शनिवार, 30 दिसंबर 2023
बल और शक्ति
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स्थानांग सूत्र और समवायांग सूत्र संख्यात्मक हैं। जो भी विश्व में और संसार से वस्तुएं हैं, भाव है, या पदार्थ है , उनकी संख्या के आधार पर इन सूत्रों में कहा गया है। स्थानांगसूत्र के दसवें अध्याय में 10 तरह के बल बताए गए हैं।
1-5 श्रोतेन्द्रीय बल
चक्षुन्द्ररीय बल
घ्राणेन्द्रीय बल
रसना इन्द्रिय बल
स्पर्श इंद्रिय बल
6-9 ज्ञान, दर्शन,चारित्र , तप बल
10 वीर्य बल
बहुत बार समझने की शुरुआत रटने से होती है। हमारे यहाँ सुनते सुनते 5 इंद्रिय, 4 ज्ञान दर्शन चारित्र तप 4 कषाय आदि । यह सब इस तरह मतलब ये बातें बार बार आती है, तो रट जाती है। रटने से बातें दिमाग मे बैठ जाती है ।
बट , रटने से समझ खुलती नहीं है। समझ खुलती है अपना खुद का दिमाग लगाने से।
मैं शास्त्र में कही हुई इन बातों को किस तरह अपनी समझ से समझती हूँ, यहाँ मैं इसका एक उदाहरण देती हूँ।
१- अब जैसे बल की ही बात से शुरू कर लेते हैं। जैसे इसमें प्रथम पांच तो इंद्रिय का बल बताया गया है। देखने की, सुनने की, सूंघने की, स्पर्श की- ये सारे बल मनुष्यों के पास जन्म से ही होते हैं।कईयों के पास नहीं भी होते ।
दारासिंह जी मशहूर पहलवान हुए हैं। उन्होंने अपनी जीवनी लिखी है। क्यों लिखी? इस बात को समझाते हुए वे कहते हैं की मैंने जीवनी इसलिए लिखी क्योंकि मैं यह बताना चाहता था कि जिस व्यक्ति के पास हाथ की 10 उंगलियां और पैर के 10 उँगलियाँ हैं, तो उसे घबराना नहीं चाहिए और जीवन में कोई भी चीज़ उसके लिए अप्राप्त नहीं है।
यह बात मुझे बड़ी शानदार लगी। वे इसमें मनुष्य के साहस का महत्त्व बताना चाहते थे । कि किसी भी परिस्थिति में इंसान को घबराना नहीं चाहिए।
दारासिंह की इस बात को मैंने प्रथम पांच इंद्रिय बल से कनेक्ट किया। थोड़ा बहुत टेक्निकली शब्दों का फर्क है। दारासिंह जी जैन नही थे । उन्होंने जैनागम नहीं पढ़े थे ।बट शायद बात वे वही कहना चाह रहे थे।
इस तरह से जैन आगम दुनिया को समझने मे बेस का काम करते हैं ।
शक्ति
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प्रश्न व्याकरण सूत्र मे अहिंसा के 60 नामों मे एक नाम शक्ति है ।
आत्मा के आठ गुणों में - अनंत ज्ञान ,अनंत दर्शन ,अनंत सुख ,क्षायिक समकित , अमूर्तिक , अटल अवगाहना , अगुरु लघु , अनंत शक्ति अथवा वीर्य ।
2 किरण बिर सेठी एक स्कूल चलाती हैं । अहमदाबाद में । उनके जीवन का मंत्र है - I can . इस मंत्र को उन्होंने बच्चों की प्रेरक शक्ति के रूप में ढाल दिया है । एटसेटरा।
How I see her work , as , she is becoming instrumental in realizing enormous capacity (अनंत शक्ति) of kids by introducing them to various activities.
This is how I try to learn things in my own humble capacity.😊
बल का उल्लेख आचारांग सूत्र में भी आया है -एक अलग कॉन्टेस्ट में । वह फिर कभी ।
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आम जीवन में हम बल को इस तरह समझते हैं जैसे ipl etc , blockbuster film, winning election . Bcoz they move great energy .create roar .
# जैसा मैने समझा है
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शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023
बुधवार, 27 दिसंबर 2023
अभी हाल ही में मैंने साहित्य की इकोनॉमिक्स का प्रश्न पुट किया था। कुछ जवाब नहीं आए। मैं भी सोच रही थी।
वर्तमान साहित्यकारों में मुझे वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा जी का साहित्य का बेहद पसंद है।
एक साहित्यकार आपके हृदय को किस तरह से छूता है, यह एक बड़ी ही पेचीदा पहेली है। अक्सर साहित्यकार अकेले के साथी होते हैं। जीवन की ऐसी बातें जिन्हें हम किसी के सामने नहीं कहते ना परिवार में , ना ही परिचितों में। वहाँ एक साहित्यकार उन बातों को संबोधित करके हमारा दोस्त और मददगार साबित होता है।
अब इसकी कीमत क्या हो ?
सच कहूं तो इस मामले मे मै अनट्रेंड हूं । नाशुक्रे तो नही है ।
दर्शन के क्षेत्र मे गुरु से सम्बन्ध भी ऐसा ही है ।इससे थोड़ा ऊंचे लेवल का । वहाँ तो एक ही कीमत चलती है -समर्पण। हो गए हम तुम्हारे जन्म भर के लिए टाइप।
प्राचीन भारतीय आदर्श यही रहा है ।
मैने आगम पढे तो मुझे इस आदर्श के पीछे की गहराई का कुछ अंदाजा हुआ।
इसलिए जमाना चाहे कोई भी हो , आदर्श तो यही रहेगा ।
वर्तमान लेखकों मे इस आदर्श की खूब खिंचाई भी देखी जाती है । वे भी गलत नही लगते ।
सत्य कहीं बीच-बिचाले मे है ।
अब इस आदर्श से ढिलाई दें तो फिर चाटुकार और हर तरह के लोग घुस आते है ।
इसलिए जमाना चाहे कोई भी हो , आदर्श तो यही रहेगा ।
लेखक लिखने मे स्वतंत्र और निर्भीक नही , तो वह लेखक भी नही। बड़ी से बड़ी सत्ता के आगे अदना लेखकों की यह मरोड़ इसी आदर्श की देन है , सर्वथा खोखली भी नही ।
सत्य कहीं बीच-बिचाले मे है ।
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दोस्त होने के नाते 'सर जी हमारा भी करवा देना' , इतना फेवर कहना तो एक्सेप्टेबल है। समझ में आता है।
कहने की इतनी ही मर्यादा होती है। लेखकों के दोस्त वगैरह तो बहुत होते हैं ।
जो हुआ है , बहुत शुभ हुआ है ।
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मंगलवार, 26 दिसंबर 2023
साहित्य का आस्वादन इतना कीमती है फिर भी इसके विमर्श की जगहों पर भीड़ क्यों नहीं , यह क्लांति भी वर्तमान लेखकों का विषय रही है ।
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One day late post -
सुशोभित कितने समय से उपनिषद सीरीज लिख रहे हैं। मैं सारी पढ़ती हूँ और अपने पढ़े गए जैन दर्शन की शब्दावली में समझने की कोशिश करती हूँ। अब तक कोई कनेक्ट नहीं मिल पा रहा था। अब लगता है कि कुछ एक बिंदु कनेक्ट का मिला है। यह पोस्ट उनकी हृदय पोस्ट की बात को आगे बढ़ाते हुए हैं।
जैन दर्शन में परमाणु पुद्गल नाम से तत्व का जिक्र आता है। इसकी आठ प्रकार की वर्गणा (categories) है । जिसके आगे भी बहुत भेद- उपभेद है।
इनमे एक है -मनो वर्गणा ।
इसका तात्पर्य है कि जिसे हम मन या हृदय (ये दो नही है ।बल्कि किन्ही पुण्य आत्माओं के विस्तृत भाव प्रसार को , दूसरे मनुष्यों की स्वार्थ मनोभावना से अलगाने के लिए दो अलग शब्द कह लिए गए हैं ।)* कहते है , उनकी किस्म तात्विक रूप से दूसरे द्रव्यों से भिन्नहै ।
cont
* अब तत्व की दृष्टि से देखो तो एक है । बट इनके अनुभव की दृष्टि से देखो तो अलग है । दृष्टि की यह विभिन्नता नय कहते है ।
चीजों को तत्व की दृष्टि से देखना is more like science, objectivity kind of thing .
गुरुवार, 21 दिसंबर 2023
आज धूप खिली- खिली है ।
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आज से सूर्य का रास्ता परिवर्तन। मै हर साल यह बात लिखती हूं । मेरे लिए यह बात इतनी महत्वपूर्ण क्यों है , कभी लिखूंगी।
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इतने लिटफेस्ट होते है ,क्या ये सब उत्साही जनों का उद्योग है । इसकी इकनॉमिक्स क्या है ।
लास्ट मै नेहरू भवन मे हुए एक टाॅक मे गई थी ।फूड पर था । सौम्या का ।ठीक था । बट मुझे ज्यादा मजा नही आया ।
Why?can't say?
वैसे मुझे खुद पर जबरदस्त शक है कि क्या दुनिया मे कोई जगह ऐसी होगी जहां मुझे अच्छा लगेगा ?
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शायद एक जगह है । गुरूदेवों के दर्शन। 1 तारीख को सेठ जी म का 96वां जन्मदिवस है । गोहाना मे । नया साल भी है ।
मंगलवार, 19 दिसंबर 2023
आज के मनुष्यों का सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलना वैसा ही है जैसा आधुनिक राष्ट्रों का निःशस्त्रीकरण की नीति अपनाना है। क्योंकि, अब आगे कोई मार्ग ही नहीं बचा। पहले ही इतने भयंकरतम शस्त्र बना लिए हैं, एटम बम वगैरह , की अगर अब सम्मिलित राय से निशस्त्रीकरण नहीं अपनाया तो मामूली सी बातों पर युद्ध की नौबत आएगी, तो फिर अपनी रक्षा के लिए एटम बम चुनने पड़ेंगे और उनसे तो अपने खुद के देश ही नष्ट हो जाएंगे।
हमारा सत्य और अहिंसा पर चलना भी वैसा ही है। क्योंकि आधुनिक मनुष्य दूसरे की मंतव्य को समझने, और भावुकता आदि भावों से इतने ऊपर हो चुकें हैं कि, सिवाए अपने मन्तव्य के प्रति स्पष्ट रहने के अब कोई उपाय ही नहीं है।
कोई किसी का रिश्तेदार नही है ।
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सत्य आदि पांच प्रतिज्ञाओं को अगर कोई सम्प्रदाय विशेष से जोड़कर देखते है तो यह विमूढता के सिवाय कुछ भी नही । किसी के असली रिश्ते भी इस आचरण के बिना नही निभ सकेंगे । (प्रतिज्ञा कह लो या आचरण कह लो। शास्त्रीय नाम आगार धर्म है । आगार चारित्र है । ) भाई भाई से चोरी करे तो वह भाई रहेगा क्या ?
#जैसा मुझे समझ आया है ।
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सोमवार, 18 दिसंबर 2023
धर्म की सबसे सरलतम व्याख्या ये है, जितना समझ में आ जाए। अगर किसी को अपनी बुद्धि, अपने ज्ञान, और अपने अनुभवों से यह समझ में आया है कि' धोखा देना .......' इत्यादि, तो यही उसका धर्म है। अब बात उस पर टिके रहने की है।
'लेखक घर' के विजन के तौर पे ' मन की स्वतंत्रता से लेकर जीव निकाय की सुरक्षा ' को अपनाया है ।
देखा जाए, तो मन कहाँ स्वतंत्र होता है? इस पर कितने बंधन होते हैं। राग के, द्वेष के। कितना संसार पीछे लगा है । बट एक जगह यह स्वतंत्र होता है। धर्म की व्याख्या करने में।
कितने मज़े की बात है ना! धर्म का सर्वोच्च लक्ष्य है मोक्ष । मुक्ति। अर्थात स्वतंत्रता । और .....इस लंबी ,दीर्घ यात्रा में स्वतंत्रता का पहला स्टेप ही इसकी व्याख्या समझने की स्वतंत्रता से शुरू हो जाता है। अर्थात वह सुख जो मंजिल पर पहुंचने के बाद मिलना था, वह इसके पहले स्टेप से ही मिलना शुरू हो जाता है । मेरी समझ मे इसे धर्म का सबसे विलक्षण गुण कह सकते हैं। खैर
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शनिवार, 9 दिसंबर 2023
शक्ति जागरण
दोपहर के सूरज का शबाब अपने उतार पर था ।सोगी दिन भर में भिक्षा का फेरा पूरा करके मस्जिद के नजदीक अपने ठिकाने पर लौट रही थी। आज उसे दो रोटी और गोश्त का कुछ रसा कटोरी में मिला था ।खाकर ,वह संतुष्ट थी ।अब उसका मन शकरकंदी खाने का था। तपती हुई रेत पर सब ओर से सिंकी हुई , भुनी हुई शकरकंदी खाने को मिल जाए तो क्या बात हो!
