Minor confusion and misinterpretation are but natural. way should be find out .
गुरुवार, 22 दिसंबर 2016
मंगलवार, 20 दिसंबर 2016
कुछ बातें इधर उधर की
कीर्ति ,यश ,ख्याति -ये चीजें अमूर्त होते हुए भी मूर्त चीजों से ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं |यह बात मैंने फिल्म स्टार्स के ट्वीट्स वगैरह पढ़कर रिअलाइज़ की |एक आम आदमी की नज़र में तो अमिताभ बच्चन ,शाहरुख़ खान ,सलमान वगैरह सभी पॉपुलर हैं |वो पॉपुलैरिटी को कम - ज्यादा में नहीं आंक सकता |
मगर मूर्त चीजों के माप-तोल की तरह कीर्ति ,यश ,ख्याति -इनका भी माप-तोल होता है | विज्ञ इस बात को समझते हैं |
अमिताभ जी के यहाँ हर संडे विजिटर्स आते हैं |35 साल से |कुली के हादसे के बाद से | हैं न कमाल की बात |क्या यह बात ,अमिताभ की ओर से एक चुनौती नहीं की देखो 'तुम क्या पॉपुलर हो मेरे सामने |पॉपुलैरिटी तो इसे कहते है |"
इसी तरह साऊथ के स्टार रजनीकांत की पॉपुलैरिटी की 'गहराई ' की तारीफ अमिताभ भी करते हैं |
ख्याति के बारे में शेक्सपियर के नाटकों का एक संवाद है कि धन को लूटने वाला तो आखिर क्या लूट ले जाता है (अर्थात कुछ भी नहीं ),मगर नाम को लूटने वाला सब कुछ लूट ले जाता है |
नहीं नहीं ,ऐसा नहीं करना |देखेंगे इस बात को भी |मेरे पास एक आइडिया है |
मगर मूर्त चीजों के माप-तोल की तरह कीर्ति ,यश ,ख्याति -इनका भी माप-तोल होता है | विज्ञ इस बात को समझते हैं |
अमिताभ जी के यहाँ हर संडे विजिटर्स आते हैं |35 साल से |कुली के हादसे के बाद से | हैं न कमाल की बात |क्या यह बात ,अमिताभ की ओर से एक चुनौती नहीं की देखो 'तुम क्या पॉपुलर हो मेरे सामने |पॉपुलैरिटी तो इसे कहते है |"
इसी तरह साऊथ के स्टार रजनीकांत की पॉपुलैरिटी की 'गहराई ' की तारीफ अमिताभ भी करते हैं |
ख्याति के बारे में शेक्सपियर के नाटकों का एक संवाद है कि धन को लूटने वाला तो आखिर क्या लूट ले जाता है (अर्थात कुछ भी नहीं ),मगर नाम को लूटने वाला सब कुछ लूट ले जाता है |
नहीं नहीं ,ऐसा नहीं करना |देखेंगे इस बात को भी |मेरे पास एक आइडिया है |
सोमवार, 19 दिसंबर 2016
# my team -my vision
एक फिल्म थी मोहनजोदड़ो |पता नहीं क्यों नहीं चली ,जबकि सब कुछ ठीक था |ये तो सब कहते हैं कि क्या चलता है ,कोई नहीं जानता |
मुझे लगता है ,अब इस बात को ,फ़िलहाल यहाँ , ख़त्म करते हैं |
..............
आज एक बात और याद आ गयी |एक बार मैंने एक क्लब बनाया था -नीरू नॉलेज क्लब ;वह अब भी है पर अब उसका नाम है - संबोध नॉलेज क्लब |एक बार मैंने fb पर भी जिक्र किया था |इस क्लब को बनाने के पीछे मेरी भावना थी कि बच्चों को -ज्ञान अनंत है -इस सत्य तक पहुँचाया जाए | बाद में मैंने इसे क्लब की टैग लाइन भी बनाया |क्लब की तीन टैगलाइन थी -
हम हर संडे इकठ्ठे होते थे |पहले प्रेयर गाते थे |वह मैंने महावीर स्तुति का एक पैरा चुना था |इस स्तुति में भगवान को नमस्कार किया गया है ,जिनकी चेतना में समस्त ज्ञान प्रभासित होता है |संस्कृत में है -
यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिद्चित
सम भ्रान्ति ध्रौव्य वय जनि लसंतोतरहिता .......एटसेट्रा
...फिर हम क्लब की टैगलाइन दोहराते थे और फिर एक्टिविटी शुरू करते थे |एक्टिविटी करने में बच्चों का मन भी लगता था ,उनका टाइम भी पास होता था ,वे कुछ नया सीखते थे ,और -ज्ञान अनंत है- यह मैसेज वे हर बार दोहराते थे |
इंग्लिश का एक शब्द है (मैंने अभी ऋतिक रोशन के संडे ब्रंच के इंटरव्यू में पढ़ा )-synapse अर्थात प्रक्रियाओं को धीरे धीरे एब्सोर्ब करने की मस्तिष्क की क्षमता |
मैं बच्चों को यही ग्रहण करना चाहती थी ,कि हर चीज ज्ञान है -ड्राइंग बनाना ,चोकलेट बनाना ,हैयर स्टाइल बनाना ,कविता बनाना ,ड्रेस बनाना एटसेट्रा .............कि ज्ञान अनंत है |
एक बार वे ये सीख लें ,तो वे कभी लाइफ में परेशान नहीं होंगे |बिकॉज़ उन्हें पता होगा की उनमे कुछ भी सीखने की क्षमता है |
क्लब में घर के ही बच्चे थे |दो-दो मेरी जेठानियों के ,तीन मेरे |
बाद में मैं बिजी हो गयी ...........बिजी तो क्या हो गयी ......बस थोडा यूँ ही .....
..............................................
दरअसल दुनियादार ,प्रक्टिकल लोगों को ऐसे काम फालतू के लगते है |आजकल ट्यूशन भेजना ज्यादा इम्पोर्टेन्ट समझा जाता है |
मैंने मेरी छोटी बहन से इसका जिक्र किया ,तो वो महारानी कौन सा कम है |फट से बोली कि हम तेरे क्लब में क्यों हाथ बटाये |बताओ ! बित्ते भर की लड़की और ये गरूर !
उस दिन मैंने जाना कि व्यक्तिवाचक नाम अहम् को ठेस पहुंचाते हैं ....खैर ...मुझे तो अहम् का कोई इशू नहीं था ....मुझे तो काम होने से मतलब था ...तो इसलिए मैंने क्लब का नाम बदल कर संबोध कर दिया |संबोध -अर्थात ज्ञान में बराबर |
क्लब तो अब भी है |पर अभी भी चल नहीं रहा है | क्या बताऊँ ......दुनिया की नज़र में आपकी कीमत कागज के टुकड़ों से नापी जाती है |ये हमारे समय का सबसे क्रूर मजाक है |
मुझे लगता है ,अब इस बात को ,फ़िलहाल यहाँ , ख़त्म करते हैं |
..............
आज एक बात और याद आ गयी |एक बार मैंने एक क्लब बनाया था -नीरू नॉलेज क्लब ;वह अब भी है पर अब उसका नाम है - संबोध नॉलेज क्लब |एक बार मैंने fb पर भी जिक्र किया था |इस क्लब को बनाने के पीछे मेरी भावना थी कि बच्चों को -ज्ञान अनंत है -इस सत्य तक पहुँचाया जाए | बाद में मैंने इसे क्लब की टैग लाइन भी बनाया |क्लब की तीन टैगलाइन थी -
- ज्ञान अनंत है |
- हेल्थ इज वेल्थ
- practice makes a man perfect .
हम हर संडे इकठ्ठे होते थे |पहले प्रेयर गाते थे |वह मैंने महावीर स्तुति का एक पैरा चुना था |इस स्तुति में भगवान को नमस्कार किया गया है ,जिनकी चेतना में समस्त ज्ञान प्रभासित होता है |संस्कृत में है -
यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिद्चित
सम भ्रान्ति ध्रौव्य वय जनि लसंतोतरहिता .......एटसेट्रा
...फिर हम क्लब की टैगलाइन दोहराते थे और फिर एक्टिविटी शुरू करते थे |एक्टिविटी करने में बच्चों का मन भी लगता था ,उनका टाइम भी पास होता था ,वे कुछ नया सीखते थे ,और -ज्ञान अनंत है- यह मैसेज वे हर बार दोहराते थे |
इंग्लिश का एक शब्द है (मैंने अभी ऋतिक रोशन के संडे ब्रंच के इंटरव्यू में पढ़ा )-synapse अर्थात प्रक्रियाओं को धीरे धीरे एब्सोर्ब करने की मस्तिष्क की क्षमता |
मैं बच्चों को यही ग्रहण करना चाहती थी ,कि हर चीज ज्ञान है -ड्राइंग बनाना ,चोकलेट बनाना ,हैयर स्टाइल बनाना ,कविता बनाना ,ड्रेस बनाना एटसेट्रा .............कि ज्ञान अनंत है |
एक बार वे ये सीख लें ,तो वे कभी लाइफ में परेशान नहीं होंगे |बिकॉज़ उन्हें पता होगा की उनमे कुछ भी सीखने की क्षमता है |
क्लब में घर के ही बच्चे थे |दो-दो मेरी जेठानियों के ,तीन मेरे |
बाद में मैं बिजी हो गयी ...........बिजी तो क्या हो गयी ......बस थोडा यूँ ही .....
..............................................
दरअसल दुनियादार ,प्रक्टिकल लोगों को ऐसे काम फालतू के लगते है |आजकल ट्यूशन भेजना ज्यादा इम्पोर्टेन्ट समझा जाता है |
मैंने मेरी छोटी बहन से इसका जिक्र किया ,तो वो महारानी कौन सा कम है |फट से बोली कि हम तेरे क्लब में क्यों हाथ बटाये |बताओ ! बित्ते भर की लड़की और ये गरूर !
उस दिन मैंने जाना कि व्यक्तिवाचक नाम अहम् को ठेस पहुंचाते हैं ....खैर ...मुझे तो अहम् का कोई इशू नहीं था ....मुझे तो काम होने से मतलब था ...तो इसलिए मैंने क्लब का नाम बदल कर संबोध कर दिया |संबोध -अर्थात ज्ञान में बराबर |
क्लब तो अब भी है |पर अभी भी चल नहीं रहा है | क्या बताऊँ ......दुनिया की नज़र में आपकी कीमत कागज के टुकड़ों से नापी जाती है |ये हमारे समय का सबसे क्रूर मजाक है |
शनिवार, 17 दिसंबर 2016
फ़िल्मी कहानियां -8
संजय लीला भंसाली का सिनेमा 'लार्जर देन लाइफ ' स्टाइल का है ,चाहे कहानी कोई भी हो |अब तो ज्यादातर राजाओं की प्रेम कहानियां दिखाते हैं , जो की उनके स्टाइल को परफेक्टली सूट करता है ,पर जब विकलागों के ऊपर कहानियां भी दिखाईं हैं ,तो उन्हें भी उसी तरह दिखाया है |मुझे तो ज्यादा पसंद नहीं है ,इस तरह का सिनेमा |पर न हो तो न हो .क्या फर्क पड़ता है |पब्लिक तो पसंद करती है |glitterati ,a treat to eyes.
राजू हिरानी जो सिनेमा बनाते हैं ,मुझे लगता है ;वो बहुत हद तक मेरे टाइप का है(जानती हूँ !आपको तो बोस्टिंग लगेगी ) | इनकी फिल्मो को मैं शांत-रस की फिल्मे कहती हूँ (जैसे की मेरा लेखन भी है -शांत रस का -कोई हड़बड़ी नहीं ,कोई जल्दीबाज़ी नहीं |सब कुछ धीरे धीरे ,अपनी ओर्गेनिक गति से सामने आता है ) |इनकी फिल्मो में भी एक केरेक्टर ऐसा होता है ,जो एन्लाइटेनड (जागृत )है ,जो हमेशा सिचुएशन से बहुत ऊपर उठकर सोचता है| करण जौहर के साथ बातचीत में करण राजामौली को बोले की -आपके जैसी फिल्म बनाने की मैं सोच भी नहीं सकता |तो राजामौली जी बोले -आप मेरे जैसी फिल्म बनाने की नहीं सोच सकते और मैं राजू हिरानी के जैसी फिल्म का एक सीन भी बनाने की सोच नहीं सकता |देखिये ! एक जीनियस दूसरे जीनियस का किन शब्दों में सम्मान करता है |तारीफ करने से अपना कुछ घटता नहीं है .बुराई करने से कुछ बढ़ता नहीं है |
इम्तिआज भी अच्छा सिनेमा बनाते है |मुझे उनकी एप्रोच अच्छी लगती है |
.
.
