15 दिन बाद कॉलेज के लॉन में नीता को पूजा मिली तो पुराने स्कूल की पहचान वाली लड़की को देखकर नीता मुस्कुराई तो जरूर पर शर्म से लाल भी हो गई । पूजा ने भी यह मौका क्यों चूकना था?
हाय! तूने भी इसी कॉलेज में एडमिशन लिया है- पूजा ने पूछा।
हाँ।
कौन से कोर्स में- पूजा ने फट से नीता का पूछा।
बी.ए.पास
अरे!!! का नकली आश्चर्य जताती हुई वह आँखों ही आंखो में पता- चल –गई- ना -अपनी -औकात का एक्सप्रेशन दिखाकर,कुछ देर बाद अपनी पोनीटेल और नया बैग झुलाती हुई इतरा कर निकल गई ।
पूजा वही लड़की थी
जिसे स्कूल के दिनों में नीता कई बार अपनी साइंस स्टूडेंट अतः होशियार- मेहनती- तेजस्वी- ओजस्वी अर्थात कुल मिलाकर
तोप स्टूडेंट होने का गर्व
दिखाती थी। पूजा कॉमर्स की थी और हालांकि उन दिनों में भी वह नीता के घमंड के आगे
झुकती नहीं थी। उसका अपना अंदाज था। वह चुटीली बातों और अपने स्वभाव के मनमौजीपन
से नीता के घमंड को इग्नोर कर देती थी ।
पर आज साल भर बाद जब पूजा को मौका मिला तो उसने यह मौका क्यों
चूकना था| अपने उसी चटपटे अंदाज में हाथ को ऊपर से नीचे करते हुए उसने जब कहा- अरे साइन्स से सीधा आर्ट में ,तो ऐसा लगा मानो
नीता स्वर्ग से सीधा नरक में
पहुँच गई थी और वह तो फिर भी “थैंक गॉड “ पृथ्वी पर थी । नीता के पास इस कटाक्ष
का क्या जवाब था |कुछ भी नहीं| क्या कहती
बेचारी | चुप करके रह गई | पर फिर भी लुटी हुई इज्जत का आखिरी टुकड़ा बचाने के लिए उसने यह कह दिया कि पास
कोर्स में उसका एडमिशन टेम्परेरी है। जल्द ही वह इंग्लिश ऑनर्स में चली जाएगी । इंग्लिश ओनर्स कहते ही नीता ने वही गर्व का भाव महसूस किया। बट इस
बार इसमें वो ताब नहीं थी।
इंग्लिश आनर्स
वाली बात सरासर झूठ भी नहीं थी । इंग्लिश डिपार्टमेंट की हेड ने कई लड़कियों को आश्वासन दिया था कि अगर उनके पहले सेमेस्टर में अच्छी परफॉर्मेंस रही तो वे
उन्हें पुनः इंटरव्यू के आधार पर
विचार करेंगी। पर फर्स्ट सेमेस्टर के छह महीने बीतते –बीतते नीता के ऊपर से इस कोर्स का जादू उतर सा गया। कॉलेज में
आते जाते उसने इंग्लिश ऑनर्स की कई लड़कियों से बात की थी । उसके पूछने पर कि उन्हें कोर्स कैसा लग रहा है ? क्या क्या है कोर्स में?
लड़कियों ने मिक्सड फीडबैक दिए थे ।
ठीक है- एक ने कहा- पर जैसा सोचकर आए थे वैसा कुछ नहीं। मैंने सोचा था इंग्लिश ओनर्स पढ़ना बहुत एक्साइटिंग होगा, बहुत मज़ा आएगा पर वैसा कुछ भी नहीं है। आम कोर्सों के जैसा ही है।
उसकी बात सुनकर नीता समझ गई कि
इंग्लिश ओनर्स लेते हुए इस लड़की ने कैसी कैसी कल्पनाएं की होंगी ?
