सोमवार, 29 अगस्त 2016

ekks -close

मुझे लगता है अब ख़त्म करते हैं |
इससे आगे की कहानी मेरी और जे डी की कहानी है |यह कहानी बहुत दिलचस्प ,गहरी और असीम है ,अगर पाठकों को सुनने में रस आ जाए तो |पर अभी नहीं | शायद अभी इसका वक्त नहीं |जब वक्त आएगा तो यह कहानी जरुर सुनाऊंगी ,अगर मेरे दोस्त चाहेंगे और कहेंगे तो ...
चलते चलते इतना और बता दूँ कि २००० -२ के बीच तक ऐसा हुआ कि मुझे लगा था कि मुझे गुरुओं का साथ मिले तो मैं संयम पथ पर चल सकती हूँ |मैंने रामप्रसाद जी म से कहा |पर गुरूजी ने मना कर दिया |मैंने पलट कर यह नहीं पूछा की क्यों ? उनकी ना को उनकी आज्ञा माना |
बाद में मुझे कई बातों का पता चला |
मुझे पता लगा की जो साल मेरे लिए आध्यात्मिक आनंद का सर्वोत्तम साल था ,दरअसल स्वयं गुरूजी के लिए वह  अपार पीड़ादायक था |वे उसी साल अपने चिर सहयोगी गुरुभाई से अलग हुए थे |उनके संघ का विभाजन हुआ था |उनका हृदय पीडाओं का महासमुद्र था और वे ऊपर से हम जैसो को मुस्कुराहटें गिफ्ट देते थे |
मुझे पता लगा संतों की राजनीति का,गंद-फंद ,चाले |धार्मिक वेश में लिपटी निपट सांसारिकता |
..................................
.......................................जाने दो |
एक बात और है |मुझे धर्म की फूफी बनने का कोई शौक नहीं |सच कहूँ तो इस मामले में मैं कभी बोलना ही नहीं चाहती |
हिंदी जनता धर्म के उपदेशकों के प्रति अति-कठोर नजरिया रखती है |वह कहे हुए और आचरण में एकरूपता की मांग करती है |या तो आप इतने सबल हो कि आचरण की आड़ में भावनाओं का दोहन कर सकें अन्यथा यह आपको बख्शती नहीं |इस मामले में हिंदी समाज की जड़ता देखकर मैं सूखे पत्ते की तरह कांप जाती हूँ |
मेरे महावीर स्वामी ने तो ऐसी कोई बंदिशें नहीं दी |महावीर स्वामी के प्रवचन सुनकर कोई साधू बनते थे ,कोई श्रावक बनते थे ,कोई सम्यग् दृष्टि प्राप्त करते थे |भगवन तो सभी को एक उत्तर देते थे ‘अहासुयं देवानुप्पिया -  हे देवों के प्रिय  ,जैसा तुम्हारी आत्मा को सुख हो ,वैसा करो |पर धर्म कार्य में विलम्ब मत करो “
अभी तो मेरे लिए यही शक्य है कि मैं अपनी समकित अर्थात समझ को विशुद्ध बनाऊं |

   

शनिवार, 27 अगस्त 2016

ekks -10

जे डी की बात सुनकर मुझे रिअलाइज़ हुआ कि उस बिल्डिंग तक की गति सिर्फ यही नहीं थी कि मैने से -3 से ९७२ नंबर की बस पकड़ी और युनिवर्सिटी पहुंच गयी |
इस गति की तह में मेरे कई चुनावी विकल्पों की गतिरुद्धता थी |जे डी की बात सुनकर यह पिक्चर उस दिन मुझे
साफ साफ दिखाई दे गयी थी |
यह था जैन दर्शन में मेरा प्रवेश |
दीपाजी से पहचान हो गयी थी |उन्होंने कहा  राजस्थान की तरफ से उत्तराध्ययन की परीक्षा करा रहे हैं |मैंने भी भर दी |ओपन बुक एग्जाम था |एग्जाम के सिलसिले में कई बार उनके यहाँ जाना हुआ |उन्हें पढाने का बहुत  शौक था |परीक्षा हुई |मैं फोर्थ आई |
 उत्तराध्ययन की परीक्षा के वक्त ही कई बार दीपा जी के साथ रामप्रसाद जी म के पास जाना हुआ |संतों की चर्या होती है कि एक इलाके में आते हैं तो कई साल वहीँ आस पास लगा लेते हैं |वे वहीँ आस पास विचर रहे थे |गुरूजी हमें देख कर  ,खुश हो जाते थे |'हाँ !ये आई हैं तो जरुर कुछ न कुछ प्रश्न लायी है ' उन्हें पढ़ाने का बहुत  शौक था | वे स्वयं आगमों के प्रकांड विद्वान् और कई भाषाओँ के जानकार थे |परन्तु उनका विचरण क्षेत्र अधिकतर हरियाणा ,पंजाब ,दिल्ली था | पंजाब और दिल्ली तो फिर भी ठीक थे पर हरियाणा के गाँवों में उस समय साक्षरता भी नहीं थी |बेपढ़े लोगों के आगे एक विद्वान की विद्वत्ता का क्या मोल ?
समाज अपने गुरुओं से आशीर्वाद की अपेक्षा करता  है |आशीर्वाद दे दो |बस |गुरु का काम भी ख़त्म ,समाज भी मस्त |ज्ञान सीखने की न किसी में चाह है ,न कोशिश |खैर ....

