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माॅरिस नगर, दिल्ली के ias aspirants से बातचीत -
राहुल गाँधी जी ऐसे अकेले राजनेता है जो जहाँ तहाँ जनता के बीच में जाकर उनसे बातें करते , उनकी समस्याएं सुनते नजर आते हैं ।
वैसे तो यह राजनेता बड़े प्रतिस्पर्धात्मक होते हैं । आपस में एक दूसरे के कार्यक्रम ,स्टाइल ,योजनाएं , नारे स्लोगन एटसेटरा सबकी नकल कर के, दूसरे नाम लगाकर पेश कर देते हैं । लगता है उनके इस कार्य में किसी को दिलचस्पी नहीं है ।
राजनेताओं के कार्यक्रमों और इंटरव्यूज को लेकर एक आक्षेप यह है कि यह सब प्रचार के लिए है । अक्सर प्रश्न पहले से तय होते हैं इत्यादि। आज के जमाने मे यह झूठ भी नहीं है ।
राहुल गांधी जी के वीडियो देखें तो यह एक दूसरे तरीके से जनता के अविश्वास की हद लांघते नजर आते है । वीडियो में प्रश्नो -उत्तरों की गहराई यह साबित करती है कि इस चर्चा के द्वारा वे श्रोता को विचार का कौन सा पहलू दिखाना चाहते हैं ।
इस वीडियो में वे माॅरिस नगर, दिल्ली के ias aspirants से बातचीत कर रहे हैं । भारत की शिक्षा प्रणाली की यह खामी है वह अधिकांश बच्चों को टाॅप पाँच जॉब का लक्ष्य देती है । जो उनमे सफल हैं , वे सफल हो जाते हैं। बाकी असफल मान लिए जाते हैं ।
यही मुद्दा वे छात्रों के आगे रख रहे हैं । छात्रों के जवाब और राहुल गांधी जी के प्रतिप्रश्नों (counter question )से इस मुददे से जुड़े कई दिलचस्प पहलू दर्शकों के सामने खुलते हैं ।
आपने यह कैरियर क्यों चुना ? जवाब में अधिकांश छात्रों का जवाब था । इस नौकरी में इज्जत है , पैसा है ।
चलो! यहां तक तो ठीक है। मां -बाप अपने बच्चों के उत्कृष्ट भविष्य की सोचते है । प्रशासनिक सेवा का कैरियर सर्वोत्तम माना जाता है ।अगर ये छात्र मां-बाप या समाज के दवाब में भी आ गए तो यह कोई बुरी बात नहीं है।
बैकअप क्या ? अगर यहां सफल नहीं हुए तो आपका बैकअप क्या है ।आपका प्लान बी क्या है? पूछने पर सब चुप थे । एक छात्र ने कहा कि प्लान बी बनाना ही नहीं है ।
बस यही मुद्दा इस बातचीत का मुख्य मुद्दा है । अगर हम ias coaching कराने वालों या मोटिवेशनल स्पीच देने वालों के व्याख्यान सुने तो वे एकलक्ष्ता, फोकस रहना, एकाग्रता को सफल होने का मंत्र बताते हैं । अगर जीवन में सफल होना है तो प्लान बी ना बनाओ । इससे तुम्हारे प्रयास की एक निष्ठता टूटेगी । विकल्पों मे फँसकर तुम्हारे मन की एकाग्रता खंडित हो जाएगी।
मन की शक्ति को केंद्रित करने की यह बातें अपनी जगह सही हो सकती हैं। लेकिन इनसे परिक्षा का गणित तो नहीं बदल जाएगा । अगर 500 सीटों के लिए 10,000 बच्चे आ रहे हैं तो 9500 का असफल होना निश्चित है। तब वे क्यों जीवन भर अपने आपको असफल मानकर निराशा और फ्रस्ट्रेशन में जीएं ।
जिंदगी गणित है - राहुल गांधी जी छात्रों को यही गणित समझा रहे हैं ।आप कहेंगे - सर जी ! ऑलरेडी भी तो यही हो रहा है । जो असफल होते हैं वे कहीं ना कहीं दूसरी जगह पर चले जाते हैं । जिन्दगी अपने आप इंसान के प्लान बी सी डी ..... बनवा ही देती है ।
हम कहेंगे- हां जी! आपकी बात ठीक है । मगर इस तरह असफल होकर, मन मारकर, उल्टे सीधे गलत समझौते करके , आप एक फ्रस्ट्रेटेड जिंदगी गुजारोगे। खुद अपने पर ,परिवार पर और समाज पर निराशाओं का बोझ उतारोगे । अपने पूरे पोटेंशियल को जाने बिना एक कामचलाऊ नौकरी करोगे और यह सब इसलिए होगा क्योंकि आप इतना गणित नहीं समझ पाए, स्वीकार नही कर पाए कि अगर 500 सीटों के लिए 10, 000 बच्चे आ रहे हैं तो 9500 का असफल होना निश्चित है । इसका यह अर्थ यह नही है कि 9500 अयोग्य हैं ।
बस! एक इस बात से ही जिंदगी ने आपको चलाया या आपने जिंदगी को चलाया ; कर्ता कौन ? का मसला तय हो जाता है ।
मन के रहस्य गहन होते हैं । गलत जानकारी , गलत विश्वास दीर्घकाल तक मनुष्य को सालते रहते हैं । खुशी की बात है कि अंत में एक छात्रा ने इस बात को ज्यों का त्यों समझा ।
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