sector 11 rohini.

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A child in a candy shop - had that feeling seeing yesterday's rahul gandhi ji's video of jaitram cobbler meeting. 

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शनिवार, 3 अगस्त 2024

Some notes on video on jain Darshan by vikas divykirti.

Time : 

2:37  -    आस्तिक  की व्याख्या - अस्ति अर्थात है । नास्तिक अर्थात  नही है । आस्तिक को नास्तिक नही किया जा सकता । नास्तिक को आस्तिक नही किया जा सकता ।

वे कौन सी चीजें हैं ,जो हैं -जीव ,अजीव आदि तत्व। 

जीव को अजीव नही किया जा सकता ।अजीव को जीव नही किया जा सकता । 

तीर्थंकर की शक्ति भी ये नही कर सकती ।

जैन दर्शन पुरुषार्थवाद का दर्शन है । पर मनुष्य का पुरुषार्थ भी नास्ति  को आस्ति नही कर सकता ।

1 : 03 :_  -आत्मा का आकार ही नही ,वजन भी पूछा गया है । यह विषय राजप्रश्नीय सूत्र मे आए हैं ।😊

1:22:_  - भीष्म साहनी के नाटक हानूश का यह सार है कि पहली घड़ी बनाने मे समय लगता है । बाद मे , उस जैसी तैयार करने मे समय नही लगता ।

कुछ इसी तरह का अंतर है -तीर्थंकर और सामान्य केवली में । 

तीर्थंकर अतिशयों से युक्त विशिष्ट ज्ञानी होते हैं जो कैवल्य प्रकट होने के बाद अन्यों के लिए भी सहायक होते है ।

दोनों के ज्ञान मे अंतर नही होता , उपकार की दृष्टि से उन का पूजातिशय अधिक होता है ।

1 :22:_ -  सिद्धशिला लोकाकाश के भीतर ही है ।  

अलोकाकाश मे तो धर्मास्तिकाय द्रव्य न होने के कारण वहां जीव की गति ही नही है ।

1 :28 :_ - ज्ञान के प्रकार आदि -ये नन्दी सूत्र के विषय हैं।

1:52:_ - तीन वाद का विश्लेषण अच्छा लगा ।

संदेहवाद और अज्ञेयवाद सुनना तो लगभग हौलनाक (anxiety-full) था । अपनी -अपनी तबीयत की बात है । इस तरह की स्थिति मे बंदा गति कैसे करेगा । 

Feels like black hole types. I get choke in these types of talks .

फिर स्याद्वाद ही सही है । वह श्योर नही है । संदेह भी होंगे । अज्ञेय को भी समझता है ,पर अपनी जानकारी के मुताबिक चल तो रहा है ।

2: 44:_ - कैवल्य का लोभ भी तो लोभ है । उत्तर सही था । शास्त्रीय शब्दावली है -यह प्रशस्त राग है ।

लोभ की स्थिति तो 12 वें गुणस्थान तक रहती है ।

मुक्ति और ध्यान  में क्लैरिटी नही थी ।

3:07:_ - संथारा का विषय बौद्धिकों मे सबसे ज्यादा न समझा गया  विषय है ।

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कुल मिलाकर अच्छा लगा । यह विडिओ सुनते हुए रिअलाइज हुआ कि जाने -पहचाने शब्दों और विषयों का भी राग होता है ।

# While I am not well . 

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Now only one month is left to rains . phuhh

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बुधवार, 31 जुलाई 2024

😔 जाति ना पूछो साधु की 


जाति प्रथा की कठोरताओं के बीच यह एक भारतीय आम सहमति है कि 
अगर एक व्यक्ति साधु के आचार की शुद्धता का पालन कर रहा है तो उसकी जाति न पूछे ।
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 बट ऐसी उच्च भूमि पर भी जटिलताएं होती  हैं ।
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फिर सांसारिक ऊँच -नीच के स्थानों पर तो इसकी भयावहता की कल्पना भी नही की जा सकती ।
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एक बार एक आलोचक की (शायद वे दलित होंगे) टिप्पणी यूं पढ़ी थी कि अगर तुम  रोटी -बेटी का संबन्ध  नही जोड़ते हो तो तुम्हारी प्रगतिशीलता हमारे लिए चूल्हे मे देने लायक है ।

लेकिन यह एक प्रलाप मात्र है ।

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मैने यह भी देखा है कि स्वयं जातिगत भेदभाव का शिकार व्यक्ति दूसरी नीची जातियों प्रति उतना ही कठोर होता है । 

यह एक नेगेटिविटी का दुष्चक्र है । 

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अगर तुम स्वयं को जाति के बंधनों से ऊपर उठा हुआ मानते हो ,तो बाकी लोगों से अपने अलगाव को साफ साफ समझो ।

यह अलगाव सिर्फ विचार का नही , आचरण का भी है तदनुसार कर्म का भी है ।

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जमाना तो पतन का है ही ।
 एक तो समानता और प्रेम के मूल्य पे चलता है और यहां दूसरा उस वितान मे घुसकर ,कब्जा करके उसी की जाति पूछता है ।
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श्री सुंदर मुनि जी म जाट हैं । 

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शनिवार, 27 जुलाई 2024

कल मनीष सिंह की पोस्ट बुद्ध धर्म के बारे मे थी । यह बात जैन धर्म पर भी उतनी ही लागू है । 

प्रतिकार की बात सही है , पर यह भी नही भूलना चाहिए कि महावीर स्वामी जी के सभी 11 प्रधान शिष्य ब्राह्मण थे । 

उन्होने अपने को जाति निरपेक्ष दिखाने के लिए अलग अलग जातियों के लोग शामिल नही किए ।

उनका मार्ग विशुद्ध चेतना की उच्चता का था ।

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मैं फेसबुक आऊंगी, जब दिल करेगा ।

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मंगलवार, 23 जुलाई 2024

जैन संत चातुर्मास शुरु होने के बाद सूई,धागा, रस्सी नही ले सकते ।एक बार एक बच्चा चातुर्मास पर के दौरान रस्सी उठा कर ले गया ।

अब क्या करें ?

मच्छरदानी कैसे लगाएं।

तो हमने घोषणा की ,जो हमारी रस्सी ले गया है देकर जाए। इस तरह रस्सी वापिस आई ।😂

#जैन संतो की अद्भुत चर्या 

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सोमवार, 22 जुलाई 2024

 हर गम ने, हर सितम ने हौसला दिया है।

हमको मिटाने वालो ने हमको बना दिया है।

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चातुर्मास का समय वर्षा ऋतु का होता है । गुरूदेवों की प्रवचन धारा को यूं उपमित करते हैं ।बाहर मेह बरसा , भीतर जिनवाणी का रस बरसा  ।😊

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Forwarded: 

21 जुलाई रविवार सेक्टर 11 रोहिणी दिल्ली 

जिंदगी मुस्कुराई 

जैनाचार्य श्री ज्ञानचंद्र जी महाराज साहब 

हर गम ने, हर सितम ने हौसला दिया है।

हमको मिटाने वालो ने हमको बना दिया है।

चाहे कैसा भी दु:ख हो, परेशानी आ जाए। पीछे हटने की जरूरत नहीं है। हिम्मत रखें जो आपको जिस कारण से मिटाना चाहता है उस कारण को समझो और उसे दूर करने के लिए पुरुषार्थ के साथ दुर्भाग्य मिटाने की आवश्यकता है। मैंने एक फैक्ट्री वाले को देखा। उसका कहना था कि हमारा कंपीटीटर हमें डाउन करने के लिए माल के भाव गिरा रहा है। हमारे बहुत नुकसान हो रहा है। हम क्या करते ? हमने मंगल पाठ सुना दिया। उसने हिम्मत नहीं हारी, उसी आइटम की डिजाइन बदलकर बेचा तो भी नहीं बिका, तीसरा आइटम बनाया वह भी बाजार में नहीं चला, तब परेशान होकर एक छोटी सी फैक्ट्री, एक मशीन का छोटा सा पार्ट बनाया, वो चल पड़ा। वह इतना बिका इतना बिका कि 3 वर्ष में तो उसने बहुत बड़ी मशीन लगा दी, मालामाल हो गया। अतः यह समझने वाली बात है कि हमको मिटाने वालों ने हमको बना दिया।

कंपीटीटर से घबराइये मत। बल्कि कंपीटीटर होना चाहिए, उसी से जागरूकता बढ़ती है। 

आपका व्यवहार नरम हो, विनम्र हो तो ही आप सफल हो पाओगे। 

लोहा नरम होने पर औजार बन जाता है।

सोना नरम होने पर आभूषण बन जाता है ।

मिट्टी नरम होने पर फसल बन जाती है ।

आटा नरम होने पर रोटी बन जाती है ।

इसी प्रकार इंसान नरम होने पर सबकी दिलों पर राज करता है। अतः अपने व्यवहार को नरम और सम्मान पूर्ण बनाओं तो जिंदगी मुस्कुराने लगेगी। 

एक पिता पुत्र में बहुत स्नेह था। पुत्र बाहर से पढ़कर आया, अब पिता पुत्र दोनों जहां भी जाते साथ जाते, साथ खाते, दोनों खुश थे। एक दिन पुत्र का दोस्त मिल गया, उसने कहा नया पिक्चर लगा है, देखने चलते हैं। तो वह बोलता है पिताजी के साथ जाऊंगा। तब दोस्त बोलता है। 

तू बच्चा है क्या जो पिताजी के साथ पिक्चर देखने जाएगा, आजकल तो बच्चे भी नहीं जाते। तू तो बड़ा हो गया, पढ़ लिख लिया लेकिन तेरी बुद्धि विकसित नहीं हुई। ठीक है जा पिताजी के साथ। हम तो अकेले अपनी पत्नी के साथ जाते हैं और दोस्तों के साथ जाते हैं, तभी मजा आता है। ऐसा कहकर वह चला गया। 

अब इसके मन में विचार आया मेरा दोस्त का तो ठीक रहा है, पिताजी के साथ कोई पिक्चर देखा जाता है। अंततः सोचते सोचते उसे पिताजी बंधन लगने लगे और दूसरे दिन प्रणाम करते समय पिताजी को बोल दिया कि मैं अब आपसे अलग रहूंगा, मेरा हिस्सा दे दो। पिताजी समझ गए कि इसका दिमाग खराब हो गया है। पिताजी समझदार थे वह समझ गए। उन्होंने कहा ठीक है कल हिस्सा दे दिया जाएगा। 

पुत्र चला गया। रात भर सोचता रहा की क्या-क्या लेना है। दूसरे दिन पिताजी के सामने जब गया तो पिताजी ने एक स्टांप पेपर पर जितनी भी चल अचल संपत्ति थी सब लिख कर दे दी और उसका मालिक अपने बेटे को बना दिया।

