मंगलवार, 21 मई 2024

कल हम गोहाना गए थे । गुरूदेव श्री सुशील मुनि जी म ने पन्नवणा सूत्र पढ़ने की कृपा फरमाई है । 

...

अब की बार गुरूदेव जयमुनि जी का चातुर्मास भी गोहाना मे ही है । कुछ चक्कर ज्यादा लग जाएंगे। 

 ...


गुरुवार, 16 मई 2024

धार्मिक विमर्श की पुरानी पोस्ट

 1

lets talk one -two thing so that when we reach 3-4-5 thing ,we automatically understand 6-7 thing .

इस पोस्ट के लिए मैंने टॉपिकों की थोड़ी- बहुत सूची बनाई थी जो इस प्रकार हैं –उदासीनता< मैं ऐसी क्यों हूं <मेरे धार्मिक विमर्श< व्रतों का स्वरूप <टीम | लेकिन मैं इसका विश्लेषण टॉपिक वाइज नहीं कर रही | अभी बात शुरू करने के लिए मैं पहले मेरे धार्मिक विमर्श से शुरू कर रही हूँ |


 एक बार मैंने पहले भी लिखा था कि मेरी लाइफ का ग्राफ ऐसा रहा है कि समुद्र की लहर की भांति एक लहर साहित्य की ऊपर की ओर ; और दूसरी लहर धार्मिक अध्ययन की नीचे की ओर. साथ साथ चली है |

 धर्म मेरा प्रिय विषय है |मुझे उस पर बात करना हमेशा अच्छा लगता है और इस पर बात करने से बात शुरू हो जाएगी |क्योंकि अभी मन खराब है| इस पर बात करूंगी तो  मन भी ठीक हो जाएगा |


< मेरे धार्मिक विमर्श से तात्पर्य है कि जैन आगम पढ़ते हुए मैंने जिन जिन बातों को जैसे समझा है यह मेरा नजरिया , बातों को समझने का मेरा वर्जन है | 


इसमें मैं हूं -नीरू जैन -जो हरियाणा में जन्म हुआ है |परिवार के बीच में रही है |उसके कुछ अनुभव हैं |अच्छे –बुरे |और एक हिंदी शेत्र में पले- बड़े होने के कारण उसके कुछ विश्वास है |जो सही है या गलत ,वह नहीं जानती| जब वह गुरुओं के संपर्क में आती है तो उनकी श्रद्धा की वजह से वह अध्ययन करती है | साथ ही साथ उसने साहित्य भी पढ़ा है | साहित्य की ट्रेनिंग की वजह से इन् धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन उसके लिए बहुत रसपूर्ण बन गया है और वह कौन-कौन से स्थल हैं जिसने उसकी सोच को बदला है| जिसकी पुरानी सोच जो हिंदी शेत्र में रहने के कारण बनी है ,हिंदी से बनी है वह कैसे नई जानकारी से टकराई और उससे उस में क्या परिवर्तन आया -यह मेरे धार्मिक विमर्श हैं |

मेरे धार्मिक विषयों के अंतर्गत यह टॉपिक हैं -

• परिवार का मिलना पुण्य होने की निशानी है |

• वह गुफा में चंपक लता की तरह बढ़ने  लगा|

• एलक अध्ययन में मानों वह आदेश की प्रतीक्षा करता है |

• विशेषण में रानी धारिणी का प्रीतिमना होना 

• उववाई के रिच विशेषण 

• पाप रुचि -शब्द ने झटका दिया |

• राजा की अवधारणा |

• स्वार्थ शब्द का सुंदरतम अर्थ

 पहला- परिवार का मिलना पुण्य की निशानी है |उत्तराध्ययन सूत्र में एक अध्ययन है उसमें 10 बोल आए हैं कि जीव को पिछले जन्म के पुण्य के फल स्वरुप 10 बोलों की प्राप्ति होती है जिसमें पहला बोल चार कामस्कन्ध –क्षेत्र,वस्तु ,सोना ,पशु-दास वर्ग है |शेष नौ अंग हैं –मित्र,ज्ञाति,उच्च गोत्र ,सुंदर वर्ण ,बीमार कमहोना,महाप्रज्ञाशाली,अभिजात,यशस्वी,बलवान है | 

क्योंकि हम हरियाणा के हैं और हरियाणा में बड़े- बड़े परिवार होते हैं |हमारा परिवार भी बहुत बड़ा है |जहां ज्यादा बर्तन होते हैं उनमें टकराते बहुत हैं| तो टकराव की वजह से यह था कि मुझे यह अच्छा नहीं लगता|