उसने सोचा होगा कि फर्स्ट क्लास एसी रूम में
स्मार्ट फर्नीचर से सजे किसी क्लास रूम
में किसी पटाखा टीचर के मुँह से फर्राटेदार इंग्लिश में पढ़ना कितना ग्लैमरस होगा। सारी दुनिया इसी
ग्लैमर पर तो मरती है । आज लोगों को
यही ग्लैमर तो चाहिए |वह भी इस ग्लैमर की शिक्षा लेकर उतनी ही ग्लैमरस अर्थात कुल
मिलाकर अलौकिक - दैवीय – प्रभाव युक्त बन जाएगी, जिसकी कृपा की एक दृष्टि पाने के लिए संसार भर के लोग लालायित होंगे। इंडिया में अंग्रेजी पढ़े
हुए लोगों को जो ताकत और सम्मान मिलता हुआ दिखाई देता है ( हालांकि यह सिर्फ अंग्रेजी भाषा की वजह से नहीं होता ) उसकी वजह से आमजन में अंग्रेजी के प्रति ऐसा
आकर्षण पैदा होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
उस आकर्षण के
दबाव में तथा बचपन से अपने पेरेंट्स के दबाव में आए हुए 17 -18 साल के युवा अपने मन में इस तरह की कल्पनाएँ
गढ़ ले तो इस बात में भी किसी को अचरज नहीं होना चाहिए । पहले-पहल नीता ने स्वयं ऐसी कल्पना की थी | पर साइंस का झटका खाकर वह खुद संभल गई थी। अब वह जल्दी बहाव में
नहीं आती थी ।
फर्स्ट ईयर में
वर्ड्सवर्थ, कीट्स है। सेकंड में
अमेरिकी ड्रामा, नोवेल वगैरह है। थर्ड में भी यही कुछ होगा। अमेरिकन लिटरेचर भी है-
एक दूसरी लड़की ने बताया- वैसे इंग्लिश लैंग्वेज बेसिकली तो अंग्रेजों की भाषा है न, इसलिए उनका साहित्य और इतिहास इस कोर्स में ज्यादा है। इंडियन भी है क्योंकि
इंग्लिश में लिखने वाले बहुत से इंडियन राइटर्स भी हैं।
लड़की ने तो अपनी जगह सही जानकारी दी थी। नीता को क्या
करना था, यह तो उसने खुद डिसाइड करना था । अंततः उसने इंग्लिश ऑनर्स ना लेने का फैसला किया क्योंकि एक तो
उसे लगा कि इंग्लिश को लेकर जैसी छवियां उसके दिमाग में है, उनका इस कोर्स की पढ़ाई से
कुछ लेना देना नहीं है। दूसरे साइंस का झटका खाने के बाद उसका मनोबल पूरी तरह टूट
गया था। उसे अपनी पढ़ाई और निर्णय लेने की क्षमता पर जबरदस्त संदेह हो गया था। एक
बार फिर वह रंगीन सपनों में
लिपटी मैली कुचैली हकीकत का सामना
नहीं करना चाहती थी । इसलिए उसने
धीरे धीरे चलते, चीजें स्वयं देखते परखते ,सेफ साइड
रहने का निर्णय किया। वह स्वयं क्या करना चाहती थी, इसकी तस्वीर अभी उसके मन
में स्पष्ट नहीं थी।
एक बार निर्णय
लिया तो फिर नीता ने उस चुलबुली,
चहकती पूजा की कटाक्षों
की भी परवाह नहीं की, जो जब तब कॉलेज के लॉन में या कैंटीन में या
आते जाते, कहीं न कहीं टकरा ही जाती थी ।
तो क्या हुआ मैं पास कोर्स में हूँ ? हजारों लड़कियां इस कोर्स में हैं। साइंस या कॉमर्स स्ट्रीम से चेंज करने वाले भी बहुत है। कोई मैं अकेली
तो नहीं - नीता ने पूजा के कटाक्षों से छिले हुए मन को समझाया ।
बात ऐसी ही थी । वह ऐसी कई लड़कियों से मिली थीं,
जिन्होंने इंटर की पढ़ाई
साइंस या कॉमर्स से की थी। पर अब वे
बीए पास में थी | सीमा ऐसी ही थी ।
क्यों चेंज कर
लिया? पूछने पर उसने मरी हुई आवाज़ में जवाब दिया - बस | 2 साल साइंस पढ़ने के बाद मुझे लगा कि ये सब मुझसे होगा
नहीं। केमिस्ट्री की इक्वेशन | बाप रे बाप।
सांवले रंग ,साफ त्वचा ,मोटी -गहरी आंखों, गोल -मटोल चेहरे वाली सीमा का मासूम इकरार सुनकर नीता को फौरन उससे सहानुभूति हो आई । उसने तुरंत
उसके दिल के दर्द को समझ लिया।
नीता ने उस दर्द का
नामकरण किया था –ज्येष्ठता का गुरु भार । आखिर 2 साल साइंस पढ़ने का इतना अभ्यास तो काम
आया कि अब वह चीजों को साइंटिफिकली वर्गीकृत करके उन्हें समझना सीख रही थी ।यह भार परिवार के सबसे बड़े बच्चे, चाहे लड़का