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

ekks-9

जब मैंने रामप्रसाद जी म को बताया कि वीर स्तुति याद हो  गयी तो उन्होंने शाबासी दी ,कहा -वीरता का काम किया है |
फिर गुरुओं के जाने का दिन भी आया |चातुर्मास अधिकतर अक्तूबर -नवम्बर में ख़त्म होते हैं |सुन्दर मुनिजी उलटी गिनती का एक एक दिन गिनते थे |भक्त इमोशनल होते थे |बहने रोने लगती थी |पर  मेरे भीतर ज़रा भी उदासी नहीं थी |मैं प्रसन्न थी ,परम प्रसन्न |मुझे जो प्रसन्नता प्राप्त हुई थी वह इतनी सघन और ठोस थी कि दिल करता था ऐसी प्रसन्नता सब को मिले |ये सब को ऐसी प्रसन्नता देते चलें |
गुरुओं के विहार के दिन उन्हें छोड़ने गए |सड़क के ट्रेफिक से बचाने के लिए मानव-चेन बनाई |
फिर ...........................
फिर क्या हुआ ?.........
फिर विरह हुआ | 6 बजे पार्क में ,सर्दियों के कोहरे में   ,ऐसा लगता था की गुरूजी कोहरे में से निकल कर अभी सामने आ खड़े होंगे |
पाकिस्तान की रेशमा ने गाया है 'चार दिना दा  प्यार ओ रब्बा लम्बी जुदाई  '|यहाँ चार दिन का नहीं चार महीने का प्यार था |खैर ...
सर्दी बीतते विरह कुछ कम हुआ |(ऐसी चीजें ठंडे मौसम में ज्यादा असर करती है  ) मेरा एडमिशन MA हिंदी में हो गया था |पेपर आने वाले थे |मैं वहां लग गयी |मेरी लाइफ में ये  दो चीजें साईड बाई साईड चली हैं |
अब आते हैं जे डी की कहानी पर ,जो अब तक की कहानी में  एक परिचित पात्र तो रहा है ,पर अभी तक उसका ज्यादा रोल नहीं आया है |
पहले छुट -पुट परिचय और बाद में गुरूजी के यहाँ जे डी को देखकर मुझे यह तो पता लग ही गया था कि यह कोई महत्व्पूर्ण आदमी है |
यह उस दिन की बात होगी जब डेढ़ -दो घंटा अलग अलग ,लम्बी लम्बी लाइनों में लगकर आखिर मैंने अपना एडमिशन MA हिंदी में कराया था | सोल की उस पुरानी  बिल्डिंग को और वहां की गंदगी  देखकर मुझे यकीं नहीं हो रहा था कि मैं यहाँ !!!!!(@##%$$^&&*)से MA कर रही हूँ कि यहाँ !!!!!(@##%$$^&&*) से  भी  MA कराई जाती है |
पर क्या निदान था ? मन माने या नहीं पर  यह सच था |पर मुझे झटका बहुत बड़ा लगा था |इतना की ,कुछ देर मैं गुमसुम वहीँ खड़ी रह गयी थी |उस  दिन उमस थी |तभी -
पहले बोले गति चार - नीम के पेड़ के पीछे से एक महीन आवाज़ आई |
हैं ,यह कौन बोला -मैंने मुड़कर देखा तो जे डी वहाँ  खड़े थे| 'अरे आप ,आप यहाँ कैसे ?'
क्या तुम भूल गयी |पहले बोले गति चार |
जी ,क्या मतलब |(जे डी मेरी बातों  के जवाब नहीं देते थे ,बस अपनी बात बताते थे )
मतलब वही ,जो तुमने बचपन में याद किया था |25 बोल का थोकडा |उसका पहला बोल -पहले बोले गति चार |
हाँ वह तो मुझे याद है |पहले बोले गति चार -नरक गति ,तिर्यंच गति ,मनुष्य गति ,देव गति | तो ............?
तो .... आज तुम इतनी आश्चर्य चकित क्यों हो ?तुम गति करके यहाँ आई हो |यह बिल्डिंग तो जहाँ थी वहीँ है |
क्या  मतलब?
मतलब की मनुष्य गति करते हैं |सभी गतियों में जीव गति करता है |गति चार हैं |
..........................हैं !!!!........................हे राम ........हे भगवान .............मुझे उनकी बातें सुनकर चक्कर आ रहा था |उन्होंने मुझे सहारा देकर लाइब्रेरी की तरफ  पैडी पर बिठाया |और मुझ पर रुमाल से पंखा झलने लगे |
इसके बाद वे बहुत देर तक कुछ बोले नहीं |मैं भी नहीं बोली |मैं अभी भी सकते में थी |दो ढाई घंटे हम यूँ ही बैठे रहे |चुपचाप |गुमसुम |शाम हो रही थी |मैं बस लेकर घर आ गयी |यह थी जे डी से मेरी लम्बी दोस्ती की पहली मुलाकात |
थोकडा - जैन शास्त्रों में जो भी दार्शनिक विषय आये हैं ,आचार्यों ने उनका संग्रह करके संक्षिप्त में याद  करने योग्य थोकडो में बना दिया है |इन्हें  जैन दर्शन की ABCD समझिये |  