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अनुराग भी ठीक हैं |
राजामौली जी के अन्दर कहानी के प्रेसेंटेशन की समझ जबरदस्त है |
राजू हिरानी जो सिनेमा बनाते हैं ,मुझे लगता है ;वो बहुत हद तक मेरे टाइप का है(जानती हूँ !आपको तो बोस्टिंग लगेगी ) | इनकी फिल्मो को मैं शांत-रस की फिल्मे कहती हूँ (जैसे की मेरा लेखन भी है -शांत रस का -कोई हड़बड़ी नहीं ,कोई जल्दीबाज़ी नहीं |सब कुछ धीरे धीरे ,अपनी ओर्गेनिक गति से सामने आता है ) |इनकी फिल्मो में भी एक केरेक्टर ऐसा होता है ,जो एन्लाइटेनड (जागृत )है ,जो हमेशा सिचुएशन से बहुत ऊपर उठकर सोचता है| करण जौहर के साथ बातचीत में करण राजामौली को बोले की -आपके जैसी फिल्म बनाने की मैं सोच भी नहीं सकता |तो राजामौली जी बोले -आप मेरे जैसी फिल्म बनाने की नहीं सोच सकते और मैं राजू हिरानी के जैसी फिल्म का एक सीन भी बनाने की सोच नहीं सकता |देखिये ! एक जीनियस दूसरे जीनियस का किन शब्दों में सम्मान करता है |तारीफ करने से अपना कुछ घटता नहीं है .बुराई करने से कुछ बढ़ता नहीं है |
इम्तिआज भी अच्छा सिनेमा बनाते है |मुझे उनकी एप्रोच अच्छी लगती है |
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अनुराग भी ठीक हैं |
राजामौली जी के अन्दर कहानी के प्रेसेंटेशन की समझ जबरदस्त है |
शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016
फ़िल्मी कहानियां -7
उस दिन टी वी पर अक्षय कुमार की सिंग इज़ ब्लिंग आ रही थी (आती ही रहती है ) ,और इस फिल्म को देखकर मैंने सोचा कि इस तरह की फिल्मे मैं किस तरह कभी भी लिख पाऊंगी ,अक्षय कितने उम्दा एक्टर हैं |मेरे लिए तो संभव ही नहीं है |कहाँ अक्षय पंजाब से ,कहाँ एनी रोमानिया की .......वो तो हिंदी भी नहीं समझती ...इसलिए ट्रांसलेटर का लारा का किरदार डाला .....इस किरदार के आने से .....ट्रांसलेशन के घुमावों से ही कितनी चटपटी ,मजेदार सिचुएशन बन गयी ....मैं तो इस तरह कभी सोच नहीं पाऊंगी .......मेरा तो दिमाग ही नहीं चलेगा ....एटसेट्रा एटसेट्रा |
मेरे मनोसंकल्प भग्न हो गए और मैं उदास हो गयी |
फिर सलमान की सुल्तान आ गयी |यह भी देखी |.......पर मेरा द्वंद्व ज्यों का त्यों था |मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था |
फिर ndtv की वेबसाईट पर मैंने सुल्तान फिल्म के राईटर अली (ये पूरा नाम नहीं है ) का इंटरव्यू पढ़ा |वे बताते हैं कि सुल्तान फिल्म का आइडिया उन्हें तब आया ,जब सुशील ने ओलंपिक्स में मैडल जीता था | तब उन्हें लगा कि एक हरियाणवी पहलवान की सक्सेस स्टोरी (पाठक ध्यान दें ,कि ,यह कहानी आलरेडी सक्सेसफुल है )पर एक कहानी बनानी चाहिए |
तब मैंने इस पहेली को सुलझाया कि जब आपके पास आलरेडी एक सक्सेसफुल कहानी है ....तब लास्ट के सीन के ....इंडिया जीताओ ....पब्लिक खुश ....हीरो की हीरोपंती .....वीर -उदात्त पूर्ण रस परिकल्पना .....; यह सब तो हो ही गया ....बस अब तो सलमान के हिसाब से कुछ मजाक-वजाक ,गाने ,........ये सब डालने हैं|
अर्थात
यह सब उतना मुश्किल भी नहीं था जितना मैं समझ रही थी |...अभी हाल की रिलीज़ फिल्मो नीरजा ,एयर लिफ्ट ,रुस्तम ,सरबजीत ,दंगल ...इत्यादि फिल्मो को देखें ..तो ये फिल्मे उन सक्सेसफुल ऑपरेशंस पर आधारित है ,जो रियल लाइफ में कहीं न कहीं अंजाम होते हैं |
सुल्तान की कहानी लगभग ठीक थी |बाद में लेखक ने कहानी का .........सफलता का गरूर नहीं करना चाहिए ...में जो एक्सटेंशन किया ....तो वो भी हमारी चिंतन परंपरा से मेल खाता है .....पर आजकल ज़रा ओवर लगता है |
मेरे मनोसंकल्प भग्न हो गए और मैं उदास हो गयी |
फिर सलमान की सुल्तान आ गयी |यह भी देखी |.......पर मेरा द्वंद्व ज्यों का त्यों था |मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था |
फिर ndtv की वेबसाईट पर मैंने सुल्तान फिल्म के राईटर अली (ये पूरा नाम नहीं है ) का इंटरव्यू पढ़ा |वे बताते हैं कि सुल्तान फिल्म का आइडिया उन्हें तब आया ,जब सुशील ने ओलंपिक्स में मैडल जीता था | तब उन्हें लगा कि एक हरियाणवी पहलवान की सक्सेस स्टोरी (पाठक ध्यान दें ,कि ,यह कहानी आलरेडी सक्सेसफुल है )पर एक कहानी बनानी चाहिए |
तब मैंने इस पहेली को सुलझाया कि जब आपके पास आलरेडी एक सक्सेसफुल कहानी है ....तब लास्ट के सीन के ....इंडिया जीताओ ....पब्लिक खुश ....हीरो की हीरोपंती .....वीर -उदात्त पूर्ण रस परिकल्पना .....; यह सब तो हो ही गया ....बस अब तो सलमान के हिसाब से कुछ मजाक-वजाक ,गाने ,........ये सब डालने हैं|
अर्थात
यह सब उतना मुश्किल भी नहीं था जितना मैं समझ रही थी |...अभी हाल की रिलीज़ फिल्मो नीरजा ,एयर लिफ्ट ,रुस्तम ,सरबजीत ,दंगल ...इत्यादि फिल्मो को देखें ..तो ये फिल्मे उन सक्सेसफुल ऑपरेशंस पर आधारित है ,जो रियल लाइफ में कहीं न कहीं अंजाम होते हैं |
सुल्तान की कहानी लगभग ठीक थी |बाद में लेखक ने कहानी का .........सफलता का गरूर नहीं करना चाहिए ...में जो एक्सटेंशन किया ....तो वो भी हमारी चिंतन परंपरा से मेल खाता है .....पर आजकल ज़रा ओवर लगता है |
गुरुवार, 15 दिसंबर 2016
फ़िल्मी कहानिया -6
'ए दिल .........'में एक टिपिकल करण जौहर फिल्म के सारे मसाले हैं |फोरेन लोकेशन ,स्टाइलिश कपडे ,हीरोइन की काजल लगी आखें ,सुपर रिच केरेक्टर्स .........आजकल सारी फिल्मे चमक धमक (glitterati ) वाली हो गयी है |(क्यों ? ......भई ! धन की आसक्ति इंसानों में जबरदस्त होती है )
इन सब पर मैं क्या कमेन्ट करु |सब अच्छा ही था |
मैं तो कहानी और केरेक्टर्स पर बात सकती हूँ |केरेक्टर्स के बारे में कहूँगी कि ऐसे ' केरेक्टर्स ' (थोडा फन्नी सेन्स में भी है )हो सकते है |मैं सहमत हूँ |
बॉलीवुड का असर 70-80 के बाद पैदा हुई पीढ़ी में साफ दिखता है |पहले यह अन्ताक्षरी के रूप में दिखाते थे ,बाद में इसे हीरो के फौरी शौक के रूप में भी कई फिल्मो में दिखाया (किशन कन्हैया ),पर हीरो के ऊपर इसका जूनून ही है ........और यह हीरो -हिरोइन के बीच कनेक्ट का मुख्य कारण है .ऐसा शायद तमाशा में देखा था |(मैं बहुत ज्यादा फिल्मे नहीं देखती हूँ |इन बातों को सिर्फ टिप्पणी समझा जाये )
अयान और अलिजेह भी ऐसे ही हैं |दोनों का कॉमन कनेक्शन बॉलीवुड है |इसके अलावा .............इसके अलावा है ....उनकी सुपर रिच क्लास की लग्ज़री , उनके दंभ ,उनके विखंडित मूल्य ,उनका अकेलापन ....जो की फिल्म में उस तरह से दिखाया नहीं गया है पर समझना मुश्किल भी नहीं है | (ऑफकोर्स कोई आर्ट फिल्म तो नहीं बनानी थी न ).....और इन सबके बीच प्यार पाने की मासूम (जिद्दी )इच्छा|यह इच्छा मासूम है क्योंकि यह दूसरी पार्टी को नुकसान नहीं करती ;मगर जिद्दी भी है कि खुद के लिए कभी समझौता नहीं करती |
फिल्मो के जानकार (शेखर कपूर ,राजामौली ) कहते है कि एक फिल्म में आप दो-चार भावपूर्ण moments क्रिएट कर लो ,बस बहुत है |
इस फिल्म में मुझे रणबीर (2 बार ) और अनुष्का (1 बार )के ब्रेक डाऊन वाले क्षण बहुत प्रभावी लगे |रियल लगे बाकि मैं कहूँगी इस फिल्म में करण ने बहुत ग्रो किया है |वे कहानी कहने में थोड़े बोल्ड हुए हैं |नए इनपुट्स भी लाये हैं (फॉर एग्जाम्पल लास्ट में अलिजेह के एंड को न दिखाना ;वर्ना हिंदी फिल्मों के ड्रामेपन को देखते हुए ऐसी इच्छा रोक पाना बहुत कठिन है )|उनमे एक सर्ज दिखती है ,कहानी को ईमानदारी से कहने की |
वे प्रयोग भी कर सकते हैं |उनके बफ़र्स भी मजबूत हैं |
इन सब पर मैं क्या कमेन्ट करु |सब अच्छा ही था |
मैं तो कहानी और केरेक्टर्स पर बात सकती हूँ |केरेक्टर्स के बारे में कहूँगी कि ऐसे ' केरेक्टर्स ' (थोडा फन्नी सेन्स में भी है )हो सकते है |मैं सहमत हूँ |
बॉलीवुड का असर 70-80 के बाद पैदा हुई पीढ़ी में साफ दिखता है |पहले यह अन्ताक्षरी के रूप में दिखाते थे ,बाद में इसे हीरो के फौरी शौक के रूप में भी कई फिल्मो में दिखाया (किशन कन्हैया ),पर हीरो के ऊपर इसका जूनून ही है ........और यह हीरो -हिरोइन के बीच कनेक्ट का मुख्य कारण है .ऐसा शायद तमाशा में देखा था |(मैं बहुत ज्यादा फिल्मे नहीं देखती हूँ |इन बातों को सिर्फ टिप्पणी समझा जाये )
अयान और अलिजेह भी ऐसे ही हैं |दोनों का कॉमन कनेक्शन बॉलीवुड है |इसके अलावा .............इसके अलावा है ....उनकी सुपर रिच क्लास की लग्ज़री , उनके दंभ ,उनके विखंडित मूल्य ,उनका अकेलापन ....जो की फिल्म में उस तरह से दिखाया नहीं गया है पर समझना मुश्किल भी नहीं है | (ऑफकोर्स कोई आर्ट फिल्म तो नहीं बनानी थी न ).....और इन सबके बीच प्यार पाने की मासूम (जिद्दी )इच्छा|यह इच्छा मासूम है क्योंकि यह दूसरी पार्टी को नुकसान नहीं करती ;मगर जिद्दी भी है कि खुद के लिए कभी समझौता नहीं करती |
फिल्मो के जानकार (शेखर कपूर ,राजामौली ) कहते है कि एक फिल्म में आप दो-चार भावपूर्ण moments क्रिएट कर लो ,बस बहुत है |
इस फिल्म में मुझे रणबीर (2 बार ) और अनुष्का (1 बार )के ब्रेक डाऊन वाले क्षण बहुत प्रभावी लगे |रियल लगे बाकि मैं कहूँगी इस फिल्म में करण ने बहुत ग्रो किया है |वे कहानी कहने में थोड़े बोल्ड हुए हैं |नए इनपुट्स भी लाये हैं (फॉर एग्जाम्पल लास्ट में अलिजेह के एंड को न दिखाना ;वर्ना हिंदी फिल्मों के ड्रामेपन को देखते हुए ऐसी इच्छा रोक पाना बहुत कठिन है )|उनमे एक सर्ज दिखती है ,कहानी को ईमानदारी से कहने की |
वे प्रयोग भी कर सकते हैं |उनके बफ़र्स भी मजबूत हैं |
मंगलवार, 13 दिसंबर 2016
फ़िल्मी कहानिया -5
हाँ ,तो बात चल रही थी फ़िल्मी कहानियों की |
बीच में कई टॉपिक चल पड़े ,तो बात कहाँ की कहाँ पहुंच गयी |खैर ...
अभी हाल ही में करण जौहर की ''ए दिल ...' देखी थी तो वहीँ से शुरू कर लेते है |
एक डाइरेक्टर के तौर पर मैंने करन को सिरियसली नहीं लिया था |इसलिए नहीं कि 'कुछ कुछ ..'',कभी ख़ुशी ., जैसी फिल्मे पसंद नहीं |नहीं |ये फिल्मे मुझे पसंद हैं-बल्कि मैं तो फैन हूँ ऐसी ब्लोकबस्टर फिल्मो की |बट ........the thing is, you should grow with time .if you dont ,that ,ultimately stales you and make you worthless.
करण की आरंभिक फिल्मे ,फिर ये जितना काम करते हैं ,जितना ज्यादा बोलते हैं (he is everywhere) ,तो मेरा परसेप्शन ये था की ये बंदा डाई -हार्ड बिजनेसमैन है ,नथिंग एल्स |
पर ए दिल मुझे पसंद आई |...........contd
एक बात और -आगे से ना ,मैं साहित्य की जगह लिटरेचर कहा करुँगी |साहित्य कहने से लद्धडपना सा लगता है |
बीच में कई टॉपिक चल पड़े ,तो बात कहाँ की कहाँ पहुंच गयी |खैर ...