हैलो दोस्तों ! मैं कौन? मैं इस कहानी की लेखिका हूँ । परिचय में ज़्यादा समय ना गंवाते हुए मैं आपको बता दूँ कि अभी तक आपने जितनी पंक्तियाँ पढी हैं, वे मैंने अपनी ओर से लिखी है। सोगी के मन में जो भाव आये, वे उसके चेतन स्तर पर नहीं, अर्धचेतन स्तर पर उभरे थे। मैं इस स्त्री के हृदय की जानकार हूं। चेतन स्तर पर तो यह कुछ सोचती ही नहीं थी ।वह जिस इलाके में रहती थी, वहाँ विलास के साधन कम थे, आदमी की मेहनत की आजमाइश ज्यादा थी। इसलिए विलासिता की कीमत ज्यादा थी| उसे प्राप्त करने में मनुष्यों में होड़ बहुत अधिक थी। साधन प्राप्त होने पर अपने अधिकार को सुरक्षित रखे जाने के कानून बेहद सख्त और अ-क्षमाशील थे। इसके परिणामस्वरूप सदियों के अंतराल में वहाँ के सामाजिक क्रम का ढांचा इस हद तक जड़ीभूत हो गया था कि उसमें सोगी जैसी भिखारिन का मूक हो जाना एक ऐतिहासिक फलानुक्रम सा लगता था।
यह 10 वीं- 11 वीं शताब्दी के इराक की कहानी है। आज के वक्त में तो संचार के साधनों ने दुनिया के भूगोल की रेखाएँ मिटा दी है। यह उस वक्त की कहानी है, जब मनुष्य अपनी जन्मजात स्थान के भूगोल की सीमा में ही जीवन के सुख- दुख भोगते थे, अपनी पीड़ाएं ,जानकारी पीढ़ी -दर -पीढ़ी साझा करते थे। यह अलग बात है कि मनुष्य का साहस सदाकाल अपराजेय रहा है। उस वक्त भी कारवां के माध्यम से लोग दूसरे देशों की यात्राएं करते थे। 10 वीं -11 वीं शताब्दी के इराक में इन्हीं के माध्यम से समृद्धि, विलासिता आई थी।
मैंने कहानी के देश -काल के बारे में यह सूचना दी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह एक ऐतिहासिक कहानी है। नहीं ! यह एक विशुद्ध काल्पनिक कहानी है। कहानी के देश -काल को इतिहास की पृष्ठभूमि में रखने की बहुत कठिनाइयां हैं, जिनका सामना दुनिया भर के साहित्यकार करते हैं। ऐसी कहानियाँ शुरुआत में ही पाठक की तेज इतिहास दृष्टि की कठोर मार झेलती है। इतिहास तथ्यों के आधार पर लिखा जाता है। इसमें तथ्यों के क्रम की बारीकी अतिरिक्त सजगता की मांग करती है। इसके विपरीत कहानी का सत्य एक विशेष देश काल में उत्पन्न मनुष्यों के भावों का सत्य होता है |यह स्थिर नहीं होता। बदलता रहता है। फिर भी किन्ही तरह के भावों पर देश-काल की छाप निश्चित होती है। अर्थात हम कह सकते हैं कि वैसे अमुक भाव उस देश- काल में उत्पन्न हुए मनुष्य में ही संभव थे।यही कहानी का सत्य होता है | रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक लेख 'तथ्य और सत्य ' में इस कठिनाई के कुछ पहलुओं को साझा किया है।
इस कहानी को पाठकों के सम्मुख पेश करके के पीछे इसी विश्वास की बलवती प्रेरणा ने अपनी भूमिका निभाई है। 10 वीं -11 वीं शताब्दी के इराक के इतिहास और मुस्लिम धर्म और संस्कृति का कुछ भी ज्ञान ना होने के बावजूद मेरे मन में यह शक्तिशाली प्रेरणा अपने आप उत्पन्न हुई कि यह कहानी उस देश- काल और परिवेश में ही होनी संभव हो सकती थी।हाँ !इसे आप मेरी जिद कह लें । आप इस कहानी को सत्य माने, मेरा आग्रह भी नहीं है। मैं स्वयं कहानी के सत्य के विषय में इस नियम का पालन करती हूँ कि आत्मतत्व और प्रेम की भाँति कहानी का सत्य भी अनिर्वचनीय होता है। मानो तो सत्य है ,नहीं मानो तो कुछ नहीं। तो चलिए कहानी आगे बढ़ाते हैं।
सोगी के मन में यह भाव क्यों आये, इस बात की आशा करने का पुष्ट आधार है। उस इलाके की ऊंची- नीची-मध्यम बस्तियों से दूर , मुख्य मस्जिद के आसपास धनी -मध्यम हैसियत के लोगों को अक्सर खैरात बांटते देखा जाता था। इलाके के अधिकांश जन अल्लाह के खौफ से डरते थे। उनके सुखी जीवन में सलामती रहे, इस मन्नत को दिल में लेकर वहाँ अक्सर, कभी नियमित -कभी अ- नियमित, पवित्र दिनों में रोज़, भिखारियों को खैरात बांटने का चलन था। खैरात में रोटी, फल, कपड़े, बर्तन, मेवे , शरबत वगैरह बांटे जाते थे। अच्छा !अब मैं चलती हूँ। बीच -बीच में आती रहूंगी।
सोगी डेरे पे लौटी तो उस दिन वहाँ एक रईस परिवार शरबत बांट रहा था। भिखारियों की एक छोटी बस्ती पास ही में थी। वे सब एक लाइन में लगकर अपने बर्तनों में शरबत ले रहे थे। सोगी ने भी अपने बर्तन में शरबत लिया और दूर रेत पर बैठकर पीने लगी। उस तपते हुए रेगिस्तान में मीठा शरबत पीकर उसने अपार तृप्ति का अनुभव किया।
शरबत की खैरात बांटकर वह रईस परिवार वहाँ से गया नहीं। बल्कि वे लोग मस्जिद के पास , थोड़ी दूरी पर बनी हुई बस्ती में ही अस्थायी रूप से रहने लगे। दरअसल, इस नजारे का दिखना भी उस इलाके में दशकों से सामान्य -सा हो चला था। यह उस इलाके की समृद्धि, ज्ञान, अदब , मानवीय क्षमता पर एक बदरंग धब्बे की भाँति था| इसलिए सब इसे छुपाना चाहते थे। इसके बारे में कोई बात नहीं करता था। कई दशकों से यह देखा गया था कि अमीर और विलासी लोगों की बस्तियों में से कुछ टूटे, बिखरे हुए पुरुष और कभी- कभी स्त्री भी निकलते थे, जो शांति और प्रेम की तलाश में भटकते फिरते थे। उनकी आंखें शून्य में कुछ ढूँढती हुई, चेहरा विषाद से भरा हुआ, मानो ज़िंदगी का सारा गणित, सारे समीकरण सही बिठाते बिठाते ,ना जाने कहाँ क्या चूक हुई कि सब गड़बड़ा गया। उनके अतिप्रिय आत्मीय जन भी उनकी कोई मदद नहीं कर पाते थे |हार कर, निराश होकर वे यही कह पाते थे यह चूक गया। उन्हें यह नहीं पता था कि उनका ऐसा कहना उन संवेदनशील मनुष्यों की पीड़ा को और अधिक बढ़ा देता था।
उस रईस परिवार में एक पुरुष, एक स्त्री, उनका एक युवा पुत्र और दो सेवक थे। उनके युवा पुत्र की हालत ठीक नहीं थी। वह अपने आपे में नहीं रहता था। दिन भर शराब पीना और रात को विलाप करना ,यही उसका जीवन हो गया था। रईस ने अपने इलाके के एक से बढ़कर एक हकीमों को दिखाया था। कारवां के माध्यम से होने वाले संपर्कों से उसने पुत्र की दशा की बाबत विदेशी हकीमों से भी सलाह मंगवाई थी। पर कोई इलाज सफल नहीं हुआ| महीनों इंतजार करने के बाद भी कोई संतोषजनक समाधान न मिला। आखिरकार उसने अल्लाह की शरण ली। इलाके की पुरानी और नामचीन मस्जिद में वह इस इरादे के साथ आया था कि अल्लाह की मेहर पाए बिना वह वहाँ से लौटेगा नहीं। अल्लाह उसके प्रति इतना कठोर नहीं हो सकता है। उसके पुत्र को ठीक करना होगा।
रईस का इरादा पुरबुलंदी पर था । उसने अपने परिचितों के यहाँ भी एक- दो ऐसे ही किस्सों की फुसफुसाहट सुनी थी। उसने यह भी सुना था कि अल्लाह के फज़्ल से वे भी ठीक हो गए थे । वह भी अपने इरादे के पूरा होने की उम्मीद रखता था। उस बस्ती में आने के दो दिन बाद तक तो रईस का इरादा पुरबुलंदी पर रहा | वह पैदल ही आसपास की जगहों के चक्कर लगा आया । मस्जिद का मुआयना कर आया । वहाँ प्रार्थना का समय देख आया ।पर वहाँ के लोगों का निरीक्षण कर के शीघ्र ही उसने अपने एक भीतर हौल का अनुभव किया।
वे लोग जहाँ रूके थे ,वह एक पुरानी इमारत थी, जिसे कई दशकों पहले किसी रईस द्वारा खैरात में बनवाया गया था। वह दो मंजिला इमारत थी, जिसका सीढ़ियों के उधर का हिस्सा नीचे आ गया था । बाहर के रोशनी वाले हिस्से की ओर देखने पर भीतर का दबा हुआ अंधियारा भाग, ऐसा लगता था कि गुफा का भाग हो।पुरबुलंद इरादे के मनोभाव में रईस ने सोचा था के पुत्र के ठीक होने पर वह इस इमारत की दोबारा मरम्मत करा देगा। खिड़कियों और दरवाजों पर रंग भी लगवा देगा।मात्र दो दिनों मे उसने जिस हौल का अनुभव किया, अगले कई दिनों तक वह इसे समझने में लगा रहा।
वह एक भिखारियों की बस्ती थी ।वहाँ गंदे ,फटेहाल ,चिथड़े लटकाए हुए, बाल बढ़े हुए, पसीने की बदबू से गंधाते पुरुष थे। कुछ स्त्रियाँ भी थी। वे अलग रहती थी। वे ऊपर से नीचे तक सदैव काले कपड़ों में रहती थी। उन सबके चेहरे विषादग्रस्त थे। वे बस चलते थे, बैठते थे, खाते थे, पीते थे, लेट जाते थे, सोते थे। उनके जिंदा रहने का यही प्रयोजन था। वे न आपस में परिचित थे, ना अ -परिचित। बंधे हुए पशुओं की भाँति रोज़ उस जगह से नगर में भीख मांगने के लिए निकलना और शाम तक इस बस्ती के ठिकाने पर लौट आना ,यही उनकी दिनचर्या थी। इस दिनचर्या में कभी कोई नागा नहीं होती थी |वह एक रेगिस्तान का इलाका था। वहाँ बरसात बमुश्किल ही होती थी। सूर्य के चढ़ने और उतरने के साथ उनका दिन शुरू और अंत होता था। भूख, प्यास, सर्दी ,गर्मी के सिवाय उनकी कोई संवेदना नहीं थी। पता नहीं, उनकी कितनी संख्या थी। शायद हजार होंगे| उनकी यह संख्या अनेक वर्षों से इतनी ही थी। ना कम होती थी, ना ज्यादा। वे आपस में लड़ते झगड़ते भी नहीं थे। ना हीं कभी बातचीत करते थे |वे अपनी अपनी जगहों पर रहे हुए ,बस !शून्य में देखते थे। उनमें न कौतूहल था ,ना ही हंसी-खुशी का कोई चिन्ह । वे आपस में एक दूसरे का अभिवादन नहीं करते थे। ना ही एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते थे। वे बस मनुष्य होने की निम्नतम भाव अवस्था में जीते थे। इतनी निम्नतम अवस्था में जीते हुए, अगर ईश्वर के धन्यवाद की कोई बात थी, तो यह थी कि चेतन स्तर पर वे सब इतने जड़ीभूत थे कि स्त्री पुरुष जन्य व्यवहार भी भूल चुके थे। जड़ीभूत चेतना ने उन सबको भाव के स्तर पर निर्दोष पशु शावकों में बदल दिया था।
रईस ने दो दिन के दौरान में वहाँ के लोगों का जायजा लिया तो उसके अब तक के पचास साल के जीवन के सीखे हुए अदब, कायदे कानून, पानी लगे नकली गहनों की भाँति बदरंग हो गए। सचमुच ! जीवन का बेहद कठोर रूप उसके सामने था। उसी इमारत के एक कोने में , अपने स्थान पर बैठे हुए, दूर से ही उन लोगों के निरीक्षण ने रईस के भीतर जिस हौल को भर दिया था, अब वह उसे समझने लगा था। उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि वह जीवन की बहती हुई धारा से छिटक गया है। मानों पानी की चिलमिलाती हलचलों में व्यस्त उस निर्दोष को किसी ने जबरन धक्का देकर पानी की गहराई तक पहुंचा दिया था और वक्त रहते अगर उसने खुद को नहीं संभाला तो वह उसमें कभी भी डूब सकता था। इस जगह में उसने ऐसा खिंचाव महसूस किया। यह तो गनीमत थी कि उस इलाके के कानून बहुत सख्त थे, विलासिता का खुद का खौफ बहुत ज्यादा था , भयभीत होने पर भी रईस के मन में यह भरोसा भी था कि उसकी आंखो की एक तरेड़ ही उन लोगों के हृदय में आसमान से बिजली कड़कने जैसा खौफ भर देगी। उसका सोचना सही था |बस्ती के लोग उन लोगों को दूर से देखकर चले जाते थे। उनकी कभी हिम्मत नही हुई कि वे नजदीक आएं ।
दो दिनों में सेवकों ने वहाँ अपना सामान जंचा लिया था। युवक का बिस्तर भी जमा दिया था। मालिक- मालकिन के उठने बैठने की जगह, सामान वगैरह जमा कर उन्होंने वहाँ रहने का अस्थाई इंतजाम कर दिया था। जाने कितने दिन रहना पड़े। रईस की पत्नी और सेवक इन सब इंतजामों को करने में इतने मशगूल और व्यस्त नजर आते थे कि वे यह भूल ही गए थे कि उनका वहाँ रहना अपने आप में बदवक्ती का चिन्ह है। यह कोई सुविधा खोजने की जगह नहीं है!
फिर भी उन नादानों को सामान लगाने में व्यस्त देख 'ये यहाँ -ये वहाँ नहीं' की बहसों में मशगूल देख ,पता नहीं क्यों ,रईस को गुस्सा उत्पन्न होने की जगह सुकून ही महसूस हुआ। कमज़्कम इन नादानों की नादानी रईस को पीछे छूटे हुए रईस जीवन की सुविधा और आदतों की याद दिलाती थी, जो स्वच्छ पानी की सतह पर पड़ रही सूर्य किरणों की भाँति मनोरम लगती थी।
एक हफ्ते के बाद ही रईस का परिवार वहाँ ठीक- ठाक इंतजाम के साथ रहने लगा। युवक को एक पलंग पर लेटाया गया था। पलंग के चारों ओर बेल बूटों की नक्काशी की गई थी। रईस और उसकी पत्नी के लिए इंतजाम थे। दोनों सेवक जमीन पर एक कपड़ा डालकर लेट रहते थे। बर्तन, तिपाईयों, कपड़ों से भरे संदूक, छोटी अलमारियाँ और सन्दूक थे। एक हफ्ते के फेरे में सेवक वापिस घर जाकर उनकी धुलाई करवा लाते थे। सेवकों की भी अदला बदली होती थी। खाने का इंतजाम बाजार में था। अन्य इंतजाम भी वहाँ की व्यवस्था के अनुसार हो गए थे।
दोस्तों ! स्मृति भी बड़ी कारगर चीज़ है। जब इंसान का वक्त सुखद न हो, तो सुखद दिनों की स्मृति भी सुखद लगती है।
पंद्रह दिन में इंतजाम के बाद शाम के वक्त रईस का मन अपने आप पुराने बीते हुए वक्त को याद करने लगा। शाम के वक्त जब सूर्य की लाली पश्चिम में दिखाई देनी बंद हो जाती थी, रात का अंधेरा धरती पर उतरने लगता था, मस्जिद के अंदर और बाहर शमा जला दी जाती थी, उस बस्ती के कोने में उसके सेवक भी शमा जलाते देते थे , रईस अपनी आराम कुर्सी में धंसा हुआ स्मृति के पथ पर अपने रोशन दिनों के नजारे देखता था।
उसे याद आया- ....अपना पैतृक निवास। एक ऊंची बड़ी इमारत और उसके आसपास की खाली छोड़ दी गई जगह, जो कई पीढ़ियों से उसके पास थी।वह एक शानदार इमारत थी | दुनिया भर के बेशकीमती, सुन्दर सामानों से भरी थी | आह! कैसे फर्नीचर! कैसे कालीन !कांच के रंग बिरंगी रोशनदान! चमकीले कपड़े के परदे! कांच के बर्तन ,प्यालियां ,तश्तरी ,सफेद रंग की चादरें ,लिहाफ! पीढ़ीयों पहले वैसी इमारत उस इलाके के गिने चुने लोगों के पास थी। अब तो व्यापार केंद्र हो जाने के कारण बहुत लोग अमीर हो रहे थे। फिर भी उस जगह का रुतबा वैसा ही बरकरार था, जहाँ वह रईस रहता था। क्या शानदार इमारत थी !कैसे शानदार बगीचे थे !क्या सुंदर घोड़े थे !क्या सुन्दर घोड़ा गाड़ी थी! ...रईस खुशनुमाँ ख्यालों में खोया था। पत्नी ने उसके सामने शराब की प्याली रखी। उसकी तंद्रा टूटी। दोनों ने शराब पी और नशे में सो रहे।