सोमवार, 22 अगस्त 2016

ekks -8

ekks -7 एक रियलिटी चेक था ,पाठकों को पवित्रता के ओवरडोज़ से बचाने के लिए ;वर्ना 1997 में मेरी भावनाएं ,जैसा मैं लिख रही हूँ वैसी ही थी |मैं तो मौका देखती रहती थी गुरुओं के पास जाने का |
दिन में तीन बजे के लगभग मैं पाठ सीखने जाती थी | एक सामायिक जितने समय ,48 मिनट ,में मैं सेठजी के पास बैठती ,गुरूजी मुझे गाथा (श्लोक संस्कृत में कहते है |प्राकृत में गाथा होती है |उस दौरान मैंने वीर-स्तुति याद  की थी |यह जैन शास्त्रों के एक मूल शास्त्र का छटा अध्ययन है | )पढवा देते थे |मैं वहीँ बैठ याद करती थी |
इस दौरान ही मैंने सेठजी को ,उनकी दिनचर्या को इतने करीब से देखा था |वे एक लकड़ी के पाट पर बैठते थे |अधिकतर कोई किताब पढ़ते रहते थे ,या माला पिरोते थे ,या संतों के पीने के पानी की संभाल करते थे | किसी गर्म दिन में पानी को ठंडा करने के लिए भरे हुए पानी के पात्र में से एक साफ़ कपडे की पट्टी लटका दो ,पानी बहकर ,ठंडा होकर ,नीचे के पात्र में गिरता रहेगा  |या पानी से भरे पात्र को एक कपडा लगाकर दो ईटों या दो पात्रों के बीच में टिका  दो ,हवा लगकर पानी ठंडा होता रहेगा |सेठजी इन्ही कामों में लगे रहते थे |कभी अपनी चादर सील लेते थे |
इस तरह बैठे हुए ,भक्त आते ,उन्हें वंदन करते ;कोई कहते मांगलिक कृपा कर दो तो मांगलिक सुना देते थे |मांगलिक एक चार-पांच लाइनों का छोटा सा पाठ है जिसमे अरिहंत ,सिद्ध,साधू की शरण को मंगलकारी बताया गया है |कोई आते अपनी कोई परेशानी उन्हें बताकर पूछते ''यह काम होगा या नहीं ''| गुरूजी के मन में उस समय जैसा भाव उदय होता ,वे वैसा ही बता देते |भक्त संतुष्ट होकर चला जाता |फिर कोई आता ,वंदना करता ,कहता मांगलिक कृपा कर दो तो मांगलिक सुना देते थे |
कोई १५-२० दिन लगे होंगे मुझे वीर-स्तुति याद् करने में |इस बीच उनकी चर्या रोजाना ऐसी ही थी |पहले पहल तो मुझे इस चर्या से घबराहट सी हुई 'हाय हाय !क्या ये इन्सान नहीं ,जो हर कोई इस तरह इनके यहाँ सर उठाए चला आता है |क्या ये कभी इरिटेट नहीं होते ,कभी थकते नहीं ,कभी इनका जी नहीं उचटता इस जंजाल से कि छोड़ कर भाग जाऊं कहीं '
पर थैंक गॉड अपने मन के ये भाव मैंने मन में ही रखे ,कहे नहीं |मेरी हिम्मत ही नहीं हुई |
धीरे धीरे मुझे सेठजी में ,उनकी शांति में- संत का ,संतत्व का सार दिख गया |यह शान्ति ही तो संत है |यह शांति ऐसी थी जैसी हिमालय के पहाड़ों की या महासमुद्रों की  होती है -विराट  ,असीम ,गंभीर ,गहन ,ठोस ,अकंप |

