इंग्लिश के जिंदल सर
तीसरे पीरियड की
घंटी बजी तो बच्चों के दिल में धुक सी हुई |क्लास अपने आप साइलेंट हो गयी |जिंदल
सर आने वाले थे |
दस मिनट में जिंदल
सर क्लास में आये |उनका रंग पक्का था |कद 5 फुट 3 इंच होगा |ठीक –ठाक नैन नक्श के
,न ज्यादा मोटे –न ज्यादा पतले आदमी थे |बच्चों ने यूँ सामान्य तौर पर तो स्कूल
में उन्हें पहले भी देख रखा था ,परन्तु स्वयं अपने टीचर के रूप में ,अपने सामने
साक्षात जिंदल सर को देखकर वे रोमांचित हो रहे थे |
नौंवी कक्षा में आज
उनका पहला दिन था |इससे पहले उन्होंने जिंदल सर के बारे में कई कहानियां सुनी थीं
|मसलन , जिंदल सर किसी से नहीं डरते |वे अपनी मर्जी से स्कूल में आते हैं
|प्रिंसिपल सर की भी हिम्मत नहीं कि उन्हें कुछ कह सकें |
दूसरे , जिंदल सर
बहुत सख्त हैं |वे हाथ की मुठठी बनवाकर ऐन हड्डी के ऊपर डंडा मारते हैं |बहुत दर्द
होता है |पर लड़कियों के लिए राहत की एक बात थी कि सर लड़कियों को कुछ नहीं कहते |
तीसरे , जिंदल
सर ‘बुलेट ‘ मोटरसाइकिल पर स्कूल में आते
हैं |वे बुलेट से भी ज्यादा तेज मोटरसाइकिल चलाते हैं | ट्रैफिक पुलिस भी उन्हें
कुछ नहीं कह सकती |
इन कहानियों का
रचनाकार तो अज्ञात था और हमेशा अज्ञात ही रहा |पर यह ज़रूर था कि ये कहानियां
क्लास-दर –क्लास चलती थीं | छोटी कक्षाओं के विद्यार्थी बड़ी कक्षाओं के
विद्यार्थीयों से ये कहानियां बड़े चाव से सुनते थे | |उन्हें पकड़-पकड़ कर ,जब भी
,जहाँ भी मौका लगता था |वे इन कहानियों पर विश्वास करते थे |
इन कहानियों से
जिंदल सर के बारे में जो धारणा बनती थी ,उसमे कुछ पक्कापन तो सर ने पहले ही दिन
अपनी बातों से ला दिया था |
“मेरा नाम रमेश जिंदल है और मैं तुम्हे
इंग्लिश पढाऊंगा |”- इंग्लिश की ये-ये किताबें हैं |तुम बाज़ार से खरीद लेना | आज पहला दिन है |पढ़ाई कल से शुरु
करेंगे | ” –बच्चों
ने हाँ-जी
में सिर हिलाया |
जिंदल सर बिलकुल तन कर खडे
थे। उन्होंने कोट पेंट पहन रखा था। वे हमेशा टू पीस या थ्री पीस कोट पेंट ही पहनते
थे। सिर्फ कभी कभार ही शर्ट पेंट पहनते थे। कोट पेंट पहनने से उनकी पर्सनेलिटी में
एक रौब आ रहा था। बच्चे भी तन कर बैठे थे।
“....एक बात
समझ लो। मैं चैप्टर पढ़ाऊंगा तो बीच में तुम्हे जो भी कठिन शब्द लगे ,वहीँ उठकर मुझसे पूछ लेना।
सब बच्चे किताब पढ़ते हुए पेन्सिल अपने हाथ में रखेंगे। तुम्हारी किताब में हर
चैप्टर के पहले कठिन शब्द हैं। मैं एकेक करके सारे शब्दों का अर्थ बताऊंगा। सारे
बच्चे पेन्सिल से उनके
अर्थ नोट करते जाएंगे। समझ गए न “ – बच्चों
ने हाँ-जी में सिर हिलाया |
“..... और हाँ....- जिंदल सर ने सीधे हाथ की
तर्जनी ऊँगली तान कर कहा।उनका चेहरा सख्त हो गया और आँखें बच्चों पे टिक
गयी |
“........ इंग्लिश
की किताबे रोज़ लानी हैं। मैं कभी यह न सुनूँ की आज हम किताब नहीं लाये। जिस दिन
किताब नहीं लाये उस दिन.... तुम्हे जिन्दा गाड़ दूंगा। याद रखना। ....... वो सामने
मैदान देख रहे हो न “ - जिंदल सर
ने अपनी निगाहें बच्चों पर रखते हुए ,क्लास के बाहर मैदान की ओर उसी तर्जनी से इशारा
करते हुए कहा।
बच्चों ने एक बार मैदान की
ओर देखकर फिर जिंदल सर की ओर देखा।
........ वहीँ गड्ढा खोद के जिन्दा गाड़ दूंगा “
| सर ने ज़रा झुक कर अपनी छोटी छोटी आँखें बच्चों पे गडा दी। उस समय उनकी आँखों
में ऐसी खूंखार चमक थी
मानो कोई शेर अपने शिकार को
देख रहा हो|
बच्चे बिना पलक झपकाए उनकी
आँखों में देख रहे थे। वे घबराये हुए हिरनों के झुण्ड की भांति अपनी अपनी जगहों पर
सिमट गए थे।
इस हॉरिबल सीन का असर लगभग
30 सेकण्ड तक रहा | फिर जिंदल सर ने अपना हाथ नीचे कर लिया। अब उनकी आवाज़ नार्मल
थी।
“ अब सबसे पहले सब बच्चे एक एक करके अपने नाम
बताएंगे।वैसे मैं नाम याद नहीं रखता। फिर भी। तुम्हारी क्लास का मोनिटर कौन है?”