और यही कहा अब तक तो तुम मेरे साथ चलते थे, अब मैं तुम्हारे साथ चलूंगा और बंगले के सर्वेंट रूम में मैं और तेरी माता रह जाएंगे और तुम्हारे यहां नौकरी करेंगे। जब यह स्टांप पेपर पर लिखा हुआ देखा तो पुत्र के मन में विचार आया कि मैंने कैसी बात कह दी पिताजी तो महान है । उसने पिताजी के पैर पकड़ लिए स्टांप पेपर फाड़ करके फेंक दिए और बोला मुझे पैसा नहीं पिता चाहिए। दोनों गले मिल गए और घर में स्वर्ग सी स्थिति आ गई।

इसे कहते हैं जिंदगी मुस्कुराई।  

पहले पिता के साथ रहना अच्छा लगता था। क्योंकि प्रेम था, अब कलियुग के बढ़ते परिवेश में वह बंधन लगने लगा है। माता-पिता का साथ पुत्र पुत्रवधु की स्वच्छंदता पर कंट्रोल करके उनका जीवन बचाता है। इसी तरह गुरु शिष्य पर अनुशासन करके शिष्य का जीवन उन्नत बनाता है। लेकिन आज के युग में न पुत्र, न शिष्य। अनुशासन में रहना परतंत्रता समझते हैं। पिता एवं के साथ रहना सीखें तो ही जिंदगी संवरेगी।

जिंदगी को मुस्कुराते रहने के लिए क्रोध के समय जरा रूक जाओ। गलती की तो थोड़ा झुक जाओ, तो अपने आप सभी तरफ आपको प्रसन्नता के फूल खिलते मिलेंगे।

4 महीने में कुछ न कुछ नियम जरूर करें।

एक राजा के एक ही बेटी थी, राजकुमारी को 64 कला सिखाई। इसके साथ नैतिकता, सदाचार, शील सभी में उच्चता प्राप्त की। जवानी में आने पर भी प्रबल संयम था।

राजा और रानी दोनों अपने-अपने परिचितों के फंक्शन में गए। रानी ने अपनी सहेली के लड़के राजकुमार को पसंदकर उसके साथ अपनी बेटी की शादी की तिथि नक्की कर ली। इधर राजा ने भी अपने दोस्त राजा के लड़के को पसंद कर, अपनी बेटी की वो ही तिथि निश्चित कर दी, निश्चय करके महल में आए। दोनों अपनी अपनी बात कहने लगे और दोनों अड़ गए की शादी मैंने जो निश्चित किया, उसी के साथ होगी, कोई केंसिल करने को तैयार नहीं। दोनों तरफ से तैयारियां प्रारंभ हो गई। जोर शोर से तैयारियां होने लगी। राजकुमारी पर भारी संकट आ गया। उसकी क्या इच्छा है, यह दोनों ही पूछने को तैयार नहीं है।

अब देखिए किसके साथ शादी होती है। वो अगले रविवार को बतलाने का भाव है।

धर्म प्रभावना 

आज आचार्य प्रवर ने चार महीने शील पालने पर जोर दिया। तरह तरह से ब्रह्मचर्य का महत्व बतलाया तो करीब 25 जोड़ों ने प्रवचन में खड़े होकर शीलव्रत नियम 4 महीने के लिए ले लिया। इसी तरह से 24 भाई बहनों ने इसी चातुर्मास में अट्ठाई करने का संकल्प ले लिया। आचार्य प्रवर के समझाने की शैली विशिष्ट है कि हर किसी का मन कुछ भी नियम करने को तैयार हो जाता है।

बीसियों भाइ बहिनों ने चार महीने रात्रि भोजन का त्याग किया। तो 9 भाई बहिनों ने रात्रि में चौविहार रखने का नियम लिया।

इसके अतिरिक्त आचार्य प्रवर ने कच्चे पानी का त्याग कराया, पानी की उपयोग की मर्यादा कराई, पानी की व्यर्थ की हिंसा न हो, टंकी के ओवरफ्लो से गिरते पानी के हिंसा रोकें, भोजन की थाली सामने आने के बाद 1 मिनट भावना भाएं कोई संत मुनिराज पधारे तो दान दूं। उस 1 मिनट के दरमियान 5 नवकार मंत्र का जाप कर लें, आहार बहराते वक्त खाद्य सामग्री के हाथ लगाने से परहेज करें, क्योंकि हाथ के कीटाणु उस पदार्थ के लगकर महाराज को बीमार कर सकतें हैं। हाथ लगाना ही हो तो बर्तन के बाहर लगाने का विवेक रखा जा सकता है। सींक में हाथ मुंह धोती वक्त, पानी को चालू रखने से चार गुणा से अधिक पानी व्यर्थ जाता है, इससे बचें।

सामायिक, प्रतिक्रमण कंठस्थ करें। यह सबसे अधिक जरूरी है।

कीचन में सब्जियां बिखेरे नहीं, कच्चे पानी का उपयोग न हो अन्यथा, उन पर बार बार पैर पड़ने पर हिंसा बढ़ेगी।

उपस्थित सभी बहिनों ने आचार्य प्रवर के निर्देशानुसार यथासंभव अधिक से अधिक नियम लिए।

आज गुरु पूर्णिमा का दिन है। आप भी चार महीने के लिए कोई न कोई नियम लेकर गुरु दक्षिणा देने का ध्यान रखना आवश्यक है। तेला तप की कड़ी चालू हो गई। आज का तेला सुनिता जी जैन, बेला मंजू जी जैन, उपवास पूजा जी जैन शक्ति नगर का रहा।

*28 जुलाई रविवार प्रवचन का विषय मनी प्लांट समय का विशेष ध्यान दें सवेरे 8:30 से 9:00 तक प्रश्न उत्तर प्रतियोगिता और 9:00 बजे से प्रवचन प्रारंभ होना संभावित है। समय रविवार का बदल दिया गया है। विशेष ध्यान लगाए प्रतिदिन का प्रवचन 8:15 से 9:30 बजे तक होना संभावित है।*

श्री अरिहंतमार्गी जैन महासंघ सदा जयवंत हों

गुरुवार, 18 जुलाई 2024

आज गुरूदेव श्री रामप्रसाद जी महाराज की पुण्य तिथि है ।

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सोमवार, 15 जुलाई 2024

हमारे यहाँ श्री ज्ञान चन्द्र जी म सा और जागृति जी म सा का चातुर्मास है । 

20 -7-24 से शुरु होगा ।ऑफिशियली 😊

सब जगह शुरु होंगे ।

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चातुर्मास की शुरुआत की महिमा एक कृषक प्रसंग से यूं बताई जाती है कि सही ऋतु में बीज बोने वाला किसान बाद में पछताता नही , उसी तरह गुरुओं के सानिध्य मे धर्म ध्यान करने वाला भी पछताता नही है । 

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गुरुवार, 11 जुलाई 2024

 मैने 'मेरे धार्मिक विमर्श 'नाम से दो पोस्ट लिखी है । ये पोस्ट उन बौद्धिक असमंजसों के शमन को दिखाती हैं ,जो महावीर वाणी पढ़ने के दौरान हुए। 

मै लिखने लगूं , तो ऐसी सैकड़ो बातें निकल आएंगी । 

बात बौद्धिक सुलझाव की है ,बट उससे पहले श्रद्धा की भी है ,जिसका स्रोत गुरु हैं । 

साथ ही स्वयं के यथाशक्ति तदनुसार आचरण की भी है । शायद तभी वह चित्त विश्रान्ति प्रकट होती है , जिसके बाद कुछ पाने की दौड़ मंद पड़ जाती है ।

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बुधवार, 10 जुलाई 2024

यह सही है कि मुझे आत्मज्ञान संबंधी चर्चा मे संतोष मिलता है ।इस दिशा मे अन्य की रूचि और प्रगति देखकर वास्तव मे मुझे आनन्द मिलता है ।

मेरी स्वयं की धारणा जैन विज्ञप्ति अनुसार स्थिर हो गई है । वर्तमान मे मै श्रावक धर्म पे यथाशक्ति* अनुसार चल रही हूं । इससे आगे प्रगति की संभावना यही है कि मै अपने व्रतों मे और शुद्धता लाऊं ।

बस।

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मोस्टली मै मन की प्रेरणा से ही कार्य कर पाती हूं । 

प्राकृत गोष्ठी पिछले साल हमारे यहां रोहिणी मे ही गुरूदेव के सानिध्य मे हुई थी । तब मै जुड़ नही पाई थी । पहले असमंजस रहा ,कि क्या बौद्धिक तरीकों से इस तरह की चर्चा को समझा जा सकता है । 

बाद मे कुछ मन हुआ तो , व्यवस्थाएं बन चुकी थी । उनमे परिवर्तन संभव नही था । 

अब मेरी धारणा यह है कि बौद्धिक गतिविधियां प्रज्ञा पर जमी धूल को हटाने का काम करती हैं । बाकी तो जिसने जो ग्रहण करना है , वह व्यक्तिगत ही होता  है ।

तो इस तरह अब मै इस गतिविधि से जुड़ी।  

यहां भी कुछ पक्का नही है । मुझे मन से सही लगेगा तो मै जुड़ूंगी । समय की उपलब्धता की बातें भी होती है । एटसेटरा 

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*यह लिखना अति आवश्यक है । क्योंकि भारत देश मे दूसरों के आचरण में  छेद ढूंढने वाले भरे पडे हैं ।

सही बात है । आचार पालन की कोई अंतिम सीमा भी नही है ।

 इसलिए हमने तो पहले ही अपनी शक्ति की सीमा को स्वीकार करते हुए,यथाशक्ति,  कह दिया है ।







यह मेरे द्वारा प्रस्तुत शोध लेख की सिनोप्सिस है । 

उनके यहां से बहुत से विषय सुझाए गए थे । उनमे से किसी एक विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत कर सकते थे । 😊


सोमवार, 8 जुलाई 2024

आज तो धूप चमकीली थी । हवा भी चल रही है इन दिनों ।

गुरूदेवों को साता होगी ।

पीछे कितनी गर्मी हो गयी थी ।

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रविवार, 7 जुलाई 2024

 श्रुत रत्नाकर संस्थान द्वारा तीसरी प्राकृत गोष्ठी का आयोजन गोहाना मे गुरूदेव श्री जय मुनि जी म के यहां कराया जाएगा । तारीख है -28,29,30 अक्टूबर,2024 ।

मैने भी एक रिसर्च पेपर तैयार किया है । 

Let's see wt happens. 

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दीवाली 31 की या 1 नवंबर की है । don't know .

I do things .I don't do things .☺️

यह काम मेरे मन के सबसे नजदीक है ।

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बुधवार, 3 जुलाई 2024

एक बात इस तरह कही जाती है -come under my skin then feel the pain .