अभी हाल ही में करण जौहर की ''ए दिल ...' देखी थी तो वहीँ से शुरू कर लेते है |
एक डाइरेक्टर के तौर पर मैंने करन को सिरियसली नहीं लिया था |इसलिए नहीं कि 'कुछ कुछ ..'',कभी ख़ुशी ., जैसी फिल्मे पसंद नहीं |नहीं |ये फिल्मे मुझे पसंद हैं-बल्कि मैं तो फैन हूँ ऐसी ब्लोकबस्टर फिल्मो की |बट ........the thing is, you should grow with time .if you dont ,that ,ultimately stales you and make you worthless.
करण की आरंभिक फिल्मे ,फिर ये जितना काम करते हैं ,जितना ज्यादा बोलते हैं (he is everywhere) ,तो मेरा परसेप्शन ये था की ये बंदा डाई -हार्ड बिजनेसमैन है ,नथिंग एल्स |
पर ए दिल मुझे पसंद आई |...........contd
एक बात और -आगे से ना ,मैं साहित्य की जगह लिटरेचर कहा करुँगी |साहित्य कहने से लद्धडपना सा लगता है |
शनिवार, 10 दिसंबर 2016
# my team -my vision
जब आप इस मार्ग पर आते हो तो आपको पता चलता है कि आप पहले नहीं हो जो यहाँ आये हो ,न ही अंतिम होगे |आप से पहले अनंत लोग आये है |
ज्ञानियों ने निकलने के (अब इसे कह लें ,मुक्त होने के )चार राह बताई -ज्ञान ,दर्शन ,चरित्र और तप |और राहों का भी निषेध नहीं है |
इनमे से मेरा मन तो ज्ञान की प्राप्ति ,वर्धन ,प्रसार में रमता है |अभी छोटी हूँ ,घर भी नहीं छूटा है ;पर मेरा ध्येय ,मेरा लक्ष्य यही है |
एक बार fb पर साहित्य के प्रसार के लिए मैंने एक टीम की बात की थी | मेरे लिए यह ज्ञान की सेवा है | कहानियों में जिस तरह कल्पना की पन्नी में लपेट कर आधुनिक जीवन की सच्चाइयों को कह दिया जाता है वह अद्भुत और शक्तिशाली है |फ़िल्मी कहानियाँ भी ज्ञान हैं (मैं आऊंगी इस टॉपिक पर भी )...इसके आगे शिक्षा के क्षेत्र में हम कुछ सॉलिड काम करें ,यह भी मेरे एजेंडे में है |अकेडमिक रिसर्च के काम भी हम करेंगे |हम सक्षम हैं ,पर अभी नहीं |अभी मेरा सारा ध्यान हम सफल कैसे हों?इस पर है |वैसे मुझे लगता है कि हमारी सफलता ही उनके लिए करारा जवाब होगी |
बाकि लोग भी अपने इनपुट्स दें |
ज्ञानियों ने निकलने के (अब इसे कह लें ,मुक्त होने के )चार राह बताई -ज्ञान ,दर्शन ,चरित्र और तप |और राहों का भी निषेध नहीं है |
इनमे से मेरा मन तो ज्ञान की प्राप्ति ,वर्धन ,प्रसार में रमता है |अभी छोटी हूँ ,घर भी नहीं छूटा है ;पर मेरा ध्येय ,मेरा लक्ष्य यही है |
एक बार fb पर साहित्य के प्रसार के लिए मैंने एक टीम की बात की थी | मेरे लिए यह ज्ञान की सेवा है | कहानियों में जिस तरह कल्पना की पन्नी में लपेट कर आधुनिक जीवन की सच्चाइयों को कह दिया जाता है वह अद्भुत और शक्तिशाली है |फ़िल्मी कहानियाँ भी ज्ञान हैं (मैं आऊंगी इस टॉपिक पर भी )...इसके आगे शिक्षा के क्षेत्र में हम कुछ सॉलिड काम करें ,यह भी मेरे एजेंडे में है |अकेडमिक रिसर्च के काम भी हम करेंगे |हम सक्षम हैं ,पर अभी नहीं |अभी मेरा सारा ध्यान हम सफल कैसे हों?इस पर है |वैसे मुझे लगता है कि हमारी सफलता ही उनके लिए करारा जवाब होगी |
बाकि लोग भी अपने इनपुट्स दें |
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
फ़िल्मी कहानियां -4
जागृति शब्द गीता का है |जैन दर्शन में इसे समकित या सम्यक्त्व दर्शन कहते हैं |
जागृति के बाद आप के अन्दर प्यास जगती है और जानने की |आपकी रूचि बदल जाती है |
मुझे तो मेरे बैकग्राउंड के कारण ज्यादा प्रॉब्लम नहीं हुई | मेरे साथ तो ऐसा हुआ कि इधर मैंने सोचा हुबलाबुब्लाबू से निकलने का और उधर गुरूजी आ गए मेरे पास ,मेरी उंगली पकड़ ली और उस रास्ते पर ले आये |मैं बोली -अरे गुरूजी ,मेरा घर है ,परिवार है | इनके बिना मेरा जी कैसे लगेगा ?तो सेठजी तो इतने भोले हैं ,बोले अच्छा ,ऐसी बात है, तो चल मैं यहीं रुका हूँ ,तू मिल ले अपने लोगों से |तब से अब तक ,मैं हूँ तो अभी घर में पर बाहर निकल झांकती रहती हूँ ,कहीं सेठजी चले न जाए | मुझे लगता है -सेठजी जरुर कोई जादू मंतर जानते हैं |अपने जैसा कोई मेरे यहाँ बैठा दिया है ...और खुद गोहाना में जाने की तयारी कर ली है |
जागृति के बाद आप के अन्दर प्यास जगती है और जानने की |आपकी रूचि बदल जाती है |
मुझे तो मेरे बैकग्राउंड के कारण ज्यादा प्रॉब्लम नहीं हुई | मेरे साथ तो ऐसा हुआ कि इधर मैंने सोचा हुबलाबुब्लाबू से निकलने का और उधर गुरूजी आ गए मेरे पास ,मेरी उंगली पकड़ ली और उस रास्ते पर ले आये |मैं बोली -अरे गुरूजी ,मेरा घर है ,परिवार है | इनके बिना मेरा जी कैसे लगेगा ?तो सेठजी तो इतने भोले हैं ,बोले अच्छा ,ऐसी बात है, तो चल मैं यहीं रुका हूँ ,तू मिल ले अपने लोगों से |तब से अब तक ,मैं हूँ तो अभी घर में पर बाहर निकल झांकती रहती हूँ ,कहीं सेठजी चले न जाए | मुझे लगता है -सेठजी जरुर कोई जादू मंतर जानते हैं |अपने जैसा कोई मेरे यहाँ बैठा दिया है ...और खुद गोहाना में जाने की तयारी कर ली है |
गुरुवार, 8 दिसंबर 2016
फ़िल्मी कहानियां-3
दरअसल आजीविका वाला प्वाइंट तो सभी पेशों पर लागू है |
...........................................
भूख और स्वाद की बात चली ,तो मैं कहूँ कि एक आम इन्सान तो इसका फर्क बता ही नहीं सकता |खाना खाते हुए ये कैसे और कौन डिसाइड करे की क्या खाना भूख-शमन है और क्या खाना स्वाद -पोषण |रोटी के साथ नमक खाएं या अचार |एक सब्जी ठीक रहेगी या दो ले सकते है |तोरी खाना सादापन है या पनीर भी चल सकता है |
विचित्र पेंच हैं |
बहस थोड़ी फिलोस्फिकल हो चली है |दर्शन की बातें बहुत लोगों को हज़म नहीं होती |दीपा जी कहती थी -यह तो शेरनी का दूध है ,सोने के पात्र में ही टिक सकता है |इसे हर कोई पचा नहीं सकता |
.मुझे तो शौक है | सच के साथ सीधे दो दो हाथ करने में मजा आता है |चाहे कमजोर हूँ ,शक्ति के मामले में |शरीर से नहीं |वजन तो मेरा 78 होगा |सर्दियों में और बढ़ जाएगा |खैर ...............
.......................
हमारे यहाँ की चिंतन परंपरा में भूख -शमन को तो अलाउ किया गया है बल्कि भूखे को भोजन कराना पुण्य का काम है | पर स्वाद-पोषण की मनाही की गयी है |क्यों ?
फिर............
आखिर प्राब्लम क्या है ?
प्रॉब्लम कुछ भी नहीं -कहीं भी नहीं ......पर जब हम देखते हैं कि एक ओर इतनी समृधि है और दूसरी ओर इतनी गरीबी , तो विषमता का अहसास मन को कचोटता है |
यह कचोट ,हम खुद देखें या पढ़ें ,जब हमारे भीतर गहरे में धंस जाती है तो self-realisation या आध्यात्मिक शब्दावली में कहूँ तो इन्सान जागृत हो जाता है |जागृति ;फ़िलहाल पाठक इस शब्द को याद रखें |
हम चिंतन के इस ऊँचे पर्वत पर ,बड़ी मुश्किल से ,पहुंचते ही हैं कि तभी फोन की घंटी बज जाती है या और कुछ होता है कि हम फिर से अपनी दुनिया में वापस आ जाते हैं -अरे अभी तो खाना नहीं बनाया .........बेटे को जूते दिलाने थे ....एटसेट्रा एटसेट्रा |पर यह जागृति आपका पीछा नहीं छोडती |आप अपने आपको को कोसते हैं कि क्यों मैं ही ऐसी हूँ ,क्यों मैं सब की तरह एन्जॉय नहीं कर पाती ,पर आपके भीतर की क्लान्ति का कोई निराकरण नहीं होता |
पाठक यह ध्यान रखें कि यह जागृति किसी भी प्रकार से आ सकती है |इसका धार्मिकता से कोई कनेक्शन नहीं है |
अनुपम खेर शो में अनुपम ने काजोल को एक किस्सा सुनाया की उनके पिताजी यह कहा करते कि यह ग्रीस (कलाकारों का मेकअप ) एक बार जिसके मुह पर लग जाये तो जिन्दगी भर नहीं उतरती | देखिये ! कैसी गहरी दार्शनिक बात है| खैर ........
जब चिंतन के ऊँचे पर्वत से आप दोबारा अपनी दुनिया में लोटते हो ,तो आप पाते हो की भूख तो बड़ी दूर की बात है ,अभी तो स्वाद भी कहीं नहीं छूटा है |.....
एक बार हमारे स्कूल में एक ट्रेनी टीचर (पहले पढ़ाई के बाद , एक साल की ट्रेनिंग होती थी |) आये थे |नए नए थे |पढाने के जज्बे से भरे हुए |बाद में परमानेंट होने के बाद तो कहाँ जज्बे बचते हैं | वे साइंस के थे |सौर मंडल के बारे में समझाते हुए उन्होंने उपमा देकर कहा कि पृथ्वी पर रहकर सौर मंडल को जानना ऐसा है कि आप बिस्कुट में बंद होकर बिस्कुट को बाहर से जानना चाहते हो |
जागृति की अवस्था ऐसी ही है |आप हुबलाबुब्लाबू (यह शब्द मैंने गढ़ा है ,उस हजार उलझनों वाली स्थिति के लिए जिसमें आप हैं )के अन्दर हैं पर आप जानते हैं की मुझे इसमें से निकलना है ,कोई रास्ता निकालना है |
जब आप यहाँ तक पहुंच जाते हो ,तब वह क्षण है ,मेरे दोस्त , जब आपके जीवन में भूख और स्वाद के बीच की फांक फट गयी है | ................contd
...........................................
भूख और स्वाद की बात चली ,तो मैं कहूँ कि एक आम इन्सान तो इसका फर्क बता ही नहीं सकता |खाना खाते हुए ये कैसे और कौन डिसाइड करे की क्या खाना भूख-शमन है और क्या खाना स्वाद -पोषण |रोटी के साथ नमक खाएं या अचार |एक सब्जी ठीक रहेगी या दो ले सकते है |तोरी खाना सादापन है या पनीर भी चल सकता है |
विचित्र पेंच हैं |
बहस थोड़ी फिलोस्फिकल हो चली है |दर्शन की बातें बहुत लोगों को हज़म नहीं होती |दीपा जी कहती थी -यह तो शेरनी का दूध है ,सोने के पात्र में ही टिक सकता है |इसे हर कोई पचा नहीं सकता |
.मुझे तो शौक है | सच के साथ सीधे दो दो हाथ करने में मजा आता है |चाहे कमजोर हूँ ,शक्ति के मामले में |शरीर से नहीं |वजन तो मेरा 78 होगा |सर्दियों में और बढ़ जाएगा |खैर ...............
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हमारे यहाँ की चिंतन परंपरा में भूख -शमन को तो अलाउ किया गया है बल्कि भूखे को भोजन कराना पुण्य का काम है | पर स्वाद-पोषण की मनाही की गयी है |क्यों ?
फिर............
आखिर प्राब्लम क्या है ?