   

रविवार, 21 अगस्त 2016

ekks-7

भक्ति भावना के इस ऊँचे पायदान पर पहुंचकर भी ,संदेहों की या कहूँ अपनी जमीन  आसानी से न छोड़ने (मैं इसे जमीं न छोड़ना कह रही हूँ ,बल्कि सच तो यह है की उस समय मैं स्वयं अपनी जड़ों की तलाश में थी )की मेरी फितरत वैसी ही थी |
भगवन शब्द के प्रयोग पर मैंने सोचा 'गुरूजी का कोई कुसूर नहीं |यह तो भक्तो की मूर्खता है '|
धर्म के बारे में मैंने सोचा कि अहिंसा -ब्रह्मचर्य वगैरह यह जो बातें हैं ,वे धार्मिक बाना पहनकर निभानी तो आसान हैं क्योंकि एक बने बनाये समाज का इंफ्रास्ट्रक्चर आपकी मदद करता है (मैं सही भी थी ,गलत भी |पाठकों के आगे वह कहानी भी कभी आएगी ) पर असली सांसारिक लोगों के आगे इन सिध्दांतों की आजमाइश हो तो पता चले कि धर्म कितना दमदार है |यह थी मेरी साल 1997 की आलोचनात्मक सोच | .............................

उसके बाद ५-4-१६ ,यानि अभी अभी की , की पर्सनल डायरी की यह टिप्पणी देखिये | टिप्पणी तो यह बहुत बड़ी है ,सारी  लिखनी तो संभव नहीं |कुछ अंश देखिये -लेकिन जो धर्म तूने सीखा है ,जो तप तू कर रही है ,जो ज्ञान तू  सीख रही है -वह बिलकुल सही है ,उत्तम है ,परम उत्तम है ,मंगल है ,कल्याणकारी है -आज इस शुभ ,सफ़ेद ,स्फटिक  ,ठंडी ,चमकदार भावना  को मैंने फील किया |..................एक्चुअली धर्म के क्षेत्र में मेरी एंट्री ही इस डाउट के साथ हुई थी कि धार्मिक बाना पहने लोगों के लिए धर्म  की बात करना ,उपदेश देना सरल है |एक्चुअल संसारी टेढ़े लोगों के आगे धर्म निभाना कठिन होता होगा |वहां इसकी टेस्टिंग हो तो पता चले |
हो गया टैस्ट !हो गयी पास !धर्म भी पास हो गया !मैं भी पास हो गयी !  

