शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

a tale of not understood hindi sentiments

उस दिन अख़बार में न्यूस पढ़ी  कि विश्विद्यालयों में स्तरीय शोध नहीं हो रहे हैं तो गुस्साई इल्ली से रहा नहीं गया और सीधी विश्वविद्यालय के प्रवक्ता से जा भिड़ी |
इल्ली: सर !भारत में शादी की  उम्र क्या है ?
प्रवक्ता ने  चश्मे के भीतर से देखा और बोले :१८-२० साल |क्यों ?
इल्ली:और शोध पूरा करने की ?
प्रवक्ता: लगभग २८ साल
इल्ली:और माफ़ कीजिये  आपसे तो क्या पूछूंगी ,खुद ही समझ  लें |समझदार को इशारा काफी  |हिंदी फिल्मों को देख-देखकर १०  साल की  उम्र से ही बच्चे कुछ-कुछ समझने लगते हैं |
प्रवक्ता :तो !आप कहना क्या चाहती हैं ?
इल्ली:यही कि क्या आप समझते भी हैं कि २० साल का रास्ता क्या कुछ-कुछ में ही कटेगा |
प्रवक्ता:क्या मतलब?
इल्ली:मतलब ये कि जिनका केरेक्टर ढीला है उनकी तो कोई बात नहीं मगर केरेक्टर वाले लोगों को तो करीयर ,शादी ,पढाई ,नौकरी सभी को बेलेंस करना है |
   प्रवक्ता: ह्म्म्म......तो
इल्ली :तो क्या सर! व्यवस्थापकों को कुछ तो सोचना चाहिए |
प्रवक्ता:क्या सोचना चाहिए ?यही कि प्रत्येक शोधार्थी को सरकारी खर्च पर सपरिवार विश्विद्यालय में आमन्त्रित करके उसके  रहने-खाने का इंतजाम करे और कह   दे कि लगे रहो  भय्ये !जब तक तुम्हारी  अगली पीढ़ी शोध के लिए तैयार नहीं हो जाती !
इल्ली:(लाजवाब हो कर )नहीं सर!
प्रवक्ता : और यह भी कि शोध का क्या है |कौन पढता है ?आप आराम से मजे लीजिये |
इल्ली:नहीं सर !
प्रवक्ता:आप लोगों ने विश्वविद्यालय को सराय समझ लिया है कि जिसका मन आता है मुह उठा का चला आता है |
इल्ली :नहीं सर!   (इल्ली रुआंसी हो गयी )
प्रवक्ता:(नरम पड़ कर) जाइये मेडम अपना घर संभालिये |यह सब आपके बस कि बात नहीं है |
इल्ली:हम्म.... यह सब तो में भी समझती हूँ मगर सर! करीयर ,शादी ,पढाई ,नौकरी के बाद जो जिन्दगी बचेगी उसमें से ऐसा क्या होगा जो हम अपने बच्चों को दे कर जाएंगे |
प्रवक्ता लाजवाब थे |

रविवार, 15 मई 2011

ek hindi bhashi ka ikbaalnaama-2

वे जब पहले पहल मुझे मिले  थे तो बहुत आत्मविश्वास में थे |वे शुद्ध हिंदी भाषी थे |उनके सामने अपनी दिल्ली कि 'भ्रष्ट 'हिंदी बोलते हुए मैं अक्सर हकला जाती थी |बिहार की तरफ का होने के कारन भाषा पर  उनका पूरा अधिकार था |धारा प्रवाह हिंदी भाषा बोलते  थे |हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य के  विषय  में बोलते  हुए पूरी रौ  में आ जाते थे |लाल चेहरा  उत्साह से   तन  जाता  था ,लगता था कि हिंदी के हथियार  से न जाने कौन सा किला जीत लेंगे |लेकिन उस समय भी उनकी आँखों में भूख बड़ी जबरदस्त थी ,स्पष्ट थी |उस समय मैं उनकी तुलना  उस  बच्चे से करती थी जो कुपोषण से ग्रस्त माँ की सूखी छातिओं में बेतहाशा दूध टटोल रहा है |
फिर पठन ,शोध,और अध्यापन के १०-१२ वर्षों के संघर्ष में चेहरे  का तेज मंद पड़ता गया |उफने हुए नाले का पार ढीला होने पर वह अपनी गाद के बीच में बहता है |युवा  उम्र का बेहतरीन हिस्सा बेस्वाद किताबों में बिताकर लगता है कि जैसे ठग  लिए गए हैं |अब तो हालत यह हैं कि तल्खी और विषाद उनके चेहरे पर स्थायी रूप से चस्पां हो गए है |हिंदी भाषा और साहित्य का जिक्र आते ही प्राण हीनता का 'अटेक'सा पड जाता है | ऐसी मुर्दा आवाज में बोलते हैं कि सामने वाले के उत्साह पर सातों घड़े पानी फिर जाये |
हिंदी ने क्या दिया ?यह प्रश्न उनके जीवन का दर्शन बन गया है |
स्पष्ट है कि अब वे हिंदी- प्रेमी नहीं बल्कि हिंदी -पति हो गए हैं और भाषा की मर्यादा की रक्षा अब वे आजीवन प्राणप्रण निष्ठा से निभाते रहेंगे |