अगले दिन, दिन का वही क्रम और शाम का वही समय। वह याद करने लगा ... बगदाद की गलियों में बीता हुआ बचपन। उसके माँ- बाप ,उसका भाई। भाई का परिवार |मुट्ठी में रेत की तरह उसकी स्मृति में कुछ टटके चमके और विलीन हो गए।
‘अब्बा! भाइयों के बीच मोहब्बत को बहुत संजीदा समझते थे| अफसोस ये हो ना सका’- अपने खयालों में गुम रईस बुदबुदाया| इन दिनों उसके पास खाली वक्त ही वक्त था। वह अपने बीते हुए दिनों को सिर्फ देख ही नहीं रहा था बल्कि अपनी बुद्धि से उनका निर्मम विश्लेषण भी कर रहा था। उस दिन वह बहुत देर तक अपने भाई से अलगाव के पहलुओं को समझने में लगा रहा। उसने बहुत तरीकों से सोचा, पर काफी देर सोचने के बाद भी वह उसे टाल पाने की संभावना का पता नहीं लगा पाया। थक हार कर उसने यह मानसिक कोशिश छोड़ दी और ठंडी सांस भरी। आज पत्नी की लाई हुई शराब की जरूरत उसे कहीं ज्यादा महसूस हुई ।
अगले दिन सुबह युवक के चेहरे पर विचलन के लक्षण स्पष्ट थे । रईस कई दिनों से मुख्य मस्जिद के चक्कर लगा रहा था कि उसकी मुख्य इमाम से मुलाकात हो सके। पर उसे सफलता नहीं मिल रही थी। वह रईस था, पर उस जैसे रईस भी अब बगदाद में आम हो चले थे। दूसरे, वहाँ के इंतजामकारों ने उसकी 'कहानी' पहले ही समझ ली थी।इमाम ने दूर से ही अपने कमरे में लगे झरोखे से रईस को देख लिया था। उसने गुप्त इशारा करके पहले ही इंतजामकारों को यह संदेश दे दिया कि वे उसे वहीं रोक के रखे, आगे न आने दें। दरअसल ये मुआमले भी अब आम हो चले थे।
'ये धनी समझते नहीं है कि धन से दुआ नहीं खरीदी जाती। जिस तरह के हालात में, विचलित स्त्री - पुरुष यहाँ लाए जाते हैं ,उसमें हम तो दुआ ही मांग सकते हैं। दुआ का लगना या न लगना हमारे हाथ में नहीं है।' यह अति गुप्त रहस्य था जो मुख्य इमाम के मन में था। इससे आगे की बात यह सोच ना सका और अपनी दैनिक प्रार्थना करने लगा।
काफी देर इंतज़ार करने के बाद रईस वापस अपने ठिकाने पर लौट आया। वह जानता था कि आज युवक रातभर मिलाप करेगा। परेशानी से बचने के लिए उसने सोचा कि वह रोज़ की मात्रा से ज्यादा शराब पी लेगा और दोनों पति - पत्नी नशे में धुत हो रहेंगे ।
रईस वापिस लौटा तो उसने पत्नी और सेवकों को नए कपड़ों को देखने और उनकी सज्जा की तारीफें करने में मशगूल पाया। घर से सेवक युवक के लिए नए कपड़ों के जोड़े दे गए थे।उस वीराने में भी रईस ने उन मासूमों की मशगूलियत देखी तो फिर उसे क्रोध उत्पन्न होने की बजाय विश्रांति ही महसूस हुई। जब जीवन की आशा के महावृक्ष आंधियों में डगमगाते है, तब जीवन की आशा घास के खिलने में मुस्कुराती है। अपने मन में उसे अदबी दुनिया के ये फलसफे याद आए । उसके मन पर छाया हुआ निराशा का कोहरा कुछ देर के लिए छंट गया और वह पुनः अपने खुशनुमाँ दिनों की याद में गोते लगाने लगा।
रईस का शहर की अदबी दुनिया से ज्यादा वास्ता नहीं था। उसने अपने जीवन की सफलता राज्य शक्ति के केंद्र के इर्द गिर्द रहने में मानी थी। वहाँ खलीफा का शासन था। खलीफा के राजकीय भोजों में इलाके के रईसों को बुलाया जाता था। वह भी उनमें से एक था। एक वक्त था जब खलीफ़ा के यहाँ अदबी लोगों की बेहद पूछ थी। वे संसार निवृत्त संतों से थोड़े नीचे स्तर के ,अदब के जानकार जन थे, जो जीवन की पेचीदगियों को ध्यान में रखकर कुछ गंभीर बातें सभा में कहकर अदब का प्रकाश प्रकट करते थे। दशकों पहले इन लोगों की बहुत पूछ थी। खुद खलीफा और राजकीय लोग उनकी बातों के बेहद प्रशंसक होते थे।
पर वक्त बदलते -बदलते उनकी बातें नीरस लगने लगी। बढ़ती नई समृद्धि में रईसों के मुख का स्वाद बदलने लगा। शान शौकत का दिखावा बढ़ने लगा |अब उन भोजो में फ़ाहशा औरतों का राज़ था। आदिलों के अदबी वचन व्यवहार पुराने अनुपयोगी साजो सामान की तरह कोनों से पड़े रहते थे।
'फ़ाहशा औरतें' -रईस अपने मन में बुदबुदाया तो उसके दिमाग में इन औरतों के मुताबिक कोई घृणा या तिरस्कार नहीं उपजा, बल्कि अपने दिल में उसने खुद को इन औरतों के रूप, रूपसज्जा, वस्त्र सज्जा, शृंगार, नृत्य, गायन और कला का आशिक ही पाया। वहाँ कौन था जो उनका आशिक नहीं था? खूबसूरत इमारतों के बड़े- बड़े हॉल दरवाजे, चिकने फर्श, खिड़कियां ,पर्दे ,कालीन, उम्दा कारीगरी से सजी झालरों वाली चादरों से ढकी मेंजें , तरह- तरह की पकवानों की उड़ती खुशबूएं , दीवारों पर तथा बीच बीच में रौशनी से रौशन बैठकें , संगीत के साजों की धुनें, उन धुनों पर नृत्य की अदाएं दिखातीं खुबसूरत औरतें - ऐसी राग- रंगों से भरी दुनिया में शामिल होना खुशनसीबी थी।
यकीनन खुशनसीबी थी । यह उस समय की सभ्यता का चरम उत्कर्ष था । यह उसने अपने परिवार में बड़ों के मुख से भी सुना था। बड़ा हुआ, तो बाहर मेल मिलाप की बातचीतों का भी यही नतीजा था। बाद में उम्र पकने पर वह खुद भी ऐसे किस्सों का गवाह बना था। इस कड़ी में एक ताजातरीन किस्सा यह था की भोज में शामिल होने के एक तलबगार ने अफ़सर के सामने अपनी कई बीवियों में से एक की पेशकश कर दी थी। यह किस्सा उन के घेरे में दबे मुँह, कानों- कान, दिल में ईर्ष्या की धधकती आग में सेंक सेंक कर, शब्दों के लजीज़ हिन्दुस्तानी मिर्च मसाले डालकर ,चटखारे लेकर सुनाया जाता था। फिर क्यों नहीं उन भोजो में शामिल लोग अपनी खुशनसीबी पर गौरव करते हैं और उसे बनाए रखने की जुगत लगाते| सोचते हुए रईस का दिमाग लब्ध रिद्धि गौरव की प्रतिष्ठा के अनुमान से तमतमा उठा।
पुराने अदबी लोगों में एक बात कही जाती थी-
मर्द ने सजाई महफिल
औरत ने लूटी महफिल
यह बात यूं तो संसार भर की सभी जगहों पर समान रूप से चरितार्थ है, मगर जहां समृद्धि, मर्दों की विलासिता और औरतों के योग का समीकरण हो , वहाँ इन वचनों की सत्यता अकाट्य है| इस समीकरण में बाजी हमेशा औरतों के हाथ में रहती है। अनगिन पुरुषों की मेहनत, कौशल, दक्षता, और ज्ञान से वस्तुएँ तैयार होकर समृद्धि के मुख्य स्थानों पर पहुंचाई जाती है |मर्दों की विलासिता इन्हें औरतों के सम्मुख पेश करके अपने अहम का तुष्टीकरण करती है| औरतें उनकी इस कमजोरी का फायदा उठाकर, दूसरा प्रतियोगी स्थापित करके उन्हें खुद को रिझाने की अंतहीन दौड़ में डाल देती है। यह एक व्यूह है,जिसका रचनाकार औरत के वजूद में है। खुद औरत और उसके आशिक इस नाच को नाचते हैं, ये जाने बिना कि वे किसके हाथों नचाए जा रहे हैं। वे आपस में खुश होते हैं एक दूसरे को रिझाकर, खिजाकर, पटखनी देकर, मगर वे जानते नहीं कि अंततः नियति ही उन्हें पटखनी दे रही है। साहित्य जगत में शेक्सपियर के नाटकों में त्रिकोण प्रेम की त्रासदियों में नियति की त्रासदी दिखाई गई है।
रईस के जीवन में भी यह अनकहा गुनाह था जो उसने अपनी प्यारी पत्नी से छुपाया था। वर्षों पहले वह आयशा नाम की एक खूबसूरत सुन्दरी पर फ़िदा था। भोजों में इन औरतों की उपस्थिति से तथा इनके रंग -ढंग से राजकीय वर्ग की स्त्रियां भी वाकिफ थी। इनके प्रति अपने पतियों के आशिकी से भी ,वे अनजान नहीं थी। फिर भी वे अपने मन में मुतमईन थी क्योंकि साहचर्य के इतने लंबे इतिहास में एक भी किस्सा ऐसा नहीं सुनने में आया था कि किसी रईस ने किसी फ़ाहशा औरत से निकाह कर लिया हो । वे उनसे दिल बहलाएं, उन पर धन लुटाएं, यह उनकी क्षमता और बेवकूफी की बात थी। उनके घर सुरक्षित थे।
उम्र, रूप, जवानी, पौरुष, स्त्री के लटके - झटके इनका समीकरण 'चालीस के पहले- चालीस के बाद' , कुछ इस तरह स्थिर हो गया था। इसका अर्थ था कि फ़ाहशा औरतों में यह बात प्रचलित थी कि पुरुषों पर उनका जादू चालीस साल के पहले तक है। घरेलू स्त्रियों में यह बात प्रचलित थी कि चालीस साल के बाद पुरुषों को खुद ही अक्ल आ जानी है |चालीस के बाद पुरुषों ने उन्हीं के पास वापस लौटना है।
पुरुष जो इस समीकरण के कर्ता और भोक्ता दोनों थे ,वे इस सारी भूल - भुलैया को पार करके स्वयंमेव अंततः उस अवस्था को प्राप्त हो जाते थे ,जिसके लिए अदबी लोगों में यह वाक्य सुनाया जाता था -
वह निकल गया पर निकला नहीं
वह निकला नहीं पर निकल गया।
इस रहस्यात्मक, गूढ ,कूट पहले वाक्य का आशय यह था कि पुरुष स्त्री के रूप ,यौवन ,कला की माया के जाल से बाहर निकल गया पर राजशक्ति के आकर्षण केंद्र से बाहर नहीं निकला, इसलिए अब वह स्त्रियों के प्रति बर्ताव में कुशल और सजग हो गया है।
दूसरे वाक्य का आशय यह था कि पुरुष स्त्री के रूप ,यौवन, कला की माया के जाल से बाहर नहीं निकला है, पर उस बंधन में फंसकर अपना धन, परिवार और जवानी लुटा दे ,ऐसी बेवकूफ़ी से वह बाहर निकल गया है। ऐसे पुरुषों को 'वे औरतें' काइयां कहती थी।
रईस दूसरी श्रेणी के पुरुषों में से एक था। यह भी सच था कि वे औरते कुछ भी कहे पर घर ,परिवार, समाज में उन जैसे पुरुषों की इज्जत थी। एक छोटे दायरे में ही सही , उन्हें घर के पालक होने का रुतबा हासिल था।
इस रुतबे के सीमित प्रभाव क्षेत्र के भीतर ही रईस को यह एक मलाल था कि उसने आयशा के साथ दिलजोई करने का गुनाह किया था । रईस का आयशा के प्रति आकर्षण तो कोई छुपने वाली चीज़ ना थी। सब देखते थे। सब को पता था। पर वह वाकई उसे दीवानों की तरह चाहने लगा है, उस पर धन दौलत लुटा रहा है, यह बात कम ही लोगों के वाकिफ में थी। रईस सचमुच दिल ही दिल में आयशा से मोहब्बत करने लगा था। उस जैसा रूप और उसकी सी नृत्यकला , उसके अंग - अंग में रोमांच भर देती थी। संगीत की लय पर थिरकता हुआ आयशा का बदन मानो दरिया के पानी में झिलमिलाती सूर्य की किरणें। वह उसके सौंदर्य की झिलमिल में गुम खड़ा हुआ रह जाता था।
आयशा ने भी उसकी आंखो की दीवानगी पहचान ली थी। वह भी नाचते हुए उसकी और एक चक्कर ज्यादा लगा आती थी।
दोस्तों! दुनिया में यह एक जानी हुई बात है। प्रेमियों को लगता है कि प्रेम में पड़े हुए वे जो अनुभव कर रहे हैं, वह कितना अनिर्वचनीय है। उनसे पहले न अनुभव किया गया है ,न उनके बाद संसार में फिर अनुभव किया जाएगा । अब हम क्या कहें ? अदबी लोगों के बीच में प्रेम नामक शै की बड़ी इज्ज़त है । वे अपनी बयानगी में दो लोगों के बीच ऐसे आकर्षण की बात कहते है जिसे शब्दों में नही कहा जा सकता ।हम इस बात को मानते हैं । प्रेम तत्व की अनिर्वचनीयता को तो फिर भी स्वीकार किया जा सकता है, पर यह सब जानते हैं कि प्रेमतत्व में 'न भूतो न भविष्यति' जैसा कुछ भी नहीं होता। सच्चाई यह है कि प्रेमियों के हावभाव ,व्यवहार इतने प्रत्यक्ष दर्शनीय होते हैं कि कुशल लोगों की तो छोड़ो, जो उड़ती चिड़िया के पर गिनने में कुशल होते है, अकुशल लोग भी देर -सबेर उनके व्यवहार की असामान्यता को पहचान ही लेते हैं।
जहाँ रईस आयशा के साथ प्रेम की पींगे बढ़ाने में व्यस्त था, वही उसका मित्र बड़ी कुशलता से दोनों के हाव - भाव के जायजे ले रहा था। रईस का यह मित्र उसके पिता के मित्र का बेटा था और उससे दस साल बड़ा था। लिहाजा उसका दुनिया का तजुर्बा भी ज्यादा था| रईस की पत्नी और उसकी पत्नी भी आपस में सहेलियां थी। रईस के मित्र ने उसका प्रेम और उसकी मासूमियत दोनों देख ली थी। वह दुनिया के मसले में खासा तजुर्बेकार आदमी था। वह समझ गया कि रईस सच्चे दिल से आयशा की मोहब्बत में गिरफ्तार हो चुका है। वह आयशा की हकीकत जानता था। वह अपने धंधे में कुशल गणिका थी । एक अर्थ में वह भी मासूम थी। आखिर में तो वह उन्हीं नियम कायदों के तहत काम करती थी, जिनकी शिक्षा उसे अपनी बुजुर्गों से मिली थी।
रईस का मित्र इस तथ्य से वाकिफ था कि समझाने का उस पर कोई असर नहीं होगा। इसलिए उसने एक युक्ति आजमाई। उसने सुना था कि धर्मगुरु और गणिका की सच्चाई जाननी हो तो उनसे तब मिलों जब मेला उठ जाए। एकांत में वे कैसे व्यवहार करते हैं, यह उनकी हकीकत बयान कर देगा। रईस के मित्र ने यही युक्ति आजमाई। एक दिन उसने जानबूझकर रईस के प्याले में कुछ नशा मिला दिया। रईस वह प्याला पी कर वहीं पड़ा रह गया। उस दिन का मेला उठने पर सब लोग चले गए। आयशा और उसकी बुजुर्गा वहीं बैठकर कद्रदानी का हिसाब लगा रही थी और आपसी बातचीत में रईसों की बेवकूफ़ी पर भी व्यंग्य कस रही थी। खामोश हॉल में उन औरतों की बातचीत सुनकर ही रईस को होश आया था। उसने वही मसनद पर पड़े हुए उनकी बातचीत सुनी तो उसके भीतर कहीं कुछ तिड़क गया। उसे वास्तव में होश आ गया|
ओह! वह तो क्या समझता रहा अब तक! उसे अपनी मासूमियत पर खुद अचरज हुआ| क्या ऐसा रूप भी छल के जहर से मिलकर बदरूप हो सकता है |उसका दिल अभी भी यह मानने को तैयार न था |वह एक गहरी उहापोह में फंस गया था| क्या वह सौंदर्य का साक्षात्कार झुठा था , जो पहली बार आयशा को देखकर उसने अनुभव किया था ? यह कैसे संभव था?क्या अदबी लोगों के वचन भी झूठे हो गए? उसका दिल अभी भी मानने को तैयार न था। पर ना मानने का उपाय ही किया था? उसने जो कुछ सुना था वह स्वयं अपने कानों में सुना था। अविश्वास का कोई कारण नहीं था। होश में आने के बाद भी वह वहीं पड़ा रहा। जब तक आयशा वहाँ से चली न गई। मित्र ऊपर बालकनी में बैठा हुआ सब नजारा देख रहा था। उसका काम बन गया था। उसने इंतज़ार किया कि वे औरतें वहाँ से चली जाए| फिर वह रईस को सहारा देकर घर लौटा लाया।
पंद्रह दिनों तक रईस अपने कमरे में ही रहा। बाहर से शरीर, स्वास्थ्य, परिवार, इज्जत, समृद्धि, सब यथावत थे; पर उसके भीतर कुछ था जो बदल गया था। अदबी लोगों की भाषा में 'वह निकला नहीं पर निकल गया था'। अदबी लोगों ने इंसानों की जिस वेदना को समझकर एक वाक्य में सूत्र बना दिया था, उस वेदना को भोगना बेहद कठिन था। इसे वही समझ सकता था, जिस पर यह बीतती थी। अगर चित्रों में इसे व्यक्त किया जाता तो शायद पीठ पीछे खंजर घोंपा हुआ व्यक्ति राजकीय भोज की जगह पर, गणमान्य लोगों के बीच स्वादिष्ट भोजन का लुत्फ उठा रहा है या आधे सिर में बहते खून की पीड़ा लिए कोई स्त्री नाच गा रही है, इस तरह के विरोधाभासी चित्र ही उन स्त्री पुरुषों की मानसिक अवस्था का ठीक -ठाक बयान कर सकते थे।