दोस्तों !इन दो बातों  में लगभग २० साल का फासला है |इस बीच मैंने बहुत कुछ देखा ,जाना ,पढ़ा ,गुना |मैंने धर्म भी देखा और  धर्म के नाम पर गिलाजत को भी देखा |अब मैं दोनों को अलग अलग पहचान सकती हूँ |
 धर्म एक प्रकार का साहस है या कहें  साहस ही धर्म है जो इन्सान को हर प्रकार की नाइंसाफी ,अपमान ,अत्याचार ,गन्दगी .गिलाजत से लड़ने की शक्ति देता है |आज के युग में इसका चेहरा बदल गया है |अब यह सिर्फ धार्मिक बानों में सजकर नहीं आता ,बल्कि फेसबुक ,ट्विटर ,अख़बार ,पत्रिका - जहाँ कहीं भी कोई लड़ रहा है , वहां धर्म मौजूद है |बल्कि जो लड़ाइयाँ अनजाने में धर्म के खिलाफ समझ कर लड़ी जा रही हैं ,वे  लड़ाइयाँ भी धर्म में आई विकृतियों के खिलाफ हैं ,अतः धर्म हैं |
मैं लकी थी कि मुझे यह सहारा धर्मगुरुओं में मिल गया |लड़कियों के मासिक के खुलेपन की बातें , धर्म में आई विकृतियों की बातें ,जो आजकल फेसबुक पर चलती हैं ,हमने खुद गुरूजी के मुंह से सुनी |
सुन्दर मुनि जी कहते थे -दुनिया की सारी नहीं तो तीन चौथाई मुश्किलें हल हो जाएँ ,अगर इन धार्मिक गुरुओं का मुंह बंद हो जाए तो उनकी बात पर रामप्रसाद जी ऐसे हँसते थे जैसे बजते हुए सितार का तार समूचा झनझनाता है |(हाँ ,देखो न |यह शरीर की भाषा ही तो कहती है कि वे इस जोक पर पूरे सीरियस थे |नहीं तो सभा में लोगों को हंसाने का यह भी एक चुटकुला ही समझिये )
अपने प्रवचनों को कहते थे कि बंदरो को पीछे लगाये रखने की गोलियां हैं ,कई बार कहते तुम मे (गृहस्थियों में )और हम मे कोई फर्क नहीं ,सिवाय वेश के | हमारी इसलिए निभ गयी क्योंकि हमारा जमाना और था |मैं धार्मिक गुरु हूँ ,मेरा फर्ज है -धर्म का प्रचार करना ,पर आज के जो हालात हैं ,उनमे मैं किसी को साधू बनने के लिए नहीं कहूँगा |ये शब्द हैं एक गुरु के जिसका जीवन शास्त्रों पर टिका है |वह ऐसी बात कह रहा है |उसे ये बातें कहने में अपने भीतर कितना साहस लाया होगा | जहाँ हो ,वहीँ रहो |जितना पले  ,उतना पाल लो  इत्यादि बातें इशारा करती है कि धार्मिक बाना पहले लोगों के लिए भी धर्म का पालन करना सरल नहीं रहा |

शनिवार, 20 अगस्त 2016

ekks-6

एक दिन ख्याल आया गुरुओं को कुछ दान दूँ। उनके पास अपनी भावना रखी। सेठजी बोले ' कुछ नहीं चाहिए '.
हां ,इन्हें क्या आवश्यकता होगी। हज़ारों रुपयों की दवाइयां लोग इनके पैर सहलाकर दे जाते है। यह तो मैंने देखा ही था। पर अपने मन में उठ रही उमंग का क्या करूँ। इसे कैसे रोकूं ?(ये छोटे छोटे प्रसंग भक्ति नामक भावना के उत्ताल वेग को दिखाते है )
तो फिर भी ,मैंने 5 पैन (क्योंकि वे लोग ५ ही थे  ) ख़रीदे और पहुंच गयी चरणों में।
राम प्रसाद जी बोले -सेठजी से पूछ ले। उनके पास यही ट्रिक थी मुझे टरकाने की। सेठजी का जवाब तो पहले से मालूम ही था। पर फिर भी दोबारा जाकर अर्ज़ की।
गुरूजी बोले -मुझे तो जरुरत नहीं। मैं तो कुछ लिखता नहीं कभी। (वे प्रवचनकार नहीं थे। प्रवचनकार संत डायरी बनाते है ,कविता ,गीत ,भजन ,शेर  वगेरह नोट करते हैं। उन्हें पैनों की आवश्यकता पड़ती है )
गुरूजी ,रख लो प्लीज। मेरी भावना है।
वह तो ठीक है। पर मुझे जरुरत नहीं।
फिर भी मैंने ढीठता दिखाई और पैन उठाए नहीं। पर एक दो बार गुरूजी के कहने पर उठाने ही पड़े। कितनी अवज्ञा करती।
आते हुए फिर रामप्रसाद  जी को फिर पूछा। वे स्वयं कोमल प्रकृति के संत थे। उनसे स्वयं ज्यादा ना -नुकुर नहीं होती थी। पर उन्हें अपनी चर्या भी तो देखनी थी। इसलिए वे दूसरे संतों पर बात को टाल  देते थे। इस बार उन्होंने सुन्दर मुनि जी का नाम ले दिया।
बाप रे उनसे कौन पूछेगा ? आखिर वापस घर आ गयी।
उसी साल मुझे दीपा आंटी भी मिली थी। वे भी जैनिज़्म की अच्छी जानकार थी। उन्हें बात करने का शौक बहुत था। उनसे बात करना अच्छा लगता था |वे रामप्रसाद जी से कई प्रश्नों के समाधान पूछतीं ,साथ में मैं भी चिपक लेती थी ;यह देखना आँखों का ,मन का ,आत्मा का एक सुकून ही था कि दो ज्ञानी आपस में कैसे बात करते हैं ?उस आँखों से छलकते आनंद को शब्दों में बताया नहीं जा सकता |वहीँ जे डी भी बैठते थे |वे दीपा जी को देखकर मुस्कुराते थे ,दीपा जी उन्हें देखकर मुस्कुराती थी ,भगवन दोनों को देखकर मुस्कुराते थे ,मैं तीनो को मुस्कुराते देखकर मुस्कुराती  थी |
उसी साल सुन्दर मुनि जी ने पोलियो का कैम्प भी लगवाया था |इस सिलसिले में भी दीपाजी से जान पहचान  बढ़ गयी थी |कैम्प में वोलंटियर के काम में भी बहुत उत्साह दिखाया था | 