हो या लड़की, उठाते हैं। बचपन में छोटे
बहन भाइयों की जिम्मेदारी से लेकर, माँ बाप की महत्वकांक्षाओं के भार को।
इनकी कुछ
विशेषताएं बड़ी कॉमन होती है। मसलन ये शीलवान, आज्ञाकारी, अचपल होते हैं । सादा तबीयत के होते हैं । बच्चा चाहे स्वयं 2 साल का हो या 3 साल का, उसके पीछे दूसरा बच्चा होते ही ,वह बड़ा बन जाता है। उसके बाद छोटे के तो सात खून
माफ मगर बड़े बच्चे (जो कि अभी
खुद भी बच्चा ही है)की छोटी से छोटी गलतियाँ भी घर भर की नजरों में
रहती हैं । उनकी 24*7 की मोरल
साइंस की क्लास चालू रहती है । इसी कंडीशनिंग
का असर यह होता है कि ऐसे बच्चे अधिकतर आज्ञाकारी होते है।
ऐसे बच्चे अगर
ज़रा सा भी पढ़ाई में होशियार हो तो वे बड़ी जल्दी मध्यमवर्गीय माता पिता के सपनों -आकांक्षाओं
के घेरे में आ जाते हैं । बच्चे माँ बाप
की आकांक्षाओं को अपनी महत्वाकांक्षा मानकर जी जान लगाते हैं। इनमें कुछ प्रतिशत
सफल भी हो जाते हैं -जो कि होगा ही। कुछ असफल भी रह जाते हैं –जो कि होगा ही । नीता और सीमा का केस असफल प्रतिशत में से था | एक जैसा टाइप होने के कारण जल्दी ही वे दोस्त
बन गईं ।
असफल लोग स्वयं
को कोसते हैं । भरी जवानी में अजीब आत्म- हीनता और टूटते हुए
मनोबल के शिकार हो जाते हैं । एक प्रकार से
जवानी उन पर आती ही नहीं |
वे बेचारे अजीब उधेड़बुन मे जीते हैं । कुछ बनने की
होड़ में लगे रहते हैं ।
मेघा भी ऐसी ही
थी। पर वह खुद और उसके माँ-बाप भी उसे असफल प्रतिशत
में से बाहर निकालने के लिए कृतसंकल्प थे। वह गोरे रंग की ,तीखे नैन-नक्श की ,खासी स्मार्ट लड़की थी |
अरे! मैं तो यहाँ
कुछ दिन के लिए हूँ । यहाँ तो एडमिशन
इसलिए लिया न कि बाई चांस कहीं कुछ ना हो तो साल वेस्ट ना जाए। मेरे पापा की बात चल रही है। एक दो जगहों
पर | किसी न किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में नंबर लग ही जायेगा। फिर मैं तो वहाँ चली
जाऊँगी। जैसे ही नंबर लगा, मैं तो फुर्र ! -मेघा ने तेजी से बताया। उसके चेहरे की चमक और
कॉन्फिडेंस देखकर नीता और सीमा ने ऐसी
हसरत से उसकी ओर देखा मानो वह कोई देवकन्या थी जो उड़ी जा रही थी। और वे अपनी किस्मत के कीचड़ मेँ धँसी हुईं लथपथ वहीं खड़ी थी। वे चाहकर भी उसे छू नहीं सकती थी। उनकी किस्मत में पासकोर्स के नरक में सड़ना ही लिखा था। कुछ दिनों के बाद मेघा चली गई थी ।
एक और लड़की मिली
सुषमा जिससे नीता की दोस्ती हुई । सुषमा ने नीता को बाद में बताया कि बैच की
लड़कियों में उसे नीता ही अपने टाइप की लगी थी। यह कहकर सुषमा हँसी थी ।उस दिन नीता यह तय नहीं कर पाई थी कि
सुषमा ने उसकी तारीफ की है या बेइज्जती |वह एक सहज विश्वासी ,भली लड़की थी | बाद में जब एक बार नीता ने सुषमा का
निम्नवर्गीय कॉलोनी का एक कमरे का घर और कस्बों जैसी गली देखी ,जहाँ एक बच्चा पोटी कर रहा था |वे दोनों पोटी
के ऊपर से टापकर घर मे घुसी थी | तो नीता को इस बात का आश्चर्य हुआ था कि आखिर किस आधार पर सुषमा
को वह अपने टाइप की लगी थी? वे लोग भी अमीर नहीं
थे |पर एक ठीक –ठाक कॉलोनी मे किराये पर रह ले ,उनकी आय इतनी अवश्य थी | खैर।
नीता को सुषमा के स्टैंडर्ड से कोई प्रॉब्लम नहीं थी, पर ‘टाइप’ वाली बात उसे समझ में नहीं आई। आखिर बात का कोई लॉजिक तो होना चाहिए
- नीता ने अपने मन में सोचा। सुषमा शुरू से आर्ट पढ़ती आई थी | वह बहुत महत्वाकांक्षी
थी। वह बीए के बाद ,एमए करके, पीएचडी करना चाहती थी।
कमाल है! तुझमें इतनी पढ़ाई पढ़ने
का स्टैमिना है। दोनों बस का पास बनवाने की लाइन
में खड़ी हुई थी। उसे आश्चर्य हुआ था। डेढ़- पसली की सुषमा के सपनों की उड़ान देखकर।