उस वाकये के बाद रईस का पुनः भोजो में जाना हुआ। उसने आयशा को भी देखा। आयशा ने भी उसे देखा। रईस की बदली हुई आँखों को देखकर वह तुरंत समझ गई कि तोता पिंजरे में से निकल गया है । इस मामले में फ़ाहशा औरत की अक्ल पर शक करना दुनिया की सबसे बड़ी बेवकूफ़ी है। बाद दिन से रईस की चेतना विरक्ति और आकर्षण के दो केंद्रों में बंट गई थी। उसे इन भोजों में आने जाने का आकर्षण भी था और उसे विरक्ति भी थी। बस | जीवन यूं ही बीच बिचाले की डोरी में लटका हुआ, झूल रहा था।
यह था की, रईस अधिकाधिक परिवार की ममता में रहने वाले पुरुष होता जा रहा था। पति के अंदरूनी बदलाव से बेखबर पत्नी खुश थी ।
दोस्तों! हमारा जीवन किस शक्ति के सहारे चलता है? ज्ञान या अनुभव? मन या बुद्धि ? भावना या कामना? शायद इनमें से कोई एक उत्तर देना संभव नहीं है। जीवन के बहुतेरे पक्षों में सभी का कम ज्यादा योगदान रहता है। पेंतालीस की उम्र तक रईस को जीवन के जो भी खट्टे मीठे अनुभव हुए थे, उसके बाद रईस का राग अधिकाधिक परिवार में केंद्रित हो गया था। पुत्र को गृहस्थी का फल कहा गया है । रईस को अपने पुत्र में बहुत ममता थी। मुँह से कह कर मांगना तो बड़ी दूर की बात है, वह पहले ही उसके लिए दुनिया के सारे साजो -सामान घर में लाकर भर रखता था। पुत्र के प्रति उसका प्रेम वटवृक्ष की महा शाखाओं की भाँति विस्तृत और शीतल छाँह प्रदान करने वाला था। पुत्र भी पिता की उसके प्रति ममता से कहीं गहरे दिल में आश्वस्त था।
यही कारण रहा होगा, जब पिता ने युवा पुत्र को राजकीय भोजों में औरतों के प्रति आकर्षित देखा तो स्वयं कटु अनुभव का भुक्तभोगी होने के बावजूद भी उसने उसे रोका नहीं। बल्कि एक समय अपने आकर्षण को याद कर उसे दिल में मीठी गुदगुदी महसूस हुई । शायद उसे विश्वास रहा होगा, वह अपने अनुभव से अपने पुत्र को निकाल लायेगा। बाला नाम की तरुणी इन दिनों भोजों की जान थी। जब वह आती थी तो उस पर सबकी निगाहें टिकी रह जाती थी| क्या रूप रंग !क्या तरुणाई! क्या चेहरे की लुनाई। जो भी देखता था ,देखता रह जाता था ।
पिता का विश्वास झूठा हो गया| पुत्र उस ओर गया तो लौटा ही नहीं। महज पाँच साल में एक सभ्य ,खुशदिल, जीवन से भरपूर युवक बिस्तर पर अपने मलमूत्र में लिपटी त्रासदी में बदल गया था। वह चूक गया। यही वाक्य था जो हारा हुआ तुर्क बेबसी में विलाप करते हुए मुँह से निकालता था। रईस ने बहुत कोशिश की समझने की, घटनाओं को याद करने की, जब से उसके पुत्र में विचलन के लक्षण दिखने लगे थे, उसे कुछ हल्का बहुत याद भी आया, पर वह सारी बातों का विश्लेषण करने में बिल्कुल असमर्थ था। ऐसा लगता था कि अकेला वह ही नहीं, बल्कि वह युग, वह सभ्यता भी उसके पुत्र की हालत का विश्लेषण करने में असमर्थ थी। वह थक गया। उसने शराब पी और लेट गया। जागृत अवस्था में उसका दिमाग इस मानसिक जद्दोजेहद में तल्लीन रहा था, नशे के बाद उसके मन की शक्तियां चेतनता के कठोर नियंत्रणों से छूट गई और वह’ ना सोया- ना जागा’, विचित्र तंद्रिल अवस्था में लेटा रहा। उसकी आंखो के आगे अतीत के टुकड़े चलचित्र की भांति घूमने लगे ।
उसे याद आया -.. वह, उसकी पत्नी और बेटा अपने पैतृक घर में शाम के राजकीय भोज में जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। युवक अतिशय उत्तेजित है। ऐसा लगता है उसका शरीर वहाँ है, उसका मन पहले ही भोज की और वहाँ होने वाले नृत्य की कल्पनाओं के बारे में सोचकर भोज स्थल पर पहुँच चुका है। वह बात बात पर नौकरों पर झल्ला रहा है। नई जूतियां कहा है? ये लोग चीजें सँभालते क्यों नहीं? उसने अगले भोज के मौके पर बाला के लिए ही तो मंगवाई थी। ये जूतियां चमड़े की थी, जिन पर सोने व चांदी के तारों की बारीक कारीगरी की गई थी। जूतियां मिली क्या? उस का आक्रोश देखकर माँ भी सहम गई। वह भी ढूंढने लगी। कुछ देर ढूंढने पर भी जब जूतियां नहीं मिली तो सहमी हुई माँ ने बेटे से धीरे से कहा कि इतनी संख्या में दूसरी तरह के उपहार रखे है, वह कोई और दे दे। सुनकर युवक फिर से झल्ला गया। उसने मन में कल्पना की थी कि बाला वे जूतियां देखकर कैसी हैरान होगी। उसने ऐसी कारीगरी पहले कभी नहीं देखी होगी। माँ की बात सुनकर उस कल्पना को ठेस लगी। नहीं, उसे वही जूतियां चाहिए। खैर, थोड़ा ढूंढने पर आखिर जूतियां मिल गई। युवक खुश हो गया।
युवक को जिस क्षण का बेतहाशा बेसब्री से इंतजार था, वह क्षण तो बहुत देर में आने वाला था। राजकीय भोज के अपने नियम और कायदे थे। हॉल जब मेहमानों से भर जाता था, तब खलीफा, मंत्रियों और अन्य राजकीय सदस्यों का प्रवेश होता था। उनके विराजने पर सब जन कुछ ना कुछ बेशकीमती उपहार पेश करते थे । यह एक राजकीय रस्म अदायगी थी, जो अब रईसों के बीच अपना महत्त्व खो चुकी थी। सब जानते थे कि इस रस्म में खलीफा के प्रति आदर और सम्मान की भावना का लोप हो चुका है। फिर भी राजकीय समारोह में रस्मों की विदाई आसानी से नहीं होती। वे निर्जीव और निष्प्राण होकर भी सर्दियों तक उसी तरह निभाई जाती हैं । रईसों के बीच असली कौतूहल और उत्सुकता की रस्म थी, नाच के बाद नर्तकी को इनाम देने की रस्म। नाच के बाद नर्तकी अपने स्थान पर जा बैठती थी। रईस उस पर सौगात न्योछावर करते जाते थे और हॉल से बाहर चले जाते थे। किसने क्या दिया? नर्तकी मुस्कुराई या नहीं? बाद में भोज स्थान में यह उत्सुकता रईसों में चर्चा का विषय रहती थी। इस बात पर उनके दिलों की धड़कन घटती -बढ़ती थी।
आज भी समारोह को इसी कायदे से चलना था। सब कुछ यंत्रवत अपनी गति से चल रहा था। बेशकीमती कपड़ों में सजे रईस, खुशदिल ,उत्साहित, चौकन्ने नजर आते। एक दूसरे को देखकर गर्मजोशी से मिलना, हाथ मिलाना, अभिवादन करना, हाल चाल पूछना ,कपड़ों की सुंदरता की तारीफ करना, हॉल में गहमागहमी जारी थी। आज बाला किस रंग की पोशाक पहनकर आएगी? जब वह आएगी तो क्या गजब ढाएगी? युवकों के दिल इन कल्पनाओं में मगन थे। रईस भी अपने परिचित लोगों को देखकर मुस्कुरा रहा था, खुश था। रईस की पत्नी अपने परिचितों के साथ 'खिल-खिल' में व्यस्त थी। रईस का बेटा व्यग्र था। ओह ! कब यह समारोह के औपचारिक तौर तरीके समाप्त होंगे और नाच शुरू होगा। उसे रईसों के हम उम्र बेटे- बेटियों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनसे अभिवादन -परिचय औपचारिकता भर के लिए था।
इस बार वह बहुत से नए लोगों को भोज में पहली बार देख रहा था। लगता है शाही अनुमति के तहत ये नए लोग शामिल किए गए थे। उन्हीं में अल्ताफ भी था। वह युवक का हमउम्र था। उसका रूप रंग, नैन नक्श, कद काठी, चाल ढाल सब आकर्षक थी। युवक को उसे देख कर अच्छा नहीं लगा। पीछे एक- दो बार से वह बाला के यहाँ भी दिखाई दिया था। बाला भी उसके संग हँसती नजर आती थी। डाह के मारे युवक का हृदय जल कर रह गया था ।
' ये यहाँ कैसे? ये यहाँ भी पहुँच गया?' - कुछ देर पहले वह बाला को देखने के लिए व्यग्र था। अब वह चाह रहा था कि कुछ ऐसी घटना हो जाए की भोज ही समाप्त हो जाए।
युवक के हृदय के भावों को भली भांति समझता हुआ, अल्ताफ बड़े ही विनीत भाव से ऐसा निर्विकार बना हुआ खड़ा रहा, ज्यों वह भोज की विशाल पेंटिंग में स्थिर खड़ा हुआ एक किरदार है, जो सदियों तक हिलेगा-डुलेगा नहीं। भोज की विशाल पेंटिंग के अन्य किरदार आ -जा रहे थे। नियत समय पर खलीफा और राजकीय सदस्यों का आगमन हुआ। अभिवादन, स्थान ग्रहण के पश्चात उपहार देने की रस्म शुरू हुई। अपना क्रम आने पर रईस ने भी उपहार पेश किया। दो चार जनों के बाद अल्ताफ के पिता ने उपहार पेश किए। उसने उसी तरह की जूतियां खलीफा और अन्य राजकीय सदस्यों के लिए पेश की, जैसी रईस का बेटा बाला के लिए लाया था। उन जूतियों को उपहार पेश होते ही सभा में उत्सुकता की बिजली सी दौड़ गई। सभी ने अत्यंत हर्ष और कौतूहल से उन जूतियों को देखा। पश्चात सब की आंखो में इन नए आगंतुकों के लिए प्रशंसा और इज्जत के भाव उभर आये। नवागंतुक का भोज में शामिल लोगों पर दम दिखाने का पहला ही दांव आशातीत रूप से सफल रहा था। अब बगदाद में उसे कोई पराभूत नहीं कर सकता था। उसने विजयी भाव से अपने पुत्र की ओर देखा, जो इस जीत का सूत्रधार था। वह दूर चित्रलिखित सा इस प्रकार खड़ा हुआ था, ज्यों वह भोज की विशाल पेंटिंग में स्थिर खड़ा हुआ किरदार है, जो सदियों तक हिलेगा डुलेगा नहीं।
इस प्रकरण में रईस के बेटे पर वास्तविक बिजली गिरी थी। वह उपहार जिसे उसने बाला के प्रति अपनी प्रेम की दीवानगी दिखाने का जरिया माना था, साथ ही ऐसे कीमती उपहार को खरीदने की क्षमता के युवकोचित प्रदर्शन का भी , वह सब दस-बीस गुना रूप में किसी अन्य के द्वारा राजभक्ति के चिन्ह के रूप में पड़ा था। प्रेमिका की कीमत प्रेमी जानता है। उस भूमिका में वह उससे चाँद -तारे भी मांग सकती है। पर प्रेमिका भी दरबारी स्थान पर खलीफ़ा के नीचे ही थी। उस भूमिका में वह स्वयं अपने ऊपर खलीफा के आदर को अधिक आदरणीय मानेगी। इंसान मन की इन विचित्र भूमिकाओं की जटिलता में फंसे युवक के लिए यह सब तरह से एक करारी हार थी। उपहार के तौर पर, उसकी कीमत के तौर पर, नवीनता के तौर पर, संख्या के तौर पर, गणिका से अधिक खलीफा को अधिक आदर देने की व्यावहारिक बुद्धि की तीक्ष्णता के तौर पर। ऐसा लगता था बाला के प्रति युवक का प्रेम एक प्रकाशवान मशाल है पर बाला को जीतकर अल्ताफ की युवक को हराने की मारक क्षमता एक प्रबल, अभेद्य हथियार है, जिसके आगे युवक बेबस, कमजोर है।
यह सारी बात उस दिन युवक को वही खड़े हुए एक क्षण में समझ आ गई । उसकी समझ में आ गया कि उसके सामने एक अत्यंत प्रबल प्रतिद्वंद्वी है। वह सारी शक्ति लगा कर भी उससे जीत नहीं सकता। युवक की वेदना का कारण यह नहीं था | उसकी वेदना का कारण यह था कि बाला इस बात को क्यों नहीं समझती है कि अल्ताफ का उसके प्रति प्रेम, प्रेम नहीं है , युवक को हराने की क्षमता का घृणित प्रदर्शन मात्र है | नहीं! वह ऐसा नहीं होने देगा। वह बाला के हृदय में अपने प्रेम की रौशनी प्रकाशित करके रहेगा। उसे अवश्य एक दिन उसके सच्चे प्रेम का पता चलेगा। यह उसकी वेदना का कारण था |
उस दिन पहली बार रईस ने अपने पुत्र के चेहरे पर विचलन के लक्षण देखे थे। .... सोते हुए पत्नी ने करवट ली तो रईस की तंद्रा टूटी। आधी रात से भी ज्यादा बीत चुकी थी। आज वह अपनी सोच में खोया रह गया। उसे वक्त का पता नहीं चला। उसने पुत्र को देखा। वह बाहर अंधेरे में ताक रहा था। ना जाने यहाँ कब तक रहना हो -रईस बुदबुदाया। कुछ देर में वह सो गया।
अगले दिन का वही क्रम। सुबह के सूरज ने अपनी लाली आसमान में फैला दी। रईस पुत्र को देखकर, मस्जिद की ओर प्रार्थना करने चला गया। युवक के चेहरे को देखकर यह पता नहीं चलता था कि उसका दर्द अत्यधिक शराब पीने के कारण से है या वह सिर्फ एक अमीर, बेपरवाह, बिगड़ैल लड़का है। दिन के वक्त उसका चेहरा सख्त होता था। अत्यधिक शराब पीने से पनीला हुआ उसका शरीर, नाक से पानी बहता था, मुँह से लार टपकत्ती थी। वह मुश्किल ही खुद अपने पैरों पर खड़ा हो पाता था। अधिकांश तो उसकी माँ उसे घर से लाए हुए कीमती कपड़ों में लिटाए रखती थी। उनमें पड़ा हुआ वह शून्य में देखता हुआ लेटा रहता था। घर से आए हुए दो सेवक कुछ पात्रों में उसके शरीर की क्रियाएं संपन्न कराते थे। उसे खाने में कोई रुचि नहीं थी।माता -पिता के कई बार कहने पर, वह कभी कुछ खा भी लेता था तो शीघ्र ही उसे वमन हो जाती थी। उसे इतना भी ख्याल नहीं था कि वह वमन करने के लिए बिस्तर छोड़ दें। वह वही कपड़ों में कर देता था। बाद में सेवक उसे सँभालते थे। कई बार लघुशंका या दीर्घशंका भी वह कपड़ों में कर देता था। सेवकों द्वारा नया कपड़ा पहनाने पर वह जिद करता था कि वह पायजामे का नाडा स्वयं बांधेगा।
यह बेशकीमती पायजामा आज कल के ताजातरीन फैशन में निकला था। इसे बगदाद के रईसों के लिए कपड़े सीने वालों में सर्वाधिक लोकप्रिय दर्जी मुस्तफा ने अपनी अद्भुत कल्पना शक्ति और बेहतरीन डिजाइन क्षमता से तैयार किया था। यह एक चमकीले सफेद कपड़े पर बनाया गया था। इस पायजामे में नीचे से मोरी टाइट और ऊपर से दोनों पैरों में सिलवटें दी गई थी। मोरी का पोहंचा चौड़ी पट्टी का बना था। उस पर सुनहरी धागे की कारीगरी की गई थी। आज कल यह रईसों के बीच खासा प्रचलित था। खलीफा के द्वारा आयोजित राजकीय समारोह में सब रईस अपनी पोशाक के साथ ये ही पहनते थे।
लगभग पूरी दोपहर वह नाड़े में उलझा रहता था। कभी सिरा छूट जाता, तो कभी एक सिरा ज्यादा खिंच जाता। कभी नाडा नेफे में से निकल जाता। सेवक विवश खड़े हुए देखते रहते। बेबस माँ पास ही बिस्तर पर लेटी रहती। बहुत जतन करने पर भी वह नाडा नहीं बांधने पाता। बहुत वक्त इस तरह गुजर जाता। मस्जिद की जगह से तीसरी प्रार्थना की गूँज उठती। वह फिर रोने लगता था। माँ उसे चुप कराती थी। पिता अपनी लाचारी में दूर खड़े रह कर देखते रहते थे। दिन का समय तो इन्हीं कार्यों में बीत जाता था।
रात को कभी- कभार वह इतनी ज़ोर से चीख मारकर उठता था कि उसकी चीख की आवाज दूर तक सन्नाटे को चीरती हुई जाती थी।जब वह चीखता था तो उसकी आवाज की वेदना, ऐसी थी जो चट्टान को भी काटकर रख दे।
अबबबब.... अबबबब.... अबबबब....