लेकिन जब मैंने पढ़ा कि बड़े परिवार का मिलना तो पुण्य की निशानी है तो मैंने अपने गुरु- गुरुदेव रामप्रसाद जी महाराज (गुरुदेव सेठजी महाराज के छोटे भाई  )से पूछा भी था कि क्या बड़े परिवार का होना पुण्य की निशानी है| तो गुरुदेव ने हंसकर कहा था कि हां !अगर कोई इंसान अकेला है, तो अकेला क्या कर लेगा | 


दूसरी बात -ज्ञाता धर्म कथा में मेघ कुमार जी के जन्म के वर्णन में यह शब्द आया कि वह गुफा में चंपक लता की तरह बढ़ने लगा |इसने भी मेरी सोच को बहुत बदला था |

अभी जैसे परिवार मे हमारे जो व्यक्तिगत अनुभव होते हैं वह थोड़े कुछ अच्छे बुरे होते हैं तो उसकी वजह से टीनएज लड़के -लड़कियों में इस तरह का गुस्सा बन जाता है |अपने माता-पिता के प्रति इतना गुस्सा बन जाता है कि हमें लगता है कि हम आजाद नहीं है |ऐसी बातें होती हैं |हम उनकी सुरक्षा मे घुटन महसूस करते हैं |पर यहाँ जब मैंने पढ़ा कि गुफा मे चंपक लता की तरह बढ़ने लगा ,तो इसमे तो मुझे कहीं घुटन नजर नहीं आई |अपनी सोच पर हैरानी हुई – अरे ! मैं तो कैसे (ना) समझती थी इस बात को | 

2

जैनागमों की विशिष्ट भाषिक अभिव्यक्ति ने भी मुझे बहुत चमत्कृत किया है | उदाहरण के लिए उत्तराध्ययन सूत्र में- औरभरीय अध्ययन में यह आया है कि मालिक ने बकरे को खिला पिला कर मोटा ताजा बना दिया है और अब वह बकरा मानो आदेश की प्रतीक्षा करता है |आदेश का अर्थ -अतिथि | तो यह भाषिक अभिव्यक्ति बड़ी चमत्कार पूर्ण थी क्योंकि मैंने समझा कि बकरा क्यों मृत्यु की प्रतीक्षा करेगा | लेकिन क्योंकि मालिक ने तो उसे इसीलिए खिला पिला कर मोटा ताजा बनाया है कि वह अतिथि के आने पर उसे काटकर खिलाएगा |तो अब क्योंकि वह खिला पिला कर मोटा ताजा बन गया है तो अब मालिक के साथ जैसे मानो वह  भी अतिथि की प्रतीक्षा करता है| यह अभिव्यक्ति बहुत चमत्कारपूर्ण लगी थी मुझे |ऐसे बहुत उदाहरण हैं |

विशेषणो की दृष्टि से अगर जैनागमों को पढ़ा जाए तो यह एक समृद्ध साहित्यक अनुभव है | शुरुआत में इन आगमों के प्रति मेरा आकर्षण इनकी साहित्यिक विशेषताओं के कारण ही बना| बल्कि मैंने ‘जैनागमों में आए कतिपय साहित्यिक स्थल’ के नाम से लेखों की एक श्रृंखला भी लिखी है जो स्वाध्याय दर्शन नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई है | उदाहरण के लिए- ज्ञाताधर्मकथा में राजा श्रेणिक की रानी धारिणी ने पूर्व रात्रि में एक स्वप्न देखा है कि एक विशालकाय हाथी लीला करता हुआ उसके मुख में समा गया| यह स्वप्न देख कर उसका मन प्रसंता से भर गया| वह अभी शैया पर ही बैठी है | उस समय की उसकी स्थिति को कितने सुंदर शब्दों में बताया गया है| इसी तरह उववाई मे राजा के, राजा की नगरी के , उद्यान के, वृक्षों के वर्णन और मंदिर के वर्णन विशेषण की दृष्टि से इतने रिच हैं कि यह अपने आप में एक है समृद्ध साहित्य का अनुभव है|


पाप रुचि –इस शब्द ने मुझे बहुत झटका दिया | शायद हिंसा के कारणों की व्याख्या में मैंने इस शब्द को पढ़ा था कि जहां यह बताया गया था कि संसार में हिंसा के क्या कारण होते हैं| पशुओं के प्रति हिंसा उनके नख ,केश, दूध, मांस, हड्डी ,दांत , खाल के लिए करते हैं |मनुष्य के प्रति हिंसा लालच में और धन के लिए करते हैं|

पता नहीं ,इस शब्द ने मुझे क्यों झटका दिया |कह नहीं सकती |

एक तो शायद इसलिए की संसार मे बहुत सी बातों के अडेप्ट होते हैं | हमारे जैसे लोग जो डायरेक्ट ऐसी हिंसा से आमने सामने नहीं है ,वह लोग इस बात को ऐसे समझते हैं कि यह उन लोगों का मजबूरी है क्योंकि उनके पास और कोई कार्य नहीं है करने के लिए जीवन यापन के लिए| एक तरह से संसार में यह हिंसा मान्य भी है |यह उनका काम है|


