मुझे लगता है अब ख़त्म करते हैं |
इससे आगे की कहानी मेरी और जे डी की कहानी है |यह कहानी बहुत दिलचस्प
,गहरी और असीम है ,अगर पाठकों को सुनने में रस आ जाए तो |पर अभी नहीं | शायद अभी
इसका वक्त नहीं |जब वक्त आएगा तो यह कहानी जरुर सुनाऊंगी ,अगर मेरे दोस्त चाहेंगे
और कहेंगे तो ...
चलते चलते इतना और बता दूँ कि २००० -२ के बीच तक ऐसा हुआ कि मुझे लगा
था कि मुझे गुरुओं का साथ मिले तो मैं संयम पथ पर चल सकती हूँ |मैंने रामप्रसाद जी
म से कहा |पर गुरूजी ने मना कर दिया |मैंने पलट कर यह नहीं पूछा की क्यों ? उनकी
ना को उनकी आज्ञा माना |
बाद में मुझे कई बातों का पता चला |
मुझे पता लगा की जो साल मेरे लिए आध्यात्मिक आनंद का सर्वोत्तम साल था
,दरअसल स्वयं गुरूजी के लिए वह अपार
पीड़ादायक था |वे उसी साल अपने चिर सहयोगी गुरुभाई से अलग हुए थे |उनके संघ का
विभाजन हुआ था |उनका हृदय पीडाओं का महासमुद्र था और वे ऊपर से हम जैसो को
मुस्कुराहटें गिफ्ट देते थे |
मुझे पता लगा संतों की राजनीति का,गंद-फंद ,चाले |धार्मिक वेश में
लिपटी निपट सांसारिकता |
..................................
.......................................जाने दो |
एक बात और है |मुझे धर्म की फूफी बनने का कोई शौक नहीं |सच कहूँ तो इस
मामले में मैं कभी बोलना ही नहीं चाहती |
हिंदी जनता धर्म के उपदेशकों के प्रति अति-कठोर नजरिया रखती है |वह
कहे हुए और आचरण में एकरूपता की मांग करती है |या तो आप इतने सबल हो कि आचरण की आड़
में भावनाओं का दोहन कर सकें अन्यथा यह आपको बख्शती नहीं |इस मामले में हिंदी समाज
की जड़ता देखकर मैं सूखे पत्ते की तरह कांप जाती हूँ |
मेरे महावीर स्वामी ने तो ऐसी कोई बंदिशें नहीं दी |महावीर स्वामी के प्रवचन
सुनकर कोई साधू बनते थे ,कोई श्रावक बनते थे ,कोई सम्यग् दृष्टि प्राप्त करते थे
|भगवन तो सभी को एक उत्तर देते थे ‘अहासुयं देवानुप्पिया - हे देवों के प्रिय ,जैसा तुम्हारी आत्मा को सुख हो ,वैसा करो |पर
धर्म कार्य में विलम्ब मत करो “
अभी तो मेरे लिए यही शक्य है कि मैं अपनी समकित अर्थात समझ को विशुद्ध
बनाऊं |