हकीकत यह है कि कोई किसी की जगह आ ही नही सकता ।

फिर क्यों कहा गया है यह । क्यों शब्दों को व्यर्थ जाया किया । 

इसलिए कि यह तो संभव नही है कि कोई किसी की जगह आ  सकता है बट यह समझना तो संभव है कि कोई किसी की जगह आ  नही सकता ।

समझ की दुनिया में होने के ये ही लाभ हैं ।

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Lop राहुल गांधी जी की स्पीच मुझे तो अच्छी लगी । इनका नेचुरल स्टाइल एग्रेशन का है ।

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रविवार, 23 जून 2024

 Cuet  का पेपर भी 12 घन्टे पहले कैंसिल हुआ था । अब पता नही रिजल्ट का क्या करेंगे ।

#nta irregularities 

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शनिवार, 22 जून 2024

समारोह पूर्वक बलि वध के लिए ले जा रहे एक पशु के साथ हुए विश्वासघात पर जब एक लेखक लिखता है ,तो वह उस पशु की चेतना मे हो रहे संघात से एकाकार हो चुका होता है ।

यह कोई मामूली परिवर्तन नही है । 

यह चार दुर्लभ अंगों -मनुष्य भव , जिनतत्व श्रवण,श्रद्धा , वीर्यकार पराक्रम - मे अंतिम अंग की भूमिका है । 

तत्व मे श्रद्धा करके जीव तदनुसार आचरण के उठता है वह द्विविध होता है -साधु और श्रावक।

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यह पराक्रम, सचमुच में बड़ी ही दुर्लभ चीज़ है। क्योंकि इसमें व्यक्ति स्वयं अपने प्रति ही बेहद निर्मम,  कठोर हो जाता है।

 स्वाद वृत्ति को जीतना , यह कोई मामूली बात नहीं है। स्वाद* के आगे ज्ञान कुछ काम नहीं आता। जितना मर्जी समझा लो। कोई फर्क नहीं पड़ता। 

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यहां तक हुई इस पक्ष की एक बात

अब आगे च्वाइस की बात को देखते है । 

यह कहा गया कि मोक्ष मनुष्य जीवन का अंतिम डेस्टिनेशन है । इसके आगे फिर कुछ प्राप्त करना नही बचता ।

बट ऐसे महत्वपूर्ण ज्ञान को बताने के लिए भी भगवंतों ने फरमाया -पूछने पर ही जवाब दे ।इसलिए इसका नाम श्रुत परम्परा है । शिष्य के पूछने पर, गुरुमुख से सुने हुए ज्ञान की परम्परा।

क्यों?

क्योंकि जब व्यक्ति संयम जैसी उत्तम चीज को भी मन से स्वीकार नही करता ,तो उसके ज्ञान ग्रहण मे अन्तर आ जाता है । इसे ज्ञानान्तर कहते है ।

ज्ञानान्तर से भयानक दोष उत्पन्न हो जाते है ।

हम देखते है कि श्रेष्ठ धर्म परम्पराएं भी आगे जाकर विभाजित होती जाती है । विभाजित हुई परम्पराएं कभी दोबारा मिलती नही ।

मूल सत्य कही वीराने मे पड़ा रोता रहता है । उस तक पहुँचने का रास्ता कठिन होता जाता है 

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आध्यात्म के क्षेत्र मे रखी गई ऐसी सूक्ष्म सावधानी का 'मांस खाने की च्वाइस  कहना कुतर्क है  ।

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अब मै एक और पहलू की चर्चा करना चाहती हूं।

जीवदया जैन विज्ञप्ति का मुख्य प्वाइंट है ,इसमे कोई शक की बात नही है ।

साथ ही इस विज्ञप्ति के अन्य मुख्य बिन्दु भी है । जिनमे से एक है मोहनीय कर्म  । यह आठ कर्मो मे चौथे नम्बर का है । वैसे तो मोक्ष प्राप्त होने मे ज्ञानावरणीय कर्म की बाधा होती है , पर मोहनीय कर्म की प्रबलता के आगे सब कर्म फीके पड जाते है ।

मोहनीय कर्म =तीव्र राग -द्वेष।  इसका बन्ध काल बहुत बहुत ज्यादा होता है ।

जैन दर्शन मे द्वेष को भी बन्ध का कारण माना गया है ।

..

पशु अधिकार की पोस्ट के जवाब मे नाॅन वेज की पिक , द्वेष स्थान है । 

अपनी रक्षा करो वहां से । 

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सुशोभित स्वयं को एथिस्ट कहते है पर जीवदया के लिए उनके आग्रह श्रमण धर्म से मिलते जुलते है ।

श्रमण जैन धर्म भी ,एक प्रकार से , धर्म के नाम पर फैले देववाद ,बलिप्रथा आदि का घनघोर विरोधी है ।

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कल संगत पे सुधीश पचौरी का इंटरव्यू सुना था । शानदार।

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*इंडिया मे एक बहुत बड़े पक्षी विज्ञानी हुए है -सालिम अली । उनका पूरा जीवन पक्षियो के अध्ययन मे गुजरा । बट वे चिड़िया का मांस खाते थे । लोगो को अचरज हो कि एक ओर चिड़ियों की ऐसी जानकारी ,

दूसरी ओर उनका भक्षण ।

यह द्वैत तो है , पर यह इंसान के अस्तित्व मे ही पैवस्त है । इसे कैटेगराइज़ नही कर सकते ।



गुरुवार, 20 जून 2024

परसों जो मैंने पेंटिंग की पिक शेयर की थी, वह चित्रकार विजय बिस्वाल की बहुत सराही जाने वाली कृतियों में से एक है। वे खुद इसका कारण नहीं जानते कि एक साधारण चूल्हे की पेंटिंग को क्यों इतनी सराहना मिलती है।

 सचमुच ही यह तो समझने की बात है कि घर का साधारण चूल्हा,  हर घर में मिल जाता है ,अगर उसे रंगों से संवार दिया जाए, तो वह दर्शक के भीतर ऐसा क्या सम्मोहन जगाता है कि वे उसकी सराहना करते हैं।

 मेरी समझ में तो इसका उत्तर यही हो सकता है। यह जीवन है।

 अज्ञात कारणों से जब जीवन के ऊपर दबाव बढ़ता जाता है तो कलाकार की चेतना उन वस्तुओं में जीवन के आनंद को ढूंढती है जो बिल्कुल साधारण रूप में है।

 जीवन के साधारण चित्रों में , छिपी हुई है -  जीने की ,जीवित होने की अदम्य आदिम लालसा।

कुछ इसी तरह का भाव है'  दर्पण मांही आग ' सीरीज की स्मृति चित्रमाला में।

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 डायरी के नोट देखे तो, साल के हिसाब से 'उववाई ', यह शास्त्र 2017 से पहले पढ़ा गया है। 16 भी हो सकता है ।15 भी ।  उस समय इसको पढ़कर मुझे अपनी कजिन बहन की शादी के मंजर याद आए थे। मैंने उसे एक कहानी के रूप में लिखना चाहा था। लिखते -लिखते लगा कि यह तो एक लघु उपन्यास ही बन जाएगा। पर वह बात वहीं रह गई ।

आगे यह बात इस रूप में सामने आई है ।सही फार्म मिलने मे इतना समय लग गया ।

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My 2024 is done ✔️ 

अब तो पुराने पेंडिंग काम पूरे करने है ।

आगे की आगे देखेंगे।  

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सोमवार, 17 जून 2024

दर्पण मांहि आग - विशाखा

चार 

गोल गप्पे

पापा ने विशाखा को मना किया था की भामनों के घर नही जाना । क्यों? कह दिया ना ! कह दिया ना ! बस। इसके आगे कोई जिरह या बहस की गुंजाइश नहीं थी। पापा की बहुत सारी 'नहीं'  के पीछे, अनजाने -छुपे हुए डर , संदेह थे , जिनकी उलझी गाठों को वे आजीवन सुलझा नहीं सके। पर  सिचुएशन ,  जगह  और वक्त के हिसाब से अपने बच्चों के लिए सटीक निर्णय लेने में वे कभी नहीं चूके। इसके लिए उन्हें हरहराते समुद्र में भी कूदना पड़ा तो वे बेझिझक कूद गए। चाहे वे तैरना भी ना जानते थे। ये सब साहस के कार्य वे  'एकमात्र ' अपने बच्चों के प्रति अपार वात्सल्य भावना के कारण कर पाए।

 पापा ने मना किया था, इसलिए विशाखा कभी भामनो के घर के अंदर नहीं गई। पर बाहर दरवाजे की दहलीज पर खड़े रहकर भामिनी को गोलगप्पे बनाते हुए देखने में क्या हर्ज था? 

भामनी ऊंची -लंबी  ,तीखे नैन नक्श की, पतले गात की महिला थीं। वह साड़ी सीधे पल्ले की बांधती थी। वह लकड़ी के फट्टे पर गूंथे हुए आटे की छोटी छोटी पेड़िया बेलन से बेलकर बड़ी कढ़ाई में छोड़ती जाती थी। गर्म तेल में छोटी छोटी पूरियां तुरंत फूल कर गोल गप्पे बनते जाते थे ।भामिनी उन्हें बड़ी झार में निथार कर लकड़ी के टोकरे में डालती जाती थी। विशाखा खड़ी हुई देखती जाती थी। 

आ जा वीशू- भामनी कहती।

 वह ना में सिर हिला देती। 

यह नहीं आएगी- भामनी का युवा लड़का रामफल कहता। 

विशाखा भागकर अपने घर में घुस जाती। घर में चर्चा थी कि रामफल बस अड्डे पे गोलगप्पे का ठेला लगाता है।



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दर्पण मांहि आग -तीन भाग में एक बाल पुस्तक श्रृंखला है । यह एक स्मृति चित्र कथा है , जिसमें एक बच्ची विशाखा का जीवन आया है । 

यहां मैने कुछ प्रसंग शेयर किए थे । अभी दूसरे और तीसरे भाग का कार्य बाकी है ।

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रचना प्रक्रिया पर एक पूर्व पोस्ट-

 श्रेष्ठ रचनात्मक कला का यह एक अनिवार्य प्रकार्य मैंने देखा है की वह आस्वादी के भीतर कुछ बदल देता है। बेशक फौरी तौर पर वह स्वयं उस तरह की रचना न कर सके, पर धीरे -धीरे परिपक्वता पूर्ण होने पर वह स्वयं भी इस तरह की रचना करने के काबिल बन जाता है।

खुद मेरे साथ यह हुआ है । अब तक , तीन बार। सुधा अरोड़ा जी की कहानी है- औरत : तीन बटा चार । यह कहानी मैंने कई बार पढ़ी है । पढ़ी,पढ़ी, पढ़ी । पता नही क्या ट्रिगर हुआ । पोशाक कहानी क्लिक हो गई।  