मुँह से तो यही आवाज निकलती थी। लेकिन चीख का तीखापन आत्मा को हिला देता था। ऐसा लगता था कि दूर किसी जंगल में एक बुरी तरह कुचला हुआ शेर जिसका मुख से नीचे का हिस्सा पूरी तरह कुचला जा कर मात्र खाल ही बचा है, वह जिंदा है; वह जमीन पर पड़ा हुआ अपनी वेदना में कराह रहा है। उसकी वेदना में हार जाने की ,कुचले जाने की पीड़ा तो है पर हार ना मानने की एक अदम्य, संकल्प शक्ति भी है। वस्तुतः यही शक्ति है जो उसकी अपार वेदना का कारण है। वह हार चुका है। वह बार- बार हार चुका है। पर वह हार मानना नहीं चाहता। इसलिए ऐसी कुचली हुई अवस्था में भी, वेदना में वह धरती पर करवटें बदल बदल कर शून्य अज्ञान अंधकार अवस्था में कराह रहा है, चीख रहा है।
वह जब भी विलाप करता था तो उसकी आवाज की वेदना ऐसी थी जो चट्टान को भी चीर कर रख दे। मगर उस बस्ती के लोगों का हृदय चट्टान से भी कड़ा था। शुरुआती दिनों के एक- दो अनुभवों के बाद वे इससे निरपेक्ष हो गए । माँ भी बेचारी क्या करती? पुत्र की सागर सम पीड़ा के समुद्र में वह अपने जीवन की नैया को किसी तरह खे रही थी। रात -दिन पुत्र को इस हालत में देखना, हर दम इबादत करना, अपनी ऐशो आराम की जिंदगी छोड़कर उस गंदी बस्ती के लोगों के साथ रहना, उसकी संवेदना का घड़ा भी पुत्र की वेदना को नहीं संभाल सकता था। निराशा के अंधेरे घटाटोप में केवल पति की संबल ही उस दुखयारी के लिए चैन की वस्तु था। नहीं तो जीवन के रणक्षेत्र में वह तो अपना मनोबल कब का हार चुकी होती। यही हाल पति का भी था। उन्हें भी पत्नी का बहुत सहारा दिखाई देता था। दोनों सेवक और कारिंदा भी अपने मालिकान पर आई विपत्ति को समझते हुए सेवक के कर्तव्य से बंधे हुए ,वही चुपचाप पड़े रहते थे।
स्मृतियों में अपने बीते हुए जीवन को दोबारा जी कर रईस के मन का भार कुछ हल्का हो गया था। एक तरह से विगत जीवन की स्मृति और उसके वर्तमान जीवन की दुर्दशा के देखने ने उसमें अत्यंत ठोस प्रकार का धैर्य ला दिया था। जीवन सुख है। जीवन दुख है। जीवन धूप है। जीवन छाया है। उसके भीतर यह स्थितप्रज्ञता स्थित हो गयी थी।
रईस का पीछे छोड़ा हुआ जीवन, एक ऐसी आशा था जहाँ उन्हें वापस लौटना था। बेशक इस समय वह परिवार अपनी इलाके की शान शौकत और रंगीनियत से दूर था, पर वहाँ की खबरें शाम की सुखद हवा की भांति सेवक उन तक पहुंचाते रहते थे। पिता को अपने परिचितों और शुभचिंतकों की खबरें सुनकर अच्छा लगता था। वे आश्वस्त थे कि उनका पुत्र भी एक दिन ठीक होगा, उस पर खुदा की मेहरबानी अवश्य होगी और वे इस घृणित बस्ती को छोड़कर पुरानी राग- रंग की दुनिया में लौट जाएंगे। पिता का खुदा पर विश्वास अटल था। अपने बेटे के प्रति ममता भी अटल थी। उन्होंने दुनिया देखी थी। उन्होंने दुनिया के बदलते ढंगों के बहुत किस्से अपने शुभचिंतकों के मुख से सुने थे। उनका सहज विश्वासी मन था। उन किस्सों की विविध रंगता में छिपी हुई अल्लाह की अदृश्य शक्ति को उन्होंने देख लिया था। उनका उस शक्ति पर पूर्ण विश्वास था।
रईस का मन अपनी स्मृतियों से फारिग हुआ तो उसने वहाँ के माहौल को समझने में चेष्ठा लगाई। कौन हैं ये लोग? कहाँ से आए हैं? क्या शासन के लोगों को इन की खबर नहीं है? इत्यादि प्रश्न उसके दिमाग में घूमने लगे। दोपहर के वक्त उसने आसपास के किसी परिचित से पूछा भी। पर कोई भी कुछ संतोषजनक उत्तर नहीं दे सका। सब ने ‘एक बात - दो बात’ हमने तो ऐसे ही देखा है, बदनसीब हैं बेचारे इत्यादि- कहकर बात खत्म कर दी। बाद में खुद रईस को भी इस बात की दिलचस्पी खत्म हो गई।
सचमुच कोई भी नहीं जानता था ,वे लोग कौन हैं? कहाँ से आए हैं आदि। खुद उन लोगों को भी पता नहीं था। उनकी स्मृतियां विलुप्त हो गयी थी। उनमें से बहुत से जन बेहद कमजोर और बीमार से थे। उनके चेहरे दुखी थे। सोगी को भी ये मालूम नहीं था कि वह कौन थी? वह इस बस्ती में कैसे आई? वह ये सब भूल चुकी थी।
बस्ती के लोगों में अकेली सोगी थी जिसे उस युवक की चीख ऐसे काटती थी, जैसे पानी की तेज धार पत्थर को काटती है। हाँ, उसका हृदय भी पत्थर का था। यह कैसे संभव था कि उन चट्टान से भी कड़े हृदय के लोगों की बस्ती में रहते हुए उसके भीतर तरलता बची रहती। यह तो प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होता। पर सोगी का हृदय चट्टान से भी कड़ा नहीं हुआ था।निश्चित रूप से तो विधाता ही इस रहस्य को जान सकते हैं ।हम तो अनुमान के आधार पर कह रहे हैं कि सोगी स्त्री थी ।शायद यही कारण रहा होगा कि उस पर युवक की चीखें असर करती थी ।कहते हैं विधाता सृष्टि के सुन्दरतम रहस्यों को स्त्री के हृदय मे छुपाकर रखते हैं ।शुरूआत में तो बाकी लोगों की तरह उसने भी निरपेक्ष रहने की कोशिश की। पर एक-दो दिन छोड़कर हर रात के इस क्रम ने उसके भीतर हलचल मचा दी थी। जैसे ही युवक रोता , वह विचलित हो जाती। वह कभी उठी नहीं। पर अपनी जगह पर पड़े हुए, वही करवटें बदल कर वह अपने भीतर उठी उस हलचल को संभालती थी। वह 'तपः –संचिता' यह कहाँ जानती थी कि रात्रि के अंधकार की नीरवता को चीरती ये चीखें उसकी आत्मा में छुपी कठोरता को ऐसे तराश रही है जैसे पानी की तेज धार पत्थर को तराशती है।
विधाता द्वारा तराश के इस उपक्रम में एक शक्ति मूर्ति उभर कर आयी, जो अपने सिंहासन पर विराजमान है। स्त्री की आकृति लिए हुए कोमल हाथ- पैर, कोमल मुख, तनु शरीर, तनु कटिबन्ध, पुष्ट वक्ष प्रदेश -यह सब एक पत्थर की कठोरता में तराशा गया था, अतः विरोधाभास का प्राकृतिक नियम इसमें स्वयं फलीभूत हो रहा था।
दोस्तों! हिंदू धर्म में शक्ति जागरण की नौ रात्रियां कही गई है। ऐसा माना जाता है कि शक्ति को जगाने के लिए नौ रात्रियों तक पुकारें तो शक्ति जाग जाती है। इस कहानी के पात्र तो हिंदू नहीं है। यह तो भारत से दूर बगदाद देश की कहानी है, जहाँ मुस्लिम धर्म प्रमुखता से माना जाता है। फिर हिंदू धर्म की इस अवधारणा के आधार पर इस बात को कैसे समझा जाए? मेरी समझ में इसका संतोषजनक यह उत्तर हो सकता है कि प्रकृति में निहित अपार रहस्य ,जो अपने आप में सार्वभौमिक होते हैं, जिन मनीषियों में प्रकट हुए हैं, वे अपने धर्म को हिंदू धर्म कहते हैं। हिंदू धर्म में कही गई इस अवधारणा के आधार पर मैं कल्पना कर रही हूँ कि सोगी के भीतर उस युवक की चीखों से होने वाली हलचलों ने पूर्ण प्रभाव दिखाने में नौ दिन का समय लिया होगा।
यह क्या!
नौ दिन में प्रतिमा तो तराश ली गई, पर यह तो पत्थर की है। वह क्षण जब उस प्रतिमा में प्राण पड़ने वाले थे, वह अगले दिन सुबह आ गया। रोज़ की भांति जब आसमान में सूर्य की लाली छाई, जगत की नित्यता ने अपनी आवाज़ें हवा में घोलनी शुरू की, वर्षों के नित्यप्रति क्रमानुसार सोगी ने अपना झोला ठीक किया ,बर्तन भी सँभाला और भीख मांगने के लिए चल पड़ी।
यह क्या!
आज वह सीधे बाहर जाने की बजाय उस जगह की ओर मुड़ गई, जहाँ वह दुखी परिवार अपने दुर्दिनों को काटने के लिए डेरा डाले हुए था। धीरे -धीरे चलती हुई वह वहाँ तक पहुँच गई। वह दूर से ही उस युवक को ताकने लगी। उसे कुछ समझ में नहीं आया। वह दूर खड़ी हुई ,यूं ही युवक को ताकती रही। उसके सामने कीमती कपड़ों में लिपटी हुई 'नारकीय त्रासदी' पड़ी थी। वह यूं ही ताकती रही।
दुनिया में धन और सौंदर्य का आकर्षण इतना तीव्र है कि उस युवक की जैसी नारकीय त्रासदी भी कीमती कपड़ों में लिपटी हुई उसे आकर्षक लगी।
युवक ने जो कपड़े पहने थे उनका रंग और डिजाइन तो आकर्षक था ही, उसके बिछोने ,चद्दर ,बर्तन, सामान भी सुन्दर दिखता था। खुद युवक भी शरीर से पतला और पनीले चेहरे वाला होकर भी, उसका रंग गोरा, आँखें काली, नाक लंबी और हाथ -पैर कोमल थे। वह दूर खड़ी हुई यूं ही युवक को ताकती रही |उसे कुछ समझ में नहीं आया। ऐसा लगता था उसकी आंखें उसके कपड़ों और शरीर में से होती हुई उसकी आत्मा को देख रही है।बहुत देर तक अपने आप को इस तरह ताकतें हुए पाकर युवक की छठी इन्द्रिय ने उसे चेताया। वह भी उस ओर देखने लगा, जहाँ सोगी खड़ी थी। सोगी को अपनी ओर ताकते हुए पाकर, युवक भी सोगी की और ताकने लगा।
युवक की चेतना तीन हिस्सों में बंटी थी –अवचेतन, अर्धचेतन और चेतन । अवचेतन मन में कहीं वह अपने माता- पिता के स्नेह, प्रेम और अपनी सामाजिक स्थिति की सुरक्षा के प्रति गहरा आश्वस्त था। अर्धचेतन स्तर पर युवक जानता था कि वह अमुक माता- पिता का, अमुक रईस खानदान का बेटा है। वह अपने सेवकों को भी जानता था। वह बीमार है। वे लोग यहाँ प्रार्थना करने आए हैं। यह एक गंदे लोगों की बस्ती है।
यह उसका चेतन मन था जो एक गहरी जटिल परिस्थिति से उत्पन्न मानसिक विक्षोभ के भंवर में उलझा हुआ था । वह उसके आवेगों को संभाल नहीं पा रहा था। वह अपनी माँ के प्रेम को जानता था, पर उसे उस पर यह क्रोध था कि वह उसे बाला के यहाँ जाने से क्यों रोकती है। वह अपने पिता की इज्जत करता था। पर उनसे उसे यह नाराजगी थी कि क्यों वे उसे और धन नहीं देते? उसे विश्वास था कि बाला उससे रुठने का झूठा अभिनय कर रही है। वह केवल कुछ धन और चाहती है। तो क्या हुआ? वे बगदाद शहर के जाने - माने रईसों में से एक है। क्या उनके यहाँ धन की कमी है? क्या पिता नहीं समझते कि किसी के आगे धन होने की कमी स्वीकार करना कितना शर्मनाक होता है? और वह भी ऐसी हूर के आगे जिसकी दिलकशी पर पूरा बगदाद फिदा हैं। उफ! इससे अच्छा तो इंसान जीते जी मर जाये।
सोचो !कितना भव्य होगा वह पल ! जब बाला पूरे बगदाद के आगे अपने दिल के मालिक का नाम बताएगी। सब रईस दिल में जल कर रह जाएंगे। यह उनके परिवार की प्रतिष्ठा के लिए कितना निर्णायक दिन होगा। बस कुछ दिनों की बात है। कुछ दिन और। वह बाला का दिल जीत लेगा। उसके दोस्तों के बीच उसका सिक्का जन्मभर के लिए जम जाएगा। आखिर यह सब करके वह अपने माता- पिता की ख्वाहिश को ही तो पूरा कर रहा है। फिर वे क्यों उसकी बाधाओं को नहीं समझते।
इस मानसिक विक्षोभ के भंवर में उस युवक का चेतन मन फंसा हुआ था। यही कारण था कि दिन रात सेवा करती माँ और पिता की मजबूरी उसे दिखाई देकर भी दिखाई नहीं देती थी। चेतन स्तर पर अपने आप को 'नियंत्रण में' दिखाने के लिए उसने जो तर्क गढ़ लिए थे, वह उन्हें ही सच मानता था ,पर यह बात उसके अनुभवी पिता और परेशान माँ उससे कहीं बेहतर समझते थे कि बाला के लिए उस युवक की दीवानगी उसके नियंत्रण में नहीं थी। यही कारण था कि माँ उसे टोकती थी। पिता ने एक हद तक उसकी मांग को पूरा किया। मगर जब देखा बाला के पीछे वह अगर भिखारी भी हो जाएंगे, तब भी उसके बर्फ़ जैसे हृदय में युवक के लिए मोहब्बत की कोई लौ ना जगेगी , तब उन्होंने हाथ खींच लिया। तब से युवक के लिए माँ- बाप जहर के समान हो गए थे। ये तो नशे की लत और शरीर की कमजोरी थी , वह वही घर में पड़ा रहता था, नहीं तो उसकी आत्मा की वेदना इतनी घनी थी कि वह कब का घर क्या, बगदाद शहर ही छोड़कर भाग खड़ा होता।
बस्ती के लोग आज तक उससे एक सुरक्षित दूरी पर ही रहे थे । अमीर और गरीब वर्ग के लोगों के बीच एक खाई होती है, जो दोनों वर्गों के लोगों को एक सुरक्षित दूरी पर रखती है। दोनों वर्गों के लोग उस खाई के पार अपने से अलग मनुष्य की नियति देखकर आगे बढ़ जाते हैं। युवक ने भी बस्ती के लोगों को ऐसे ही देखा था।
पर यह क्या!
आज उस दुनिया की कोई स्त्री उसके सामने खड़ी थी और अनिमेष उसे ताके जा रही थी। यह बात युवक के लिए ऐसी आश्चर्यजनक थी मानों वह किसी दूसरे ग्रह की निवासी थी। वह भी सोगी को अनिमेष ताकने लगा |
यह है वह, जो रोता है- सोगी के चेतन मन में यह भाव उभरा।
अब तक जिस दर्द की केवल आवाज़ थी, अब उसका चेहरा, रूप -रंग, वस्त्र ,परिधान, परिवेश था| सोगी उसे अपलक देखती रही। उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वह उन दोनों के बीच की खाई को पार करके आगे बढ़े |बहुत देर तक यूं ही खड़े रहने के बाद वह वहाँ से चली गई। युवक ने उसे जाते हुए देखा। उसके मन में कोई भाव नहीं उभरा।
सोगी और युवक का इस तरह आमने - सामने आना एक ऐसी अलौकिक घटना थी जिसके रहस्य अलौकिक ज्ञानी पुरुष ही बता सकते थे। इस घटना के बीज में अलौकिक शक्ति ने किन रहस्यों के समाधान छुपा रखे थे, ये कौन जानता था? बेचारी सोगी और वह युवक भी कहाँ जानते थे? वे तो कठपुतलियों की भाँति एक दर्द की डोर से बंध गए थे ।
इस घटना के अगले ही दिन उस स्थान पर मस्जिद के सबसे सम्मानित संत आए, मानों पिछले दिन की घटना की आलौकिकता को उस संत पुरुष ने अपनी चेतना के दर्पण में देख लिया था और वह भी इस पर मुहर लगाने आ गए थे। माँ ने सफेद कपड़ों और सफेद लबादे में सिद्ध पुरुष को आते देखा तो वह हर्षातिरेक में उन्हें लिवाने आगे बढ़ी। पिता को भी इशारा किया। पिता आश्चर्यचकित थे । वे कई बार मस्जिद में जाकर उन सिद्ध पुरूष के चरणों में अर्ज कर चुके थे कि वे एक बार युवक को अपने यहाँ आने की आज्ञा देने की कृपा करें। सिद्ध पुरुष ने अब तक कोई उत्तर नहीं दिया था । वे मौन रहे थे। दुनियादार पिता ने मस्जिद में खासी संपत्ति भी चढ़ाई थी कि अलौकिक अर्थ भी लौकिक अर्थ से जल्द सिद्ध हो जाते हैं। पर उनकी एक ना चली। थक हार कर पिता ने अपनी जीवन नैया अल्लाह के भरोसे छोड़कर इस बात पर संतोष कर लिया था कि इस विकट दुख की घड़ी में उनकी प्यारी सुंदरी पत्नी उनके साथ है। बेटा बीमार ही सही, जिंदा है। वे रोज़ उसका मुख देखते हैं। आज्ञापालक, वफादार सेवकों का साथ, धन संपत्ति, बगदाद में पीछे छूटा हुआ विगत वैभव और वहाँ की वैभवशाली दुनिया, पिता को चिर परिचित संसार गहरी आश्वस्ति का भाव देता था।
आज पिता ने स्वयं सिद्ध पुरुष को अपने स्थान पर आते देखा तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। मगर अविश्वास का कोई कारण नहीं था। मस्जिद के कुछ जाने पहचाने लोग उनके साथ थे। वे अल्लाह के नाम के नारे लगाते हुए आ रहे थे। पिता के मन में अप्रत्याशित आशा का संचार हुआ। उन्हें यूं इस तरह सिद्ध पुरुष के आने में अपने दुखों के अंत होने का आभास हुआ। उन्होंने फौरन अपने वस्त्र ठीक किए और पत्नी के साथ आगे बढ़कर सिद्ध पुरुष की अगुवाई की। सिद्ध पुरुष का मुख प्रसन्नता से चमक रहा था। उन्होंने दोनों पति- पत्नी को हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। पश्चात वे सेवकों द्वारा रखे गए मूढ़े पर बैठ गए। उन्होंने आँखें बंद करके अपने ईष्ट का ध्यान किया। वे इस अवस्था में कुछ देर यूं ही बैठे रहे। इस बीच उस स्थान पर पूर्ण मौन रहा। सब लोग आश्चर्य से सिद्ध पुरुष को देखते रहे। थोड़ी देर में सिद्ध पुरुष ने आंखें खोलीं और अपने पवित्र वस्त्र को युवक के शरीर पर फिराया। माँ- पिता ने उनके इस पवित्र उपक्रम को बहुत ही शुभ माना। श्रद्धा वश वे वहीं जमीन पर बैठ गए । युवक चुपचाप इन कामों को होते देखता रहा। उसने कोई भाव प्रकट नहीं किया। थोड़ी देर के उपक्रम के बाद सिद्ध पुरुष अपने स्थान पर वापिस लौट गए ।
कदाचित् यह उस दिन की घटना की गहमागहमी का प्रभाव था या कहें की युवक को सिद्ध पुरुष की दुआ लग गई थी, उस रात को उसे नींद आ गई। माता पिता के मन ने इसे शुभ होने का अगला कदम माना।
दो दिन शांति से गुजरे। तीसरे दिन की बात है। आज माँ ने दलिया बनाया था। सेवक कांच की प्याली में डालकर युवक को खिला रहा था। युवक ने दो- तीन चम्मच तो खा लिए। उसे खाना अच्छा भी लग रहा था। उसने सेवक को इशारा किया कि अभी ठहरकर खिलाना। सेवक ने देखा नहीं। उसने फिर चम्मच भरकर युवक के होंठों पर लगा दिया। युवक को गुस्सा आया। उसने चम्मच और प्याली फेंक दी। सेवक घबराया। माँ ने आवाज सुनी तो वह उस तरफ भागी। पिता बाहर खड़े किसी से बतिया रहे थे। वे भी भीतर देखने के लिए आए कि क्या हुआ?