“ जी मैं “ -उमा खड़ी हो
गयी।
“ ठीक है |आगे जो भी
होमवर्क दिया जाएगा ,वो सब
कापियां इकठ्ठी करके तुम यहाँ रखोगी।“
“यस सर!” - कहते हुए उमा ने
अपनी गर्दन नब्बे डिग्री के कोण तक हिलाई।
“अब वहां से शुरू हो जाओ “ -जिंदल
सर ने बायीं तरफ के पहले डेस्क पर बैठे हुए बच्चे को इशारा किया। वे स्वयं कुर्सी
पर बैठ गए। वे कुर्सी पर भी तन कर बैठे थे। सब बच्चे बारी बारी
से उठकर अपना नाम बताने लगे। उस दिन का पीरियड ख़त्म हुआ।
रिसेस में उमा जब
पानी पीने जा रही थी तो उसने ज़रा मैदान पर नज़र डाली और वहीँ खड़ी होकर अंदाज
लगाने लगी कि मैदान के कौन से कोने में जिंदल सर बच्चों को गाड़ सकते हैं।
वह एक छोटा सा सरकारी
स्कूल था ,जिसमे
तीन और कमरे बने थे ,चौथी
साइड खाली थी।
“यहाँ ही गाड़ सकते
हैं -उमा ने खाली जगह की ओर देखते हुए सोचा | पर कितने ? ज्यादा से ज्यादा दस ही
गाड़ पाएंगे।“ उनकी क्लास में तो 45 बच्चे थे|
“ऐसा
थोड़े ही होता है “- उमा को अपनी कल्पना पर हंसी आ गयी।
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यह जिंदल की इमेज का या कह
लो पर्सनैलिटी का असर था कि इंग्लिश की क्लास में अनुशासन रहता था। उनकी
क्लास में कोई चूं तक नहीं करता था। इसका एक फायदा यह था कि जिंदल सर जो भी बात
कहते ,उसका एक
एक शब्द सुनाई देता था। बच्चों का सुनने में ध्यान जमता था। वर्ना उमा ,अनुराधा ,शैली ,दीपक ,विनय आदि क्लास के कुछ
होशियार बच्चों यह देखकर दुख होता कि शोर के कारण मैडमें पढ़ा नहीं पता थी। उनका
ज्यादातर समय क्लास कंट्रोल में निकल जाता था। इससे वे परेशान होती थी और पढाई मे भी
हर्ज होता था। वे बेचारे अपनी मैडमों की मदद करना चाहते थे ,पर यह उनके भी बस की बात
नहीं थी। जिंदल सर की क्लास में इस कोई टेंशन नहीं थी।
“इंग्लिश सीखने का सिर्फ एक
तरीका है ,वो है
-रीडिंग। जो कुछ भी तुम्हे इंग्लिश में लिखा हुआ मिले -अख़बार,कोई किताब ,कहानी ,मैगजीन -उसे रीड करो। पढ़ने
से शब्दों का प्रयोग ऑटोमेटिकली तुम्हारे दिमाग में बैठता चला जाएगा। तुम्हारे
कोर्स में जो किताबें हैं ,वो मैं
तुम्हे करा दूंगा। ग्रामर करा दूंगा। पर सिर्फ इससे तुम्हारी इंग्लिश अच्छी नही होगी।
फ्लुएंसी ( धारा- प्रवाहता ) लाने के लिए तुम्हे ज्यादा से ज्यादा पढ़ना पड़ेगा।
समझ गए न “ -अगले दिन जिंदल सर क्लास में कह रहे थे। जिंदल सर तन कर बैठे थे.....से
लेकर ....बच्चे भी तन कर बैठे थे -यहाँ तक का वर्णन पूर्ववत समझ लिया जाए। बच्चों
ने हांजी में सिर हिलाया।
“ एक बात और , मेरी सरकारी
नौकरी है। मैं तुम्हे पढ़ाऊँ या नहीं ,यहाँ कुर्सी पर खाली बैठकर चला जाऊं ,इससे मेरी नौकरी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। ....” हाँ
तो यह तो बच्चों को मालूम ही था कि जिंदल सर को कोई कुछ नहीं कह सकता।
....... पढोगे तो तुम्हारा फायदा है
,नहीं
पढोगे तो तुम्हारा नुकसान है। इसलिए याद रख लेना, पढ़ने में ही तुम्हारा फायदा है।
नहीं तो। ...... समझ गए न।“ बच्चों ने समझ लिया कि उनकी भलाई इसी में है कि
वे खुद अपनी भलाई समझें और पढ़ें।
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दो महीने बाद बच्चे जिंदल