दूसरी बात इसमें यह है कि शुरुआत से ही हम समाज के ‘भले होने ‘और ‘बुरे होने’ के खांचों में बंटे होते हैं| और ‘हम तो भले ‘ -भले होने के नाते ,भले होते होते हम यह भूल जाते हैं कि मात्र हमारी भले होने से यह आवश्यक नहीं है कि सब लोग भले हो गए हैं | भला होना एक जड़ता भी है ऐसा व्यक्ति सभी को अपने जैसा समझता है| यह एक प्रकार की जड़ता भी होती है | ऐसे लोग अपने नियम खुद बना लेते हैं वह समझते हैं कि फलां से यह पाप हुआ है तो इसकी कोई मजबूरी रही होगी |इसने चोरी की है ,इसने झूठ बोला है ,तो इसकी कोई मजबूरी रही होगी | शायद इसीलिए इस शब्द ने मुझे इतना झटका दिया क्योंकि यह बात मेरी कल्पना के बाहर थी कि लोगों में पाप की रूचि भी हो सकती है|    

हिंदी क्षेत्र में राजा की अवधारणा बड़ी रंगीन और स्ट्रांग है| इसका बढ़ा चढ़ाकर अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन हिंदी भाषा के अंदर मिलता है| जैनागमों में राजा की अवधारणा से संबंधित अलग-अलग व्याख्या पढ़ी | एक जगह पढ़ा कि राजा दूसरे की वमन किए हुए धन को भी ग्रहण कर लेता है |एक जगह पढ़ा कि राजा दूसरे के धन के लुटेरे होते हैं | राजा कोनिक के वर्णन बहुत प्रभावशाली भाषा में बताए गए हैं| एक जगह आया कि राजा होना सब चाहते हैं ,सबकी इच्छा होती है कि वह एक बार राजा होने के स्तर और लेवल को पा ले | हिंदी में यह इच्छा बहुत तीव्र है |

स्वार्थी शब्द को हिंदी में नकारात्मक लहजे में प्रयोग किया जाता है कि स्वार्थी होना बुरा होना अनिवार्य रूप में| 

आगमों मे इसका प्रयोग इस तरह से देखा कि आचार्य भगवंत ने जब मोक्ष प्राप्त कर लिया तो अपने स्व-अर्थ को प्राप्त कर लिया |वहाँ इस शब्द का प्रयोग नकारात्मक से नहीं है | इस तरह से मुझे लगा कि उस समय उस सोसाइटी के लोग इतने अधिक जागरूक और बोधवान थे कि वह अलग -अलग व्यक्तित्व के अलगपन को सहजता से स्वीकार कर सकते थे |हो सकता है यह बात उस समय के जनसाधारण की बात नहीं हो, बल्कि यह उस समय की उच्च बौद्धिक ,ज्ञानी वर्ग की बात है |आजकल हम देखते हैं बहुत से लेखकों की बहुत सी ऊर्जा अपने को साबित करने में, अपनी तरह जीने में ही निकल जाती है | वह छोटी-छोटी मामूली बातों को अपनी तरह से करना चाहते हैं लेकिन सोसाइटी इतनी ज्यादा प्रेशर में रखती है कि उनकी बहुत सारी ऊर्जा ,बहुत सारा समय ,बहुत सारी मेहनत इसी में निकल जाती है कि वह अपनी तरह से जी ले |

3

धार्मिक विमर्शों की इस कड़ी में अगला विमर्श था जो मेरे चिंतन का विषय बना - काम भोगों की निंदा | यह बात थी जो मेरे चिंतन में आई कि हमारे ग्रंथों मे काम भोगों की इतनी निंदा क्यों की गई है |हर कोई यह चाहता है कि वह अच्छा खाए , अच्छा पीए, अच्छा पहने ,अच्छी तरह रहे और अच्छी तरह जीए ,फिर यह हमारे समाज का स्वीकृत ,घोषित मूल्य क्यों नहीं है |क्यों सब लोग दबे-छुपे, अंदर मन मे तो यही चाहते हैं; पर बाहर त्याग की ,निस्पृहता की ,अकिंचनता की प्रशंसा करते हैं | 

दूसरे अगर हम काम-भोग का अर्थ उस अर्थ में भी ले जैसे हिंदी क्षेत्र में समझा जाता है ,तो भी संबंधों की दृष्टि से और स्त्री-पुरुष संबंधों की दृष्टि से, इसमें क्या बुराई है | यह तो जीवन का आधार है| इन माता –पिता ,भाई-बहन आदि संबंधों का प्रेम तो मनुष्य जीवन का आधार है| यह एक बात थी ,यह एक सवाल था जो मेरे अंदर बहुत सालों तक, बहुत गहराई से चलता रहा|