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

ekks-5

एक दिन ख्याल आया कि कितना अच्छा हो अगर मैं सेठजी को अपने हाथ से आहार बहराऊँ | पर सेठजी तो वृद्ध थे ,वे तो आहार के लिए उठते ही नहीं थे |तो मैंने अभिग्रह की तपस्या धारण कर ली |अभिग्रह तपस्या का वह स्वरुप है जिसमे अपने मन में धारण की हुई किसी धारणा के पूरा हो जाने पर ही इसे खोलते हैं |
एक दिन ....
दो दिन .......
तीन दिन........निकल गये | गुरुओं को चिंता हुई कि यह क्या माजरा है | चौथा दिन भी आया |तब तक बहुत कमजोरी आ गयी |राम प्रसाद जी हंसने लगे 'तूने तो मरने का इंतजाम कर लिया ' |
सेठजी के पास गयी तो बोली -आज का पच्क्खान (नियम ) भी करा दो जी |
जान तो थी नहीं |मरियल सी आवाज निकल रही थी |
सेठजी बोले -आज का करा देता हूँ कल खोल लेना |
नहीं ,अभी मेरा अभिग्रह पूरा नहीं हुआ |
अच्छा  ,अगर पूरा न हो तो तेले (तीन दिन की तपस्या )के बाद खोल लेते हैं |(गुरूजी ने हिसाब लगाया और यह कहकर मुझे बहका दिया )
अच्छा ,खोल लो |पाप तो नहीं लगेगा |
नहीं नहीं ,कोई पाप नहीं |
ठीक है कहकर मैंने गुरु आज्ञा पालन मैं ही अपनी भलाई समझी |सेठजी जाने  ,उनका काम जाने|
बाद में , उनके यहाँ एक संत है सुन्दर मुनिजी |उन्होंने  ने हमारे पडोसी भैया से पूछकर अभिग्रह का राज  निकलवा लिया |वे खूब हँसे पर गुरुओं ने भावना के निर्दोषपन की बड़ाई भी मानी |   

बुधवार, 17 अगस्त 2016

ekks -4

जे डी की कहानी के साथ गुरूजी की कहानी भी आ गयी है।
चातुर्मास पूरा होते होते मुझ पर गुरूजी का रंग चढ़ने लगा था। नित नए ख्याल आते थे।
एक दिन ख्याल आया की मुझे गुरु धारणा लेनी चाहिए। सब लेते हैं। तो पहुंच गयी सेठजी के पास।
 पर ये क्या। येल्लो ,हो गया बिस्मिल्ला ही गलत !
सेठजी बोले मैं तो किसी को गुरु धारणा देता नहीं।
अयं ,हमने तो गुरुधारणा दिलाने के लिए संतो को लोगों के पीछे पड़ते देखा है। ये कैसे गुरु हैं ?
खैर !मन मार के राम प्रसाद जी के पास गयी। वे बोले ' अरे मैं कहाँ ?ये तो सेठों के काम हैं। मैं तो छोटा मोटा आदमी हूँ ?' सुनकर बड़ी हंसी आयी। हाँ मोटे तो  आप हैं ही।
फिर सेठजी के पास गयी। उन्होंने फिर न कह दिया।
फिर राम प्रसाद जी के पास आयी। उन्होंने कहा मेरा नाम ले दियो ,दे देंगे।
फिर सेठजी के पास गयी। फिर ना हो गयी। इसी तरह यह खेल १५-२० मिनिट तक चलता रहा। आखिर राम प्रसाद जी का दिल पसीजा की क्यों बच्ची के चक्कर लगवाए।
तो पूछा -क्यों लेना चाहती हो ?
जी ,सब लेते है।इसलिए |
इससे पहले किसी की ली है।
नहीं
अच्छा कहकर समकित का पाठ सुना दिया। हो गयी गुरु धारणा।
हो गयी जी ?
हाँ
बस यही होती है ?
हाँ ,एक बात का ध्यान रखना। जीवन में कभी आत्महत्या नहीं करनी। (हैं जी ,मैं डर  गयी। कहीं गुरूजी को कुछ भविष्य तो नहीं दिख गया | यह तथ्य संत वचनों का आम जन मानस पर प्रभाव को बताता है |खैर )
क्यों जी ,ऐसा क्यों कह रह हो आप ?
कुछ नहीं गुरुधारना देते हुए हम यह नियम सभी को कराते हैं |(सुनकर जान में जान  आई ) अगर जीवन में कभी ऐसा मौका आये तो यह कदम नहीं उठाना ,पहले हमारे पास आना है |
जी
नियम करा दूँ
करा दो जी |जी मैंने सुना है साल में एक बार अपने गुरु के दर्शन जरुर करने पड़ते है |(भाषा देखिये ,कैसा बोझ भरा है इन शब्दों में )
 हाँ ,कई लोग कराते है यह नियम ,पर मैं नहीं कराता |मैं किसी को बांधता नहीं |
सुनकर गुरु की उस अकिंचन छवि से मन अपने आप बंध गया | मुझे संतुष्टि नहीं हो रही थी |जन्म -जन्मान्तरों को बदल देने वाली अलौकिक घटना इतनी छोटी सी कैसे  थी ?मैं कुछ और भी करना चाहती थी |कुछ बड़ा ,कुछ महान |
मैंने  अर्ज की 'जी और कोई नियम भी करा दीजिये '
ले ले जो तेरा मन हो |
कुछ ज्ञान तो था नहीं |सो आजीवन अरवी की सब्जी का त्याग  कर लिया |