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सर्दियां आ गई
थी। कॉलेज के लॉन की गुनगुनी धूप और बगीचे के किनारे लगे फूलों की क्यारियाँ नीता को भाने लगी थी। अपने कोर्स की पढ़ाई तो नहीं पर कॉलेज की खुली
जिंदगी उसे रास आने लगी थी । यहाँ किसी तरह
का कोई टेंशन नहीं था। स्कूल की
नियमित जिंदगी की कैद नहीं थी। अपनी क्लास के हिसाब से आने -जाने की आज़ादी थी | मनमर्जी की किताबें पढ़ने की आजादी थी। कॉलेज के परिसर में | परिसर से बाहर।
मैदान में | टहलने- घूमने- फिरने की
आजादी थी । कॉलेज के बाहर सर्दियों
में इलाहाबाद के अमरूद बिकते थे | नीता को उन्हें खाने का बहुत
शौक था । उस समय तक उसने आलोक धन्वा की "आम के बाग" कविता नहीं पढ़ी थी जिसमें कवि ने आम को
भारतीय होने की पहचान के गर्व से जोड़ा है |
“आम जैसे रसीले फल के लिए
भाषा कम पड़ रही है
मेरे पास
भारतवासी होने का
सौभाग्य
तो आम से भी बनता है !” अगर नीता ने यह कविता पढ़ी होती तो वह उसी तर्ज पर एक
कविता जरूर कहती –
“आम जितना रसीला तो नहीं पर
अमरूद का स्वाद भी
करारा ,लाजवाब है |
इलाहाबादी (प्रयागराज वासी ) होने के
सौभाग्य के
अनेक कारणों मे, अमरूद का दावा भी बनता है |”
अपने कोर्स की पढ़ाई से नीता असंतुष्ट थी | उसे अजीब तरह के खालीपन और लक्ष्यहीनता का एहसास होता था । कहाँ तो मात्र छह महीने पहले वह डॉक्टर बनकर अपने पिता की सपनों को पूरा करने के गुरु- गंभीर दायित्व में जुटी हुई थी और कहाँ अब वह बीए पास जैसा हल्का कोर्स करके टाइम पास कर रही थी | उससे लग रहा था कि मानो हार्डवेयर के इंजन से खिलौना गाड़ी चलाई जा रही हो ।कहाँ तो फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स की भारी भरकम प्रॉब्लम्स और कहाँ अंग्रेजी और हिंदी की कुछ आसान कविताएँ |उसे अपनी क्षमता के व्यर्थ होने का एहसास होता था ।
एक और तो यह एहसास सच्चा था। दूसरी ओर अपनी स्वयं की क्षमता पर
संदेह भी सच्चा था। छह महीने, आठ महीने बीत जाने पर भी जब-जब नीता पीछे मुड़कर अपने स्कूली दिनों को याद
करती दिखीं तो कानों पर हाथ लगा लेती थी । ना बाबा ना मेरे बस की नहीं थी साइंस चलानी |-वह अक्सर सोचती |
नीता अपनी
दुविधाएं सीमा से शेयर करती थी,
पर सीमा स्वयं ऐसी ही
मिलीजुली परेशानियों की शिकार थी। वह नीता को क्या समाधान बताती ? बल्कि नीता तो केवल मानसिक तनाव के शिकार थी।
सीमा ने तो अपना हार्डवेयर एक लक्ष्य से हटाकर दूसरे लक्ष्य में लगा दिया था। वह कॉलेज से जाने के बाद शाम को कंप्यूटर कोर्स में जाती थी । उस कोर्स का उन दिनों बड़ा प्रचार था| फीस जरूर महंगी थी, पर कोर्स को करने के बाद
रोजगार पाने की गारंटी का प्रचार कंपनी जोरशोर से करती थी । जल्द से जल्द अपने बच्चों को सेटल करने का और
उनका करियर बनाने की चाह में मिडिल क्लास पेरेंट्स महंगी फीसों की परवाह नहीं करते थे। बच्चे भी जी जान लगाकर
उनकी इच्छाओं का अनुकरण करते थे | और हों भी क्यों नहीं? आखिर कुछ बनने के महान सपने देखकर
ही तो उन्होंने शिक्षा जगत के इस महापथ पर अपने कदम बढ़ाए थे। सीमा की मेहनतकशी देखकर नीता को आश्चर्य होता था और उसके प्रति सहानुभूति भी । उसके मन मे सीमा के
प्रति इज्जत भी बढ़ी पर स्वयं ऐसा कर पाने में उसने अपने आप को अक्षम
पाया।
आखिर तू चाहती क्या है? तू कुछ करना भी चाहती है
या नहीं? सीमा ने झुंझलाकर पूछा | उसे अधिक देर तक पसोपेश में रहना पसंद नहीं था। या इधर या उधर -ऐसा साफ सीधा
मिज़ाज था उसका |
पता नहीं यार
मुझे खुद नहीं पता मैं क्या करूँगी?