ये सब 2014-15 के आसपास की बातें हैं |उस समय मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानती थी |आज मुझे इसका उत्तर पता है |

लेकिन यह समझने से पहले हमें विशुद्ध धार्मिक विमर्श समझने होंगे |

विशुद्ध धार्मिक विमर्श ;

• जीवन की अनित्यता 

• जीवन की क्षणभंगुरता/ अल्पता 

• शरीर की नश्वरता 

• जीव का एकत्व/ अकेलापन 

• नातेदार ओर परिवार की अशरणता 

यह सब जो बातें हैं वह इंद्रिय प्रत्यक्ष हैं अर्थात यह बातें ऐसी नहीं है कि मैंने अपनी परंपरा से सीखी है |किसी धार्मिक परंपरा ने मुझे सिखाई हैं ,मैं मानती हूं इसलिए ऐसा है |यह हर कोई देखता है|

अधिकतर धर्म के विषय में यह भ्रांति है कि आप तो फला धर्म में जन्म हुए हो इसलिए आप इन बातों को मानते हो| हम क्यों माने |लेकिन यह जो विमर्श है यह किसी के मानने या ना मानने की चीज नहीं है |यह बिल्कुल इंद्रिय प्रत्यक्ष हैं |सबकी आंखों के सामने है | 

इन बातों का ज्ञान वह मेधावीपन है जो इस पथ पर निकले हुए साधक को आरंभ से ही होता है | तब पूर्ण सत्य की खोज में वह निकलता है (उठा हुआ) और तब उसकी राह में जो भी चुनौतियां आती हैं ,उन को पार करते हुए वह आखिरी सोपान तक पहुंचता है जिसे मोक्ष कहते हैं| यह एक फुल- फ्लैश , होल टाइम खोज है जिसमें एक जीवन, दो जीवन, जितने भी जीवन लग सकते हैं |

इस यात्रा में जो सबसे बड़ी बाधा है वह है काम-भोग अर्थात खाने ,पीने. रहने और और स्त्री संबंधी शक्तियां ही मनुष्य को इस राह पर आगे बढ़ने में रुकावट पैदा करती है |यह कारण है कि इसकी इतनी अधिक निंदा की गई है |पहली शंका समाप्त |

दूसरे परिवारिक संबंधों के संदर्भ में यह शंका बरकरार थी |इसका समाधान होने में बहुत समय लगा| बल्कि मैं कहूंगी कि यह मेरे लिए एक चमत्कार से कम नहीं है |महावीर स्वामी जी की कृपा है| यह कैसे हुआ ,मेरे लिए यह जानना तो ,इसका आकलन करना संभव नहीं है | पर मैं इतना अवश्य कह सकती हूं कि यह उस प्रक्रिया का ही फल है जो शास्त्र पढ़ने से और अलग-अलग तरह की आलोचनात्मक किताबें पढ़ने से और गुरुओं के संपर्क से और मेरे परिवार के संपर्क से हुई |

इस तरह संबंधों के संदर्भ में मेरी इस शंका का समाधान इस तरह हुआ कि काम -गुण अपनी प्रकृति में ही अस्थिर ,चंचल और सदा अतृप्ति के कारण हैं |इन्हें महाभय का कारण कहा गया है|

पाठक इन पंक्तियों में साहित्य और दर्शन का संबंध भी देख सकते हैं| दर्शन में जिसे काम गुणों की अस्थिरता और चंचलता कहा गया है ,साहित्य में उसी द्वंद्व को नायिका यह कहकर गीतों में पिरोती है कि तुम भूल ना जाना , भंवरा ना बनना आदि

got diabetes.

....

जब हमारा मन स्वतंत्रता से कार्य करता है, तब ही वह अपने सर्वश्रेष्ठ परिणाम को प्राप्त करता है। आनन्द तभी प्रकट होता है । इसलिए मन की स्वतंत्रता को मैं बहुत महत्त्व देती हूं ।इतने वर्ष बीत जाने पर भी मैंने टीम* में आज तक किसी के लिए कोई भी निर्देश नहीं दिया,  क्योंकि मैं ' प्रोसेस' को महत्त्व देती हूँ। वे सब चीजें देख रहे हैं , जब ठीक लगेगा वे अपने आप मनमुताबिक कार्य मे प्रवृत होंगे। 

 मेरे लिए शास्त्र का अर्थ था - भगवान की ऑथेंटिक वाणी। इस बात पर मुझे श्रद्धा अपने गुरुओं के कारण से है । क्योंकि हमारे गुरु भी तो उसी वाणी के हिसाब से अपना जीवन चल रहे हैं।

कहते है इंसान का मन गहनतम होता है। जब मैंने शास्त्र पढ़ने शुरू किए तब मुझे उस विपरीत रास्ते का पता चला , जिसपर सारा संसार चल रहा है ।  मैं भी चल रही थी।

 शास्त्र पढ़कर ही मैंने अपने मन की गहनतम संदेहों को जाना। इनकी एक छोटी बानगी** मैंने पहले भी फेसबुक पर कई पोस्टों में लिखी है। वह एक अलग पोस्ट के रूप में दोबारा लगाई है ताकि पाठक देख सके।

  ...