मंगलवार, 16 अगस्त 2016

ekks -3

1996 की बात है। जुलाई के आस पास मैं अपने घर के छज्जे में खड़ी थी।स्थानक की बिल्डिंग में झाड़ बुहार देखी तो मम्मी ने बताया कि  सेक्टर  -३ ,रोहिणी की स्थानक में सेठजी का चातुर्मास घोषित हुआ है। मैं बहुत खुश हुई। राम प्रसाद जी का नाम तो बचपन से ही सुनते आये थे। चलो अच्छा है। अब देखने का मौका भी मिलेगा। उस समय मैं थर्ड ईयर में थी।
चातुर्मास में क्रम बना। सुबह प्रार्थना में जाना ,फिर प्रवचन में जाना ,दिन में कुछ पाठ सीखने  जाना। पहले पहल जब मैंने लोगो को राम प्रसाद जी महाराज को भगवन कहते सुना तो मेरे मन में आया कि इन लोगो को शरम नहीं आती ,खुद को भगवान कहलवाने में। कॉलेज की शिक्षा से शिक्षित उस समय मैं इतनी पठ्ठी तो हो ही गयी थी जो ऐसी बातें सोचती।
20 -25 दिन बीतते न बीतते ,मेरे भीतर गुरुओं के प्रति आकर्षण पैदा होने लगा। राम प्रसाद जी के प्रवचनों का जादू ऐसा था की इधर वर्षा की झड़ी लगती थी ,ठंडी हवाओं से तन शीतल होता ;उधर जिनवाणी से आत्म के संताप दूर होते नज़र आते थे। वे प्रवचन करने के महारथी थे। शास्त्र के मूल पाठ ,उद्धरण ,कहानी ,दृष्टांत ,ढाल ,भजन ,शेरो शायरी -माने हर प्रकार के श्रोता को रिझाने का पूरा सामान उनके पास था। भजनों को स्वयं इतने मधुर गले से गाते थे ,की जिस फ़िल्मी तर्ज पर वह भजन उठाया था ,वह तर्ज याद ही नहीं आती थी और श्रोता नयी तर्ज में डूब जाते थे।
उन्ही की प्रवचन सभा में मैंने जे डी को दोबारा देखा। आदमियों की तरफ बैठे एक पतले ,सांवले युवा को भगवन को निहारते देखा तो मुझे उस समय लगा तो जरूर था की यह जे डी ही है ,पर उस  समय मैं कुछ बोली नहीं। बल्कि कभी ही नहीं बोली। मुझे क्या ?होगा। पर प्रवचन में बैठे हुए उन दिनों उसके चेहरे पर अपूर्व संतोष दीखता था। हो सकता है उसने भी मुझे देखा हो। खैर