मुझे खुद अपने मन का नहीं
पता। सीमा की झुंझलाहट देखकर नीता परेशान तो हुई पर वह क्या करती? अपने मन की अस्पष्टता से वह
भी परेशान थी कि वह सीमा को साफ जवाब नहीं दे पा रही है। उसकी वजह से सीमा भी
परेशान हैं। दोनों चबूतरे पर बैठी थी। अप्रैल के दिन थे। सामने मैदान था। गर्म हवा के चलने से धूल उड़ रही थीं ।फर्स्ट ईयर के पेपर शुरू होने को थे ।
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अर्थहीनता का बोध
मनुष्यों में चिरकालीन है| हर काल हर युग के मनुष्यों ने इस अस्तित्ववादी प्रश्न
का सामना किया है। मैं कौन हूँ?
मेरे जीवन का लक्ष्य क्या
है? नीता भी कभी- कभी इन दार्शनिक प्रश्नों की खोह मे जा उलझती थी |पर ज्यादातर ऐसा तभी होता था
जब कभी किसी बात पर उसका मूड खराब होता था या वह बोर हो रही होती थी या मम्मी से
कहासुनी हो जाती थी | नहीं तो वह मस्त रहती थी। कह सकते हैं उन दिनों
वह पार्ट-टाइम दार्शनिक थी।
दर्शन के प्रश्न
तो चिरकालीन है | ये प्रश्न जिसके हृदय में उत्पन्न हों- उनकी बलिहारी है। इन प्रश्नों का समाधान वही
कर सकता है जो जिज्ञासु हो, गहन चिंतनशील हो| इन दिनों वह अजीब प्रकार का
खालीपन महसूस कर रही थी। जैसे कुम्हार का घूमता हुआ चक्का कीले पर से उतर जाए तो पिछले वेग में वह कुछ देर
तक घूमता है, पर धीरे- धीरे घूमकर रुक जाता है। नीता को ऐसे
ही लगता था कि उसके जीवन का वेग धीमा पड़ रहा है। वह रुकने से पहले उसे वापस कीले पर रख देना चाहती थी। वह जानती थी कीले को और वेग को भी | नीता के पिता वह कीला थे, जिसपर उसका जीवन टिका था। वे भरसक यह चाहते थे नीता अपने जीवन में पढ़ -लिख कर
बहुत रुपया कमाए |
उनकी बेटी की इज्जत हो |सोसाइटी
में सम्मान हो । इसलिए उन्होंने उसे
डॉक्टर बनाने का सपना देखा था।
डॉक्टरी के पेशे
की ओर भारतीय मध्यवर्ग में जबरदस्त आकर्षण है। वैसे तो यह एक समाजशास्त्र के
विद्यार्थी के लिए गहन शोध का विषय बन सकता है। पर फिर भी सामान्य अनुभव के आधार
पर हम भी दो -चार कारण बता सकते हैं।
पहला - ईश्वर के बाद जीवन और
मृत्यु डॉक्टर के हाथ में है। इस तर्क से डॉक्टर तो एक किस्म का भगवान ही हो गया|
अतः एक डॉक्टर के प्रति
इज्जत का भाव, भगवान की भक्ति के बाद, बहुत ऊंचे किस्म का, बड़ा सच्चा और गहरा होता है | यह इस पेशे के प्रति आकर्षण का पहला जबरदस्त
कारण है।
दूसरा कारण भौतिक
है- मरना कोई नहीं चाहता। बीमारी होगी तो डॉक्टर के पास तो आना ही होगा और
आने के बाद फीस भी देनी ही पड़ेगी। इसलिए बारिश कम हो या ज्यादा ,इससे डॉक्टर की
कमाई पर कोई असर नहीं पड़ता। वह तो सारे साल एक सी रहनी है।
विशेषकर लड़कियों
के लिए यह पेशा हर दृष्टि से उत्तम माना गया है | अधिक शारीरिक मेहनत नहीं है,
सुरक्षा की चिंता नहीं है
और काम के घंटे भी कम है। इन सारे कारणों को मिलाकर प्रतिभावान –होशियार- लड़कियों
के लिए मध्यवर्गीय माँ -बाप ये ही सपना देखते हैं। इसके बाद टीचिंग का नंबर आता
है।
नीता के पिता ने
भी नीता के लिए यही सपना देखा था। बचपन से आजतक घर में घुसते ही नीता की खोज खबर रखना, पढ़ाई की पूछना, अच्छे नंबरों पर उत्साहित होना,
कम नंबरों पर गुस्सा करना, फिर ज़ोर देना, 10-12 साल से पिता पुत्री के
बीच वार्तालाप ये ही क्रम चलता आ रहा था | उनके बीच यह एक ही टॉपिक था, बाकी सारी बातें गौण थी।
मतलब की दुलीचंद जी फैमिली के लिए जो भी कर्तव्य निभाते थे, मसलन रुपया कमाना, घर की जरूरतें पूरी करना -यह सब तो दुलीचंद जी को फैमिली और बच्चों के लिए करना ही
था। इसमें क्या बड़ी बात थी? कुछ भी नहीं।
बड़ी बात यह थी कि
नीता लाइफ में क्या करती है? पिता ने तो जैसे- तैसे मेहनत करके जिंदगी काट ली मगर नीता पढ़ लिखकर
अच्छी सम्मानित जिंदगी जिए, इसी में उनके जीवन की सफलता थी। पापा को नीता से यही
चाहिए था। इसी तरह के वेग से उनकी जिंदगी चलती थी। वे हमेशा उत्साहित ऊर्जावान
रहते थे। उत्साह वायरल होता है। पिता को उत्साहित देखकर नीता भी उत्साहित, ऊर्जावान बनी रहती।
नीता ने देखा था
कि उसे किसी बात की कमी नहीं थी।
बढ़िया खाना, बढ़िया पहनना बल्कि पहनाने के शौक तो दुलीचंद जी इतने चाव से पूरे करते
थे | रीझते थे | खुश होते थे कि नीता अपने प्रति पिता के स्नेह से अभिभूत होती
थी। सारा टाइम इतराई रहती थी। ये
स्नेह का भाव उसके लिए कितना कीमती था?