सर से सहज मन हो गए।
अब कहाँ जाना था ?उन्होंने भी वहीँ रहना था
और सर ने भी। उनका हौव्वा तो वैसा तो वैसा का वैसा था पर फिर भी जिंदल सर के नाम
से अब उनकी धड़कन नहीं बढ़ती थी |
विशेषकर
लड़कियां ,और
लड़कियों में भी विशेषकर उमा और अनुराधा जैसी कुछ होशियार लडकिया जिंदल सर से
बिलकुल नहीं डरती थीं। और डरें भी क्यों ? वे आज्ञाकारी ,चुप रहने
वाली ,पढ़ाकू
लड़कियां थीं ,फिर डर
किस बात का ? लड़के इस
मामले में लड़कियों से चिढ़ते थे। क्योंकि महीने में एकाध बार उनमे से किसी न किसी
का पिटाई का नंबर आ
ही जाता था। चिढ़ें तो चिढ़ें जाएँ ,लड़कियों को क्या ?
मार खाएं तो खाएं ,आखिर
क्यों इतनी बदतमीजी करते हैं ?
“सर ये छूट गया ‘-उमा सर की
स्वयं नियुक्त पी ए थी। क्लास में नया लेसन शुरू हुआ था। सर पहले कठिन शब्द करा रहे
थे। सर की छोटी सी असावधानी को स्वयं इंगित करना वह अपना परम कर्तव्य मानती
थी।
“सेक्स का क्या मतलब
होता है ?”- यह चैप्टर मानव जाति के क्रमिक विकास पर था ,यह शब्द छूट गया था। उमा ने
याद दिलाया|
पूछने के बाद उमा ने ध्यान
दिया कि बेध्यानी में वह
क्या पूछ गयी है |एक बार तो वह घबराई। पर क्लास में अपनी पोजिशन के कारण उसे यकीन
था कि जिंदल सर उसे कुछ नहीं कहेंगे। अब पूछ तो लिया ही था। वह उत्सुक हुई कि देखें
सर इस मुश्किल सिचुएशन से कैसे निपटते हैं ?
सर ने पहले तो अनभिज्ञता
दिखाई -
“क्या?कौन सा? अच्छा
अच्छा” -फिर दो- तीन सेकण्ड तक सोचते रहेऔर जवाब दिया – “यह एक प्रकार का समुद्री
कीड़ा होता है।“
सर की
तत्परता देखकर उमा विस्मित हुई पर हाव-भाव की एक भी चेष्टा से उसने यह उजागर नहीं
होने दिया कि यह इस शब्द का अर्थ नहीं है |एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसने सर की
बात को स्वीकार किया और किताब में सेक्स शब्द के सामने पेन्सिल
से लिखा -एक प्रकार का समुद्री कीड़ा।
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सर शिक्षण के तौर तरीकों –पीडागॉजी
-से कितने वाकिफ थे ,यह तो
नहीं कह सकते पर इंग्लिश ग्रामर करने का उनका तरीका मुहंजबानी था। पीडागॉजी में
इसे निगमनात्मक शैली कहते हैं। सर ग्रामर के सिद्धान्तों को समझाने में ज्यादा समय
नहीं गंवाते थे। बल्कि ग्रामर के सिद्धांतों को एक बार ब्लैकबोर्ड पर लिखकर ,बताकर ,वे तुरन्त प्रॉब्लम्स
करवाने लगते थे।
बायीं ओर से पहले बच्चे को
खड़ाकर वे क्रम से प्रॉब्लम्स कराते जाते और साथ ही साथ ग्रामर के नियमों को
पुनःपुनः दोहराते जाते। बच्चा जहाँ ,जिस जगह अटका ,उसे वहीँ
,हाथ की
हाथ ,उसकी
गलती सुधारकर दुरस्त कर देते थे। इस तरह एक टॉपिक के नियम लगभग 15 -20 बार क्लास
में दोहराये जाते थे। मसलन टेन्स करने का उनका स्टाइल देखिये। पाठक ज़रा कल्पना
करें -
जिंदल सर क्लास में आये ,आते ही उन्होंने ब्लैकबोर्ड
पर तीन लाइनें
खींचकर चार खाने
बनाये। टेन्स के तीन भेदों में से पहले भेद –present tense के चार प्रभेदों के नाम
उन चार खानों में लिखे।उनके नियम भी लिख दिए |अब बायीं ओर के पहले बच्चे को खड़ा करके उसे एक वाक्य दिया –
मसलन उन्होंने लिखा –sudha dances very well.