* टीम के लिए मैं कहूँगी की इसके दो फेज रहे ।पहला फेज 2016 तक था । उसके बाद डेढ़ -दो  साल तक तो मैं चली ही गई थी। उसके बाद 19 से कुछ सुगबुगाहट दोबारा शुरू हुई थी ।तो जो पहली टीम थी वो तो डिसमिस ही समझिए । उसका तो कुछ हुआ ही नहीं क्योंकि ना किसी ने रिस्पॉन्स किया ,ना प्रोग्राम बने ।

प्रोग्राम तो दूर की बात है ,लाइक तक नही की । सब बने भी रहे ,और अड़कर खड़े भी रहे । हमने अब तक यही झेला है । फिर भी मै खुश हूं । जो हुआ है ,शुभ हुआ है । क्योकि इस संघर्ष मे ही हमने खुद को पहचाना है ।

दुनिया के इतिहास मे शायद ही कोई अफल होकर इतना खुश हुआ होगा ।

आगे क्या होगा । मुझे नही मालूम। 

**भगवान की वाणी पे श्रद्धा करने वाले जन वे भाग्यशाली 'नेपो किड ' हैं ,जिन्हे अपने भावों को व्यक्त करने के लिए एक बनी बनाई भाषा स्वयंमेव ही प्राप्त हो गई है ।

धार्मिक विषयों मे चिन्तन मनन को शास्त्रीय भाषा मे अनुप्रेक्षा कहते हैं। यह स्वाध्याय के पांच भेदों -वाचना ,पृच्छना ,अनुप्रेक्षा आदि मे से तीसरा भेद है ।

....

अपनी ही नही , फेसबुक पे मै कई पोस्ट ऐसी देखती हूं जिनका सार महावीर वाणी मे आया है । 

मनीष सिंह की पोस्ट है -जगजीत सिंह की गजल पर । शरारा ,दो घड़ी का है खेल सारा टाइप । इसमे जो बात कही गई है ,वह हूबहू कई शास्त्रीय तथ्यों से मेल खाती है ।

ऐसी पोस्ट और भी हैं । अभी याद नही आ रही ।

..

जब मै ये पोस्ट देखती हूं तो मेरे मन मे यह क्लांति उपजती है कि हाय!ये बात सही समझ रहे है , कह भी रहे है , बस ये समग्रता से अनजान हैं ।

खैर 

... 

महावीर वाणी का मार्ग सुख -शांति का सच्चा मार्ग है ।

....



बुधवार, 15 मई 2024

 दुर्लभ परिस्थितियों में ही ऐसा होता है कि बंधन बाजूबंद बन जाए।

 मेरे साथ ऐसा ही हुआ है।

 स्त्रियों का शास्त्र पढ़ना, ये कोई नॉर्मल बात नहीं है। इस तरह की नॉलेज के प्रति आकर्षण होना,

 पहला बंधन तो यही है कि क्या तुम्हें दीक्षा लेनी है ? क्या साध्वी बनोगी? और अपने तीखेपन में यह प्रश्न बहुत ही 'ऑब्वियस- सा' लगता है। सदा के लिए किसी का उत्साह तोड़ देने के लिए काफी है ।

 ये दुनिया कार्य- कारण और उसमें फायदा ढूंढने के वज्र सरीखे नियमों पर चलती है।

 दूसरा इस क्षेत्र की नॉलेज के प्रति आम गृहस्थियों में 'रहस्यात्मक  होने ' का भय होता है । यह भय आगे पारिवारिक सुख- शान्ति को बचाने  के लिहाज से बहुत उचित  दिखाई पड़ता है।

 तीसरी बात है प्रसिद्धि पाने की चाह  का बंधन भी बहुत मजबूत है। इस क्षेत्र में वास्तविक तरक्की के लिहाज से।  मुझे प्रवचनकार नहीं बनना था।  मुझे लेखक नहीं बनना था। यह आकांक्षा भी मेरे मन में नहीं थी ।


 तो इस तरह विशुद्ध पढ़ना और पढ़ने  के आनंद को प्राप्त करना , ये ही एक लक्ष्य था पढ़ने का।बाकी चीजें खुद-ब-खुद घटित होती चली  जाती हैं । 

 मैं इन सभी बंधनों को पार कर पाई, सिर्फ और अपने  गुरु की वजह से। गुरु के प्रति श्रद्धा होने के कारण मुझे कभी किसी बात का भय नहीं हुआ। 

...