डॉक्टरी का सपना
टूटने के बाद (वह एक अलग कहानी है) पिता पुत्री के बीच उत्साह का वेग ठंडा पड़ गया था । अब तो मानो
उनके बीच बात करने के लिए कोई टॉपिक ही नहीं बचा था। नीता को याद आए वे दिन जब मई- जून की कड़ी दुपहरियों में वह एक
कॉलेज से दूसरे कॉलेज फार्म भरवाती फिरती थी |आखिर इस कॉलेज
में नंबर आया था। पापा उस दिन स्कूटर पर लेकर आए थे।ऐन टाइम
पर सत्यापन की फॉर्मैलिटीज़ का पता चला| दोनों बाप -बेटी स्कूटर पर एक जगह से दूसरी
जगह गजेटेड ऑफिसर को ढूँढते फिरे | आखिर इन
प्रक्रियाओं को पूरा कर जब कॉलेज की शेड के नीचे दोनों सांस लेने बैठे तो पापा के
चेहरे पर संतोष नहीं उदासी थी।
अब तू क्या करेगी? पापा का दिमाग अनिश्चितता के बियाबानों में भटक रहा था |बी ए का क्या है| ये तो कोई भी कर लेता है, इसकी ज्यादा वैल्यू नहीं है?
साइंस की ज्यादा वैल्यू
थी, तूने साइंस लेनी थी –पापा की आवाज मे पछतावा था
| नीता क्या कहती? वह चुपचाप खड़ी रही |
बी. ए. का क्या? उसकी क्या बात करे? वह तो हो ही जानी थी । उसमें कौन सी बड़ी बात थी? जिंदगी खाना –पीना-
सोना के रोज़मर्रा ढर्रे पर चल रही थी । तब ही शायद उन्हीं
दिनों मे नीता ने अपने मन में भयंकर
खालीपन को महसूस किया। उसे लगा कि आज तक पापा ने जो प्यार उस पर लुटाया था, वह उस प्यार की पात्र नहीं थी। यह आत्मनिरीक्षण नीता को कचोटता था और हालांकि
इस मुद्दे की बात के सारे पहलू इतने सरल भी नहीं थे। बहुत से किंतु- परंतु थे बीच में। नीता जानती थीं इन किंतु- परंतुओं को भी| पर सब बातों की आखिरी बात
यह थी कि नीता यह नहीं सह सकती थी कि वह
स्वयं या भविष्य में पापा यह समझे कि जो प्यार उन्होंने नीता पर लुटाया था, वह उसकी पात्र नहीं थी। नहीं,
नीता यह नहीं सह सकती थी ।
मन के अंधेरों के
यही दिन थे शायद जब अन्वी तनेजा मैडम एक रौशनी की तरह चमकी और नीता उनकी ओर आकर्षित होती चली गई। वे हिंदी पढ़ाती थी। अंग्रेजियत के गुमान के
दिनों में एक हिंदी टीचर के अंदर ऐसी नफासत और आकर्षण , नीता ने एक्सपेक्ट नहीं
किया था ।वे युवा ही थी |28 -29 की होगी। पतली-छरहरी ,गोरी रंग की थी | ज्यादा मेकअप
नहीं करती थी । उन्होंने कॉलेज में अभी
ज्वॉइन किया था। सुंदर नैन –नक्श वाले चेहरे पर एक
वर्किंग वुमेन होने का स्वाभिमान झलकता था | क्लास के दौरान नीता
ने उनकी और भी बातें नोट की ,जिनसे
उनके कैरेक्टर के कई खूबसूरत रंग झिलमिलाते थे। अपनी सुंदरता और कपड़ों की पसंद के
कारण वे ग्लैमरस दिखती थीं पर उनका ग्लैमर
बिजली के बल्बों से उत्पन्न रौशनी जैसा आंखो को चुभने वाला नहीं था।सुदृढ़ चरित्र की ताकत से उनमें अत्यंत तीव्र ठोस किस्म का आकर्षण पैदा हुआ था |जैसा आकाश मे चन्द्रमा के प्रकाश के कारण होता है ।
अन्वी मैडम अपने
पेशे के प्रति पूरी निष्ठावान थीं
|समय की पाबन्द थीं | तय समय पर क्लास
में दाखिल होती और तय समय पर निकल जाती । क्लास का 1 मिनट भी व्यर्थ की बातों में जाया करना उन्हें
पसंद नहीं था । उनकी टीचिंग का तरीका नायाब था। जब कॉलेज की टीचरों के एक से बढ़कर एक नमूने