युवक अभी गुस्से में ही था। यूं भी उसका स्वभाव तेज और गुस्सैल था। जब वह घर में था तब बात -बात पर या बिना बात भी सेवकों को डांटना डपटना उसके लिए बड़ी ही सामान्य बात थी। वह अपनी चीजों के रख-रखाव, सफाई और तरतीबी में ज़रा सी भी चूक सहन नहीं करता था। किसी छोटी बात के लिए अपने दोस्तों या घरवालों के सामने लज्जित होना उसे कतई पसंद नहीं था। इस बात के ख्याल से ही उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता था। बगदाद के अपने परिचितों में वह अपनी सुरुचि, सभ्यता और अनुशासन के लिए लोकप्रिय था।
विधि की विडंबना देखिये कि बगदाद के रईसों में अपनी सभ्यता और नफ़ासत के लिए मशहूर रहा वह युवक यहाँ अपने दैनिक कर्म भी खुद नहीं कर सकता था |वह कितना मानसिक विक्षोभ और संताप का अनुभव करता होगा।
वह अभी भी गुस्से में था। सेवक की असावधानी पर उसे क्षणिक गुस्सा आ गया था। पर जब सब घर के लोग आवाज सुनकर वहाँ दौड़कर आए, तो उनके चेहरों की हैरानी ने युवक को अपनी अवस्था का पुनः भान करा दिया।। नाकामी और पराजय की गहरी पीड़ा ने फिर उसी जलजले को जगा दिया, जो न जाने कब से उसकी चेतना में पैठा था। उसे मानसिक आघात महसूस हुआ। वह पुनः शून्य में ताकने लगा। माँ ने उसके चेहरे के बदलते भावों को पहचान लिया। बेचारी दो दिन से आशा के हिंडोलों में झूल रही थी। वह पुनः धरती पर आ गिरी। पिता धैर्यवान थे। उन्होंने इतनी जल्दी स्वास्थ्य की उम्मीद न पाली थी। इसलिए बेटे की पुनः वही दशा देखकर वे विचलित नहीं हुए। धैर्यवान बने रहे । सेवकों को वहाँ सफाई करने का इशारा किया और बाहर निकल गए।
युवक की मनः स्थिति विचलित होने के बाद स्थिति फिर वही पहले जैसी हो गई। आधीरात के बाद युवक की चीखें उसी तरह रात के नीरव अंधकार को चीरती हुई गूंजने लगी। ना जाने कितने जन्मों का संचित संताप और विक्षोभ था, जिसके नरक को वह भोग रहा था।
यह क्या!
आज हवा में युवक की चीखों के साथ, कुछ हिचकियाँ भी सुनाई दे रही थी। ये किसकी हिचकियाँ थी? यह तो किसी स्त्री की आवाज़ है। कोई स्त्री रो रही है। यह सोगी की आवाज थी । अपने स्थान पर पड़ी हुई उसने जैसे ही युवक की चीखों की आवाज सुनी, बेसाख्ता उसकी आँखों से खुद –ब- खुद आंसू बहने लगे। इधर युवक रोता था, उधर सोगी रोती थी। वह नहीं जानती थी कि ऐसा क्यों हो रहा है। ऐसा लगता था वे दोनों दो पोल थे और उन दोनों के बीच एक अदृश्य तार था जिसके बीच में दर्द बहता था। युवक की चीखें सुनकर ना रोना अब उसके वश में नहीं था। रात इसी तरह गुजर गई। रात को तो गुजरना ही था।
सुबह होने पर सोगी फिर अदृष्ट की किसी बलवती प्रेरणा से युवक के स्थान की ओर चल पडी । पिछली बार की तरह वह युवक के सामने कुछ दूरी पर जाकर खड़ी हो गई। रात भर का जगा हुआ युवक अब उनींदा हो रहा था। माँ ने उसे दो प्याले शराब के पिला दिए थे। वह अर्ध तंद्रा में था। उसी अवस्था में उसने सोगी को अपनी ओर ताकते हुए पाया। उस तंद्रिल अवस्था में भी वह उसे पहचान गया कि यह पहले भी आई थी। वह भी उसे ताकने लगा। आज एक और बात हुई। सोगी उसे देखकर मुस्कुराने लगी। युवक की तंद्रा गहरी थी। उसकी अवस्था देखकर ऐसा लग रहा था कि ज़रा सा छेड़े जाने पर वह पुनः उसी तरह रो देगा। कुछ देर बाद सोगी वहाँ से चली गई।
इस तरह यह क्रम हर रात को दोहराया जाने लगा। एक -दो दिन छोड़कर युवक को वेदना का दौरा उठता और वह चीखने लगता। उसकी चीख, विलाप इस तरह का एकाकी, मानो वह अनेक जन्मों से घने जंगलों में एकाकी विलाप करता रहा हो और किसी ने भी उसकी आवाज न सुनी हो । इधर युवक का विलाप शुरू होता, उधर सोगी की आंखें बेसाख्ता बहने लगती। युवक की चीखें सुनकर ना रोना अब उसके वश में नहीं था। वह हिचकियों में रोने लगती। कई बार के क्रम के बाद, कहीं जा कर युवक की चेतना को यह भान हुआ कि मैं रोता हूँ, तो वह रोती है। कोई है जो रोती है। उसकी चेतना को झटका लगा। वह कौन है? अगले दिन भी वही क्रम। फिर उसके अगले दिन भी वही क्रम। इस तरह कई रातों के क्रम के बाद युवक को यह भान हुआ की मैं रोता हूँ, तो वह रोती है।
युवक के लिए यह एहसास बिल्कुल अनोखा था। वह अभी तक अपने परिचित संसार के दरिया की लहरों में खेलता ,खिलता ,रोता- हंसता, डूबता, उतरता रहा था। इस संसार ने उसकी आत्मा की तलछट में कितना कीचड़ जमा किया था, वह उससे भी दो चार हुआ था, पर एक बिल्कुल अलग संसार की कोई स्त्री उसके रोने से रोती है, इस एहसास ने उसकी जमी हुई वेदना को पिघला दिया था।
अगले दिन भी वही क्रम। युवक की चेतना अपने पिछले जीवन की स्मृतियों में तैर रही थी। उनका एक बड़ा घर था। उनके यहाँ इस तरह शान- शौकत की चीजें बिखरी रहती थी। वे लोग रईसों को दावतों की शान थे। किसी में ये हिम्मत नहीं थी कि उनके परिवार के किसी सदस्य से बेअदबी कर दे । इस तरह चेतना स्मृतियों में तैरते- तैरते पुनः बाला पर जा अटकी। ओह बाला! गजब की सुंदरी! उसके रूप की एक झलक ही दीवाने का दिल जलाने के लिए काफी थी। मैं तो पिता से बात करके और धन लाता | क्या उसे मेरा इतना भी भरोसा नहीं था? करते- करते वापिस चेतना उसी खो में चली गई और युवक फिर विलाप करने लगा। इधर युवक ने विलाप करना शुरू किया, उधर सोगी की आंखो से आंसू बहने लगे। कुछ देर में वह हिचकियां लेने लगी। आज इस एहसास का अनुभव करना युवक को शर्मनाक लगा। उसे खुद पर शर्म आई । मैं रोता हूँ तो यह रोती है, इस अहसास ने उसे एक अजीब सी उलझन में डाल दिया। उसकी खुद की वेदना का कारण वह नहीं जानता था, पर सोगी के रोने का कारण उसने खुद को माना। मैं रोता हूँ तो यह रोती है ,यह बात गीत की टेक की भांति उसके हृदय में जम गई।
रात को रोना और सुबह युवक के सामने जाकर मुस्कुराना सोगी के जीवन में यह नियत क्रम चल पड़ा था। युवक उसे रोज़ आते हुए -जाते हुए देखता था। पहले तो वह भावशून्य ही बना रहा था। अब रात को उसके रोने और उसके पीछे सोगी के रोने ने उसकी चेतना की एक खिड़की खोल दी थी। उसकी चेतना जो अपने संसार के मायाजाल में उलझी थी , उसमें नए आगंतुक के लिए भाव पैदा हो रहे थे। धीरे- धीरे युवक को यह एहसास हुआ कि यह वही है जो रात को रोती है। मैं रोता हूँ तो यह रोती है। इस एहसास ने उसके भीतर सोगी के प्रति एक परिचय भाव पैदा किया। वह सोगी को उसकी शक्ल, रूप- रंग से पहचानने लगा। 'यह वही है जो रात को रोती है। मैं रोता हूँ तो यह रोती है'।
परिचय भाव पैदा होने पर तथा यह एहसास कि यह वही है जो रात को रोती है, वेदना के धरातल पर विचार करने पर कोई आशा करेगा कि युवक सोगी के आने पर दौड़कर उसे लिपट गया होगा और वे दोनों घंटों फूट- फूटकर रोए होंगे। नहीं! ऐसा नहीं हुआ। परिचय और समान वेदना के अलावा वर्गभेद की दीवार थी, जो उनके बीच में मजबूती से खड़ी थी। युवक उस बेहोश मानसिक हालत में भी अर्धचेतन स्तर पर अपने वर्ग, उस वर्ग के आराम और सुविधा के प्रति जागरूक था । सोगी के ऊपर भी युवक ने महंगे परिवेश का आतंक था, जिससे वह अदब के साथ दूर खड़े रहने की अभ्यासी थी।
भीतर भावों का दरिया
सुनता -पुकारता
बाहर खड़ी ऊंची, मजबूत दीवार
स्तब्ध- निशब्द
रोज़ की भाति आज भी सोगी उस तरफ आई थी। युवक आज फिर से अपने बेशकीमती पायजामे के नाड़े में उलझा था। सेवक उसे दूर से खड़े देख रहे थे । कौन उसके पास जाकर उसके क्रोध को झेलने की जहमत उठाए ? जैसे कहता है वैसे करो, दूर खड़े देखते रहो। सोगी ने युवक को देखा। युवक ने सोगी को अपनी ओर देखते हुए देखा। उसे खुद पर बड़ी शर्म आई। पर आश्चर्य की बात थी ,शर्म के इस भाव में खुद की अक्षमता पर विक्षोभ नहीं था, बल्कि सोगी की हमदर्द मुस्कान उसे आश्वस्त कर रही थी, घबराओ नहीं! तुम ये कर सकते हो। हवा में डगमगाता हुआ उसका मन कुछ स्थिर हुआ। उसे अपने मन में अच्छा महसूस हुआ। उसने सेवक को इशारा किया। सेवक ने नाड़ा बांध दिया। युवक ने विजय के भाव से सोगी को देखा। सोगी मुस्कुरा दी और चली गई।
इस तरह एक मामूली घटना से शुरू हुआ यह परिचय बढ़ता गया। सोगी रोज़ आती थी। विचलन की अवस्था के मौके आगे भी आए। मगर धीरे- धीरे वे कम होते गए। युवक के मन में जमा हुआ यह एहसास 'मैं रोता हूँ तो यह रोती है', यहाँ तक आ पहुंचा कि 'मैं रोऊँगा तो यह रोएगी'। इस एहसास ने उसकी संकल्प शक्ति को जागृत कर दिया कि ‘ मैं रोऊँगा तो यह रोएगी इसलिए मैं नहीं रोऊँगा’। इस संकल्प शक्ति ने उसकी कमजोर आत्मचेतना में गजब की शक्ति का संचार किया। इस शक्ति के सहारे उसने खुद को उस मानसिक जलजले के गड्ढे से बाहर निकाल लिया, जो न जाने कितने जन्मों से उसकी आत्म चेतना में एक नासूर की तरह गड़ा हुआ था। वह नासूर खत्म नहीं हुआ था।वह वही था। वह वहीं पड़ा हुआ था। पर अब युवक की चेतना, चेतन स्तर पर अपने परिवेश, माता -पिता, संपत्ति, दिनचर्या ,समाज के प्रति सजग थी।
इतने वर्षों तक वह अपने माता- पिता के प्रति क्षुब्ध रहा था। इस क्षुब्धता ने उसके प्रति माता- पिता के अपार स्नेह के ऊपर भी पर्दा डाल रखा था। अब जीवन में पहली बार उसे अपने बूढ़े होते माता- पिता की ममता और बेबसी दिखाई दीं। उसकी प्यारी माँ, एक रईस आदमी की रईस बीवी, सब तरह के ऐशोआराम की अभ्यासी, यहाँ चार- पांच महीनों से रेगिस्तान की धूल खा रही है। शाम के वक्त प्रार्थना में डूबी अपनी बूढी होती माँ की आकृति उसे बेहद निरीह लगी। उसके प्यारे पिता, शहर भर के रईसों के बीच एक नामचीन शख्सियत, शहर भर में किसी की मजाल नहीं जो उनकी दूरदर्शिता, व्यावहारिक बुद्धि और निर्णय क्षमता का मुकाबला कर सके। मगर जिसे दुनिया नहीं हरा सकी, वह बेटे की बदकिस्मती के आगे हार गया। युवक को जीवन में पहली बार खुद ब खुद माता पिता के प्रति अपने कर्तव्य का भान हुआ।
इस सोच ने उसकी मानसिक अवस्था को बहुत हद तक, कामचलाऊ ढंग का स्वस्थ बना दिया था। अब वह अधिकांशतः अपने बिस्तर पर लेटा रहने की बजाय, बैठा रहने लगा था। उसका शरीर अभी भी कमजोर था। पर आश्चर्यजनक रूप से उसे अब भूख लगने लगी थी। वह कपड़े स्वयं पहनने लगा था। वह बाल भी संवारने लगा था। एक दिन उसने पिता को कहा कि उसे लंबी दाढ़ी नहीं चाहिए। हर्षित हुए पिता ने तुरंत आदमी बुलाकर हजामत करवा दी। आशावान सेवकों ने उसके हाथों- पैरों की मालिश शुरू कर दी। महीने भर की देखभाल में उसके शरीर की शक्ति भी काफी हद तक लौट आयी।
बेटे की हालत में दिन- प्रतिदिन सुधार के लक्षण देखकर माता- पिता की आँखों में खुशी के आंसू थे। आखिर रहमपसंद अल्लाह को उन पर रहम आ गया था। उन्हें अब घर वापसी की उम्मीद होने लगी थी। सोगी को उन्होंने अपने लिए शुभ माना था। अपने पुत्र के साथ सोगी के छोटे- छोटे खेल में वे आनंद लेते थे। उसके साथ खेलने में उनका बेटा हँसता था, मुस्कुराता था, खुश होता था।
जाने से पहले, पिता ने सोगी को खूब बख्शीश दी। सोगी ने सिर झुकाकर ले ली। पिता ने उसके हाथ में एक चिन्ह भी दिया। कहा कि मुद्रा खत्म होने पर, वह उनके निवास की जगह आये। वहाँ वे उसे इससे भी ज्यादा बख्शीश देंगे। सोगी ने 'हाँ' में सिर झुकाकर उनकी बात सुनी। उन्हें सलाम किया। आखिर छह महीने वहाँ बिताकर वह परिवार अपने घर वापिस लौट गया।
वापिस लौटने पर युवक ने अपना घर, सामान, ऐश्वर्य,, बाग- बगीचे, सेवकों, जानवरों को देखा, तो इस मिल्कियत का स्वामी होने का गर्व महसूस किया। माता- पिता को यह अंदेशा था कि कहीं अपने दोस्त के यहाँ बाला का जिक्र सुनकर विचलित न हो जाये। पहले तो उन्होंने उसके दोस्तों का आना बंद रखा। फिर यह महसूस करके कि आखिर पूरी जिंदगी के लिए तो ये नहीं किया जा सकता, उन्होंने हमदर्द साथियों को विश्वास में लेकर सारी बात बताई और कहा कि वे उसके आगे बाला का जिक्र ना करे।
उन्हें यह पता नहीं था कि युवक इस बाबत पहले ही बाला को ना देखने और न बात करने की कसम खा चुका है। वह पहले ही अपने मन में यह निर्णय ले चुका है कि किसी भी हालत में उसे माता- पिता, घर, सामान, ऐश्वर्य, बाग- बगीचों, सेवकों ,जानवरों की हकीकत को भूलना नहीं है। अपनी मन- बुद्धि को उस व्यवसाय की व्यवस्था संभालने में लगाना है, जो इसे चलाये रखने के लिए जरूरी है। अब यही उसकी जिंदगी का कर्तव्य है। दोस्तों के आने पर वह ना अधिक खुश हुआ ना उदास । उसने अपने दिल के हालात भी बयान नहीं किए। वे शाम तक घोड़ों, तीतरों की शिकार की बातें करते रहे। उनकी बातों में युवक ने अजीब ढंग की विश्रांति अनुभव की।' देखो! दुनिया के महानतम जलजलों के बीच भी ज़िंदगी की शामे युवकों की उत्साह भरी बातों में कट जाती है।' बहुत दिनों के बाद उसे इस तरह शाम का कटना भला लग रहा था।
छह महीने बाद माता- पिता ने अपने बिरादरी की एक सुंदर कन्या से उसका विवाह कर दिया। युवक ने इसे भी अपना कर्तव्य माना। वह जीवन के राग- रंग, हर्ष- शोक से विरत हो गया था। उसने अपने जज्बातों के ऊपर कर्तव्य को सफेदी पोत ली थी, जिसके नीचे उसकी विचलित मानसिक अवस्था का बेरंगपन, बेढंगपन, उबड़- खाबड़पन छिप गया था। हाँ !यह सब कुछ बड़े ही जतन से छुपाया गया था। कभी भी ,कहीं भी इसके झटके से उखड़ पड़ने के खतरे थे, लेकिन बस! फिलहाल जिंदगी यूं ही ,ढांप-ढूँप के चल रही थी।
बाला को भी उसके मुरीदों ने शहर में युवक के लौट आने की खबर दे दी थी। उसे आश्चर्य हुआ था कि दो दिन-तीन दिन बीत जाने पर भी उसका तलबगार उसे देखे बिना कैसे रह गया? जाएगा कहा? अभिमानी के अभिमान ने शरीर के भीतर लोच मारा। फिर बढ़ते- बढ़ते यह अभिमान ऐसा पैठा कि उसने कसम खा ली, वह कभी जीते जी उसका मुँह नहीं देखेगी। इस तरह उनके बीच नकारात्मक बल रहा जिससे वे बंधे तो थे, पर उसके बाद जीवन में कभी मिले नहीं।
उधर सोगी का पुराना जीवन उसी तरह चलता रहा। जो बख्शीश उसे मिली थी , थोड़े ही दिन बाद वह किसी ने चुरा ली। वह फिर वहीं आ गई। उसे कोई भय नहीं था। वह अपने जीवन में संतुष्ट प्राय थी। जीवन वही था, दिनचर्या वही थी : पर सोगी अब पुरानी सोगी नहीं रह गई थी। रात को जब आसमान अपना थाल उल्टा कर देता था, तब उसे युवक की स्मृति हो आती। युवक की स्मृति में उसका रोना इतना दर्दनाक शक्तिशाली था| वह उसे कैसे भूल सकती थी। वह ऐसे रोता था, याद करके उनकी आंखो से पुनः आंसू बहने लगते थे।
एक बार वह प्रयास करके पैदल चलती हुई युवक के शहर में आयी थी। वहाँ के बड़े- बड़े मकान, शान -शौकत देखकर वह पहले ही घबरा गई। किसी तरह पूछपाछ कर, उस चिन्ह को दिखाकर वह युवक के यहाँ पहुंची भी, तो बाहर से ही इतना बड़ा घर देखकर मारे संकोच के उसके पैर ही नहीं उठे। वह बहुत देर तक बाहर ही खड़ी रही । दूर से उसे ऐसे प्रतीत हुआ कि कमरे की छत पर कोई टहल रहा है। शायद युवक हो। मगर उसकी हिम्मत नहीं हुई किसी से पूछने की या भीतर जाने की।वह वहीं से वापस लौट गई। बाद का जीवन उसने उसी तरह पुराने ढर्रे पर जीते हुए बताया।
युवक को भी कभी -कभार सोगी की याद हो आती थी। किसी शाम बच्चे के साथ खेलते हुए या यूं ही एकांत में साँझ का सूरज ढलते देखते हुए, जब तक रात को आसमान थाल उल्टा नहीं करता था, वह सोचता था 'जब मैं रोता था तो वह रोती थी'। यह सोचकर वह मुस्कुरा उठता था।
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पिछले साल के संकल्प अनुसार दो किताबें न सही यह कहानी ही सही , मैने यहाँ प्रकाशित की है । बाकी के प्रकाशन मेरे वश मे नही है । जब होंगे, तब हो जाएगें । कच्चे रूप में यहां शेयर की है ।
दोस्त! पढ़ें , आनंद लें ।
हो सके तो गलतियां बताएं । या ना बताएं...😊
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लेखकों के बारे मे कहा जाता है "अपने रचना- संसार के प्रजापति टाइप्स " , बिल्कुल रोन्ग है । एक दूसरी कहानी लिख रही थी , उसका अंश भी शेयर किया था , इसने बीच मे आकर हाथ पकड़ लिया । पहले मैं ! और मुझे इसकी बात माननी पड़ी । फिर किस बात के प्रजापति हुए !