प्रॉब्लम कुछ भी नहीं -कहीं भी नहीं ......पर जब हम देखते हैं कि एक ओर इतनी समृधि है और दूसरी ओर इतनी गरीबी , तो विषमता का अहसास मन को कचोटता है |
यह कचोट ,हम खुद देखें या पढ़ें ,जब हमारे भीतर गहरे में धंस जाती है तो self-realisation या आध्यात्मिक शब्दावली में कहूँ तो इन्सान जागृत हो जाता है |जागृति ;फ़िलहाल पाठक इस शब्द को याद रखें |
हम चिंतन के इस ऊँचे पर्वत पर ,बड़ी मुश्किल से ,पहुंचते ही हैं कि तभी फोन की घंटी बज जाती है या और कुछ होता है कि हम फिर से अपनी दुनिया में वापस आ जाते हैं -अरे अभी तो खाना नहीं बनाया .........बेटे को जूते दिलाने थे ....एटसेट्रा एटसेट्रा |पर यह जागृति आपका पीछा नहीं छोडती |आप अपने आपको को कोसते हैं कि क्यों मैं ही ऐसी हूँ ,क्यों मैं सब की तरह एन्जॉय नहीं कर पाती ,पर आपके भीतर की क्लान्ति का कोई निराकरण नहीं होता |
पाठक यह ध्यान रखें कि यह जागृति किसी भी प्रकार से आ सकती है |इसका धार्मिकता से कोई कनेक्शन नहीं है |
अनुपम खेर शो में अनुपम ने काजोल को एक किस्सा सुनाया की उनके पिताजी यह कहा करते कि यह ग्रीस (कलाकारों का मेकअप ) एक बार जिसके मुह पर लग जाये तो जिन्दगी भर नहीं उतरती | देखिये ! कैसी गहरी दार्शनिक बात है| खैर ........
जब चिंतन के ऊँचे पर्वत से आप दोबारा अपनी दुनिया में लोटते हो ,तो आप पाते हो की भूख तो बड़ी दूर की बात है ,अभी तो स्वाद भी कहीं नहीं छूटा है |.....
एक बार हमारे स्कूल में एक ट्रेनी टीचर (पहले पढ़ाई के बाद , एक साल की ट्रेनिंग होती थी |) आये थे |नए नए थे |पढाने के जज्बे से भरे हुए |बाद में परमानेंट होने के बाद तो कहाँ जज्बे बचते हैं | वे साइंस के थे |सौर मंडल के बारे में समझाते हुए उन्होंने उपमा देकर कहा कि पृथ्वी पर रहकर सौर मंडल को जानना ऐसा है कि आप बिस्कुट में बंद होकर बिस्कुट को बाहर से जानना चाहते हो |
जागृति की अवस्था ऐसी ही है |आप हुबलाबुब्लाबू (यह शब्द मैंने गढ़ा है ,उस हजार उलझनों वाली स्थिति के लिए जिसमें आप हैं )के अन्दर हैं पर आप जानते हैं की मुझे इसमें से निकलना है ,कोई रास्ता निकालना है |
जब आप यहाँ तक पहुंच जाते हो ,तब वह क्षण है ,मेरे दोस्त , जब आपके जीवन में भूख और स्वाद के बीच की फांक फट गयी है | ................contd
बुधवार, 7 दिसंबर 2016
फ़िल्मी कहानिया -2
आजीविका के प्वाइंट ऑफ़ व्यू से देखें तो हर सफल फिल्म की कहानी अपने आप में पूर्ण उचित है |गुंडे भी क्या बुरी है |फिर मर्डर ,हेट स्टोरी एटसेट्रा बी ,सी ,डी ग्रेड की फिल्मे भी क्यों बुरी है ?< फिर ग्रेडिंग ही क्यों की जाए? <सेंसर क्यों ?............इत्यादि अनगिनत प्रश्न तैयार खड़े हैं ,आप को निगलने के लिए |
सचमुच कठिन है इस बहस में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना |
.................
पर कोशिश तो करनी है |
दरअसल आजीविका का मुद्दा वह ग्राऊंड है जहाँ से इस प्रकार की बहसें उठती हैं ,और यहीं आकर धडाम से गिरती भी है |
और दरअसल यहीं ,इस माध्यम की सीमा (साहित्यिक कहानी के बनिस्पत में ) भी तय हो जाती है |
.................
दरअसल बहुत बारीक़ फर्क है -भूख और स्वाद में ,आजीविका और लालच में |
जब एक बार आप इस राह पर आ जाते हो तो there is no going back .मकड़ी एक पतला सा तार छोडती है कि मैं पेट का गडहा पार कर लूंगी ,पर फिर ,दूसरा -तीसरा बुनते बुनते खुद वह भूल जाती है |एक बड़ा जाल बना डालती है जिसमे कभी खुद ही फंस कर मर जाती है |
इस प्वाइंट ऑफ़ व्यू से जब मैं श्रीदेवी या अन्य हीरोइनों के चमकदार कपडे और स्टाइलिशपने देखती हूँ ,तो ;
फर्स्ट -मैं अपने हिंदीपन को (हाँ ,हमें पता तो होना चाहिए कि हिंदीवाला होने की स्ट्रेंथ क्या है ?)धन्यवाद देती हूँ कि हम इन चीजों को पाने के लिए नहीं लपके |हमने शुरू से अपने आस पास सादा लोग देखे ,जिन्होंने अपने प्यार में जोड़े रखा |सदा यही सिखाया -झुक कर चलना चाहिए |अपनों से नीचे वालों को देखकर चलना चाहिए |एटसेट्रा एटसेट्रा
सेकेण्ड -मुझे उन पर दया आती है |मार्केट में बने रहने की इनकी तड़प -ओहोहोहो |इनके प्रमोशन , इनके इंटरव्यू ,इनके प्रोग्राम ...यूँ ही चलते रहेंगे ,,,जब तक है जान ....जब तक है जान |
सचमुच कठिन है इस बहस में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना |
.................
पर कोशिश तो करनी है |
दरअसल आजीविका का मुद्दा वह ग्राऊंड है जहाँ से इस प्रकार की बहसें उठती हैं ,और यहीं आकर धडाम से गिरती भी है |
और दरअसल यहीं ,इस माध्यम की सीमा (साहित्यिक कहानी के बनिस्पत में ) भी तय हो जाती है |
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दरअसल बहुत बारीक़ फर्क है -भूख और स्वाद में ,आजीविका और लालच में |
जब एक बार आप इस राह पर आ जाते हो तो there is no going back .मकड़ी एक पतला सा तार छोडती है कि मैं पेट का गडहा पार कर लूंगी ,पर फिर ,दूसरा -तीसरा बुनते बुनते खुद वह भूल जाती है |एक बड़ा जाल बना डालती है जिसमे कभी खुद ही फंस कर मर जाती है |
इस प्वाइंट ऑफ़ व्यू से जब मैं श्रीदेवी या अन्य हीरोइनों के चमकदार कपडे और स्टाइलिशपने देखती हूँ ,तो ;
फर्स्ट -मैं अपने हिंदीपन को (हाँ ,हमें पता तो होना चाहिए कि हिंदीवाला होने की स्ट्रेंथ क्या है ?)धन्यवाद देती हूँ कि हम इन चीजों को पाने के लिए नहीं लपके |हमने शुरू से अपने आस पास सादा लोग देखे ,जिन्होंने अपने प्यार में जोड़े रखा |सदा यही सिखाया -झुक कर चलना चाहिए |अपनों से नीचे वालों को देखकर चलना चाहिए |एटसेट्रा एटसेट्रा
सेकेण्ड -मुझे उन पर दया आती है |मार्केट में बने रहने की इनकी तड़प -ओहोहोहो |इनके प्रमोशन , इनके इंटरव्यू ,इनके प्रोग्राम ...यूँ ही चलते रहेंगे ,,,जब तक है जान ....जब तक है जान |
मंगलवार, 6 दिसंबर 2016
फ़िल्मी कहानियां -1
अब बात चल ही पड़ी है तो सोचा फ़िल्मी कहानियों पर कुछ लिखने की बात पेंडिंग थी ,वह भी कह लूँ |क्या पता फिर हम -
कल हो न हो (फ़िल्मी कहानियों की बात चली है तो इतना फिल्मिपन तो बनता है ) खैर .......जोक्स अपार्ट
यह बात तब की है जब हम गुंडे फिल्म देखने गए थे |18-२-१४ को (एक्चुअली उससे पहले गए होंगे ,इस तारीख की तो डायरी एंट्री है ) | पाठक याद करें कि ये ही दिन थे जब मैं कहानीपन के बारे में चिंतनरत थी |
वहां फिल्म देखते हुए लगा कि कितना पैसा बहाया (खर्चा नहीं )जाता है एक nonsensical स्टोरी को दिखाने के लिए |फिर सोचा मैं यहाँ (थिएटर में )क्यूँ हूँ ?<क्योंकि सान्या ,मेरी बड़ी बेटी ,ने जिद की <सान्या ने जिद क्यों की <क्योंकि उसने इस फिल्म का 'टन टन 'वाला गाना टीवी पर देखा था <उसने यह गाना क्यों देखा था ?<क्योंकि टीवी तो बच्चे देखते ही हैं |
in short
फिल्म देखना is not a choice .it is a compulsion . एक्चुअली हमारी लाइफ में से ऑप्शन धीरे धीरे ख़त्म हो रहे हैं |और हम एक बहुत बड़ी धारा में बहे जा रहे हैं |यह हमारी मज़बूरी है |
उस दिन वहीँ बैठे हुए (क्योंकि फिल्म में मुझे ज़रा भी मज़ा नहीं आ रहा था )-
मेरे माइंड में एक ओर हिंदी के आलोचकों(क्योंकि हिंदी से हूँ ) के बाजारवाद के लानत-मलानत के लेख घूम गए (सचमुच वे कितनी मेहनत करते हैं इन सब चीजों को समझने-समझाने की ) और दूसरी ओर महानगरीय सभ्यता पर लिखे (क्योंकि मैंने इस विषय में पीएचडी जमा की है )उन विद्वानों की लिखी हुई किताबों के उद्धरण घूम गए जहाँ उन्होंने महानगर को एक विशालकाय पिंजरा बताया है |
और मैंने हॉल में बैठे हुए सचमुच अपने आप को पिंजरे में बंद किसी पक्षी के समान बेबस महसूस किया |(इन चीजों को इस तरह से सोचना सचमुच बहुत हैवी होता है )
.....
मगर लाइफ तो लाइफ है |वह तो रूकती नहीं | हम बेबस महसूस करें या नहीं आखिर रास्ता क्या है |क्या हो जाता है जानने से ,जब हम उसे बदल नहीं सकते ?...मगर इन्सान और इन्सान की जात आखिर इस तरह निरुपाय होकर भी कैसे बैठे ? .........तब आखिर मैंने सोचा कि क्या हम ऐसी कहानियां नहीं लिख सकते जो meaningful हो |
तो इस तरह मैं फ़िल्मी कहानियों पर सोचने में प्रवृत हुई |
एक बार जो थोट प्रोसेस चला तो then i realize की फ़िल्मी कहानियों पर अब तक की मेरी समझ बौद्धिकतावाद से ग्रस्त बचकानी समझ थी जो इधर उधर के बौद्धिकतावादी रिव्यूस पढ़कर बनी थी .ऐसे रिव्यूस एक खास प्रकार के बौद्धिकतावादी अहंकार से ग्रस्त होकर लिखे जाते है जिनका उद्देश्य अपने पाठकों को आतंकित करना होता है | पाठकों में भी वे इसी प्रकार की रूचि को प्रसारित करते हैं |मेरा इशारा आर्ट फिल्मो की ओर है ,जिन्हें मैं पहले ,अपने इंटेलिजेंट होने के दंभ में जबरन पसंद करती थी |पसंद तो मुझे मेन स्ट्रीम वाली फिल्मे भी थी पर लोगो को बताते हुए मैं आर्ट फिल्मो के नाम ज्यादा लेती थी |
...........................
फ़िल्मी कहानियां भी कहानिया होती हैं ,पर वे सिर्फ कहानियां नहीं होती |
एक फिल्म में बहुत क्षेत्रों का टेलेंट यूज़ होता है |म्यूजिक ,कोस्ट्युम ,मेकअप ,एक्टिंग ,डांस एटसेट्रा एटसेट्रा
एक फिल्म की मेकिंग में बहुत से लोग इन्वोल्व होते हैं |उनका जीवन -आजीविका उस पर निर्भर होती है |
एक साहित्यिक कहानी का लेखक अपने सरोकारों के लिए आजीवन लिख सकता है |इससे सिर्फ उसका जीवन या अधिक से अधिक उसके परिवार का जीवन प्रभावित होगा |
परन्तु एक फिल्म का निर्माता यह रिस्क नहीं उठा सकता |
फिल्म की कहानी के लिए -उसका चलना -सबसे पहली शर्त है |
.......