  


सोमवार, 13 मई 2024

Mehak jain got 93% in 12th cbse board.  Also she got a good rank in ipu bcom -hons entrance test.

# बल्ले- बल्ले. 

Bt she is nt satisfied.  कह रही है -मम्मी ये तो बैकअप का भी बैकअप था । 😂

..

यहां हमारे समय के डिस्कोर्स में  ये बातें चल रही है कि पेरेंट्स अपनी महत्वाकांक्षाएं बच्चों पर न थोपे । 

उन्हे मालूम नही कि समय बदल गया है । ये बातें पुरानी हो ली । पेरेंट्स को गिल्ट मे डालना छोड़ो।  अब बच्चो की महत्वकांक्षा बढ़ गई है ।😊

....

समय तेजी से बदलना मतलब बोध का बदलना । Overall यह सब इतना तेज है कि पांच साल बड़े भाई-बहन भी जेनरेशन गैप जितना अलगाव महसूस करते है  ।

 .. 


गुरुवार, 9 मई 2024

   


सदा हँसता हुआ चेहरा ।
उनकी हँसी ऐसी थी 'उन्मुक्त ठहाके ' कि पल भर में सारे दुख ,चिन्ता , शोक,कठिनाई को हर लेती थी । 
गुरूदेव श्री रामप्रसाद जी महाराज जी की जय हो  ।आज उनकी जयंती है ।

मंगलवार, 7 मई 2024

लॉकडाउन में मुगल शासकों के इतिहास पढ़ने की बातें मैंने पहले भी अपनी पोस्ट में लिखी हैं । 

- एक पहले की पोस्ट 

शहजादे दारा शिकोह का आख्यान धार्मिक,सांसारिक,दार्शनिक सत्यों की विचित्रता को उजागर करने का एक करूण प्रसंग है।

बेगम जहाँआरा की आत्मकथा पढने के बाद शाहजहां के परिवार को जानने मे मेरी रूचि जागी और इस तरह मै कानूनगो की किताब तक पहुंची ।इसकी भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है ।

पहले मुझे दारा के जीवन मे दिलचस्पी थी ।शाहजहां की उस पर विशेष कृपा,उसकी धार्मिक रूचि ,परिवार, ओरंगजेब से उसका युद्ध और करूण अन्त। 

सभी इतिहासों मे उसके करूण अन्त का वर्णन बड़ी करूणा से किया गया है ,अतः दिलचस्पी होनी तो स्वाभाविक थी कि ऐसी भी क्या बात हुई। 

बाद मे इस किताब मे दिए गए एक चैप्टर ने मेरा ध्यान खींचा जो दारा की लिखी हुई किताबो पर है ।इससे उसकी धार्मिकता व आध्यात्मिकता पर प्रकाश पडता है ।

इस किताब ने दारा की ऐतिहासिक शख्सियत से पूरा न्याय किया है। ज्ञान ,श्रम, प्रतिभा का सुसंयोग है यह किताब ।जो कुछ भी किताब मे है ,उसके अलग अपनी रीडिंग और समझ के अनुसार कुछ बाते यहां लिखूंगी ।cont..

एटसेटरा

....

दारा शिकोह के जीवन को पढ़कर , उसकी अध्ययन में रूचि देखकर मुझे ये रिअलाइज हुआ कि इस तरह की नॉलेज को  आत्मज्ञान की नॉलेज कहते हैं। साथ ही उसके जीवन को देख कर मैंने ये अनुमान लगाया की ये अवश्य विनयवादी है। एक जगह वो कहता है कि मैं ईश्वर की कल्पना परमपिता,  दयालु के रूप में करता हूं ।अगर वह मेरे प्रति दयालु और करुणामय  नहीं है तो मैं उसे ईश्वर मानने से इनकार करता हूँ । टाइप

...

विचार साम्यता के कारण दारा शिकोह की दार्शनिक टाइप को समझकर ही मैंने अपनी दार्शनिक टाइप भी समझी। की मैं भी विनय वादीे कैटेगरी की हूँ।

....