सर – इसका टेन्स
बताओ ?
बच्चा – सर ,present tense.
ठीक है ,इसे present continous में बदलो |
बच्चा बोर्ड पर लिखे
नियम को देखकर – sudha is
dancing very well.
गुड ,नेक्स्ट
- यहाँ एक सम्भावना यह हो सकती है कि बच्चे को
मालूम नहीं है कि टेन्स कौन सा है |तो वहां से आगे संवाद क्या होगा ,इसका नमूना
देखिये –
बच्चा – सर
!................. |बच्चा नीची नज़र किये खड़ा है |
सर – क्या हुआ ?
बताओ ?
बच्चे ने गर्दन हिला
दी कि उसे नहीं मालूम |
सर – verb देखो ,कौन
सी है ? dances....कौन सी verb हुई ?
बच्चा –पहली
तो कौन सा टेन्स हुआ
?
....................
Present tense
,कौन सा हुआ?
गुड !अब इसे present perfect में
बदलो |
बच्चा बोर्ड पर लिखे
नियम को देखकर –sudha has
been dancing very well.
वेरी गुड ,नेक्स्ट
- यहाँ यह भी
सम्भावना हो सकती है कि बच्चे को verb का न पता हो |तब सर verb भी बताते |क्लास
में 9-10 बच्चे ऐसे थे जो बहुत कमजोर थे |उनकी ग्रहण क्षमता भी कम थी |उन्हें
छोड़कर अधिकांश बच्चे ग्रामर के सभी टॉपिक्स बहुत अच्छे से सीख गए थे |
इसी तरीके से सर ने
direct-indirect , active- passive ,modals ,tense इत्यादि जो टॉपिक उस समय नौंवी
की ग्रामर में थे ,कराये थे |सर्वनामों (pronouns) को तो
–
i-my-me
you -your
-you
इत्यादि दोहरा –दोहरा
कर रटवा ही दिया था |सर खुद इन्हें पोयम की तरह लय में बोलते थे |बच्चों ने भी
वैसे ही याद कर लिया था|
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सर ने तो अपना काम
किया |
ये तो बच्चों को
बहुत बाद में जाकर पता चला –पता चला होगा कि-
उस समय नौंवी कक्षा
की ग्रामर में इंग्लिश के जिंदल सर ने उन्हें जो ग्रामर करा दी थी ,वह उन्हें
जिंदगी भर के लिए याद हो गयी थी |कि –
उस समय नौंवी कक्षा
में उन्होंने ग्रामर के जो टॉपिक पढ़ लिए थे ,वास्तव में अंग्रेजी भाषा की ग्रामर
के वे ही मुख्य टॉपिक थे | कि –
उस समय क्लास में
जिस भाषा की पढाई से उन्हें खौफ नहीं हुआ ,उस पढाई का पढना उनके देश में पढ़े-लिखे
होने का आत्मविश्वास पाने के लिए बेहद जरुरी था | कि –
मात्र इस
आत्मविश्वास के कारण उनके आगे ज्ञान-विज्ञान के कितने रास्ते खुल गए थे |कि -
देश के हजारों बच्चे
इंग्लिश से खौफ खाने के कारण पढाई छोड़ देते है |
बच्चों को उस समय ये सब बातें कहाँ पता थीं ?
रिसेस चल रही थी
|उमा और अनुराधा क्लास के बाहर चबूतरे पे बैठी पैर झुला रही थीं |सामने मैदान में
बच्चों के खेलने से धूल उड़ रही थी |यशा और प्रीती घुमती-घामती उन दोनों के पास आ
खड़ी हुईं |
“अच्छा दीदी ! ये
बताओ क्या जिंदल सर बहुत मारते हैं ?”- प्रीती ने उमा से पूछा |प्रीती अनुराधा की
छोटी बहन थी पर पढाई में होशियार होने के कारण वह अपनी बहन से ज्यादा उमा की बात
को मान देती थी |
“अरे नहीं ! जिंदल
सर तो बहुत अच्छे हैं |लड़कियों को तो कुछ भी नहीं कहते | हाँ! कभी –कभी लड़कों को
मार देते हैं | वैसे बहुत अच्छे हैं सर |”
“ मैंने सुना है
जिंदल सर को कोई कुछ भी नहीं कह सकता ..........................................................”
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