बुधवार, 11 मई 2011

ek hindi bhashi ka ikbaalnaama

यह सच है की हिंदी भाषा के लिए मैं इतनी तो क्या उतनी भी चिंतित नहीं होती अगर मैंने हिंदी साहित्य में उच्च शिक्षा नहीं ली होती |उच्च शिक्षा में हिंदी साहित्य का चुनाव अन्य विषयों में विकल्प हीनता  का स्वाभाविक विकल्प था |इसमें सारा दोष अकेले मेरा भी नहीं था |स्कूल के दिनों से अंग्रेजी का इतना शोर सुनते आये थे की हिंदी पढना/सीखना तो अपनी शान के खिलाफ लगता था |लेकिन भारत में सरकारी स्कूली शिक्षा किसी भी तरह एक एवरेज स्टुडेंट को विज्ञान जैसे विषयों में बेहतर प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं कर पाती|अब हालात बदलें  हों तो कह नहीं सकती |
इसी का परिणाम था हिंदी में प्रवेश |लेकिन स्नातकोत्तर कक्षाओं में अपने सहपाठियों को देखा तो लगा की ये मैं कहाँ आ गई ?
इतना डिमोशन !!!!!!!
खैर !
लेकिन जब मैंने हिंदी काव्य और कथा साहित्य को गहराई से पढना शुरू किया तो मुझे लगा की मैं सही जगह आ गई हूँ |आज तक जो कुछ भी मेरे अन्दर अन्भिव्यक्त था उसे भाषा मिल रही थी |
यानि हिंदी तो मैं शुरू से ही थी लेकिन मेरे हिंदीपने को नाकारा जा रहा था |यहाँ हिंदी से मेरा तात्पर्य आत्मसंतोश्पूर्ण, समरसता पूर्ण मिली जुली भारतीयता से है जिसका प्रतिनिधत्व आम   भारतीय जन आज भी करता है |हिंदी भाषा मेरे उस नकारे गए 'हिंदीपने' को सफलता से अभिव्यक्त कर पा रही थी |
मैं हिंदी भाषी हूँ ,यही मेरी पहचान है |हालाँकि आज मैं यह ही मानती हूँ की मेरे अन्दर अब कुछ ऐसा भी है जो शायद इंग्लिश में ही अभिव्यक्त  हो सकता हो ,लकिन मेरा मूल आधार हिंदी का है और रहेगा |इससे आगे हिंदी प्रेमी होने और इन छोटे छोटे लेखों द्वारा हिंदी सेवी होने की ध्रिष्ट्ता को पाठक क्षमा करें  |

बुधवार, 4 मई 2011

a tale of hindi sentiments

ए टेल ऑफ फोर्गौटन हिंदी सेंटीमेंट्स
फूलो-फलो -ग्रो लाइक ए ट्री
हिंदुस्तान के बड़े बूढ़े पहले पांव छूने पर आशीर्वाद दिया करते थे -फूलो -फलो !शब्द क्या हैं जीवन को सही दिशा देनेका मंत्र है !कहते हैं जिसकी दिशा बदल गयी उसकी दशा बदल गयी!इस मंत्र में शक्ति है उगने की और जुड़ने की !बीज अपने अस्तित्व की सीमा में सुरक्षित रहते हुए मिटटी ,पानी,धूपसे जुड़कर उगता है और आगे बढ़ता है !काल बीतने पर एक बड़ा पेड़ बनता है फूलता है ,फलता है ! यही मंत्र इंसान की तरक्की का भी आधारहै \ होना चाहिए |न की आजकल के प्राइवेट स्कूल या कंपनी की तरह जो त्वरित लाभ के अबाधित लोभ पर टिकी है |उनका बदना बासी रोटी पर फफूंद की तरह है जो बदती तो शीघ्र है लेकिन फलती नहीं ,सड़ जाती है |

मंगलवार, 3 मई 2011

a tale of hindi sentiments


ए टेल ऑफ कॉवर्ड हिंदी सेंटीमेंट्स
भाषा व्यक्ति की निजी सांस्कृतिक सुरक्षा है |
संवाद -१ पिता - तू हरियाणवी मत बोला कर
लड़की - क्यूँ ?
पिता - गवारु लगती है
कसमसाई हुई सी लड़की फिर भी नहीं मानती ।
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महानगर में  बीस सालों में इस बीच पिता ने बेटियों को घर से भागते देखा, बहुयों को पीहर मैं बैठे देखा, कोर्ट - कचहरियों मैं तलाक होते देखे |
संवाद -२ शादी शुदा लड़की पीहर मैं आकर बोली-माँ री, तू कित सै ?
सुनकर पिता की आखें संतोष से चमक गयीं | जाने-पहचाने शब्दों की गंध से मन भर गया | बूढी भाषा ने कायर बेटे को बचा लिया था