वस्तुवादी दार्शनिक दृष्टि दर्शन का गहरा तल है । फिजिक्स, एस्ट्रो फिजिक्स टाइप्स ।
चीजें अपनी गति से घूम रही हैं । आप मात्र दृष्टा हो ।स्थितप्रज्ञ।
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इंसानों को मालूम नही है कि उनकी समस्या क्या है , और उपाय क्या है ।
जैसे ये कहा -अनंत लोभ। यह एक आध्यात्मिक दोष है । उपाय है -मर्यादा ।
बट कितनी ?क्या? यह पेचीदा पहेली है ।
इसका गणित इंसान स्वयं सुलझा सकता है । यह आत्म-संयम का विषय है ।
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यह दो जोडी कपड़े रखने का सुझाव नही है ।
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बहुत पहले मैने कभी(संभवतः राहुल गांधी जी की )स्टेटमेंट पढ़ी थी , कि एक सांसद के हाथ में यही है कि वह 8 किमी की रोड बनवा दे । ।😂
मुझे ऐसी ओनेस्टी भाती है । सब बंदों को वस्तुस्थिति का मालूम होना चाहिए।
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ऐसा सुनते थे कि पॉलिटिशियन्स होने के लिए गैंडे की खाल होनी चाहिए , तभी आप सर्वाइव करते हो ।
विरोधियों के प्रहार का तो पता नहीं , बट लोगों की दर्दनाक बातें देखकर ये अवश्य लगता है कि उनका दिल भी जरूर गैंडे की खाल जैसा अति कड़ा होना चाहिए, नहीं तो आप कैसे सर्वाइव करते हो ।
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ब्रूटल आलोचना के समय में लोग कह देते हैं , एक्टिंग है । मैं कहती हूं आप भी कर लो । कम से कम लोगों का दर्द तो सुना जाएगा ।
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बेरोजगारी वाकई में भारत भर की कितनी बड़ी समस्या है , लेकिन इसके समाधान का कोई सिलसिलेवार सामूहिक चिंतन-प्रयास नही है ।
# राहुल गांधी जी के विडियोज़
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उपर्युक्त विडियो की मल्टीलेयर आलोचना -
आम आलोचना - भईया ! जो जिसकी समस्या है , वो उसकी समस्या है ।
पुरूष आलोचना (निन्दा -चुगली टाइप) - हाँ ! सब पता है । डाॅलर मे कमाणा चांवें सब ।
स्त्री आलोचना (निन्दा -चुगली टाइप) - सारी नए सूट पहन री थी ।राहुल जी से मिलने के उपलक्ष्य में ।
ब्रूटल स्त्री-पुरुष आलोचना (निन्दा -चुगली टाइप) - जब नही पलते तो इतने बालक पैदा करने जरूरी हैं ।
वस्तुवादी आलोचना - भारत मे समस्यायों को ऑब्जेक्टिवली देखने की व्यवस्था ही नही है ।
दार्शनिक आलोचना - (मुझे इस पर श्रद्धा है ) - जो जहर इंसानों के जीवन को महान दुखों से भर देता है , उसका नाम है - अनंत लोभ ।
इन्सानों का एकमात्र कर्तव्य है कि वे इससे छुटकारा पाएं ।
वस्तुवादी दार्शनिक आलोचना (matter of truth ) - अज्ञानता सबसे बड़ा पाप है ।
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ब्रूटल आलोचना दर्दनाक होने पर भी अंततः शुभ वस्तु है । क्योंकि इसमें अज्ञान को खत्म करने की शक्ति है ।
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कई बार मन अकारण ही बहुत खुशी महसूस करता है ।.... वैसे मेरे साथ तो यह होता रहता है । मैं तो मौसम के बदलाव देखकर भी खुश हो जाती हूं ।
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अभी गोहाना मे एक पुरानी परिचित से 22 साल बाद मिलना हुआ। उन्हें भी स्वाध्याय की रुचि है । वो भी अक्टूबर मे हो रही गोष्ठी मे भाग ले रही हैं । उनका नाम है लीना जैन ।
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लेखक की भाषा में जिसे सोपान कहते हैं , शास्त्र की भाषा में इसे गुणस्थान कहते है । गुणस्थान 14 होते हैं ।
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मैं बातों के बीच में शास्त्र की भाषा को इसलिए लाती हूं ताकि सब उस यूनिवर्सल कोड को पहचानना सीखे । कि कम्प्यूटर की भाषा के समान प्रोग्राम अलग है , पर पीछे काम कर रहा कोड तो वही है ।
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मनीष सिंह की खेती वाली पोस्ट अच्छी थी ।
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मैं उत्तराध्ययन का 25वां अध्ययन याद कर रही थी न । वह ऑलमोस्ट पूरा हो गया है ।
मजेदार है ।
यह एक संवाद है ,दो ब्राह्मणों के बीच में ।
यह लाइन पसंद आई - रमई अज्ज वयणम्मि । आर्य वचनों मे रमता है जो ।
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I don't hate Mr modi ......etc
When u fight a person for a very long time , u come over to the bitterness of it . After all , for how long u can be bitter . More than the opponent , it harms yourself .it is not a good place to live in .
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That is the characteristics of a 'lighter person ' ,so to say in aagam language. 😊
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जब हम ऐसी बातें सुनते हैं , तभी हम इस तरह की बात को समझने के काबिल होते हैं कि हर कोई एक सोपान में रहकर एक दूसरे से मुखातिब है ।
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