तो इस तरह सोचते हुए ,डिस्कशन यहाँ तक पहुंची कि कौन सी कहानियां चलती हैं <क्यूँ चलती हैं |
तो इस तरह ख्याल सलमान खान ,अक्षय कुमार वगैरह की फिल्मो की ओर गया और तब स्टारडम ,ब्लोकबस्टर ,ये शब्द दिमाग में आये | .............contd
कल हो न हो (फ़िल्मी कहानियों की बात चली है तो इतना फिल्मिपन तो बनता है ) खैर .......जोक्स अपार्ट
यह बात तब की है जब हम गुंडे फिल्म देखने गए थे |18-२-१४ को (एक्चुअली उससे पहले गए होंगे ,इस तारीख की तो डायरी एंट्री है ) | पाठक याद करें कि ये ही दिन थे जब मैं कहानीपन के बारे में चिंतनरत थी |
वहां फिल्म देखते हुए लगा कि कितना पैसा बहाया (खर्चा नहीं )जाता है एक nonsensical स्टोरी को दिखाने के लिए |फिर सोचा मैं यहाँ (थिएटर में )क्यूँ हूँ ?<क्योंकि सान्या ,मेरी बड़ी बेटी ,ने जिद की <सान्या ने जिद क्यों की <क्योंकि उसने इस फिल्म का 'टन टन 'वाला गाना टीवी पर देखा था <उसने यह गाना क्यों देखा था ?<क्योंकि टीवी तो बच्चे देखते ही हैं |
in short
फिल्म देखना is not a choice .it is a compulsion . एक्चुअली हमारी लाइफ में से ऑप्शन धीरे धीरे ख़त्म हो रहे हैं |और हम एक बहुत बड़ी धारा में बहे जा रहे हैं |यह हमारी मज़बूरी है |
उस दिन वहीँ बैठे हुए (क्योंकि फिल्म में मुझे ज़रा भी मज़ा नहीं आ रहा था )-
मेरे माइंड में एक ओर हिंदी के आलोचकों(क्योंकि हिंदी से हूँ ) के बाजारवाद के लानत-मलानत के लेख घूम गए (सचमुच वे कितनी मेहनत करते हैं इन सब चीजों को समझने-समझाने की ) और दूसरी ओर महानगरीय सभ्यता पर लिखे (क्योंकि मैंने इस विषय में पीएचडी जमा की है )उन विद्वानों की लिखी हुई किताबों के उद्धरण घूम गए जहाँ उन्होंने महानगर को एक विशालकाय पिंजरा बताया है |
और मैंने हॉल में बैठे हुए सचमुच अपने आप को पिंजरे में बंद किसी पक्षी के समान बेबस महसूस किया |(इन चीजों को इस तरह से सोचना सचमुच बहुत हैवी होता है )
.....
मगर लाइफ तो लाइफ है |वह तो रूकती नहीं | हम बेबस महसूस करें या नहीं आखिर रास्ता क्या है |क्या हो जाता है जानने से ,जब हम उसे बदल नहीं सकते ?...मगर इन्सान और इन्सान की जात आखिर इस तरह निरुपाय होकर भी कैसे बैठे ? .........तब आखिर मैंने सोचा कि क्या हम ऐसी कहानियां नहीं लिख सकते जो meaningful हो |
तो इस तरह मैं फ़िल्मी कहानियों पर सोचने में प्रवृत हुई |
एक बार जो थोट प्रोसेस चला तो then i realize की फ़िल्मी कहानियों पर अब तक की मेरी समझ बौद्धिकतावाद से ग्रस्त बचकानी समझ थी जो इधर उधर के बौद्धिकतावादी रिव्यूस पढ़कर बनी थी .ऐसे रिव्यूस एक खास प्रकार के बौद्धिकतावादी अहंकार से ग्रस्त होकर लिखे जाते है जिनका उद्देश्य अपने पाठकों को आतंकित करना होता है | पाठकों में भी वे इसी प्रकार की रूचि को प्रसारित करते हैं |मेरा इशारा आर्ट फिल्मो की ओर है ,जिन्हें मैं पहले ,अपने इंटेलिजेंट होने के दंभ में जबरन पसंद करती थी |पसंद तो मुझे मेन स्ट्रीम वाली फिल्मे भी थी पर लोगो को बताते हुए मैं आर्ट फिल्मो के नाम ज्यादा लेती थी |
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फ़िल्मी कहानियां भी कहानिया होती हैं ,पर वे सिर्फ कहानियां नहीं होती |
एक फिल्म में बहुत क्षेत्रों का टेलेंट यूज़ होता है |म्यूजिक ,कोस्ट्युम ,मेकअप ,एक्टिंग ,डांस एटसेट्रा एटसेट्रा
एक फिल्म की मेकिंग में बहुत से लोग इन्वोल्व होते हैं |उनका जीवन -आजीविका उस पर निर्भर होती है |
एक साहित्यिक कहानी का लेखक अपने सरोकारों के लिए आजीवन लिख सकता है |इससे सिर्फ उसका जीवन या अधिक से अधिक उसके परिवार का जीवन प्रभावित होगा |
परन्तु एक फिल्म का निर्माता यह रिस्क नहीं उठा सकता |
फिल्म की कहानी के लिए -उसका चलना -सबसे पहली शर्त है |
.......
तो इस तरह सोचते हुए ,डिस्कशन यहाँ तक पहुंची कि कौन सी कहानियां चलती हैं <क्यूँ चलती हैं |
तो इस तरह ख्याल सलमान खान ,अक्षय कुमार वगैरह की फिल्मो की ओर गया और तब स्टारडम ,ब्लोकबस्टर ,ये शब्द दिमाग में आये | .............contd
सोमवार, 5 दिसंबर 2016
काफी हैविनेस हो गयी है |थोडा लाइट करते हैं |
शाहरुख़ खान ने एक इंटरव्यू में कहा -the only way to move from a bad phase is to work more .actually you have no option either .
कितनी सुंदर बात है |
मुझे फ़िल्मी कलाकारों के इंटरव्यूस वगैरह देखने का बहुत शौक है |बहुत शौक है |पर मैं देखती हूँ ज्यादातर स्तरीय इंटरव्यूस इंग्लिश में ही हैं | हिंदी में ढंग के हैं ही नहीं |1-२ को छोड़कर |बल्कि हिंदी में ,कई तो इतने बचकाने होते हैं कि देखकर हंसी आती है कि क्या पूछ रहे हैं |वे लोग भी हँसते हैं |
एक जगह मैंने देखा दिलवाले की प्रमोशन पर एक ने शाहरुख़ से पूछा की आप गौरी को भी टुकुर टुकुर देखते थे क्या ?साथ में गाने की क्लिप चला दी और ये सवाल दाग दिया |बेचारा शाहरुख़ ....वो बोला भी कि इतनी पुरानी बात पर कहाँ से पहुंच गए ....पर नहीं .....फिल्म में टुकुर टुकुर गाना है तो पत्रकार जी को तो यही सवाल पूछना है ................. हिंदी वालों का गानों से ओबसेशन ..... कमाल है|
इंग्लिश में भी कई तो स्तरीय है ,कई तो इंग्लिश की आड़ में पर्सनल तांक -झाँक ज्यादा करते है |वे तो और भी ज्यादा बुरे लगते हैं |एटलीस्ट बेचारे हिंदी वालों में कुछ मासूमियत तो है |
इंग्लिश में जो स्तरीय है ,वे अच्छा काम कर रहे है |अनुपमा , tete-e -tete वाली ,ndtv वगैरह |
इन इंटरव्यूस से फिल्म मेकिंग ,कहानी ,इंडस्ट्री ,वर्क एथिक्स ,अप्स एंड डाऊन,बाज़ार .......रिलेशनशिप्स ...........बहुत सी बातें पता चलती है | नॉलेज बढती है |मुझे तो देखने का बहुत शौक है |
शाहरुख़ खान ने एक इंटरव्यू में कहा -the only way to move from a bad phase is to work more .actually you have no option either .
कितनी सुंदर बात है |
मुझे फ़िल्मी कलाकारों के इंटरव्यूस वगैरह देखने का बहुत शौक है |बहुत शौक है |पर मैं देखती हूँ ज्यादातर स्तरीय इंटरव्यूस इंग्लिश में ही हैं | हिंदी में ढंग के हैं ही नहीं |1-२ को छोड़कर |बल्कि हिंदी में ,कई तो इतने बचकाने होते हैं कि देखकर हंसी आती है कि क्या पूछ रहे हैं |वे लोग भी हँसते हैं |
एक जगह मैंने देखा दिलवाले की प्रमोशन पर एक ने शाहरुख़ से पूछा की आप गौरी को भी टुकुर टुकुर देखते थे क्या ?साथ में गाने की क्लिप चला दी और ये सवाल दाग दिया |बेचारा शाहरुख़ ....वो बोला भी कि इतनी पुरानी बात पर कहाँ से पहुंच गए ....पर नहीं .....फिल्म में टुकुर टुकुर गाना है तो पत्रकार जी को तो यही सवाल पूछना है ................. हिंदी वालों का गानों से ओबसेशन ..... कमाल है|
इंग्लिश में भी कई तो स्तरीय है ,कई तो इंग्लिश की आड़ में पर्सनल तांक -झाँक ज्यादा करते है |वे तो और भी ज्यादा बुरे लगते हैं |एटलीस्ट बेचारे हिंदी वालों में कुछ मासूमियत तो है |
इंग्लिश में जो स्तरीय है ,वे अच्छा काम कर रहे है |अनुपमा , tete-e -tete वाली ,ndtv वगैरह |
इन इंटरव्यूस से फिल्म मेकिंग ,कहानी ,इंडस्ट्री ,वर्क एथिक्स ,अप्स एंड डाऊन,बाज़ार .......रिलेशनशिप्स ...........बहुत सी बातें पता चलती है | नॉलेज बढती है |मुझे तो देखने का बहुत शौक है |
शुक्रवार, 4 नवंबर 2016
सोमवार, 10 अक्टूबर 2016
कहानी - पोशाक
उसके लिए पति और पति -भाव
अब दो अलग अलग चीज हो गए थे।
थे तो वे पहले से ही अलग पर
उसे यह मालूम नहीं था या कहें उसे यह मालूम होने से बचाया गया था। बचाने वाले लोग
बड़े ही आत्मीय और उसका सदैव हित चाहने वाले ,हिताकांशी जन थे ,इसलिए
उसे कभी कुछ शुबहा भी नहीं हुआ कि कोई बड़े हित की ऐसी बात है जिसे उसे मालूम होने
से बचाया जा रहा है।
या कहें कि हिताकांशी जन
स्वयं गफलत में थे या रहे होंगे। क्या मालूम? कुछ कह नहीं सकते।
दरअसल वह लड़की जहाँ रहती
थी उस देश की रिवाज ही ऐसी थी ।वहां सदियों की मेहनत के बाद असंख्य स्त्री- पुरुष जनों ने मिलकर
पति- भाव नामक एक ऐसी पोशाक तैयार की थी जिसे पहनते ही पुरुष पूर्ण पुरुषत्व के
भाव में आ जाते थे। बल ,शौर्य ,वीरता ,पराक्रम आदि पुरुषोचित
भावों के स्वयमेव स्वामी हो जाते थे। ऐसी चमत्कारी पोशाक थी वह।
इस पोशाक की एक और खासियत
थी। प्रचलित कायदा यह है कि व्यक्ति की नाप के हिसाब से पोशाक तैयार की जाती
है पर यहाँ पोशाक के हिसाब से व्यक्ति तैयार किये जाते थे। यही नहीं पोशाक तैयार
करने वाला व्यक्ति भी इस के
अनुसार स्वयं को
तैयार करता था |
सदियों से माएँ अपनी
बेटियों के लिए पोशाक और पोशाक के लिए बेटियां तैयार करती आयी थीं। इस नये ज़माने
में बेटियों ने यह जिम्मा स्वयं उठा लिया था।
ऐसा नहीं था कि पोशाक की
नाप और डिजाइन सदा काल एक सी रही हो। नहीं ,काल और स्थान परिवर्तन के साथ इसकी डिज़ाइन बदलती गयी थी। यह और अधिक
चुस्त और आकर्षक होती गयी थी। आजकल यह पोशाक कोटनुमा शक्ल में ,बढ़िया सूटलेंथ के कपडे में
,गले और
बाजु पर गोल्ड या सिल्वर की ज़री में उपलब्ध थी।
उस लड़की के घरवाले भी यह चाहते
थे कि उसके लिए एक पोशाक तैयार हो। पर वह लड़की खिलंदड़ी सी थी। उसके
आत्मीयजनों ,विशेषकर
उसके पिता को यह भरोसा नहीं था कि वह लड़की कभी अपने लिए कोई पोशाक तैयार कर
पाएगी। इसलिए उन्होंने उसे कुछ इधर उधर के कामों में डाल दिया था ,कुछ पढ़ा लिखा दिया था कि
चलो ! और कुछ नहीं तो अपना गुज़ारा तो कर ही लेगी।
लड़की जैसा पहले कह आयें
हैं ,खिलंदड़ी
थी। उसने खेल खेल में ही कई काम सीख लिए थे। कुछ लिखना पढ़ना करने लगी थी। वह
लड़की अपने आस पास की जगहों पर सारा दिन डोलती फिरती थी। धूप,बारिश,भूख प्यास का ज़रा भी ख्याल
नहीं था उसे। या कहें ये सब महज़ शब्द नहीं थे उसके लिए ,इन शब्दों की दैहिक
वास्तविकता को वह भली भांति समझती थी। उसकी समझ कुछ अलग तरह की थी। अमूमन किसी से
मेल नहीं कहती थी |जो भी हो
|अपने समय की लड़कियों जैसा एक भी शऊर नहीं था उसमे ,पूरी रवल्ली थी।
खिलंदड़ी थी ,रवल्ली थी ;पर थी तो लड़की। ऐसा कैसे
सम्भव था कि उसके समय की लड़कियां जिस कार्य में इतने जोर शोर जुटी थी या यूँ
कह लें कि यही कार्य उनके जीवन का एकमात्र कार्य था ,उस कार्य की महत्वपूर्णता
को वह अनदेखा कर देती। इसलिए इधर उधर की देख सुनकर उसने भी उस पोशाक पर
काम करना शुरू किया ,जो उसकी
माँ ने एक पुराने संदूक में से निकाल कर दी थी।
वह पोशाक क्रीम कलर का ,थ्री
पीस सादा सूट था ,जिस पर
कोई डिजाइन नहीं था। उस लड़की ने उस पर अपनी मनपसंद कशीदाकारी की थी। पुरुष छवि के
जितने भी रूप वह देखती ,उनको
अपनी कल्पना के रंगीन धागों से पोशाक पर काढ़ देती। टी वी पर ,सिनेमा में वह प्रेमी पुरुषों
की जिस जिस अदा पर फ़िदा होती ,उस अदा
को बड़ी सफाई से पोशाक पर टांक देती थी। जैसी पुरुषोचित अदा वह
पोशाक पर टांकती थी ठीक उसका संपूरक स्त्रियोचित भाव उसके भीतर उग जाता था।
यह उस चमत्कारी पोशाक की एक और चमत्कारी विशेषता थी।
इस प्रकार उसने पोशाक पर
तरह तरह की मनभावन अदाएं ,हाव- भाव
टांक दिए थे ,जिन्हें देख देखकर वह फूली नहीं समाती थी। फूली फूली सी वह सारा दिन
इतराई हुई ,इधर उधर
डोलती फिरती थी।
एक बात और हुई थी। यह बात
ठीक उस बात की रिवर्स थी जो वह बाहरी प्रभावों के टीमटाम पोशाक पर लगा रही थी।
नहीं, यह भाव उसके भीतर से उगा था ,जिसकी कृत्रिम प्रतिकृति उसने बाजार से खोजकर पोशाक में लगाई थी।
कहाँ से ?कैसे? कब? ,ठीक
ठीक कह नही सकते पर यह भाव जब उसके भीतर उगने लगा था तो एक विशेष प्रकार की चिकनाई
उसके चेहरे पर ,उसके स्वभाव
में और उसके बर्ताव में आने लगी थी। गुजरते वक्त के साथ यह स्निग्धता उसके भीतर इस
कदर रच पच गयी ,इतनी अभिन्न हो गयी जैसे फूलों
की कोमलता ,पानी की
तरलता उनके द्रवत्व से अभिन्न है।
स्निग्धता के इस भाव ने
उसके हृदय को गहरा कर सागर- सम बना दिया था। सपनो में वह नीला ,विस्तृत ,गहरा समुद्र देखती थी।
जिसका ओर था न छोर।
कभी अपने आपको नीले, विस्तृत, आकाश में उड़ता हुआ देखती थी।
प्रारंभिक यौवन वय ही रही होगी उसकी उस वक्त। चपल
तो थी ही। इस आसमानी गहराई लिए हुए नीले रंग ने उसे बेचैन बना दिया था। साफ-
शफ्फाक आसमानी नीला रंग !!!,जिसमे
विस्तार के साथ गहराई भी थी। मैदानों के ऊपर आसमान का रंग तो हल्का सलेटी
होता है | हाँ ,बर्फीले पहाड़ों की तरफ आसमान का रंग वैसा ही नीला था ,जैसा वह सपनो में देखती थी |
अपने मन में उगे भाव के
अनुरूप वस्तुरुप को पोशाक में सज्जित करने के लिए वह व्यग्र रहती। उसकी आँखें
अपने सामने आ पड़ने वाली छवियों को तलाशती रहती।टी वी देखते हुए ,कोई मैगजीन पलटते हुए ,फिल्म देखते हुए या बाजार
में कहीं सामान खरीदते हुए - आँखों की अनवरत तलाश जारी रहती।
“क्या हो सकती है वह
चीज़ ?” वह सोचती | -नीली आभा लिए कोई कीमती पत्थर ,नीला कांच ,नीला चाँद ,नीली आंखें ,नीला कमल , नीली मुस्कान,
नीली चितवन ,नीली अदा
-नीलेपन की मारी उस लड़की ने उन वस्तुओं पर भी नीलापन आरोपित कर दिया था जो नीली
या किसी भी रंग की नहीं होती।
आँखें !!!!!!