रविवार, 14 अगस्त 2016

ek kahani ki shuruaat -2

तो हमारा जे डी दिखने में ऐसा है की किसी ऊँचे खानदान का चश्मे- चिराग लगता है।
दोस्तों ,आपने अपने जीवन में जिस किसी सबसे ग्रेसफुल इंसान को देखा हो तो आप अपनी कल्पना में उसे जे डी मान लेना।
ये पतले से हैं ,थोड़े सांवले हैं। वैसे ज्यादातर मौन ही रहते हैं (  समझ गए न !) पर जब कभी रौ में आते हैं तो उस समय जे  डी का तेज संभाले नहीं संभालता। उस समय इनकी वाणी में संसार भर का ज्ञान बोलता नज़र आता है।
जे डी से मेरी मुलाकात यूँ कहने को तो बचपन में ही हो गयी थी ,जब मैंने गुरुओं के पास बैठकर सामायिक के नौ पाठ और २५ बोल का थोकडा इत्यादि सीखा था। पर वह मुलाकात तो ऐसी थी की मानों दो घरों के बच्चे कहीं शादी में मिल गए। .दोनों ने मिलकर टिक्की खा ली ,आइसक्रीम खा ली ,पानी लिया ,स्टेज के पीछे जाकर दुल्हन के ऊपर फूल फेंक आये। बस। .फिर अपने अपने घरों में चले गए। पर ऐसी मुलाकात से भी पहचान की स्मृति तो बनती  ही है। 

शनिवार, 13 अगस्त 2016

Ek kahani ki shuruaat

चलो एक कहानी सुनाती हूँ। कहानीनामा में औरों की कहानियों के लेखे जोखे लिख रही हूँ ,तो सोचा क्यों न एक कहानी मैं भी कहूँ।
उससे पहले यह बता दूँ कि बोलने की आज़ादी को मैं बड़ा कीमती मानती हूँ। मनुष्यों ने आज तक के सफर में जो कुछ भी अर्जित किया है ,वह कहकर (श्रुत परम्परा )ही आगे बढ़ाया है। पर बाकि सभी चीजों की तरह ,आज के समय में ,इसमें भी बड़ी खराबियां आ गयी हैं। तेरा -मेरा ,गुटबाज़ी ,पॉलिटिक्स.... न जाने क्या क्या।इसलिए कहने से पहले अपनापन तो अर्जित करना ही चाहिए।खैर
हम सारी दुनिया को तो बदल नहीं सकते ,मगर अपनी अदबी मित्रता के छोटे से घेरे में तो ऐसी चीजों को बचा सकते हैं ,जहाँ हम एक दूसरे के सबसे निर्मम आलोचक हों (कि हमें इम्प्रूव करने के लिए किसी और की आलोचना की ज़रूरत ही न पड़े ) और एक दूसरे के सबसे बड़े प्रशंसक भी।
तो बात इस तरह शुरू हुई कि एक बार स्कर्ट वाली लड़की ने मुझे कहा कि मैं बहुत कठोर हूँ। उसकी बात सुनकर मुझे मिर्च तो बहुत लगी (दोस्तों ,अपनी बुराई किसे पसंद आती है ) ,पर ठंडे दिमाग से सोचने पर मुझे उसकी बात उतनी गलत भी नहीं लगी। बल्कि मुझे हैरानी हुई कि ऐसी बात उसे पता कैसे लगी।
सच कहूँ ,इसका सही सही कारन तो मैं भी नहीं जानती।मुझे लोगों की शुद्रताएं हज़म नहीं होती। मैं ऐसी ही रही हूँ ,शुरू से ही। जैनिज़्म तो लाइफ में बहुत बाद में आया।
  खैर
पिछली कहानी तो मैं बता नहीं पाऊंगी (क्योंकि उसका कोई शुरूआती सिरा ही नहीं ,जहाँ से बात चलाऊं। हो सकता है ,बीच में कहीं बात -बातों में कुछ आये तो आये ) पर आज की कहानी में जरूर बता सकती हूँ।
इसके लिए एक केरेक्टर की रचना करते हैं। इस केरेक्टर का नाम है -जे डी (जैन दर्शन। )
इस केरेक्टर को मैं अपने दोनों गुरु का मिला जुला रूप दे रही हूँ। ये दोनों सगे भाई थे
सेठजी महाराज - पतले से हैं ,मौन रहते हैं। इनका मौनी बाबा नाम प्रसिद्ध है।इनकी आवाज़ बहुत महीन है।
राम प्रसाद जी महाराज -मोटे थे ,गोल -मटोल चेहरा ,गज़ब के विद्वान् ,कई भषाओं के जानकार ,तेजस्वी ,प्रवचनकार कंटद