स्वयं नीता ने डेढ़ साल में देख सुन लिए थे, तब अन्वी मैडम का तरीका
उसे आज की शिक्षा और परीक्षा प्रणाली के हिसाब से एक दम लॉजिकल नजर आया। अन्वी
मैडम पढ़ाते हुए बराबर स्टूडेंट्स को किसी टॉपिक की परीक्षा की दृष्टि से
महत्वपूर्णता के बारे में चेताती रहती थी।
सभी महत्वपूर्ण विषयों को उन्होंने बहुत विस्तार से समय लगाकर पढ़ाया था। यह नहीं
कि जिन विषयों में खुद की थोड़ी पकड़ है वे तो घंटो तक खींचते रहें और जिनमें पकड़ कमजोर हैं, उन्हें आधा घंटे में चलता कर दिया ।छंद- विचार जैसा कठिन टॉपिक भी मैडम ने इतने मनोयोग
से पढ़ाया था कि बीए प्रथम वर्ष की लड़कियों को और कुछ नहीं तो आखिर तक मगण – तगण तो याद रह ही गए थे।
अपने विषय में रस
पैदा करना एक टीचर के लिए उपलब्धि भी है और बीमारी भी, अगर समय पर समेटा ना जाए तो| नीता ने
दोनों नमूने देखें थे ।
दूसरे नमूने के
दर्शन तो हालिया ताजा ताजा हुए थे। सेकंड ईयर की हिंदी में ‘बाग में चींटी’ नाम की
कविता थी। उस दिन रोज़मर्रा की क्लास में कुकरेजा मैडम ने जो कविता पढ़ानी शुरू की तो वे चींटी की मेहनतकशी का वर्णन करते करते इतनी भाव विभोर हो गई कि
बात मजदूर वर्ग की मेहनतकशी तक ले गई। बेचारे मजदूर किस तरह जेठ की दुपहरियों में भी चीटीयों के मानिंद इधर से उधर माल
ढोते फिरते है। उस समय उनका अस्तित्व एक विराट पूंजी व्यवस्था में चीटियों जैसा नगण्य दिखाई पड़ता है। पूंजी व्यवस्था किस तरह मानव
मूल्यों का क्षरण करती है, इस व्यवस्था से लड़ने के लिए संसार भर
में कितने महान आंदोलन हुए हैं , कितने महान विचारको ने इस
दिशा में काम किया है ,कार्ल मार्क्स की किताब दास कैपिटल ऐसे अध्येताओं के लिए बाईबल के समान है। स्टालिन जैसा
महान क्रांतिकारी इत्यादि होते- होते, बात कहीं की कही पहुँच गई और घंटी बज गई | मैडम इतनी भाव द्रवित हो गई कि उस दिन वे उस
कविता को पूरा नहीं कर सकी और “बाकी तुम खुद पढ़ लेना”- कहकर क्लास से फूट ली।
क्लास का माहौल बेहद संजीदा हो गया था। लड़कियां अपने दिमाग में मज़दूरों की चींटियों के रूप में कल्पना करके भावोद्वेलित हो रही थी। जिसने जहाँ कहीं भी किसी गरीब या दुखी कामगार को देखा था, उस समय वे अपने मन में उसी की सूरत साकार कर रही थी। मैडम के शब्दों से उनके मन में भावों के तूफान उठ रहे थे। वे काल मार्क्स और स्टालिन जैसे बड़े नामों के झपाटे में आ गई थी।
जिस समय मैडम ने क्लास छोड़ी उस समय वे करुण-रस की भाव-विगलित अवस्था में थी | अगर घंटी थोड़ी देर न बजती तो संभवतः उन बालिकाओं का करुण रस से वीर रस में क्रांतिकारी रसांतरण हो जाता पर कमबख्त घंटी सही समय पर बजी और वे करुण-रस के अधर में ही डूबी रह गई| बाद में कई लड़कियों ने अपने परीक्षा परिणाम को भी डूबा
हुआ पाया।