वह ख़ुशी से चिल्लाई।
हाँ ! आँखें ही हो सकती हैं
वह चीज जो आत्मा में गहरे अनुभूत किये किसी भाव को साफ साफ दिखाती हैं। यह
ख्याल आते ही वह तुरंत ,सब्र तो
उसमे था ही नहीं ,बाजार से
दो बड़े ,चमकते
हुए ,आसमानी
नीली आभा लिए हुए कांच के टुकड़े ले खरीद लायी थी। ये टुकड़े अपने साफपन में आँखों
से दिखाई पड़ते थे। इन टुकड़ो को चांदी में मंडवाकर उसने कॉलर लिंक बनाकर पोशाक में
लगा लिया था ,ताकि ऐन
सामने होने से ये सबको दूर से ही नज़र आ जाएँ। बेशक इन लिंक्स से पोशाक की शोभा
दोगुनी हो गयी थी। इन्हें देखकर देखकर वह फूली नहीं समाती थी। इन्हें देखकर उसके
भीतर का स्निग्ध भाव और पुष्ट होता था मानो वे कांच के निर्जीव टुकड़े न होकर सजीव
अलंकरण हों।
इस पोशाक को वह सभी नज़रों
से छिपाकर रखती थी। किसी को भी दिखाती नहीं थी। सहेलियां हंसकर कहती ,”हमें तो
दिखा दो ,कैसी
बनाई है।“ पर वह किसी की नहीं सुनती थी। वह जानती थी कि वे भी अपनी पोशाकें तैयार
कर रही हैं।
“जब वे नहीं दिखाती तो मैं
ही क्यों अपनी पोशाक दिखाकर पुरानी करूँ “ -वह स्त्री सुलभ ईर्ष्या में सोचती।
इस बीच उसे कहीं से भी पता
चलता कि आजकल पोशाक में फलां बटन या वर्क लगाने का रिवाज चला है तो वह फ़ौरन बाजार
जाती और जब तक नए रिवाज़ के बटन ,बेल -बूटे ,जरी पोशाक में काढ़ नहीं
लेती ,तब तक उसे
चैन नहीं पड़ता था। इस काम में वह रात दिन ,भूख प्यास सब भूल जाती थी। माँ टोकती थी “खाना तो खा ले। थोड़ा आराम
कर ले।“ पर वह किसी की नहीं सुनती थी। बडी मेहनत ,मन और वक्त लगाकर उसने पोशाक तैयार की थी।
उस पोशाक को उस लड़की ने
शादी होने तक बड़े ही अरमानों के साथ सहेजा था। इस विश्वास के साथ कि इसे वह अपने
भावी पति को पहनाकर ताजिंदगी सुखों की छाया में रहेगी। और हालाँकि भावी पति को
पहली बार देखने पर वह कुछ सशंकित हुई थी कि इन्हें यह पोशाक फिट होगी या नही |पर
पार्क की बेंच पर ‘उनके’ साथ काजू की
बर्फी का छोटा टुकड़ा मुँह में डालते हुए उसने अपने संशयों को दरकिनार कर दिया।
उसे पोशाक के चमत्कार पर पूरा भरोसा था।
विवाह के समय अन्य कीमती
सामान के साथ वह पोशाक भी लायी थी ,जिसे उस समय दहेज़ देखने वाले किसी भी संबंधी जन ने देखा नहीं था। पर
सब जानते थे कि वह पोशाक लायी है। दरअसल सभी की नज़रों से बचाकर उसने बड़ी
सफाई और तत्परता से वह पोशाक अपनी ब्लाऊज़ के बाएं हिस्से में ,हृदय के पास पहले ही रख ली
थी कि शादी की भीड़भाड़ में इतनी कीमती चीज के इधर उधर हो जाने का शुबहा न
रहे।
भाभियों ने मुस्कुराकर
इशारों में पूछा पोशाक कहाँ है? कहाँ छुपाई है? पर वह शर्म से आँखें नीची किये
बैठी रही। उसका जवाब मौन था।
अंततः उसने वह पोशाक ,सिर्फ
और सिर्फ ,अपने पति को सुहागरात की अतिप्रतीक्षित बेला में दिखाई थी ,इस शर्त के साथ कि वह उसे
पाने का हक़दार तभी होगा जब वह पोशाक पहन लेगा। पति ने कुछ आश्चर्य से ,कुछ विस्मय से पोशाक को
देखा। पोशाक की भव्यता में उसे मंत्रमुग्ध कर दिया।
और हालांकि एक ढीले नाप की,
झालर लगी हुई एक पोशाक वह भी उसके लिए लाया था पर एक तो उसकी लाई हुई पोशाक की भव्यता
देख कर ,दूसरे
उसके भीतर से चमक रही नए रिवाज की चुस्त पोशाक देखकर वह कुछ घबरा गया और उसने
अपनी लायी पोशाक तकिये के नीचे ही रहने दी ,निकाली नहीं। लड़की ने कनखियों में वह पुरानी पोशाक देख ली थी |उसे हंसी आयी |पर वह कुछ
बोली नहीं।
पति एक पुरानी ,हलके कपडे की तंग नाप की
पोशाक पहले से पहने था। वह कमीजनुमा पोशाक इतनी तंग थी कि उसके शरीर से चिपक ही
गयी थी। उसने कोशिश भी की उतारने की पर वह उतरी नहीं। इसलिए उसने वह नयी
पोशाक उसके ऊपर ही पहन ली|
वाह !!!!!
पोशाक एकदम फिट थी। वह खुशी
से मदमस्त हो गयी। पति ने पोशाक पहने पहने ही उसे बाँहों में भर लिया। उन
मदहोशी के क्षणों में उसने भी बुरा नहीं माना कि इतनी कीमती पोशाक में सिलवट पड
जायेगी।
अगले दिन घरवालों ने उसे
नयी पोशाक में देखा तो आँखें बदली। पर ये कोई खास बात नहीं थी। इसे अपनी विजय का
चिन्ह समझकर वह हँसता हुआ बाहर निकल गया।
आने वाले दिन नीले आसमानों
में उड़ने के थे। आसमान में उड़ते हुए वे किसी हिल स्टेशन पर गए और आसमान में उड़ते हुए ही वापस
आये। वहां बैलून में ,ट्राली
पर उन्होंने आसमान की खूब सैर करी। नदी के बीचों बीच पड़े एक पत्थर पर जब वह फोटो
क्लिक कर रही थी तो उसने एंगल इस प्रकार रखा कि फोटो में सिर्फ पति और बैकग्राउंड
में नीला आसमान रहे। रुमानियत से भरे दिनों की उमंग में दोनों उड़ रहे थे। ऐसे ही
एक मौके पर पहाड़ी फिसलन से बचाते हुए पति ने उसका हाथ इस अदा से पकड़ा कि वह लट्टू ही हो गयी। उस दिन उसके पैर
जमीन पर पड़े ही नहीं।
इस दौरान वे जहाँ भी जाते ,पति अपनी नयी पोशाक पहनता
था। पोशाक की भव्यता उस पर असर कर रही थी। वह पहले से अधिक जिम्मेदार ,जागरूक और गंभीर नज़र आता
था। उसके हाथों में हाथ डालकर मॉल रोड पर घूमते हुए वह अवर्णनीय तृप्ति का सुख
अनुभव करता था। इस बीच पहाड़ों से उतरते हुए या पानी में खेलते हुए पोशाक पर के
कुछ अलंकरण कहीं गिर भी गये थे तो दोनों ने इसकी परवाह नहीं की थी। वे पहाड़ के
ऊपर नीले आसमान में खो जा रहे थे।
इस बीच एक महत्वपूर्ण बात
और हुई थी। वे भाव जिनके कारण वह लड़की फूली फूली सी महसूस करती थी ,अब भाव रूप न रहकर स्थूल
रूप होकर उसके शरीर की फुलावट में दिखने लगे थे। वह पहले से भरी हुई ,विशेष काँति युक्त ,आकर्षक नज़र आती थी। यही हाल
पति का भी था।
ऐसे ही रंगीन दिनों की
रंगीन शाम का एक वाकया है। तब वे अपने घर लौट आये थे।दोनों बाहर कहीं , बाइक पर घूमने जा रहे थे।वह
पति की कमर में हाथ डाले पीछे बैठी थी कि एक दोराहे पर उनकी बाइक दूसरी बाइक से
टकरा गयी। टक्कर तो मामूली थी |पर वह आदमी बड़ा जबरदस्त था। बात की बात में
उसने बाइक साइड में लगवाकर जो धमकाना शुरू
किया तो पति की तो सिट्टी पिट्टी गुम। वे लगे सफाई देने। और हालाँकि उस समय भी
उन्होंने पोशाक पहन राखी थी ,जिसके मुताबिक यह चमत्कार होना चाहिए था कि पति
रोबदार आवाज़ मे उस आदमी को चुप करा देते या पति की रोबदार आवाज़ सुनकर वह खुद चुप
हो जाता ,पर ऐसा
कुछ हो नहीं रहा था |उस आदमी के आगे अपने पति को कूतरु तईं मिमियाते देख उसके गर्व
को ठेस सी लगी। उस का वह खास विनय और शर्म वाला भाव जो
एक रोबदार पति की पत्नी होने के भाव का संपूरक था ,वह भाव ,उस दिन ,उसके
भीतर से गायब हो गया। और हालाँकि चेहरे की कमनीयता और कोमलता ज्यों की त्यों
बरक़रार रही पर वह खास विनय और शर्म वाला भाव अब
नहीं था |
इस बात को पति ने भी नोट
किया। वह बड़ी व्यग्रता के साथ पोशाक संभाल रहा था कि तभी उसने देखा कोहनी का
हिस्सा उधड़ गया है। घर आकर उसने उधड़े हिस्से की सिलाई कर दी। उस दिन देर रात तक
उसका मूड ख़राब रहा।
फिर ऐसा हुआ कि कई महीनों
के बाद पति पोशाक में असहज महसूस करने लगा था। वह भारी कपडे की कीमती पोशाक थी
जिसे सारा दिन पहने पहने वह अकड़ सा जाता था। वह चाहता था कि वह आज़ादी से अपने
हाथ पैर चलाए ,पर पोशाक
की भव्यता उसे एक खास तरीके से उठने ,बैठने ,खड़े
होने ,चलने को
बाध्य करती थी। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था। पर पोशाक की फॉर्मेलिटी उसके बोलने के
तरीके ,लफ़्ज़ों
के चुनाव ,बातचीत
में विषयों के चुनाव ,सिगरेट
पकड़ने के तरीके तक को नियंत्रित कर रही थी। इन सबसे अब वह खीजने लगा था।
और अक्सर डिनर के समय या बाहर
आउटिंग के वक्त पति की खीज को उसने भी नोटिस तो किया था ;वह इस बात से विचलित भी हुई
थी कि ‘ये’ ढंग से बिहेव क्यों नहीं करते पर फिर अन्य जनों के सामने वह बात को संभाल
लेती थी कि कहीं वह स्वयं सबके आगे उपहास की पात्र न बन जाए कि उसकी पोशाक सही
नहीं बनी है।
ऐसे ही एक अवसर पर दूसरा
वाकया हो गया। असल में तो वह घटना पहले भी घट चुकी थी पर वाकये के तौर पर
याद रखे जाने लायक उसने नोटिस ,
उस दिन की थी। क्या हुआ था कि अपने घरवालों के साथ डिनर के बाद उसने
देखा ऐन बिल अदायगी के वक्त पति सहसा व्यस्त हो गया था। कभी पानी पी रहा था। कभी
मोबाइल पर बात कर रहा था। इस बीच वह नयी पोशाक के भीतर पड़ी पुरानी कमीज को बार बार छू रहा था।
पति की इस चीप हरकत से वह
हैरान रह गयी। उसने तुरंत लज्जा को अवाइड किया और तटस्थ रहने का प्रयत्न किया ,जिसमें