जैन आगम 'उववाई ' के ' रिच' भावपूर्ण वर्णन पढ़ते हुए मुझे नाते मे बड़ी बहन की शादी के मंजर याद हो आए थे । मैने उन्हे एक कहानी मे लिखने की कोशिश की थी । बट सही फार्म नही मिली थी । 

ऐसा होता है ना! कि लाइफ मे एक मोमेंट पर आपने बातों को कैसे समझा-जिया , बाद मे परिवर्तित जानकारी मे उन पिछली बातों का भी स्वाद बदल गया ।तो चीजे काम्प्लेक्स हो गई। बट फिर भी आप पाते हो कि उस पिछले समय मे जिस तरह बाते देखी थी , उनका मजा विलक्षण था ।

तीसरी बार ऐसा हुआ। मैं पत्रकार रवीश कुमार* के एफबी को फॉलो करती हूँ। उन्होने अपनी टाइमलाइन पर सॉन्ग शेयर किया था ।यह एक अंग्रेजी गाने का लिंक था। वह गाना था- फ़िल्म साउन्ड ऑफ म्यूजिक का दीज़ आर् माई फ्यू फ़ेवरेट थिंग्स। इस गाने की एनर्जी इतनी जीवंत और तुरंत फैलने वाली थी कि मेरा मन बहुत खुश हो गया था। इस गाने की वजह से, मैं भी अपने बचपन में पहुँच गई थी।

बाद में मैंने उसे एक कहानी में ढालने की कोशिश की, पर वह बात नहीं बन पा रही थी। फिर वही समस्या। मनचाही फॉर्म नहीं मिल रही थी। मुझे लगता है , अब जाकर वह समस्या सॉल्व हुई है। देखो ! आगे क्या सामने आता है।

* लेखन में प्रसिद्ध लोगों का जिक्र करना अनुकूलता -प्रतिकूलता के पैमाने पर देखा जाता है।

अनुकूलता है तो, यह बात प्रसन्नता की लगती है।

प्रतिकूलता है तो , यह बात 'हमारी प्रसिद्धि में जबरन शेयर लेना चाह रहे हैं ' इस टाइप से निकल कर आती है। 

मैं इस बात को तथ्य के तौर पर दर्ज करती हूँ। और इस तथ्य के द्वारा रचनात्मक अनुभव की प्रक्रिया पर भी कुछ रौशनी डल जाती है।

यहाँ ब्लाग पर प्राइवेटली इस बात को इस तरह लिखने में तो मुझे लगता है कि यह दोष नहीं लगेगा। अगर कभी इस बात को प्रकाशन में कहने का अवसर आया तो फिर यह बात कैसे कही जाएगी, जब की तब देखेंगे ।

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किताब छपने का मुझे नही मालूम। सहृदयों ने यहां पढ़ लिया , मेरे लिए तो यही प्रकाशित होना है ।

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रविवार, 16 जून 2024

विशाखा-3- काला कौआ

विशाखा पहली क्लास में थर्ड आई थी। स्कूल से इनाम में एक लंच बॉक्स और एक लाल रंग की बड़ी गेंद मिली थी। वह खुशी के मारे सबको दिखाती हुए घूम रही थी । पहले दादी को दिखाई , मम्मी को, ताई के बच्चों को, फिर सामने गली में  एक घर छोड़कर बुआ को दिखाने गई। बुआ उसे देखकर खुश हुई और कहा- अच्छी बात है। वह अड्डे पर दरी बना रही थी ।

विशाखा उछल- उछल कर सबको अपनी गेंद दिखा रही थी । उसकी खुशी संभल नहीं रही थी। कभी वह इस घर में घुसती, तो कभी उस घर में। उत्साह की मारी वह ओम बाबा के घर तक चली गई।

 घरों में काम कर रही महिलाएं-  कपड़े धोती हुई, कपड़े सुखाती हुई, झाड़ू से चौंक धोती हुई, सब्जी काटती हुई, सब्जी बनाती हुई , आटा गूंथती हुई, रोटी बनाती हुई - उसका उत्साह देखकर बहुत खुश थीं।

उसके पीछे सब बच्चे लगे थे। उनके हृदय ईर्ष्या की आग में जल रहे थे। वे बस पास हुए थे। उन्हें कोई इनाम नहीं मिला था।

 आह ! कितनी बढ़िया गेंद है  ! कैसा लाल रंग है  ! काश वे भी ऐसी बॉल ले पाते ! - वे बड़ी हसरत से बॉल की ओर देख रहे थे। वे विशाखा के आगे इसरार भी कर रहे थे कि  एक बार वह उन्हें  भी बॉल हाथ में दे दे। बाॅल हाथ में लेकर देखने के बाद वे वापस दे देंगे।

 क्यूं दूँ?  मेरी हैं। मुझे इनाम में मिली है। मैं थर्ड आई हूँ। मैं नहीं दूंगी। - कहती हुई विशाखा इतरा रही थी।

 तभी काके ने बॉल पे झपट्टा मारा।  वह बॉल को लेकर अपने घर की ओर भागा। विशाखा चिल्लाई । वह भी काके के पीछे भागी।। सारे बच्चे भी भागे ।  भागते हुए काके अपने घर में गया और अड्डे में काम आने वाला एक लंबा सुंआ बॉल में ठोक दिया।

 फटाक! -  बॉल गुब्बारे की तरह फट गई।

 ये ले अपनी बॉल - काके ने लाल प्लास्टिक विशाखा की ओर फेंक दी।

 विशाखा ज़ोर से चिल्ला कर रो रही थी ।  उसे काके काला कौवा प्रतीत हुआ, जिसने सख्त चोंच से उसकी खुशी को नोच लिया था। काके का रंग काला था। वह ज़ोर ज़ोर से रो रही थी।

 मेरी बाॅल तोड़ दी। 

काके ने मेरी बाॅल तोड़ दी । 

बुआ कमरे में आयी। उसने उसे दुलारा -पुचकारा । काके को डांटकर भगाया। बुआ ने उसे आश्वासन दिया कि वह ऐसी बॉल दूसरी ला देगी । उसने उसे खाने की चीज़ दी। तब जाकर विशाखा का रोना कम हुआ। 

रात को विशाखा ने  पापा के आगे काके  की शिकायत लगाई। पापा ने सारी बाते सुनी और कहा - बस ! तू थर्ड आयी है। फर्स्ट क्यों नहीं आयी।

एं -  उसका रोना बंद हो गया।

यहाँ  काके ने  मेरी बॉल फोड़ दी। पापा को फर्स्ट आने की पड़ी है-विशाखा के मन में आया।



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शनिवार, 15 जून 2024

विशाखा -2 - सुलेख


विशाखा का दाखिला दुर्गा भवन स्कूल में हुआ था। उसकी बुआ, ताई और गली के बच्चे वहीं जाते थे।

दोपहर में कभी बुआ, तो कभी मम्मी - सभी बच्चों को घर ले आते। यह स्कूल रेलवे स्टेशन के पास था। पहले उसका दाखिला घर के पास में एक पाठशाला में हुआ था। मैडम ने किसी बात पर विशाखा को कई चांटे मार दिए। पापा को यह बात पता चली तो उन्होंने वहाँ से उसका नाम कटवा दिया। अनुशासन के नाम पर अपनी बेटी की पिटाई वे नहीं सहेंगे।

 नए स्कूल में और गली में , विशाखा को अपने मुकाबले में नीतू लगती थी। वह ओम बाबा की पोती थी। बाकी काके, काके का भाई सोनू, अपनी ताई के बच्चों में विशाखा श्रेष्ठ थी ।काके उसकी बुआ का बेटा था ।

 पांच लाइनों की इंग्लिश की कॉपी में छोटी एबीसीडी लिखते हुए विशाखा ने नीतू के लेख से अपने लेख का मिलान किया तो उससे नीतू के अक्षरों में चैन महसूस हुआ । उसे अपने लेख में एक अनिश्चिंतता सी लगी ।

क्या कारण हो सकता है?उसने सोचा। तो उसने देखा नीतू तो अपनी पेंसिल शार्पनर से छिलती है। उसकी पेंसिल की नोंक लंबी ,बारीक, चिकनी निकलकर आती है। 

 वह अपनी पेन्सिल मम्मी से छिलवाती है। उसकी मम्मी पेन्सिल चाकू से घट कर देती है। पेंसिल की नोंक छोटी, मोटी और ऊबड़- खाबड़ दिखती है।

 यही कारण हो सकता है ,  लिखाई में अंतर का। विशाखा का लेख भी सुंदर था। पर नीतू के मुकाबले वह कभी अपने लेख से संतुष्ट नहीं हुई।
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शुक्रवार, 14 जून 2024

विशाखा -1

 सुबह 

 घर में सुबह होने की हलचल की आवाजें थी। विशाखा उठकर चौंक (आंगन ) में आई। अंगीठी पर छोटी पतीली में चाय बन रही थी। चाय का रंग हल्का भूरा था। उसकी भाप और खुशबू पूरे चौक में फैली थी। पापा 7:00 बजे की गाड़ी में काम पर जाने के लिए तैयार थे। मम्मी ने रोटियां बना दी थी। सब्जी भी। चाय गिलास में छान रही थी। दादी एक तरफ कमरे की डोली पे बैठी थी। ताई अपनी तरफ के आंगन की डोली पे खड़ी थी। उसकी लड़कियां स्कूल ड्रेस में तैयार थी।

 वहाँ सर्दी की धुंध थी। सबके मुँह से भाप निकल रही थी। वे सब - बाबा , पापा गर्मी के लिए अंगीठी के आसपास खड़े थे। हाथों को जल्दी- जल्दी रगड़ रहे थे । उनकी बातें अलाने- फलाने लोगों की जिंदगी की आकस्मिकता से जुड़ी थी। 

 विशाखा भाग कर गली में गयी। वहाँ एक घर के आगे अंगीठी रखी थी। कोयला जले तो धुआं उठता है। धुआं घर में न फैले, इसलिए उसकी सीलन को खत्म होने तक, सब लोग अंगीठी गली में रख देते थे। यह सुबह शाम की नियमित दिनचर्या थी। ऐसा करने से एकबारगी तो पूरी गली धूँए से भर जाती थी। थोड़ा छंटने पर सब अपनी अंगीठियां अंदर ले आते थे।

 विशाखा वापिस चौंक में आ गई।

 इसका दूध बना दे -  पापा ने मम्मी को कहा।

 मम्मी ने एक गिलास में गर्म दूध डाला। चीनी मिलाई। विशाखा ने दूध पिया। उसे दूध का स्वाद बहुत अच्छा लगता था ।

 आ जा चाचा ! -  विनेश ने गली में से आवाज लगाई।

 आया- कहकर पापा चले गए।

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रविवार, 9 जून 2024

 पन्नवणा -  1-2-3 । a year read probably. Yippee.....