Enjoy reading...
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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023
बुधवार, 6 दिसंबर 2023
पक्ष -विपक्ष के बीच मे एक आख्यान सुर-असुर का है । नेक टू नेक स्पर्द्धा। काँटे की टक्कर टाइप । दोनो बराबर के एक्टिव ।
बट आगमों मे मैने देखा कि असुरों का वर्णन नकारात्मक नही है । वे भी समान ऋद्धि सम्पन्न , परिवार सम्पन्न बताए गए है । बट उनके स्थान नीचे है । शक्ति का भी अंतर है ।
हमारे यहां ऊंचे देवों के लक्षणों मे उनकी प्रशान्तता , अल्प इच्छा और शुभता कही गई है ।
मोह की मंदता से यह संभव होता है ।
यह मोह की मंदता के कारण ही है कि इन्सान को राग -द्वेष दो नही , एक नजर आते है ।
दुनिया राग को बंधन मानती है । जैन धर्म मे द्वेष को भी बंधन माना गया है ।
धर्म के सुनने से पहले द्वेष संयमित होता है । (negative force)। फिर जाकर राग के संयम की बारी आती है । अंततः तो उसे भी छोड़ना है ।
यह सब चिन्तन ज्ञान -अज्ञान को देखने से अपने आप डेवलप होता है ।
आठ कर्मों मे मोहनीय कर्म को सबसे बलवान बताया गया है ।
#beware what u say .# concentrate on your doing.
मंगलवार, 5 दिसंबर 2023
रविवार, 3 दिसंबर 2023
We Indians hv created systems (political)that attract so much man power, which mainly crushes them .
Who , on earth ,mortal man can take so much of pressure. Really.
selfishly a thought came into my mind why shd i indulge in these things . Let them do who hv no option.
It is so unbearable for ppl like us sitting far away .
How would hv they bear it who are into it physically n all.
My mind was in dark and I was searching for hope .
....and then it turned to the other side ppl.even they do it day -night , night -day .
And see , while a true path goer has that satisfaction of doing right , whatever little one does in his/her own capacity,
...even if one writes a fb post
... they do not hv that satisfaction even .
#yesterday feelings (written on 4 Dec 23)
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It's 1/4 for congress.
शनिवार, 2 दिसंबर 2023
जब हमने शुरुआत की थी तब हम स्ट्रिक्टली चुने हुए लोगों पर ही टिके थे ।एक समय वह भी आया- नो वेकेन्सी भी कहा । लेकिन जैसे जैसे बात आगे चली , आगे लोगो के साथ और स्नेह ने 'आदर न करें' यह असंभव कर दिया ।
मुझे तो सब पसंद है। mk , गीता, अंकिता जैन, सुशोभित, अविनाश।
बट आप समझते हो । बिना पांच पैसे लिए-दिए भी लेखको के झगडे सबने देखे है ।
मै इतने ही को रोज पढती हूं । और भी बहुत से होंगे ।
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मैने अभी तक कई कहानियाँ भेजी हैं , बट सब वापिस आ गई। पर मैने आशा नही छोड़ी है ।
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पता नही । मन में कोई फीलिंग नही आ रही ।
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गुरुवार, 30 नवंबर 2023
मंगलवार, 28 नवंबर 2023
कुछ समय पहले मैने एक फोटो देखी थी । बहुत सी डिस्पोजेबल प्लेट्स की ।
देखो तो , दिखे की- उल्टी रखी है । बट देखते देखते एक प्वाइंट पे सीधी दिखने लग जाती है ।
मजे की बात है कि जब सीधी दिखने लगी तो , अब चाहकर भी उल्टी दिखनी बंद हो गई।
कमेंटस मे पढा तो देखा कि सभी ने ये बात दर्ज की थी । इसका हल यह था कि वापिस स्क्रोल करके फिर देखो ।😊
आत्मज्ञान भी ऐसा ही है । एक प्वाइंट पर आकर चीजे सीधी दिखने लग जाती है ।फिर इसे वापिस उलटने की चाह ही नही रहती ।
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हसबैंड के मोबाइल मे देखी थी ।संभव हुआ तो यहां शेयर करूंगी ।
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बुधवार, 15 नवंबर 2023
शनिवार, 11 नवंबर 2023
मंगलवार, 7 नवंबर 2023
Sometimes it feels so soothing to read these kind of things .
An extract frm an unfinished story .
कई बार कोई कहानी ऐसे दिख जाती है जैसे सामने टेबल पर रखी हुई कोई चीज़। हम उस कहानी को उठाकर अलटते पलटते हैं कि देखें तो सही यह क्या चीज़ है?
अरे?
यह है तो एक पुराने जमाने की चीज़ लगती सब परिवेश पुराना है। किरदार जीवन। जीवन की गति।
अब ये बातें कहाँ पसंद आएगी किसी को? कहानी का निरीक्षण करते हुए मन से एक आवाज़ आती है।
तो क्या हुआ? कहानी पुरानी है तो। मनुष्य के भाव और करतूतें तो वही है। कह दो - पुराने साहित्यानुरागी मन से आवाज आती है।
हम दिन भर में कितने ही शब्दों ,आवाजों और छवियों में से गुजरते हैं। एक बार कहीं पढ़ा था कि हमारे ऊपर रोजाना हजारों शब्द गिरते हैं।
गिरते हैं ! सीरियसली!
बम हैं क्या?
उस समय इन्कार में मैंने सोचा था।
पर धीरे धीरे मुझे उस बात की गहराई समझ में आयी। मीडिया के जरिए जिंस तेजी के साथ शब्दों, आवाजों और छवियों की रचना बदलती जाती है ,उसमें कब गुड़ को शौकीन व्यक्ति को बंगाल के रसगुल्ले भी फीके लगने लगते हैं, ये पता ही नहीं चलता।
ऐसे अति चंचल यथार्थ के समय में जब -
मन की गति "सो घोड़े दौड़ रहे हों , एक साथ "
बुद्धि की गति" अपनी दिनचर्या में धंसी हुई हो"
और शरीर की गति " टल जाये तो टाल दें, नहीं तो आ पड़े काम को किसी तरह निपटा लें बस ", यह हो ;
तब कौन सी बात आपको किस तरह सूझ जाएगी, यह समझना तो लगभग नामुमकिन सा है । फिर यह है कि आपका एक परिवेश ,सोच , रहन- सहन का ढांचा भी है। बेहतर यही है की आप कहानी का मज़ा लें।
रविवार, 5 नवंबर 2023
सोमवार, 30 अक्टूबर 2023
रविवार, 29 अक्टूबर 2023
सोमवार, 23 अक्टूबर 2023
शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023
आचारांग (दिसम्बर 2020) पढने के बाद पृथ्वी , जल आदि के प्रति सचेत भाव बढ़ा है । पहले नही था ।
कहने का अर्थ यह है पहले विचार के तौर पर तो था मगर हमे आचरण मे ढ़ालना है , बल्कि आचार को इस तरह चुनाव करना है कि यह विचार सामने रहे , यह सचेतनता बिल्कुल नही थी ।
शुरुआत मे तो मन की आकांक्षाए ऊंची थी । ब्रांड बनाएंगे टाइप
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अब मन के वे अंहकार मन्द पड़ गए हैं । अच्छी बात है । यही गुरु कृपा की बात है । 😊
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मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023
जब एक पूर्ण विश्वसनीय मार्ग पर धीरे धीरे चलकर , अपने हर भय का सामना करते हुए हम इस ज्ञान तक पहुँचे हैं कि पृथ्वी, जल आदि मे जीवन है ,
तब मनुष्य के रूप मे हमारी महत्वाकांक्षाओं की सारहीनता बड़ी प्रत्यक्ष हो जाती है ।
मन की गति ऑटोमेटिकली स्लो हो जाती है ।
खुद को प्रूव करने का अंहकार भी मंदा पड़ जाता है । (और कितना प्रूव करें । कितने सफल होवें ! )
मुझे तो गुरुदेवों ने और महावीर वाणी ने बचा लिया !
(अरे !असली कार्य तो इनकी रक्षा का है । वह तो अपनी सीमा मे हम कर ही रहे हैं , जैसा हमारा आज का जीवन है ।फिर क्या घबराना !
एक कार्य विमर्श का है । वह भी जैसे तैसे चल ही रहा है ।)
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बाकी हम रूक नही गए हैं । हम चल रहे हैं । अपना काम , अपनी स्पीड मे कर रहे हैं ।
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देखते है आगे क्या दिशा रहती है ।
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सोमवार, 16 अक्टूबर 2023
रविवार, 15 अक्टूबर 2023
शनिवार, 14 अक्टूबर 2023
गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023
बुधवार, 11 अक्टूबर 2023
Today I read D'Souza poems on avinash mishra fb post. And almost unconsciously I imagined those poems being recited in actor Lillet dubey'voice.
May be her texture of voice can do justice to the serious, loneliness of these poems .
... and may be her sparkling face can reflect the free,carefree spirit of the actor/poet simultaneously.
😊
मंगलवार, 10 अक्टूबर 2023
रविवार, 8 अक्टूबर 2023
शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023
मुझे लगता है , मै हमेशा से एक खुशमिजाज, मनमस्त बच्ची रही हूं ।मुझे सिर्फ एक ही टेन्शन रही है कि जिन लोगों ने मुझ पर भरोसा किया है ,वे निराश न हो ।
शायद यही कारण है कि बाद मे मै संत -धारा से जुड़ी।क्योंकि यह भी तो एक प्रसन्नता की बृहत्तर धारा है । वैराग्य को लोग नेगेटिव सेन्स मे समझते है ।
कुछ दुख होगा , जो उधर गए।
कुछ अभाव होगा ।इत्यादि
बहुत हद तक तो इन बातों मे सच्चाई भी है । आखिर बहुजन-समर्थित राग रंग रंजित संसार मार्ग को छोड़कर कोई यूं ही तो नही आ जाएगा ,एक रूखे -सूखे मार्ग पर ।क्या लड्डू -पेड़े बँट रहे है यहाँ ।
मै कहती भी थी यह बात कि इस मार्ग पर आने के लिए संसार का विकर्षन नही , मार्ग का आकर्षण होना चाहिए।
और देखिए! जिन खोजा , तिन पाइयां । मुझे गुरूदेव मिल गए।
-कल सुशोभित की पोस्ट पढ़कर
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सोमवार, 2 अक्टूबर 2023
गांधी जी की जीवनी पहली कोर्स से इतर किताब थी जो मैने खरीद कर पढ़ी थी ।इंग्लिश में ।1997 में ।पढ़कर लगा 'वाह ! कैसी अद्भुत किताब है ।इसमे कैसी कैसी बातें कैसे ढंग से कही गई हैं । बहुत संतोष हुआ था मुझे । (पूर्व पोस्ट का अंश)
अब आगे -
यह किताब मैने गुरुदेव रामप्रसाद जी म की प्रेरणा से खरीदी और पढी थी । मात्र 20रु की ।
अरे! इतनी बढ़या किताब है ।वो भी इतनी कम कीमत मे ।
उस समय मुझे पता नही था कि यह कम मूल्य मे उपलब्ध कराई गई है ।😊
रविवार, 1 अक्टूबर 2023
कल हम तिजारा जी गए थे ।बहुत दिनो के बाद सब लोग गए थे ।
आते हुए यह चौक दिखा था । वहां तो खींची नही । यह फोटो इन्टरनेट से निकाली है ।
जहां एक शेर की शक्ति और गाय की करूणा मिल जाती है , वहां महावीर की अहिंसा का सर्कल पूरा हो जाता है / प्रकट हो जाती है ।
यह प्रतीक मैने अनन्तचतुर्दशी के अवसर पर निकाले जाने वाली शोभा यात्रा मे भी देखा है ।
परम्पराएं किस तरह सत्यों को सहेजती हैं , यह देखना भी एक आश्चर्य है ।
मेरा पहले से मन था कि मै यह बात शेयर करूं ।पर मेरे पास फोटो नही थी। कल मैने यह मूर्ति देखी तो सुखद आश्चर्य हुआ।
गुरुवार, 28 सितंबर 2023
आज यह लिखा है -
आज का दिन इतना चमकीला है कि अगर बाहर से अंदर आओ तो एकदम अंधेरा छा जाता है।
पेड़ों के पत्ते 5 शेड में दिखते हैं । गहरा हरा ,हल्का हरा....से होता हुआ धूसर ,पीला ।
यह शेड मुझे मैचिंग सेंटर में करीने से लगे हुए कपड़ों की याद दिलाते हैं । रंगों के ऐसे शेड्स ,बढते क्रम में , घटते क्रम में वहीं देखे हैं ।
सड़क पर एक फैमिली गुब्बारे बेचते हुए जा रही है। आदमी है ।उसकी हट्टी कट्टी औरत है। दो बच्चे है । पांच -छह गुब्बारे हैं ,फुलाए हुए ।गुब्बारे नए स्टाइल के है । अगर 25 का होगा तो शाम तक डेढ़ सौ रुपए बन जाएंगे । बिना फुलाए गुब्बारे थैली में होंगे।
औरतें स्कूटी पे इधर से उधर जा रही है । अब रोड पे आदमियों के साथ औरतें भी बहुत दिखती हैं ।
#आज का हाल
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शुक्रवार, 22 सितंबर 2023
I think I had misunderstanding yesterday . Anyway .