वह सफल भी हो गयी| तटस्थ भाव से अपने पति को निहारते हुए उसने दोबारा अपनी बनाई
पोशाक को देखा। उसे महसूस हुआ की पोशाक पर लगा कपडा उतना मज़बूत नहीं था जितना उसे
बताकर दिया गया था। पोशाक की मज़बूती के भाव के ख़त्म होते ही उसके भीतर वह खास
अधिकार वाला भाव छिन्न भिन्न हो गया जिसके कारण वह एक गरिमामयी महिला होने का गौरव
प्राप्त करती थी। उस भाव के ख़त्म होते ही उसने अपने आपको सर्वथा श्रीहीन ,कमजोर महसूस किया।
उस दिन वह बात को संभाल नही
सकी और खेद जताकर लौट आयी।
उस दिन उनके कमरे में
घमासान मचा था। नाराज़गी के अवसर तो पहले भी आये थे। अक्सर घर में हुई किसी बात पर
या पति के लेट आने पर वह मुँह फुला लेती थी |पति पहले उसे मनाता था ,फिर बाँहों में भरे भरे ही
बेड तक लाता था। मनौवल की अवधि गुस्से
की अंत्यता पर निर्भर करती थी। कभी वह जल्दी तो कभी बहुत देर से मानती थी। धीरे
धीरे उनकी लाइफ में इस बात का एक पैटर्न ही बन गया था । यहाँ तक की एक निश्चित
अवधि के बीच यह प्रक्रिया बार बार दोहराई जाने लगी थी। पति को इन सबसे अब ,ऊब होने लगी थी।
उस दिन ऐसा ही हुआ था। वह
बेहद गुस्से में थी और जोर जोर से बोले जा रही थी। पति का उसे मनाने का कोई मूड
नहीं था। वह कुछ देर यूँ ही बैठा रहा। अपनी बातों का जवाब न मिलता देखकर वह गुस्से
से पागल हो गयी। गुस्से की प्रचंड मुद्रा में मुख विकृत हो जाता है। पति को उसे
देखकर विरक्ति सी हुई।
‘कैसी लग रही है ?‘ - पति ने
इतना कहा और दूसरी तरफ मुँह करके सो गया।
उस प्रचंड क्रोधित अवस्था
में भी उसने पति की विरक्ति को देख लिया और आगे के लिए सावधान हो गयी। उस दिन के
बाद से पति निरपेक्ष होता गया।
पति की निरपेक्षता ने उसे
सकते में डाल दिया। वह अजीब से अवसाद का शिकार हो गयी। उसके बाद तीसरा, चौथा ,पांचवा ........ और भी
वाकये हुए। पोशाक के ज़रीदार बेल- बूटे ,जिन्हें उसने इतने अरमानो से काढ़ा था ,उधड़ते गए ;सलमा सितारे जिन्हें एक एक
कर टांकते हुए उसने कितनी रोमांटिक कल्पनाएं की थी ,उखड़ते गए। यहाँ तक की वह अब इतनी बदरंग हो गयी थी
कि पति ने पहनना ही छोड़ दिया था। खूंटी पर टंगी उस पोशाक पर गर्द जमने लगी थी।
वह अपनी बनाई हुई पोशाक को
देखती थी और आंसू बहाती थी। पोशाक की भाँती उसकी जिंदगी भी बदरंग होती जा रही थी।
उसके चेहरे की कांति खत्म हो गयी थी। उसकी बातों की खिलखिलाहट कहीं गुम हो गयी थी।
वह दिन भर चुप रहती। खाना ,पीना ,सोना ,घर का काम करना -जीवन की सारी
क्रियाएं यंत्रवत करती थी।
ऐसी उदास घड़ियों में वह
पोशाक को देख देखकर और अधिक उदास हो जाती। उसकी वेदना के सबसे बड़े कारण थे -वे दो
कांच के कॉलर लिंक ,जो अब भी
वहीँ टंगे थे। उन टुकड़ों का संपूरक भाव जो उसके भीतर जब उगा था ,तो उसे जीवन ,जगत ,परिवार सब उसी की आभा की रंजित
दिखाई देता था। उगने के बाद दिन से इनकी आभा उसके भीतर इस कदर व्याप्त हो गयी थी कि
वह सोचती थी की अगर यह भी बुझ गयी तो वह जीवन की अंतहीन तमस गुफा में किस प्रकार
रहेगी ? यह डर उसे
चैन से बैठने नहीं देता था। अब उसे
इनकी महत्वपूर्णता पर संदेह होने लगा था | उन
टुकड़ों को उसने उतार कर अलमारी में रख दिया |
रोज़
प्रति रोज़ उसकी उदासी गहराती जाती थी और यह तय था कि वह इस उदासी की गहराई में डूब
जाती अगर वह खिलंदड़ी न होती। उस लड़की के स्वभाव की इस विशेषता को हम खिलंदड़ापन
कह रहे हैं पर सच तो यह है कि वह लड़की इस राह से जीवन रस संचित करती थी।
हुआ यह था कि चरम उदासी के
क्षणों में वह अक्सर बालकनी में आ खड़ी होती थी। बालकनी उसके क्रोध की ही नहीं ,अवसाद को रिलीव करने की
आउटलेट भी थी। इन दिनों अक्सर ही वह स्त्री पुरुषों को रंग बिरंगी पोशाकों में
देखा करती थी। जो रंग उसे पहले कभी नज़र नहीं आये थे इन दिनों वे उसे साफ साफ नज़र
आते थे। उसने देखा कि सभी स्त्री पुरुषों ने अपनी अपनी पोशाकें बना रखी हैं ,जिन्हें वे अपने साथी को
पहनाना चाहते हैं। कुछ लोगों ने स्वेच्छा से पहन लिया है ,कुछ ने अनिच्छा से लाद रखा
है। विस्मय की बात थी की सामान्य कद काठी -रूप रंग -हाथ पैरों वाले मनुष्य उसे
भिन्न भिन्न जानवरों के रूप में नज़र आते थे। उनका सामने का रूप तो मनुष्यों जैसा
था पर पोशाक के भीतर से निकली हुई पूंछ देखकर वह पता लगा लेती थी कि यह गाय ,घोडा ,हाथी ,गधा ,शेर ,चूहा ,ऊंट इत्यादि में से क्या है
?
बालकनी में खड़ी इन दृश्यों
को देखकर वह चकित रह जाती थी। हैरानी से आँखें मलकाती थी कि कहीं उसे भ्रम तो नहीं
हो रहा। पर बालकनी के नीचे का दृश्य वही रहता था। यही नहीं ,किन्ही मनुष्यों को देखकर
उसे लगता था मानों वे रबड़ का टुकडे हों या गोंद की शीशी।
“बालकनी दर्शन” के ये दृश्य
देख देखकर वह खूब हंसती थी। इतना कि हँसते हँसते उसकी आँखों में से आंसू निकल आते
थे। पेट दुखने लगता था। और हंसी भी कोई मामूली औरतों वाली हंसी नहीं जो मुँह पर
हाथ रखकर दबा दी जाती है बल्कि ऐन मर्दों के जैसी ठहाका लगाकर ,आवाज़ निकालकर ,दिल-पेट की गहराइयों से
निकल कर आने वाली हंसी। बेवक्त। बेवजह। वह कमरे में पड़ी पड़ी हंस हंस कर बेहाल हो
जाती थी।
उसके कमरे से ऐसी आवाज़ें
आती देख घरवाले चकित -चिंतित होते थे| वह भी अपनी पत्नी को अपने घरवालों के सामने
ऐसी हंसी से
हँसते देखकर खासा शर्मिंदा होता था। पर उसकी हंसी थी कि एक बार जो शुरू हो तो
रुकने का नाम न ले। यहाँ तक कि ऐसे मौकों पर ,जब परिस्थिति के अनुसार विशेष गंभीर भाव दिखाना
अति आवश्यक होता था ,ऐसे मौके
भी वह बावली पूंछ जैसी कोई चीज देखकर बेतहाशा हंसने लगती थी।बेधड़क |बेलौस।
उसके स्वभाव की विचित्रता
पर परिवार –चर्चा में चर्चाएं होती ,टीका टिप्पणी होती ,संदेह जताए जाते ,सलाह मशविरे किये जाते। पर
अंततः परिवार वालों ने एकमत होकर इस बात पर संतोष कर लिया कि लड़की घर का काम तो
ठीक से करती है ,किसी
चीज़ का नुकसान नहीं करती। केवल दिमाग का कोई पुर्जा हिला हुआ है। वह कोई खास बात
नहीं है।
गुज़रते वक्त के साथ वह
प्रकृतिस्थ होती गयी । अब उसे अपने आस पास की चीजे ठीक उसी रंग रूप में दिखने
लगी थी जैसी वे वास्तव में थीं। वह समझ गयी थी कि पति अलग है ,पति भाव अलग है।
इस बदलाव ने उसकी आंतरिक
प्रकृति में एक प्रकार की स्थिरता ला दी थी।आंतरिक प्रकृति में हुए इस बदलाव का
प्रभाव उसके बाहरी बर्ताव पर भी पड रहा था। और सूक्ष्म ही सही पति भी इस
बदलाव को नोट करता था ,पर कहता
कुछ नहीं था। वह अपनी पुरानी पोशाक में ही संतुष्ट था।
इस बीच एक ज़रुरी काम उसने
यह किया था कि उन नीले कांच के टुकड़ों को सोने में मंडवाकर टॉप्स बनवा लिए थे
,जिन्हें वह कानो में पहनने लगी थी | टॉप्स पहने हुए अपनी छवि जब वह शीशे में
देखती थी तो उसे खुद का रूप हर बार नया लगता था | वह खुद अपनी छवि को देखकर विस्मित होती थी |
पति भी अपने वास्तविक रूप रंग में उसे बुरा नहीं लगता था |या कहें एक
हाड-मांस के जीवित इंसान के रूप में उसकी सजीव उपस्थिति का अनुभव उसे इनहीं दिनों हो
रहा था |पति की आवाज़ ,रूप ,गंध और स्पर्श से उत्त्पन्न प्रभावों को वह अपने भीतर
उगता हुआ पाती थी |यह सब उसके लिए एक रोमांचक यात्रा करने जैसा था |अपने आपको इतना
‘भरा हुआ ‘उसने पहले कभी नहीं पाया था |पति उसे देखता था और विस्मित होता था |पर
कहता कुछ नहीं था |उसे भी उसके कानों के चमकते हुए नीले कांच के टुकड़े अच्छे लगते
थे |
रही पोशाक की बात
,तो केंचुल के जैसी उस पोशाक को उसने उतारकर एक लाल वेलवेट के बॉक्स में रख छोड़ा
था कि एक परम्परा के जर्जरित ,निर्जीव मोमेंटो के रूप में उसे अपने बच्चों को
दिखाएगी ,जिसकी उम्मीद अब हो रही थी |परम्परा कभी एक सी नहीं रहती |उसके हृदय का
विश्वास एक नयी ,चमकीली ,स्पन्दंयुक्त त्वचा में उसके चेहरे पर खिल रहा था |
पिछली कहानी के असली पाठक 7 से 12 वी तक के बच्चे हैं |
यह कहानी परिपक्व रूचि के पाठकों के लिए है , बौद्धिक अभिरुचि के पाठकों के लिए |इस तरह की कहानियां थोड़ी हैवी होती हैं |
यह genre पर्सनली मुझे भी कम पसंद है |पर मैं बौद्धिकता को त्याज्य भी नहीं मानती |आज के जीवन के संक्लेशों को समझने के लिए बौद्धिक निर्ममता जरुरी है |उसी से साहित्य में धार बनती है |
स्त्री पुरुष के रिश्ते में महत्वकांक्षाओं का होना स्वाभाविक सा लगता है |पर जब महत्वकांक्षाएं रिश्ते को ख़त्म करने लगें तो .......