अब बात पहली और दूसरी कैटेगरी की । क्रिया का विषय जैन दर्शन का एक महत्वपूर्ण विषय है । बहुत से शास्त्रों मे यह विषय आया है ।

 हैरानी की बात है की जिन नौ तत्वों पर श्रद्धा करके  एक श्रद्धालु क्रियावादी कहलाता है,  उन्हीं (-2) तत्वों पर श्रद्धा करके एक दूसरा श्रद्धालु अक्रियावादी कहलाता है। यह इन दो  वादों का सबसे पेंचीदा पॉइंट है ।

 ज्यादा मैं भी नही समझी हूँ । 

ये विषय घनघोर स्लो मोशन के विषय है । इनमें प्रगति धीमी होती है ।

.....

आगे आप समझिए कि चारों ही तरह के दर्शन  एकांतवादी कहलाते हैं अर्थात एक मत को पकड़कर चलने वाले । जैन दर्शन अनेकांतवादी है ।

....

यह मेरा प्रिय विषय है । जब भी अवसर मिले तो ,  बातें साझा करके संतोष होता है । 

.... 








सोमवार, 6 मई 2024

 कुछ पोस्ट ऐसी होती हैं जिन्हें देर से लिखने का पछतावा होता है। यह पोस्ट ऐसी ही है।

 देर से लिखने के कई कारण हैं। कई बार फोन हाथ में नहीं रहता।  टाइम भी कम मिलता है।

 पछतावा इसलिए क्योंकि बहुत समय इंतजार करने के बाद जाकर तो , इस तरह की बातचीत का कोई मौका मिलता है। और तब भी आप उस बात को लिखने में देर लगा दो । खैर।

शोभित ने ईश्वर है या नहीं, इस तरह की एक पोस्ट लिखी थी।तब मैंने एक पोस्ट शेयर की थी - क्रियावादी एटसेटरा।

सुशोभित ने कहा - मैं बदसूरत, खूबसूरत एट्सेटरा।

 सबसे पहले  तो मैं कहूँगी  विनय और सरलता, यह सर्वप्रथम अर्हता है,  आत्मज्ञान के क्षेत्र में  'क'  सीखने की भी ।

....

पहले मैं जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी जी के जीवन का एक तथ्य शेयर करती हूँ की महावीर स्वामी जी  दीक्षा लेने के बाद 12 वर्ष तक मौन रहे थे ।उनका यह संकल्प था कि जब तक मुझे केवल ज्ञान प्राप्त नहीं होगा तब तक मैं एक भी शब्द नहीं बोलूंगा। यह इस क्षेत्र की नॉलेज के प्रति गंभीरता और गहनता को समझने का एक बहुत बडा महत्वपूर्ण संकेत है।

दूसरी बात मै हमेशा कहती हूं कि जैन दर्शन की मेरी समझ मेरा version है , बातों को समझने का । यह अंतिम नही है ।

इस तरह का कथन कहना ,विनय -वचन व्यवहार भी है और जिन वाणी के अर्थ की बहुलता का संकेत भी है ।

 ...

रेफरेंस के लिए वह पोस्ट दोबारा यहां लगाई है -

 समवसरण

क्रियावादी = जीव अजीव पाप पुण्य आस्रव संवर बन्ध निर्जरा तप मोक्ष = 9 ×2 स्व-पर = 18×10 नित्य -अनित्य अर्थात काल, नियति ,ईश्वर, स्वभाव, आत्मा = 5×2 =10 । 18×10=180

अक्रियावादी 

जीव अजीव आस्रव संवर बन्ध निर्जरा तप मोक्ष = 7 ×2 स्व-पर = 14×12 नित्य -अनित्य अर्थात काल, + यदृच्छा , नियति ,ईश्वर, स्वभाव, आत्मा = 6×2 =12 । 14×12= 84

अज्ञानवादी 

9 ×7 =63 

7=सद असत सदसत अवक्तव्य सद् -अवक्तव्य असद- अवक्तव्य, सद-असद-अवक्तव्य

विनयवादी

देव ,राजा ,यति ,ज्ञाति ,स्थविर ,अधम ,माता पिता =8 ×4 मन,वचन,काय,दान = 36

....

यह विषय सूत्रकृतांग और भगवती सूत्र में आया है । 

..

 यहाँ से आगे मैं पोस्ट को थोड़ा क्लैरिफाइ करूंगी । 

  • समवसरण का अर्थ है- मिलना । वर्तमान में विचार गोष्ठी टाइप ,जहां विभिन्न प्रकार के वादी मिलते है ।

यह शब्द तीर्थंकर की धर्म सभा के लिए भी प्रयोग मे लाते है ।अन्य किसी की सभा के लिए इस शब्द का प्रयोग नही लाते ।

  • तत्व नौ हैं । जीव ,अजीव आदि । कोई  सात भी कह देते है । वे पुण्य-पाप को जीव के साथ संलग्न मान लेते हैं ।
प्राचीन भारतीय चिन्तन परंपरा मे यह संख्या लगभग स्थिर हो गई है। जीव और अजीव का अंतर तो स्पष्ट ही है । यह तो प्रत्यक्ष चक्षु दर्शन का विषय है कि दिख रहे जगत मेें एक तत्व चेतन है ,आत्म