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संवर , सामायिक, संयमासंयम (श्रावकपन), संयम (मुनि जीवन) -यही है सार जीवन का ।

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मंगलवार, 21 मई 2024

कल हम गोहाना गए थे । गुरूदेव श्री सुशील मुनि जी म ने पन्नवणा सूत्र पढ़ने की कृपा फरमाई है । 

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अब की बार गुरूदेव जयमुनि जी का चातुर्मास भी गोहाना मे ही है । कुछ चक्कर ज्यादा लग जाएंगे। 

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गुरुवार, 16 मई 2024

धार्मिक विमर्श की पुरानी पोस्ट

 1

lets talk one -two thing so that when we reach 3-4-5 thing ,we automatically understand 6-7 thing .

इस पोस्ट के लिए मैंने टॉपिकों की थोड़ी- बहुत सूची बनाई थी जो इस प्रकार हैं –उदासीनता< मैं ऐसी क्यों हूं <मेरे धार्मिक विमर्श< व्रतों का स्वरूप <टीम | लेकिन मैं इसका विश्लेषण टॉपिक वाइज नहीं कर रही | अभी बात शुरू करने के लिए मैं पहले मेरे धार्मिक विमर्श से शुरू कर रही हूँ |


 एक बार मैंने पहले भी लिखा था कि मेरी लाइफ का ग्राफ ऐसा रहा है कि समुद्र की लहर की भांति एक लहर साहित्य की ऊपर की ओर ; और दूसरी लहर धार्मिक अध्ययन की नीचे की ओर. साथ साथ चली है |

 धर्म मेरा प्रिय विषय है |मुझे उस पर बात करना हमेशा अच्छा लगता है और इस पर बात करने से बात शुरू हो जाएगी |क्योंकि अभी मन खराब है| इस पर बात करूंगी तो  मन भी ठीक हो जाएगा |


< मेरे धार्मिक विमर्श से तात्पर्य है कि जैन आगम पढ़ते हुए मैंने जिन जिन बातों को जैसे समझा है यह मेरा नजरिया , बातों को समझने का मेरा वर्जन है | 


इसमें मैं हूं -नीरू जैन -जो हरियाणा में जन्म हुआ है |परिवार के बीच में रही है |उसके कुछ अनुभव हैं |अच्छे –बुरे |और एक हिंदी शेत्र में पले- बड़े होने के कारण उसके कुछ विश्वास है |जो सही है या गलत ,वह नहीं जानती| जब वह गुरुओं के संपर्क में आती है तो उनकी श्रद्धा की वजह से वह अध्ययन करती है | साथ ही साथ उसने साहित्य भी पढ़ा है | साहित्य की ट्रेनिंग की वजह से इन् धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन उसके लिए बहुत रसपूर्ण बन गया है और वह कौन-कौन से स्थल हैं जिसने उसकी सोच को बदला है| जिसकी पुरानी सोच जो हिंदी शेत्र में रहने के कारण बनी है ,हिंदी से बनी है वह कैसे नई जानकारी से टकराई और उससे उस में क्या परिवर्तन आया -यह मेरे धार्मिक विमर्श हैं |

मेरे धार्मिक विषयों के अंतर्गत यह टॉपिक हैं -

• परिवार का मिलना पुण्य होने की निशानी है |

• वह गुफा में चंपक लता की तरह बढ़ने  लगा|

• एलक अध्ययन में मानों वह आदेश की प्रतीक्षा करता है |

• विशेषण में रानी धारिणी का प्रीतिमना होना 

• उववाई के रिच विशेषण 

• पाप रुचि -शब्द ने झटका दिया |

• राजा की अवधारणा |

• स्वार्थ शब्द का सुंदरतम अर्थ

 पहला- परिवार का मिलना पुण्य की निशानी है |उत्तराध्ययन सूत्र में एक अध्ययन है उसमें 10 बोल आए हैं कि जीव को पिछले जन्म के पुण्य के फल स्वरुप 10 बोलों की प्राप्ति होती है जिसमें पहला बोल चार कामस्कन्ध –क्षेत्र,वस्तु ,सोना ,पशु-दास वर्ग है |शेष नौ अंग हैं –मित्र,ज्ञाति,उच्च गोत्र ,सुंदर वर्ण ,बीमार कमहोना,महाप्रज्ञाशाली,अभिजात,यशस्वी,बलवान है | 

क्योंकि हम हरियाणा के हैं और हरियाणा में बड़े- बड़े परिवार होते हैं |हमारा परिवार भी बहुत बड़ा है |जहां ज्यादा बर्तन होते हैं उनमें टकराते बहुत हैं| तो टकराव की वजह से यह था कि मुझे यह अच्छा नहीं लगता|

लेकिन जब मैंने पढ़ा कि बड़े परिवार का मिलना तो पुण्य की निशानी है तो मैंने अपने गुरु- गुरुदेव रामप्रसाद जी महाराज (गुरुदेव सेठजी महाराज के छोटे भाई  )से पूछा भी था कि क्या बड़े परिवार का होना पुण्य की निशानी है| तो गुरुदेव ने हंसकर कहा था कि हां !अगर कोई इंसान अकेला है, तो अकेला क्या कर लेगा | 


दूसरी बात -ज्ञाता धर्म कथा में मेघ कुमार जी के जन्म के वर्णन में यह शब्द आया कि वह गुफा में चंपक लता की तरह बढ़ने लगा |इसने भी मेरी सोच को बहुत बदला था |

अभी जैसे परिवार मे हमारे जो व्यक्तिगत अनुभव होते हैं वह थोड़े कुछ अच्छे बुरे होते हैं तो उसकी वजह से टीनएज लड़के -लड़कियों में इस तरह का गुस्सा बन जाता है |अपने माता-पिता के प्रति इतना गुस्सा बन जाता है कि हमें लगता है कि हम आजाद नहीं है |ऐसी बातें होती हैं |हम उनकी सुरक्षा मे घुटन महसूस करते हैं |पर यहाँ जब मैंने पढ़ा कि गुफा मे चंपक लता की तरह बढ़ने लगा ,तो इसमे तो मुझे कहीं घुटन नजर नहीं आई |अपनी सोच पर हैरानी हुई – अरे ! मैं तो कैसे (ना) समझती थी इस बात को | 

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जैनागमों की विशिष्ट भाषिक अभिव्यक्ति ने भी मुझे बहुत चमत्कृत किया है | उदाहरण के लिए उत्तराध्ययन सूत्र में- औरभरीय अध्ययन में यह आया है कि मालिक ने बकरे को खिला पिला कर मोटा ताजा बना दिया है और अब वह बकरा मानो आदेश की प्रतीक्षा करता है |आदेश का अर्थ -अतिथि | तो यह भाषिक अभिव्यक्ति बड़ी चमत्कार पूर्ण थी क्योंकि मैंने समझा कि बकरा क्यों मृत्यु की प्रतीक्षा करेगा | लेकिन क्योंकि मालिक ने तो उसे इसीलिए खिला पिला कर मोटा ताजा बनाया है कि वह अतिथि के आने पर उसे काटकर खिलाएगा |तो अब क्योंकि वह खिला पिला कर मोटा ताजा बन गया है तो अब मालिक के साथ जैसे मानो वह  भी अतिथि की प्रतीक्षा करता है| यह अभिव्यक्ति बहुत चमत्कारपूर्ण लगी थी मुझे |ऐसे बहुत उदाहरण हैं |

विशेषणो की दृष्टि से अगर जैनागमों को पढ़ा जाए तो यह एक समृद्ध साहित्यक अनुभव है | शुरुआत में इन आगमों के प्रति मेरा आकर्षण इनकी साहित्यिक विशेषताओं के कारण ही बना| बल्कि मैंने ‘जैनागमों में आए कतिपय साहित्यिक स्थल’ के नाम से लेखों की एक श्रृंखला भी लिखी है जो स्वाध्याय दर्शन नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई है | उदाहरण के लिए- ज्ञाताधर्मकथा में राजा श्रेणिक की रानी धारिणी ने पूर्व रात्रि में एक स्वप्न देखा है कि एक विशालकाय हाथी लीला करता हुआ उसके मुख में समा गया| यह स्वप्न देख कर उसका मन प्रसंता से भर गया| वह अभी शैया पर ही बैठी है | उस समय की उसकी स्थिति को कितने सुंदर शब्दों में बताया गया है| इसी तरह उववाई मे राजा के, राजा की नगरी के , उद्यान के, वृक्षों के वर्णन और मंदिर के वर्णन विशेषण की दृष्टि से इतने रिच हैं कि यह अपने आप में एक है समृद्ध साहित्य का अनुभव है|


पाप रुचि –इस शब्द ने मुझे बहुत झटका दिया | शायद हिंसा के कारणों की व्याख्या में मैंने इस शब्द को पढ़ा था कि जहां यह बताया गया था कि संसार में हिंसा के क्या कारण होते हैं| पशुओं के प्रति हिंसा उनके नख ,केश, दूध, मांस, हड्डी ,दांत , खाल के लिए करते हैं |मनुष्य के प्रति हिंसा लालच में और धन के लिए करते हैं|

पता नहीं ,इस शब्द ने मुझे क्यों झटका दिया |कह नहीं सकती |

एक तो शायद इसलिए की संसार मे बहुत सी बातों के अडेप्ट होते हैं | हमारे जैसे लोग जो डायरेक्ट ऐसी हिंसा से आमने सामने नहीं है ,वह लोग इस बात को ऐसे समझते हैं कि यह उन लोगों का मजबूरी है क्योंकि उनके पास और कोई कार्य नहीं है करने के लिए जीवन यापन के लिए| एक तरह से संसार में यह हिंसा मान्य भी है |यह उनका काम है|


दूसरी बात इसमें यह है कि शुरुआत से ही हम समाज के ‘भले होने ‘और ‘बुरे होने’ के खांचों में बंटे होते हैं| और ‘हम तो भले ‘ -भले होने के नाते ,भले होते होते हम यह भूल जाते हैं कि मात्र हमारी भले होने से यह आवश्यक नहीं है कि सब लोग भले हो गए हैं | भला होना एक जड़ता भी है ऐसा व्यक्ति सभी को अपने जैसा समझता है| यह एक प्रकार की जड़ता भी होती है | ऐसे लोग अपने नियम खुद बना लेते हैं वह समझते हैं कि फलां से यह पाप हुआ है तो इसकी कोई मजबूरी रही होगी |इसने चोरी की है ,इसने झूठ बोला है ,तो इसकी कोई मजबूरी रही होगी | शायद इसीलिए इस शब्द ने मुझे इतना झटका दिया क्योंकि यह बात मेरी कल्पना के बाहर थी कि लोगों में पाप की रूचि भी हो सकती है|    