ये अच्छी बात है कि हमारी स्पीड इतनी स्लो है कि सबको निश्चिंतता रहती है ।
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मैने अपने जीवन मे उन लोगो को फाॅलो किया है जो दूसरों से नही , खुद से ये सवाल पूछते थे कि मै उन लोगों के लिए क्या कर सकता हूं जिन्होने मुझे प्रेम किया है ।
इतनी सद्बुद्धि होना भी गुरुकृपा की देन है ।
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अब तो , कोई बात को यहां तक ले आए है कि अपने fb handleपर शाहरुख की फिल्म की तारीफ मे कुछ लिखो तो लगता है खुद शाहरुख पढ रहे है , पढ़कर हँस रहे है ।
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आर्थिक दर्शन है -मर्यादित परिग्रह।
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यह पुरानी पोस्ट है। अब भी सितम्बर ही चल रहा है । खैर ...
इस आधार पर माॅडल बना लेंगे।
17 sep2022
विचार को अमल मे लाने के तीन तरीके संभव है ।ये माॅडल मैने धर्म के क्षेत्र मे भी देखे है ।
एक - कि अपने सत के दम पर चलते रहो । कद्रदान फाइनेंस करे ।
दो-चंदा से फाइनेंस जुटाओ।
या आत्मनिर्भर रहते हुए काम करो ।
आलोचना तीनो की होती है ।पहले मे कानाफूसी ,अंदर ही अंदर क्या चल रहा का अविश्वास। दूसरे की तो कोई इज्जत ही नही ।तीसरे को धंधेबाज कह देते है ।
बाकि व्यक्तिगत प्रयास है ।
पर्सनली मुझे तीसरा पसंद है।hv filled du forms.
😊बाकी भी कहो ।
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गुरुवार, 21 सितंबर 2023
बहुत बातें ऐसी होती है जो दूसरों के आगे कहने में , पुनः नए ढंग में समझ आती हैं ।
संवत्सरी का जो प्रसंग मैने शेयर किया था , यहां लिखकर , बाद में मुझे रियलाइज़ हुआ कि देखो ! जैनों का मुख्य महापर्व सुदूर अनन्तकाल में घटी एक ऐसी घटना के आधार पर मनाया जाता जिसका जैन धर्म के प्रतीकों या महापुरुषों से कोई मतलब नही है ।
वे लोग जैन नही थे । न ही उन्होने प्रवचन सुने थे ।
प्रकृति मे हो रहे परिवर्तन से अभिभूत होकर स्वतः हृदय की प्रेरणा से उन्होने शाकाहार अपनाया था ।
यह एक बात ही कितनी प्रेरणास्पद है ।
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Me and my family will meet our leader rahul gandhi ji ,may be, someday.
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बुधवार, 20 सितंबर 2023
सोमवार, 18 सितंबर 2023
कल संवत्सरी है ।सभी से संवत्सरी सम्बन्धी खिमत खिमावना 🙏🏻🙏🏻
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जब तक न शुरु करो तब तक पहाड़ सरीखी लगती है तपस्या। शुरु कर लो तो कब वक्त निकल जाता है पता ही नही लगता ।मेरा रिटायर्मेंट प्लान है कि मै आजीवन एकाशने किया करुँगी।
हमारे गुरूदेव श्री सुंदर मुनि जी महाराज तो 30 सालों से कर रहे हैं ।
पता नही कर पाऊंगी या नही ।भावना जरुर है ।
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संवत्सरी मनाने का थोड़ा सा इतिहास बता रही हूं । कुछ इन्टरनेट से यूज किया है । कुछ खुद लिखा है ।
जैन आगम के अनुसार अभी पंचम आरा चल रहा है ।यह 21000 वर्ष तक चलेगा। इसमें 2500 साल बीत चुके हैं । और 18500 साल बाकी हैं । उसके बाद छठा आएगा जो वह भी 21000 वर्ष का होगा। फिर उसके बाद (उत्सर्पिणी का )*पहला आरा आएगा । वो भी 21000 वर्ष का होगा ।इसका स्वभाव छठे आरे के समान होगा मगर शुभता के बढ़ते क्रम मे ।
अभी शुभता का घटता क्रम चल रहा है।
छठे आरे के 21000 वर्ष तक सिर्फ जलचर, मछली वगैरह खाते रहने के बाद , क्योंकि धरती पर बिलकुल भी वनस्पति नहीं रहेगी , तब जलवायु परिवर्तन होगा । भीषण गर्मी से तप्त धरती पर मेघों की बरसात होती है। 49वें दिन तक यह बरसात धरती को हरा-भरा कर देती है। फलों वगैरह की पैदाइश होगी । वे लोग उनके देवोपम स्वाद को चखेंगे तब उस समय के लोग यह निर्णय करेंगे कि वे आगे से मांस आहार का त्याग कर देंगे।
इस दिन को अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह संवत्सरी मनाने का कारण है।
इस पर्व को मनाने का विशेष महत्त्व है क्योंकि इस पर्व को मनाने में पर्व को मनाने के साथ साथ , तीर्थंकर की आज्ञा का लाभ भी मिलता है। अनंत तीर्थंकरों की आज्ञा का लाभ भी मिल जाता है ।
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* काल के अनुसार समय की सुई जैसे पहले नीचे की ओर और फिर उपर की और गति करती है उसी तरह से पर यहां काल को (अवसर्पिणी काल व उत्सर्पिणी काल) दो वर्गों में बांटा गया है।
अवसर्पिणी काल में जहां ऊपर से नीचे उतरते हुए धर्म की हानि हो रही होती है, वहीं उत्सर्पिणी काल में धर्म का उत्थान हो रहा होता है। मतलब अवसर्पिणी काल में प्रकृति और व्यक्ति दुख की ओर बढ़ रहा होता है और उत्सर्पिणी काल में सुख की ओर।
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शनिवार, 16 सितंबर 2023
गुरुदेव श्री सुंदर मुनि जी महाराज के चरणों में जन्मदिन की शुभकामनाएँ ।
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Breaking stereotypes of a politician . we are not used to see this in india . Although traditional things are also liked in india -seeing rahul gandhi ji's ladakh diaries .
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Everyone was speaking hindi so well .
कितने कमाल की बात है !
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बाइक पर /साइकिल पर खड़े होने को मै लडकों का टशन समझती थी । अब मुझे मालूम हुआ कि इससे थकान कम होती है ।
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गुरुवार, 14 सितंबर 2023
मेरे लिए हिन्दी का अर्थ है - सहर्ष अपने पापा की इच्छा पूरी करते हुए अंततः यूनिवर्सिटी मे एक कोर्स मे दाखिला मिलना ।😊
बाकी किसी बात की हम दोनो ने ही परवाह नही की । वे तो मेरे नेट क्लियर से ही संतुष्ट हो गए।
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बाद मे -
वरिष्ठ आलोचक सुधीश पचौरी जी का हिन्दी को लेकर जज्बा भी विस्मित करता था ।
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गहराई मे -
मेरे लिए हिन्दी का अर्थ है - मेरी दादी की गम्भीरता और मेरे पापा की विस्फोटकता की भाषा ।
पर अरररर....
वह तो प्रॉपर भाषा भी नही । वह तो बस गहरा मौन है ।
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और अधिक गहराई मे -
यह मौन मैने और भी जगह देखा । और उसकी अभिव्यक्ति के लिए विकल भाषा भी।
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मंगलवार, 12 सितंबर 2023
बुधवार, 6 सितंबर 2023
वे शिक्षक जिनकी मैं कल बात कर रही थी , ऊपर ऊपर से ढोंग करते हैं अ-श्रद्धालू होने का , चंटई , सन्नी लियोनी । यह एक खोल है जो इन्होंने ओढ़ रखा है अपने भीतर की श्रद्धा को बचाने का ।
अन्यथा कहीं भीतर ये गहरे आदर्शवादी हैं । कहीं झलक देखते हैं सच्चाई की, तो झुक जाते हैं।(कड़ी परीक्षा लेने के बाद। इस मामले मे पूरे कडियल हैं )
स्वयं अपने जमाने के माने हुए प्रभावशाली सत्ता पुरुष, विचार पुरुष, सत्ता-विचार पुरुष होते हुए सबके सामने एक अदना स्त्री से माफी मांगने में भी नहीं हिचकिचाते ।(टाइमलाइन याद रहे)
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मैने कभी लिखा नही ।
क्या फायदा ।
दरअसल हिन्दी मे लोगों के जुड़ने की ऐसी चित्र-विचित्र वैराइटियां है कि ऐसे सरोकार से भी कोई जुड़ सकते है ,यह बात हजम करने मे अभी 1000 साल तो लग ही जाएंगे ।
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#कल शिक्षक दिवस था।
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मंगलवार, 5 सितंबर 2023
सोमवार, 4 सितंबर 2023
गुरुवार, 31 अगस्त 2023
गुरुवार, 24 अगस्त 2023
After very very long time I tried something in cooking.
I am a so-so kind of cook.
I don't like cooking. Bt I really like to serve people feeding. And also I really like serving my kids and family .
I hv very deep respect for my this skill.....
You know , how i am . I get philosophical at all occasions. I find this skill has the capacity to relieve someone frm hunger .
Lessons learnt today frm first attempt -
Taste was nice . Crip was good . Bt 9 out of 19-20 burnt frm bottom . Got bitter. Next time I'll use butter paper.
Whether to decrease temperature or to increase bake time ,not sure. Need more attempts .
शुक्रवार, 18 अगस्त 2023
मेरा अब किसी से कुछ कहने का मन नही होता । जिन दो-तीन जन को मेरी बातों की सच्चाई जची है , मेरे लिए तो उतना ही बहुत है ।
हम यहां तक आयेंगे, यह किसने सोचा था ।
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जिनवाणी की विशेषताओं मे से एक विशेषता है इसका अश्रुतपूर्व होना -अर्थात वह बात जो कभी पहले सुनने मे नही आई है ।
पानी मे जीव!क्या यह सुनने योग्य बात है । अगर सुनने को मिल भी जाए तो क्या यह मानने योग्य बात है ।
निश्चित रूप से आप अज्ञानता की दुर्लंघ्य गलियो को पार करोगे तभी इस बात की सच्चाई को मानोगे ।खैर
मै तो सुना न सकी पर इन सालो मे मैने अवश्य ऐसी बाते सुनी है जो मेरे लिए तो अश्रुतपूर्व ही है ।
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मै तो इसे भी महावीर वाणी की कृपा ही कहती हूं कि मन शांत है ।
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उदासीनता बड़ी कीमती चीज है ।आपको भी इसे अपनाना चाहिए।
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मंगलवार, 8 अगस्त 2023
एक स्वाध्यायी के रूप मे शास्त्रों का अध्ययन करना ,अहिंसादि 12 श्रावक व्रतो का यथाशक्ति पालन करना ; इस प्रकार यह मेरा जीवन तो चल ही रहा है ।
मै अपनी समझ के अनुसार लिखती भी रहती हूं ।
शास्त्रों मे जो विषय हैं उन्हे पढते हुए ये रिअलाईज होता है कि यह ज्ञान न जानना कितनी बड़ी अज्ञानता है ।
हर कोई इसे जाने यह संभव है , उसकी स्वयं की रेफरेंस भाषा मे यह संभव है ।बस सुनने का माहौल हो अगर तो ।
खैर
यह बात है जो मुझे लगातार, सतत प्रेरित करती है ।
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But nowadays I feel-
Not to write here or anywhere.
शनिवार, 5 अगस्त 2023
हाल ही मे जयन्ती की कहानी पढी -चौथा आदमी । काइंड शब्द का प्रयोग इस अर्थ मे होता है!
मै तो जहां भी कुछ छपने के लिए भेजती हूं यही लिखती हूं -kindly consider....for publication.
😔
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Anyway...
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आज हमारे गुरूदेव श्री बद्री प्रसाद जी म का संथारा दिवस है । उनका संथारा 72 दिन तक चला था अर्थात 16 अक्टूबर तक,1986 सोनीपत हरियाणा ।जय जय ।
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मंगलवार, 1 अगस्त 2023
मंगलवार, 25 जुलाई 2023
प्रसंगवश एक अवांतर चर्चा-
प्रिय पाठक! इन पंक्तियों की लेखिका ने जैन आगमों का अध्ययन किया है इसलिए अपनी समझ के आधार पर मैं श्रद्धालु और अ-श्रद्धालू के द्वैत पर विचार प्रस्तुत कर रही हूं ।
यह दर्शनशास्त्र की बहुत शक्तिशाली और पेचीदा पहेली है ।
मै कभी इस प्रश्न के बारे मे अवेयर नही थी।
पहले पहल मैने यह चर्चा मजूमदार की किताब मे पढ़ी थी ।शाहजहां के पुत्र दारा शिकोह संतो के साथ सोहबत मे इस बात की बौद्धिक पडताल कर रहे हैं।
इस्लामी दर्शन एकेश्वरवाद को मानता है । अल्लाह एक है और उसी ने सबको बनाया है तो फिर प्रश्न उठता है काफिर (अ-श्रद्धालू) को किसने बनाया ?
इस प्रश्न से शुरू होकर आगे एक कठोर बौद्धिक प्रक्रिया बताई गई है , जिसका अन्ततः यह निष्कर्ष निकलता है -
सच्चा विश्वासी वह अविश्वासी है जो ईश्वर को प्राप्त हो गया है ।जिसने उसका दर्शन प्राप्त कर लिया है , जिसे उसका ज्ञान है।
अविश्वासी वह है जो विश्वासी ( ईमानदार)है जो ईश्वर को प्राप्त नही है ।जिसने उसका दर्शन प्राप्त नही किया है , जिसे उसका ज्ञान नही है।
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जैन आगम मे यह पहेली कैसे सुलझाई गई है , इसकी बानगी देखिए। जैन दर्शन का आधार है- आत्मा की स्वतन्त्रता ।
आचारांग के पहले श्रुतस्कंध के पांचवें अध्ययन 'लोकसार' के पाँचवे उद्देशक में कुछ सूत्र आए हैं, जिन्हे हम इस पहेली के निष्कर्ष मान सकते हैं ।मूल भाषा प्राकृत है । उनकी हिन्दी इस प्रकार है ।
4 - श्रद्धालुओं में सम्यक अनुज्ञा में सम्प्रवर्जित -
सम्यक मानते हुए एकदा सम्यक होता है ।
असम्यक मानते हुए एकदा असम्यक होता है ।
असम्यक मानते हुए एकदा सम्यक होता है।
सम्यक मानते हुए एकदा असम्यक होता है।
5- सम्यक मानने वाले को सम्यक अथवा असम्यक अथवा सम्यक होती है उत्प्रेक्षा
6 -असम्यक मानने वाले को सम्यक अथवा असम्यक अथवा असम्यक होती है उत्प्रेक्षा
पाठक इस चर्चा से क्या निष्कर्ष निकालेंगे , यह मै उन पर छोड़ती हूं ।
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यह विषय मुझे प्रिय है इसलिए मैने थोड़ा-बहुत लिख दिया अन्यथा मौन रहना सर्वोत्तम सुखद है ।
सोमवार, 24 जुलाई 2023
राहुल गांधी जी के वीडिओ-6
स्मृति के आधार पर-
राहुल गांधी जी का वैष्णो देवी की यात्रा का वीडियो देखा था। बहुत साल पहले की बात है ।इस वीडियो में रास्ते में एक हिंदू श्रद्धालु की बातचीत दिखाई गई है, इसमें वह आदमी कह रहा है- वैष्णो देवी माता ने बुलाया है राहुल जी को दर्शन करने के लिए।इसलिए वे जा रहे हैं । नहीं बुलाया होता तो नहीं जा सकते थे ।
जो लोग भी वैष्णो देवी माता की दर्शन करने जाते हैं उनमें यह एक सामान्य विश्वास है ।हम भी तीन बार गए हैं।
अच्छा! श्रद्धालु इस विश्वास से जुड़ी कहानियां नहीं बताना भूलते। जब हम गए थे ।एक व्यक्ति ने हमें यह बताया था कि एक डेढ़ सौ किलो का आदमी पैदल चला गया उसे कुछ नहीं हुआ- क्योंकि माता ने उसे बुलाया था ।
और एक पतला सींक सा आदमी जिद कर रहा था मैं जरूर जाऊंगा रास्ते में ही हार्ट अटैक हो गया । इसलिए वापिस उतारना पड़ा - क्योंकि माता ने नहीं बुलाया था।
हम उनकी बातें सुनते रहे ।हमारे पास इन बातों की पुष्टि का उपाय था ?
कुछ बातें किन वजहों से याद रह जाती हैं कोई नहीं जानता। यह वीडियो मुझे उस श्रद्धालु की मासूमियत की वजह से याद रहा।
ओह ! ये श्रद्धालु कितने मासूम होते हैं -मेरे मन ने कहा ।
और कितने वल्नरेबल भी-मेरी बुद्धि ने कहा ।
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