 कह लो ,soul एटसेटरा ।बाकी तत्वो  का विषय इस विषय से जुडा है ।

जैन दर्शन मे चार तरह के दार्शनिक बताए गए हैं। उन में तीसरे नंबर के दार्शनिक अज्ञानवादी कहलाते है ।ये 63 प्रकार के होते हैं। 

नौ तत्वों को  सत असत आदि 7 प्रकार से देखने पर 👀 इनके नतीजे 63 तरह के निकल सकते है ।  

कोई कहते हैं कि नव तत्वादि सत हैं

कोई कहते हैं कि असत्य है ।

कोई कहते हैं कि सत्य-असत्य है । (अनिर्णय की अवस्था)

कोई कहते हैं कि अवक्तव्य है ।कह नही सकते ।

आगे इन्हीं तीनों की अवक्तव्यता वाले हैं । 

अभी जैसे कई पोस्टों में विकास दिव्यकीर्ति के इंटरव्यू की बात चल रही थी

उसी इंटरव्यू में विकास दिव्यकीर्ती ने यह कहा कि मैं पहले ऐथिस्ट था । अब नहीं हूं , क्योंकि मैं नही जानता था। जानता तो अब भी नही हूं, लेकिन जिस बात को हम नही जानते ,तो क्यों कहें कि वह नहीे है  एटसेटरा ।लक्षण के हिसाब से यह अज्ञानवादी की कैटेगरी होनी चाहिए।😊

यहाँ तक के चिंतन में एक छोटा सा गैप मुझे दिखाई देता है।  

कहते हैं कि अज्ञानी वह हैं जो यह जानता नहीं है कि वह अज्ञानी हैं। जो यह जानता है कि वह अज्ञानी है तो दरअसल वह ज्ञानी है।तो दरअसल दूसरे टाइप का अज्ञानी जिज्ञासु हैं।

..

अब आते हैं चौथे नंबर के दार्शनिक पर - विनयवादी। ये 32 तरह के होते हैं ।इसमें आठ जन  की मन वचन काया और दान से विनय करने में ये धर्म मानते है। 

वैसे तो चारों ही कैटेगरीज़ का क्षेत्रफल बहुत ज्यादा है। फिर भी इस कैटेगरी के लोगों की संख्या(मेरी समझ में) बहुत ज्यादा होगी। 

माता  पिता ,गुरु, शिक्षक ,राजा  आदि ,  एक तरह की आचार व्यवस्था में इनके प्रति विनय को ही धर्म माना गया है। 

 माता पिता के प्रति आदर पूर्ण रहना

शिक्षकों के प्रति आदर पूर्ण रहना

गुरु , साधु के प्रति आदरपूर्ण रहना। इत्यादि 

बल्कि हम यह देखते हैं कि संसार मेें बताए जाने वाले धर्मों का एक बड़ा हिस्सा इनके प्रति सुआचरण से है । एक सामान्य लेवल तक इसमे कुछ गलत भी नही है ।

...

लगभग 20 साल शास्त्र पढ़ने के बावजूद तथा उससे भी पहले प्रवचन और गुरु दर्शन के माध्यम से एक परंपरा से जुड़े होने के बावजूद , मैं ये कहूँगी कि मुझे यह कभी पता ही नहीं था कि यह नॉलेज आत्मज्ञान की नॉलेज कहलाती है । सचेत रुप में ।अपने जाने तो मैं अपने गुरु की आज्ञा लेकर शास्त्र पढ़ रही थी । मुझे रस आ रहा था । मुझे नई नई बातें पढने को मिल रही थी । बस ।

एक बहती हुई धारा में बहते आने के समान , ये सब चीजे मेरी लाइफ ऑटोमेटिकली आती गई और मैं उनको फॉलो करती गई ।जैन  परिवार में पैदा होना , फिर जैन गुरुओं के दर्शन करना और शास्त्र पढ़ना एटसेटरा ।

Cont


शनिवार, 4 मई 2024

चुनाव का समय भी खासा हलचल भरा होता है ।

....

समय शब्द का एक अर्थ सिद्धांत है ।स्वसमय - अपना सिद्धांत। परसमय -दूसरे पक्ष का सिद्धांत। अहिंसा समय - अहिंसा का सिद्धांत। 

शब्द की अर्थ विभिन्नता तो साधारण व्यवहार मे आने वाले शब्दों मे भी देखी जाती है ।बहुत काॅमन है यह बात ।

....

 #पहली नौकरी पक्की और महालक्ष्मी स्कीम सहायक हैं । 

 ....