हिंदी क्षेत्र में राजा की अवधारणा बड़ी रंगीन और स्ट्रांग है| इसका बढ़ा चढ़ाकर अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन हिंदी भाषा के अंदर मिलता है| जैनागमों में राजा की अवधारणा से संबंधित अलग-अलग व्याख्या पढ़ी | एक जगह पढ़ा कि राजा दूसरे की वमन किए हुए धन को भी ग्रहण कर लेता है |एक जगह पढ़ा कि राजा दूसरे के धन के लुटेरे होते हैं | राजा कोनिक के वर्णन बहुत प्रभावशाली भाषा में बताए गए हैं| एक जगह आया कि राजा होना सब चाहते हैं ,सबकी इच्छा होती है कि वह एक बार राजा होने के स्तर और लेवल को पा ले | हिंदी में यह इच्छा बहुत तीव्र है |

स्वार्थी शब्द को हिंदी में नकारात्मक लहजे में प्रयोग किया जाता है कि स्वार्थी होना बुरा होना अनिवार्य रूप में| 

आगमों मे इसका प्रयोग इस तरह से देखा कि आचार्य भगवंत ने जब मोक्ष प्राप्त कर लिया तो अपने स्व-अर्थ को प्राप्त कर लिया |वहाँ इस शब्द का प्रयोग नकारात्मक से नहीं है | इस तरह से मुझे लगा कि उस समय उस सोसाइटी के लोग इतने अधिक जागरूक और बोधवान थे कि वह अलग -अलग व्यक्तित्व के अलगपन को सहजता से स्वीकार कर सकते थे |हो सकता है यह बात उस समय के जनसाधारण की बात नहीं हो, बल्कि यह उस समय की उच्च बौद्धिक ,ज्ञानी वर्ग की बात है |आजकल हम देखते हैं बहुत से लेखकों की बहुत सी ऊर्जा अपने को साबित करने में, अपनी तरह जीने में ही निकल जाती है | वह छोटी-छोटी मामूली बातों को अपनी तरह से करना चाहते हैं लेकिन सोसाइटी इतनी ज्यादा प्रेशर में रखती है कि उनकी बहुत सारी ऊर्जा ,बहुत सारा समय ,बहुत सारी मेहनत इसी में निकल जाती है कि वह अपनी तरह से जी ले |

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धार्मिक विमर्शों की इस कड़ी में अगला विमर्श था जो मेरे चिंतन का विषय बना - काम भोगों की निंदा | यह बात थी जो मेरे चिंतन में आई कि हमारे ग्रंथों मे काम भोगों की इतनी निंदा क्यों की गई है |हर कोई यह चाहता है कि वह अच्छा खाए , अच्छा पीए, अच्छा पहने ,अच्छी तरह रहे और अच्छी तरह जीए ,फिर यह हमारे समाज का स्वीकृत ,घोषित मूल्य क्यों नहीं है |क्यों सब लोग दबे-छुपे, अंदर मन मे तो यही चाहते हैं; पर बाहर त्याग की ,निस्पृहता की ,अकिंचनता की प्रशंसा करते हैं | 

दूसरे अगर हम काम-भोग का अर्थ उस अर्थ में भी ले जैसे हिंदी क्षेत्र में समझा जाता है ,तो भी संबंधों की दृष्टि से और स्त्री-पुरुष संबंधों की दृष्टि से, इसमें क्या बुराई है | यह तो जीवन का आधार है| इन माता –पिता ,भाई-बहन आदि संबंधों का प्रेम तो मनुष्य जीवन का आधार है| यह एक बात थी ,यह एक सवाल था जो मेरे अंदर बहुत सालों तक, बहुत गहराई से चलता रहा|

ये सब 2014-15 के आसपास की बातें हैं |उस समय मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानती थी |आज मुझे इसका उत्तर पता है |

लेकिन यह समझने से पहले हमें विशुद्ध धार्मिक विमर्श समझने होंगे |

विशुद्ध धार्मिक विमर्श ;

• जीवन की अनित्यता 

• जीवन की क्षणभंगुरता/ अल्पता 

• शरीर की नश्वरता 

• जीव का एकत्व/ अकेलापन 

• नातेदार ओर परिवार की अशरणता 

यह सब जो बातें हैं वह इंद्रिय प्रत्यक्ष हैं अर्थात यह बातें ऐसी नहीं है कि मैंने अपनी परंपरा से सीखी है |किसी धार्मिक परंपरा ने मुझे सिखाई हैं ,मैं मानती हूं इसलिए ऐसा है |यह हर कोई देखता है|

अधिकतर धर्म के विषय में यह भ्रांति है कि आप तो फला धर्म में जन्म हुए हो इसलिए आप इन बातों को मानते हो| हम क्यों माने |लेकिन यह जो विमर्श है यह किसी के मानने या ना मानने की चीज नहीं है |यह बिल्कुल इंद्रिय प्रत्यक्ष हैं |सबकी आंखों के सामने है | 

इन बातों का ज्ञान वह मेधावीपन है जो इस पथ पर निकले हुए साधक को आरंभ से ही होता है | तब पूर्ण सत्य की खोज में वह निकलता है (उठा हुआ) और तब उसकी राह में जो भी चुनौतियां आती हैं ,उन को पार करते हुए वह आखिरी सोपान तक पहुंचता है जिसे मोक्ष कहते हैं| यह एक फुल- फ्लैश , होल टाइम खोज है जिसमें एक जीवन, दो जीवन, जितने भी जीवन लग सकते हैं |

इस यात्रा में जो सबसे बड़ी बाधा है वह है काम-भोग अर्थात खाने ,पीने. रहने और और स्त्री संबंधी शक्तियां ही मनुष्य को इस राह पर आगे बढ़ने में रुकावट पैदा करती है |यह कारण है कि इसकी इतनी अधिक निंदा की गई है |पहली शंका समाप्त |

दूसरे परिवारिक संबंधों के संदर्भ में यह शंका बरकरार थी |इसका समाधान होने में बहुत समय लगा| बल्कि मैं कहूंगी कि यह मेरे लिए एक चमत्कार से कम नहीं है |महावीर स्वामी जी की कृपा है| यह कैसे हुआ ,मेरे लिए यह जानना तो ,इसका आकलन करना संभव नहीं है | पर मैं इतना अवश्य कह सकती हूं कि यह उस प्रक्रिया का ही फल है जो शास्त्र पढ़ने से और अलग-अलग तरह की आलोचनात्मक किताबें पढ़ने से और गुरुओं के संपर्क से और मेरे परिवार के संपर्क से हुई |

इस तरह संबंधों के संदर्भ में मेरी इस शंका का समाधान इस तरह हुआ कि काम -गुण अपनी प्रकृति में ही अस्थिर ,चंचल और सदा अतृप्ति के कारण हैं |इन्हें महाभय का कारण कहा गया है|

पाठक इन पंक्तियों में साहित्य और दर्शन का संबंध भी देख सकते हैं| दर्शन में जिसे काम गुणों की अस्थिरता और चंचलता कहा गया है ,साहित्य में उसी द्वंद्व को नायिका यह कहकर गीतों में पिरोती है कि तुम भूल ना जाना , भंवरा ना बनना आदि

got diabetes.

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जब हमारा मन स्वतंत्रता से कार्य करता है, तब ही वह अपने सर्वश्रेष्ठ परिणाम को प्राप्त करता है। आनन्द तभी प्रकट होता है । इसलिए मन की स्वतंत्रता को मैं बहुत महत्त्व देती हूं ।इतने वर्ष बीत जाने पर भी मैंने टीम* में आज तक किसी के लिए कोई भी निर्देश नहीं दिया,  क्योंकि मैं ' प्रोसेस' को महत्त्व देती हूँ। वे सब चीजें देख रहे हैं , जब ठीक लगेगा वे अपने आप मनमुताबिक कार्य मे प्रवृत होंगे। 

 मेरे लिए शास्त्र का अर्थ था - भगवान की ऑथेंटिक वाणी। इस बात पर मुझे श्रद्धा अपने गुरुओं के कारण से है । क्योंकि हमारे गुरु भी तो उसी वाणी के हिसाब से अपना जीवन चल रहे हैं।

कहते है इंसान का मन गहनतम होता है। जब मैंने शास्त्र पढ़ने शुरू किए तब मुझे उस विपरीत रास्ते का पता चला , जिसपर सारा संसार चल रहा है ।  मैं भी चल रही थी।

 शास्त्र पढ़कर ही मैंने अपने मन की गहनतम संदेहों को जाना। इनकी एक छोटी बानगी** मैंने पहले भी फेसबुक पर कई पोस्टों में लिखी है। वह एक अलग पोस्ट के रूप में दोबारा लगाई है ताकि पाठक देख सके।

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* टीम के लिए मैं कहूँगी की इसके दो फेज रहे ।पहला फेज 2016 तक था । उसके बाद डेढ़ -दो  साल तक तो मैं चली ही गई थी। उसके बाद 19 से कुछ सुगबुगाहट दोबारा शुरू हुई थी ।तो जो पहली टीम थी वो तो डिसमिस ही समझिए । उसका तो कुछ हुआ ही नहीं क्योंकि ना किसी ने रिस्पॉन्स किया ,ना प्रोग्राम बने ।

प्रोग्राम तो दूर की बात है ,लाइक तक नही की । सब बने भी रहे ,और अड़कर खड़े भी रहे । हमने अब तक यही झेला है । फिर भी मै खुश हूं । जो हुआ है ,शुभ हुआ है । क्योकि इस संघर्ष मे ही हमने खुद को पहचाना है ।

दुनिया के इतिहास मे शायद ही कोई अफल होकर इतना खुश हुआ होगा ।

आगे क्या होगा । मुझे नही मालूम। 

**भगवान की वाणी पे श्रद्धा करने वाले जन वे भाग्यशाली 'नेपो किड ' हैं ,जिन्हे अपने भावों को व्यक्त करने के लिए एक बनी बनाई भाषा स्वयंमेव ही प्राप्त हो गई है ।

धार्मिक विषयों मे चिन्तन मनन को शास्त्रीय भाषा मे अनुप्रेक्षा कहते हैं। यह स्वाध्याय के पांच भेदों -वाचना ,पृच्छना ,अनुप्रेक्षा आदि मे से तीसरा भेद है ।

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अपनी ही नही , फेसबुक पे मै कई पोस्ट ऐसी देखती हूं जिनका सार महावीर वाणी मे आया है । 

मनीष सिंह की पोस्ट है -जगजीत सिंह की गजल पर । शरारा ,दो घड़ी का है खेल सारा टाइप । इसमे जो बात कही गई है ,वह हूबहू कई शास्त्रीय तथ्यों से मेल खाती है ।