अन्वी मैडम विषय में रस तो पैदा करती थीं मगर इतना नहीं कि लड़कियां उसमें गोते लगाती रह जाएं और उन्हें बाहर निकलने के ओर –छोर का पता ही न चले।वे तो चखवा भर देती थी। मसलन सूरदास के वात्सल्य पदों को पढ़ाते हुए सहसा मैडम को अपने 3 साल के बेटे की कोई बात याद आ गई और उसे बताकर वे खिलखिलाकर हँस पड़ी | बल्कि वे कुछ देर तक हँसती ही रहीं । रह-रहकर हँसती रही, मानो कोई लहर उनके हृदय को गुदगुदा रही हो। रस की यही तो पहचान है कि इंसान उस में डूबे रहना चाहता है। उस समय उनके आनंदपूर्ण चेहरे का अवलोकन मात्र वात्सल्य रस का साकार चित्र स्थापित करने के लिए पर्याप्त था।
लड़कियों ने न तो मैडम के बेटे को देखा था, ना ही यशोदा और कृष्ण को। पर उस दिन अन्वी मैडम के रस से सिक्त वदन का अवलोकन ये इशारा दे गया था कि अपने नन्हें बेटों की मासूम शरारतों से युवा माएँ इतनी गदगद रहती है। वे खीजती है, झल्लाती है, पर फिर भी इस आनन्द में मगन रहना
चाहती है। इसी में अपने नारी जीवन की उपलब्धि मानती है।
अन्वी मैडम सभी को सहज
उपलब्ध थी। हिंदी कोई कठिन विषय तो था नहीं पर फिर भी लड़कियों की आदत होती है
स्टाफ रूम में पीछे -पीछे चलने की | अन्वी मैडम कभी खींजती नहीं थी। बल्कि एक बार ,दो बार जितनी बार भी
लड़कियां पूछे उनकी कठिनाइयों को धैर्य से समझा
देती थीं। वे अपनी बात की पक्की थी | जिस समय जहाँ कहीं भी
किसी से मिलने का समय देती , उस समय वह अवश्य उपस्थित मिलती। समय देकर न
मिलना और व्यर्थ ही लड़कियों को अपने पीछे लगाए रखकर अपनी लोकप्रियता के झूठे
प्रोफेसरी गंदे दिखावों से वे दूर रहती
थी।
ये ही कुछ बातें
थीं, जिनकी वजह से नीता अन्वी मैडम की ओर
आकर्षित हुई। पापा की निगाह में सफल कैरियर के जो मानक थे अर्थात कम मेहनत और ठीक-
ठाक आमदनी, उन मानको पर भी कॉलेज टीचिंग खरी उतरती थी । “मुझे भी इनके जैसा बनने की कोशिश करनी चाहिए “- नीता ने अपने मन में सोचा तो उसके दिल में गुदगुदी सी हुई और चेहरा आत्माभिमान के दर्प से ताम्रवर्णी हो उठा।
उसी दिन नीता ने
यह शुभ संदेश पापा को प्रसारित किया कि बीए की पढ़ाई इतनी बेकार भी नहीं है।
लेक्चरर बनने का ऑप्शन भी है उसके पास।
“हाँ यह ठीक है, सही बात है | इस नौकरी में ज्यादा घंटे भी नहीं है”- पापा का
चेहरा खुशी से दमक उठा। उनकी आंखें आशा के पानी से सजल हो गईं ।
तेरा बटुआ रुपयों से भरा रहेगा।गाड़ी चलाना सीख लियो | कॉलेज गाड़ी में आइयो –जाइयो ।भारत में शिक्षा का लक्ष्य जिस तरह रूपए कमाने तक सिमट गया है ,उसमें इस तरह की बातचीत पर किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।
नीता ने चैन की साँस ली |पापा पुनः अपनी बेटी के
अफसरी ठाठ के सपने देख रहे थे | उनके चेहरे की रौनक लौट आई थी।लाइफ मे कभी अंधरे मिलते हैं तो कभी रोशनी | कभी –कभी
अनजाने मे मिले हुए संयोग जिंदगी बदल देते हैं |
अभी तो बीए होगी, फिर एमए ,एमफिल,पीएचडी होगी | “क्या बनेगी ?” का
मसला कुछ सालों के लिए सुलझ गया था। शायद तब तक वह भी जान ही लेगी, वह कौन है ?, उसके जीवन का लक्ष्य क्या
है? -सोचते हुए नीता ने चावलों में कढ़ी मिलाई और खाने लगी । दरवाजे के पार दिख रहा आसमान स्लेटी था। मई- जून के गर्म दिन थे |प्रकृति तप रही थी। शाम का समय था |आज पापा जल्दी आ गए थे तो खाना जल्दी लग गया था। मम्मी रसोई में रोटी सेंक रही थी। पापा ने रोटी कड़ी
में लगाकर छोटी को खिलाई।