ऐसी पोस्ट और भी हैं । अभी याद नही आ रही ।

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जब मै ये पोस्ट देखती हूं तो मेरे मन मे यह क्लांति उपजती है कि हाय!ये बात सही समझ रहे है , कह भी रहे है , बस ये समग्रता से अनजान हैं ।

खैर 

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महावीर वाणी का मार्ग सुख -शांति का सच्चा मार्ग है ।

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बुधवार, 15 मई 2024

 दुर्लभ परिस्थितियों में ही ऐसा होता है कि बंधन बाजूबंद बन जाए।

 मेरे साथ ऐसा ही हुआ है।

 स्त्रियों का शास्त्र पढ़ना, ये कोई नॉर्मल बात नहीं है। इस तरह की नॉलेज के प्रति आकर्षण होना,

 पहला बंधन तो यही है कि क्या तुम्हें दीक्षा लेनी है ? क्या साध्वी बनोगी? और अपने तीखेपन में यह प्रश्न बहुत ही 'ऑब्वियस- सा' लगता है। सदा के लिए किसी का उत्साह तोड़ देने के लिए काफी है ।

 ये दुनिया कार्य- कारण और उसमें फायदा ढूंढने के वज्र सरीखे नियमों पर चलती है।

 दूसरा इस क्षेत्र की नॉलेज के प्रति आम गृहस्थियों में 'रहस्यात्मक  होने ' का भय होता है । यह भय आगे पारिवारिक सुख- शान्ति को बचाने  के लिहाज से बहुत उचित  दिखाई पड़ता है।

 तीसरी बात है प्रसिद्धि पाने की चाह  का बंधन भी बहुत मजबूत है। इस क्षेत्र में वास्तविक तरक्की के लिहाज से।  मुझे प्रवचनकार नहीं बनना था।  मुझे लेखक नहीं बनना था। यह आकांक्षा भी मेरे मन में नहीं थी ।


 तो इस तरह विशुद्ध पढ़ना और पढ़ने  के आनंद को प्राप्त करना , ये ही एक लक्ष्य था पढ़ने का।बाकी चीजें खुद-ब-खुद घटित होती चली  जाती हैं । 

 मैं इन सभी बंधनों को पार कर पाई, सिर्फ और अपने  गुरु की वजह से। गुरु के प्रति श्रद्धा होने के कारण मुझे कभी किसी बात का भय नहीं हुआ। 

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सोमवार, 13 मई 2024

Mehak jain got 93% in 12th cbse board.  Also she got a good rank in ipu bcom -hons entrance test.

# बल्ले- बल्ले. 

Bt she is nt satisfied.  कह रही है -मम्मी ये तो बैकअप का भी बैकअप था । 😂

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यहां हमारे समय के डिस्कोर्स में  ये बातें चल रही है कि पेरेंट्स अपनी महत्वाकांक्षाएं बच्चों पर न थोपे । 

उन्हे मालूम नही कि समय बदल गया है । ये बातें पुरानी हो ली । पेरेंट्स को गिल्ट मे डालना छोड़ो।  अब बच्चो की महत्वकांक्षा बढ़ गई है ।😊

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समय तेजी से बदलना मतलब बोध का बदलना । Overall यह सब इतना तेज है कि पांच साल बड़े भाई-बहन भी जेनरेशन गैप जितना अलगाव महसूस करते है  ।

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गुरुवार, 9 मई 2024

   


सदा हँसता हुआ चेहरा ।
उनकी हँसी ऐसी थी 'उन्मुक्त ठहाके ' कि पल भर में सारे दुख ,चिन्ता , शोक,कठिनाई को हर लेती थी । 
गुरूदेव श्री रामप्रसाद जी महाराज जी की जय हो  ।आज उनकी जयंती है ।

मंगलवार, 7 मई 2024

लॉकडाउन में मुगल शासकों के इतिहास पढ़ने की बातें मैंने पहले भी अपनी पोस्ट में लिखी हैं । 

- एक पहले की पोस्ट 

शहजादे दारा शिकोह का आख्यान धार्मिक,सांसारिक,दार्शनिक सत्यों की विचित्रता को उजागर करने का एक करूण प्रसंग है।

बेगम जहाँआरा की आत्मकथा पढने के बाद शाहजहां के परिवार को जानने मे मेरी रूचि जागी और इस तरह मै कानूनगो की किताब तक पहुंची ।इसकी भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है ।

पहले मुझे दारा के जीवन मे दिलचस्पी थी ।शाहजहां की उस पर विशेष कृपा,उसकी धार्मिक रूचि ,परिवार, ओरंगजेब से उसका युद्ध और करूण अन्त। 

सभी इतिहासों मे उसके करूण अन्त का वर्णन बड़ी करूणा से किया गया है ,अतः दिलचस्पी होनी तो स्वाभाविक थी कि ऐसी भी क्या बात हुई। 

बाद मे इस किताब मे दिए गए एक चैप्टर ने मेरा ध्यान खींचा जो दारा की लिखी हुई किताबो पर है ।इससे उसकी धार्मिकता व आध्यात्मिकता पर प्रकाश पडता है ।

इस किताब ने दारा की ऐतिहासिक शख्सियत से पूरा न्याय किया है। ज्ञान ,श्रम, प्रतिभा का सुसंयोग है यह किताब ।जो कुछ भी किताब मे है ,उसके अलग अपनी रीडिंग और समझ के अनुसार कुछ बाते यहां लिखूंगी ।cont..

एटसेटरा

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दारा शिकोह के जीवन को पढ़कर , उसकी अध्ययन में रूचि देखकर मुझे ये रिअलाइज हुआ कि इस तरह की नॉलेज को  आत्मज्ञान की नॉलेज कहते हैं। साथ ही उसके जीवन को देख कर मैंने ये अनुमान लगाया की ये अवश्य विनयवादी है। एक जगह वो कहता है कि मैं ईश्वर की कल्पना परमपिता,  दयालु के रूप में करता हूं ।अगर वह मेरे प्रति दयालु और करुणामय  नहीं है तो मैं उसे ईश्वर मानने से इनकार करता हूँ । टाइप

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विचार साम्यता के कारण दारा शिकोह की दार्शनिक टाइप को समझकर ही मैंने अपनी दार्शनिक टाइप भी समझी। की मैं भी विनय वादीे कैटेगरी की हूँ।

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अब बात पहली और दूसरी कैटेगरी की । क्रिया का विषय जैन दर्शन का एक महत्वपूर्ण विषय है । बहुत से शास्त्रों मे यह विषय आया है ।

 हैरानी की बात है की जिन नौ तत्वों पर श्रद्धा करके  एक श्रद्धालु क्रियावादी कहलाता है,  उन्हीं (-2) तत्वों पर श्रद्धा करके एक दूसरा श्रद्धालु अक्रियावादी कहलाता है। यह इन दो  वादों का सबसे पेंचीदा पॉइंट है ।

 ज्यादा मैं भी नही समझी हूँ । 

ये विषय घनघोर स्लो मोशन के विषय है । इनमें प्रगति धीमी होती है ।

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आगे आप समझिए कि चारों ही तरह के दर्शन  एकांतवादी कहलाते हैं अर्थात एक मत को पकड़कर चलने वाले । जैन दर्शन अनेकांतवादी है ।

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यह मेरा प्रिय विषय है । जब भी अवसर मिले तो ,  बातें साझा करके संतोष होता है । 

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सोमवार, 6 मई 2024

 कुछ पोस्ट ऐसी होती हैं जिन्हें देर से लिखने का पछतावा होता है। यह पोस्ट ऐसी ही है।

 देर से लिखने के कई कारण हैं। कई बार फोन हाथ में नहीं रहता।  टाइम भी कम मिलता है।

 पछतावा इसलिए क्योंकि बहुत समय इंतजार करने के बाद जाकर तो , इस तरह की बातचीत का कोई मौका मिलता है। और तब भी आप उस बात को लिखने में देर लगा दो । खैर।

शोभित ने ईश्वर है या नहीं, इस तरह की एक पोस्ट लिखी थी।तब मैंने एक पोस्ट शेयर की थी - क्रियावादी एटसेटरा।

सुशोभित ने कहा - मैं बदसूरत, खूबसूरत एट्सेटरा।

 सबसे पहले  तो मैं कहूँगी  विनय और सरलता, यह सर्वप्रथम अर्हता है,  आत्मज्ञान के क्षेत्र में  'क'  सीखने की भी ।

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पहले मैं जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी जी के जीवन का एक तथ्य शेयर करती हूँ की महावीर स्वामी जी  दीक्षा लेने के बाद 12 वर्ष तक मौन रहे थे ।उनका यह संकल्प था कि जब तक मुझे केवल ज्ञान प्राप्त नहीं होगा तब तक मैं एक भी शब्द नहीं बोलूंगा। यह इस क्षेत्र की नॉलेज के प्रति गंभीरता और गहनता को समझने का एक बहुत बडा महत्वपूर्ण संकेत है।

दूसरी बात मै हमेशा कहती हूं कि जैन दर्शन की मेरी समझ मेरा version है , बातों को समझने का । यह अंतिम नही है ।

इस तरह का कथन कहना ,विनय -वचन व्यवहार भी है और जिन वाणी के अर्थ की बहुलता का संकेत भी है ।

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रेफरेंस के लिए वह पोस्ट दोबारा यहां लगाई है -

 समवसरण

क्रियावादी = जीव अजीव पाप पुण्य आस्रव संवर बन्ध निर्जरा तप मोक्ष = 9 ×2 स्व-पर = 18×10 नित्य -अनित्य अर्थात काल, नियति ,ईश्वर, स्वभाव, आत्मा = 5×2 =10 । 18×10=180

अक्रियावादी 

जीव अजीव आस्रव संवर बन्ध निर्जरा तप मोक्ष = 7 ×2 स्व-पर = 14×12 नित्य -अनित्य अर्थात काल, + यदृच्छा , नियति ,ईश्वर, स्वभाव, आत्मा = 6×2 =12 । 14×12= 84

अज्ञानवादी 

9 ×7 =63 

7=सद असत सदसत अवक्तव्य सद् -अवक्तव्य असद- अवक्तव्य, सद-असद-अवक्तव्य

विनयवादी

देव ,राजा ,यति ,ज्ञाति ,स्थविर ,अधम ,माता पिता =8 ×4 मन,वचन,काय,दान = 36

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यह विषय सूत्रकृतांग और भगवती सूत्र में आया है । 

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 यहाँ से आगे मैं पोस्ट को थोड़ा क्लैरिफाइ करूंगी । 

  • समवसरण का अर्थ है- मिलना । वर्तमान में विचार गोष्ठी टाइप ,जहां विभिन्न प्रकार के वादी मिलते है ।

यह शब्द तीर्थंकर की धर्म सभा के लिए भी प्रयोग मे लाते है ।अन्य किसी की सभा के लिए इस शब्द का प्रयोग नही लाते ।

  • तत्व नौ हैं । जीव ,अजीव आदि । कोई  सात भी कह देते है । वे पुण्य-पाप को जीव के साथ संलग्न मान लेते हैं ।
प्राचीन भारतीय चिन्तन परंपरा मे यह संख्या लगभग स्थिर हो गई है। जीव और अजीव का अंतर तो स्पष्ट ही है । यह तो प्रत्यक्ष चक्षु दर्शन का विषय है कि दिख रहे जगत मेें एक तत्व चेतन है ,आत्म

 कह लो ,soul एटसेटरा ।बाकी तत्वो  का विषय इस विषय से जुडा है ।

जैन दर्शन मे चार तरह के दार्शनिक बताए गए हैं। उन में तीसरे नंबर के दार्शनिक अज्ञानवादी कहलाते है ।ये 63 प्रकार के होते हैं। 

नौ तत्वों को  सत असत आदि 7 प्रकार से देखने पर 👀 इनके नतीजे 63 तरह के निकल सकते है ।  

कोई कहते हैं कि नव तत्वादि सत हैं

कोई कहते हैं कि असत्य है ।

कोई कहते हैं कि सत्य-असत्य है । (अनिर्णय की अवस्था)

कोई कहते हैं कि अवक्तव्य है ।कह नही सकते ।

आगे इन्हीं तीनों की अवक्तव्यता वाले हैं । 

अभी जैसे कई पोस्टों में विकास दिव्यकीर्ति के इंटरव्यू की बात चल रही थी

उसी इंटरव्यू में विकास दिव्यकीर्ती ने यह कहा कि मैं पहले ऐथिस्ट था । अब नहीं हूं , क्योंकि मैं नही जानता था। जानता तो अब भी नही हूं, लेकिन जिस बात को हम नही जानते ,तो क्यों कहें कि वह नहीे है  एटसेटरा ।लक्षण के हिसाब से यह अज्ञानवादी की कैटेगरी होनी चाहिए।😊

यहाँ तक के चिंतन में एक छोटा सा गैप मुझे दिखाई देता है।  

कहते हैं कि अज्ञानी वह हैं जो यह जानता नहीं है कि वह अज्ञानी हैं। जो यह जानता है कि वह अज्ञानी है तो दरअसल वह ज्ञानी है।तो दरअसल दूसरे टाइप का अज्ञानी जिज्ञासु हैं।

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अब आते हैं चौथे नंबर के दार्शनिक पर - विनयवादी। ये 32 तरह के होते हैं ।इसमें आठ जन  की मन वचन काया और दान से विनय करने में ये धर्म मानते है। 

वैसे तो चारों ही कैटेगरीज़ का क्षेत्रफल बहुत ज्यादा है। फिर भी इस कैटेगरी के लोगों की संख्या(मेरी समझ में) बहुत ज्यादा होगी। 

माता  पिता ,गुरु, शिक्षक ,राजा  आदि ,  एक तरह की आचार व्यवस्था में इनके प्रति विनय को ही धर्म माना गया है। 

 माता पिता के प्रति आदर पूर्ण रहना

शिक्षकों के प्रति आदर पूर्ण रहना

गुरु , साधु के प्रति आदरपूर्ण रहना। इत्यादि 

बल्कि हम यह देखते हैं कि संसार मेें बताए जाने वाले धर्मों का एक बड़ा हिस्सा इनके प्रति सुआचरण से है । एक सामान्य लेवल तक इसमे कुछ गलत भी नही है ।

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लगभग 20 साल शास्त्र पढ़ने के बावजूद तथा उससे भी पहले प्रवचन और गुरु दर्शन के माध्यम से एक परंपरा से जुड़े होने के बावजूद , मैं ये कहूँगी कि मुझे यह कभी पता ही नहीं था कि यह नॉलेज आत्मज्ञान की नॉलेज कहलाती है । सचेत रुप में ।अपने जाने तो मैं अपने गुरु की आज्ञा लेकर शास्त्र पढ़ रही थी । मुझे रस आ रहा था । मुझे नई नई बातें पढने को मिल रही थी । बस ।

एक बहती हुई धारा में बहते आने के समान , ये सब चीजे मेरी लाइफ ऑटोमेटिकली आती गई और मैं उनको फॉलो करती गई ।जैन  परिवार में पैदा होना , फिर जैन गुरुओं के दर्शन करना और शास्त्र पढ़ना एटसेटरा ।

Cont


शनिवार, 4 मई 2024

चुनाव का समय भी खासा हलचल भरा होता है ।

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समय शब्द का एक अर्थ सिद्धांत है ।स्वसमय - अपना सिद्धांत। परसमय -दूसरे पक्ष का सिद्धांत। अहिंसा समय - अहिंसा का सिद्धांत। 

शब्द की अर्थ विभिन्नता तो साधारण व्यवहार मे आने वाले शब्दों मे भी देखी जाती है ।बहुत काॅमन है यह बात ।

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 #पहली नौकरी पक्की और महालक्ष्मी स्कीम सहायक हैं । 

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सोमवार, 29 अप्रैल 2024

इस बार कांग्रेस की एडवर्टाइजमेंट्स कैम्पेन रचनात्मक है । मजा आता है देखके । 

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रविवार, 28 अप्रैल 2024


 Sew sister's daughter frock. 

पहले मैं सिलाई में कुशल हो जाऊं , मेरे लिए तो इतना ही बहुत है ।😊

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मंगलवार, 23 अप्रैल 2024

 श्रद्धा प्राप्त होने मे स्त्रियां अदभुत भाग्यशाली होती हैं । 😊

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रविवार, 21 अप्रैल 2024

शनिवार, 20 अप्रैल 2024

कैसी सुखद आश्चर्य की बात है ना कि जो बातें सब खुले में कहीं जा रही है, सबके सामने कही जा रही है, फिर भी उनमें से कुछ बातों का अर्थ कुछ ही लोग समझ पाते है।

 विकास दिव्यकीर्ति ने जब अपने इंटरव्यू में कहा की यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी के दौरान उन्हें पढ़ने का सुख प्राप्त हुआ, तो यह बात मैं किस तरह लगभग- लगभग समझ गई।

एम ए -फाइनल ईयर की पढ़ाई के दौरान मैंने भी वैसा ही पढ़ने का  असली मजा हासिल किया था। मैने बच्चों को भी कह रखा है कि अगर वे पढ़ने का मजा हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें कम से कम एमए तक की शिक्षा जरूर हासिल करनी चाहिए।

पढ़ने का मजा अर्थात परीक्षा की टेंशन से मुक्ति पाना। कैसे? टीचरों के अनुशासन और स्कूल की नियमित दिनचर्या के शासन से अलग, पहले ही दिमाग में एक क्लियर पिक्चर होना-

 सिलेबस की

 किताबों की

 संभावित प्रश्नों की - यहाँ संभावित प्रश्नों से आशय नहीं कि  कुंजी स्टाइल में गिने-  चुने प्रश्नों को याद करना। इस बात से आशय ये है कि जब आप सिलेबस को पूरे मन से पढ़ कर तैयार करते हैं, तब आपको ये आइडिया अपने आप ही लग जाता की इस सिलेबस में से कौन कौन से प्रश्न बन सकते हैं। तब परीक्षा में ' कौन से प्रश्न कहीं से भी पूछ लिया जाएगा'  का भूत  अपने आप दिमाग से उतर जाता है ।

अपनी निजी अनुभव से प्राप्त इन महत्वपूर्ण बातों को , बाद में मैंने अपनी टीचिंग में भी शामिल किया था। अपने बच्चो को भी सिखाया। और धार्मिक शिक्षा शिविर में भी मैंने इन बातों का एप्लाई किया था।

आप कहोगे की क्या पहले जितनी भी शिक्षा प्राप्त की वहाँ क्या सिलेबस या किताबों का भी पता नहीं होता था? इतने मूर्ख थे क्या ?

 तो यहाँ बात ना- पता होने की नहीं है, बल्कि बात है इन चीजों को कंट्रोल में लेने की। 

पहले भी सारी बाते पता होती थी। लेकिन बहुत फर्क होता है रिक्शा में पीछे बैठ के चलना और रिक्शा में आगे बैठ कर चलने में । और ये फर्क ही होता है जब शिक्षा आपके लिए एक बोझ है ,  एक मजबूरी है। या फिर वह आनंद है। 

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यहाँ तक बात हुई पढ़ने के विलक्षण आनंद की , जिसका स्वरूप केवल भोक्ता ही जानता है।

अब आगे बात करते हैं प्रकट और प्रकटीकरण की ।

पढ़ने का विलक्षण आनंद आपके भीतर प्रकट हुआ यह एक निजी बात है। बट दुनिया में इसका प्रकटीकरण किन तरीकों में होता है।

 विकास दिव्यकीर्ति के संदर्भ में देखें, तो हम ये देखते हैं की वे कोई इस आनंद में विभोर होकर गीत नहीं गा रहे है , न ही वे इसका बखान करते फिर रहे हैं। उनके भीतर यह आनंद प्रकट हुआ और उन्होंने इसे अपने हृदय में ही छुपाकर रख लिया। फिर वह पढ़ाने के क्रम में उनकी उद्यमशीलता में प्रकट हुआ।

अपने संदर्भ में मैं ये कह सकती हूँ कि यह आनंद जैन शास्त्र पढ़नेे की तीव्र इच्छा के रूप में प्रकट हुआ।

आधुनिकता विषय पर सुधीश पचौरी का एक विस्तृत लेख है जिसमे वह शहर में हो रही एक गोष्ठी में एजाज़* का वक्तव्य सुनने के लिए लालयित  हैं । और इसके मुख्य बिंदुओं को और अपनी आलोचना को उन्होंने उस लेख में समेटा है। अगर मैंने सही पहचाना है तो यह आनंद वही है। बट इनमें यह एक विकट बौद्धिक श्रमशील क्षमता के रूप में प्रकट हुआ है।

अगर मैं गलत नहीं हूँ तो सुशोभित में  यह सोवियत पुस्तकों के अध्ययन के रूप में प्रकट हुआ है। और

 मनीष सिंह में यह इतिहास के अध्ययन में प्रकट हुआ है। लेकिन उनमें इस आनंद का स्वरूप 'आनंदमय'  नहीं है । पाठक उनकी पोस्ट बढ़कर इतिहास पढ़ने के आनंद से परिचित नहीं होता बल्कि उनकी प्रतिभा जितनी डाईसेक्टिंग मैनर में इतिहास पुरुषों की चीर फाड़ करती है तो वह  कमजोर जिगर वालों के लिए तो खासा धक्का लगाने वाला होता है ।

व्यक्तित्व,  क्षमता , परिस्थिति में यह अलग-अलग ढंग से दिखता है ।

हैरान हूं  ।


*स्मृति के आधार पर 

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