कहानी तो बनती है |enjoy reading
यह कहानी परिपक्व रूचि के पाठकों के लिए है , बौद्धिक अभिरुचि के पाठकों के लिए |इस तरह की कहानियां थोड़ी हैवी होती हैं |
यह genre पर्सनली मुझे भी कम पसंद है |पर मैं बौद्धिकता को त्याज्य भी नहीं मानती |आज के जीवन के संक्लेशों को समझने के लिए बौद्धिक निर्ममता जरुरी है |उसी से साहित्य में धार बनती है |
स्त्री पुरुष के रिश्ते में महत्वकांक्षाओं का होना स्वाभाविक सा लगता है |पर जब महत्वकांक्षाएं रिश्ते को ख़त्म करने लगें तो .......
कहानी तो बनती है |enjoy reading
बुधवार, 21 सितंबर 2016
कहानी - इंग्लिश के जिंदल सर
इंग्लिश के जिंदल सर
तीसरे पीरियड की
घंटी बजी तो बच्चों के दिल में धुक सी हुई |क्लास अपने आप साइलेंट हो गयी |जिंदल
सर आने वाले थे |
दस मिनट में जिंदल
सर क्लास में आये |उनका रंग पक्का था |कद 5 फुट 3 इंच होगा |ठीक –ठाक नैन नक्श के
,न ज्यादा मोटे –न ज्यादा पतले आदमी थे |बच्चों ने यूँ सामान्य तौर पर तो स्कूल
में उन्हें पहले भी देख रखा था ,परन्तु स्वयं अपने टीचर के रूप में ,अपने सामने
साक्षात जिंदल सर को देखकर वे रोमांचित हो रहे थे |
नौंवी कक्षा में आज
उनका पहला दिन था |इससे पहले उन्होंने जिंदल सर के बारे में कई कहानियां सुनी थीं
|मसलन , जिंदल सर किसी से नहीं डरते |वे अपनी मर्जी से स्कूल में आते हैं
|प्रिंसिपल सर की भी हिम्मत नहीं कि उन्हें कुछ कह सकें |
दूसरे , जिंदल सर
बहुत सख्त हैं |वे हाथ की मुठठी बनवाकर ऐन हड्डी के ऊपर डंडा मारते हैं |बहुत दर्द
होता है |पर लड़कियों के लिए राहत की एक बात थी कि सर लड़कियों को कुछ नहीं कहते |
तीसरे , जिंदल
सर ‘बुलेट ‘ मोटरसाइकिल पर स्कूल में आते
हैं |वे बुलेट से भी ज्यादा तेज मोटरसाइकिल चलाते हैं | ट्रैफिक पुलिस भी उन्हें
कुछ नहीं कह सकती |
इन कहानियों का
रचनाकार तो अज्ञात था और हमेशा अज्ञात ही रहा |पर यह ज़रूर था कि ये कहानियां
क्लास-दर –क्लास चलती थीं | छोटी कक्षाओं के विद्यार्थी बड़ी कक्षाओं के
विद्यार्थीयों से ये कहानियां बड़े चाव से सुनते थे | |उन्हें पकड़-पकड़ कर ,जब भी
,जहाँ भी मौका लगता था |वे इन कहानियों पर विश्वास करते थे |
इन कहानियों से
जिंदल सर के बारे में जो धारणा बनती थी ,उसमे कुछ पक्कापन तो सर ने पहले ही दिन
अपनी बातों से ला दिया था |
“मेरा नाम रमेश जिंदल है और मैं तुम्हे
इंग्लिश पढाऊंगा |”- इंग्लिश की ये-ये किताबें हैं |तुम बाज़ार से खरीद लेना | आज पहला दिन है |पढ़ाई कल से शुरु
करेंगे | ” –बच्चों
ने हाँ-जी
में सिर हिलाया |
जिंदल सर बिलकुल तन कर खडे
थे। उन्होंने कोट पेंट पहन रखा था। वे हमेशा टू पीस या थ्री पीस कोट पेंट ही पहनते
थे। सिर्फ कभी कभार ही शर्ट पेंट पहनते थे। कोट पेंट पहनने से उनकी पर्सनेलिटी में
एक रौब आ रहा था। बच्चे भी तन कर बैठे थे।
“....एक बात
समझ लो। मैं चैप्टर पढ़ाऊंगा तो बीच में तुम्हे जो भी कठिन शब्द लगे ,वहीँ उठकर मुझसे पूछ लेना।
सब बच्चे किताब पढ़ते हुए पेन्सिल अपने हाथ में रखेंगे। तुम्हारी किताब में हर
चैप्टर के पहले कठिन शब्द हैं। मैं एकेक करके सारे शब्दों का अर्थ बताऊंगा। सारे
बच्चे पेन्सिल से उनके
अर्थ नोट करते जाएंगे। समझ गए न “ – बच्चों
ने हाँ-जी में सिर हिलाया |
“..... और हाँ....- जिंदल सर ने सीधे हाथ की
तर्जनी ऊँगली तान कर कहा।उनका चेहरा सख्त हो गया और आँखें बच्चों पे टिक
गयी |
“........ इंग्लिश
की किताबे रोज़ लानी हैं। मैं कभी यह न सुनूँ की आज हम किताब नहीं लाये। जिस दिन
किताब नहीं लाये उस दिन.... तुम्हे जिन्दा गाड़ दूंगा। याद रखना। ....... वो सामने
मैदान देख रहे हो न “ - जिंदल सर
ने अपनी निगाहें बच्चों पर रखते हुए ,क्लास के बाहर मैदान की ओर उसी तर्जनी से इशारा
करते हुए कहा।
बच्चों ने एक बार मैदान की
ओर देखकर फिर जिंदल सर की ओर देखा।
........ वहीँ गड्ढा खोद के जिन्दा गाड़ दूंगा “
| सर ने ज़रा झुक कर अपनी छोटी छोटी आँखें बच्चों पे गडा दी। उस समय उनकी आँखों
में ऐसी खूंखार चमक थी
मानो कोई शेर अपने शिकार को
देख रहा हो|
बच्चे बिना पलक झपकाए उनकी
आँखों में देख रहे थे। वे घबराये हुए हिरनों के झुण्ड की भांति अपनी अपनी जगहों पर
सिमट गए थे।
इस हॉरिबल सीन का असर लगभग
30 सेकण्ड तक रहा | फिर जिंदल सर ने अपना हाथ नीचे कर लिया। अब उनकी आवाज़ नार्मल
थी।
“ अब सबसे पहले सब बच्चे एक एक करके अपने नाम
बताएंगे।वैसे मैं नाम याद नहीं रखता। फिर भी। तुम्हारी क्लास का मोनिटर कौन है?”
“ जी मैं “ -उमा खड़ी हो
गयी।
“ ठीक है |आगे जो भी
होमवर्क दिया जाएगा ,वो सब
कापियां इकठ्ठी करके तुम यहाँ रखोगी।“
“यस सर!” - कहते हुए उमा ने
अपनी गर्दन नब्बे डिग्री के कोण तक हिलाई।
“अब वहां से शुरू हो जाओ “ -जिंदल
सर ने बायीं तरफ के पहले डेस्क पर बैठे हुए बच्चे को इशारा किया। वे स्वयं कुर्सी
पर बैठ गए। वे कुर्सी पर भी तन कर बैठे थे। सब बच्चे बारी बारी
से उठकर अपना नाम बताने लगे। उस दिन का पीरियड ख़त्म हुआ।
रिसेस में उमा जब
पानी पीने जा रही थी तो उसने ज़रा मैदान पर नज़र डाली और वहीँ खड़ी होकर अंदाज
लगाने लगी कि मैदान के कौन से कोने में जिंदल सर बच्चों को गाड़ सकते हैं।
वह एक छोटा सा सरकारी
स्कूल था ,जिसमे
तीन और कमरे बने थे ,चौथी
साइड खाली थी।
“यहाँ ही गाड़ सकते
हैं -उमा ने खाली जगह की ओर देखते हुए सोचा | पर कितने ? ज्यादा से ज्यादा दस ही
गाड़ पाएंगे।“ उनकी क्लास में तो 45 बच्चे थे|
“ऐसा
थोड़े ही होता है “- उमा को अपनी कल्पना पर हंसी आ गयी।
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यह जिंदल की इमेज का या कह
लो पर्सनैलिटी का असर था कि इंग्लिश की क्लास में अनुशासन रहता था। उनकी
क्लास में कोई चूं तक नहीं करता था। इसका एक फायदा यह था कि जिंदल सर जो भी बात
कहते ,उसका एक
एक शब्द सुनाई देता था। बच्चों का सुनने में ध्यान जमता था। वर्ना उमा ,अनुराधा ,शैली ,दीपक ,विनय आदि क्लास के कुछ
होशियार बच्चों यह देखकर दुख होता कि शोर के कारण मैडमें पढ़ा नहीं पता थी। उनका
ज्यादातर समय क्लास कंट्रोल में निकल जाता था। इससे वे परेशान होती थी और पढाई मे भी
हर्ज होता था। वे बेचारे अपनी मैडमों की मदद करना चाहते थे ,पर यह उनके भी बस की बात
नहीं थी। जिंदल सर की क्लास में इस कोई टेंशन नहीं थी।
“इंग्लिश सीखने का सिर्फ एक
तरीका है ,वो है
-रीडिंग। जो कुछ भी तुम्हे इंग्लिश में लिखा हुआ मिले -अख़बार,कोई किताब ,कहानी ,मैगजीन -उसे रीड करो। पढ़ने
से शब्दों का प्रयोग ऑटोमेटिकली तुम्हारे दिमाग में बैठता चला जाएगा। तुम्हारे
कोर्स में जो किताबें हैं ,वो मैं
तुम्हे करा दूंगा। ग्रामर करा दूंगा। पर सिर्फ इससे तुम्हारी इंग्लिश अच्छी नही होगी।
फ्लुएंसी ( धारा- प्रवाहता ) लाने के लिए तुम्हे ज्यादा से ज्यादा पढ़ना पड़ेगा।
समझ गए न “ -अगले दिन जिंदल सर क्लास में कह रहे थे। जिंदल सर तन कर बैठे थे.....से
लेकर ....बच्चे भी तन कर बैठे थे -यहाँ तक का वर्णन पूर्ववत समझ लिया जाए। बच्चों
ने हांजी में सिर हिलाया।
“ एक बात और , मेरी सरकारी
नौकरी है। मैं तुम्हे पढ़ाऊँ या नहीं ,यहाँ कुर्सी पर खाली बैठकर चला जाऊं ,इससे मेरी नौकरी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। ....” हाँ
तो यह तो बच्चों को मालूम ही था कि जिंदल सर को कोई कुछ नहीं कह सकता।
....... पढोगे तो तुम्हारा फायदा है
,नहीं
पढोगे तो तुम्हारा नुकसान है। इसलिए याद रख लेना, पढ़ने में ही तुम्हारा फायदा है।
नहीं तो। ...... समझ गए न।“ बच्चों ने समझ लिया कि उनकी भलाई इसी में है कि
वे खुद अपनी भलाई समझें और पढ़ें।
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दो महीने बाद बच्चे जिंदल
सर से सहज मन हो गए।
अब कहाँ जाना था ?उन्होंने भी वहीँ रहना था
और सर ने भी। उनका हौव्वा तो वैसा तो वैसा का वैसा था पर फिर भी जिंदल सर के नाम
से अब उनकी धड़कन नहीं बढ़ती थी |
विशेषकर
लड़कियां ,और
लड़कियों में भी विशेषकर उमा और अनुराधा जैसी कुछ होशियार लडकिया जिंदल सर से
बिलकुल नहीं डरती थीं। और डरें भी क्यों ? वे आज्ञाकारी ,चुप रहने
वाली ,पढ़ाकू
लड़कियां थीं ,फिर डर
किस बात का ? लड़के इस
मामले में लड़कियों से चिढ़ते थे। क्योंकि महीने में एकाध बार उनमे से किसी न किसी
का पिटाई का नंबर आ
ही जाता था। चिढ़ें तो चिढ़ें जाएँ ,लड़कियों को क्या ?
मार खाएं तो खाएं ,आखिर
क्यों इतनी बदतमीजी करते हैं ?
“सर ये छूट गया ‘-उमा सर की
स्वयं नियुक्त पी ए थी। क्लास में नया लेसन शुरू हुआ था। सर पहले कठिन शब्द करा रहे
थे। सर की छोटी सी असावधानी को स्वयं इंगित करना वह अपना परम कर्तव्य मानती
थी।
“सेक्स का क्या मतलब
होता है ?”- यह चैप्टर मानव जाति के क्रमिक विकास पर था ,यह शब्द छूट गया था। उमा ने
याद दिलाया|
पूछने के बाद उमा ने ध्यान
दिया कि बेध्यानी में वह
क्या पूछ गयी है |एक बार तो वह घबराई। पर क्लास में अपनी पोजिशन के कारण उसे यकीन
था कि जिंदल सर उसे कुछ नहीं कहेंगे। अब पूछ तो लिया ही था। वह उत्सुक हुई कि देखें
सर इस मुश्किल सिचुएशन से कैसे निपटते हैं ?
सर ने पहले तो अनभिज्ञता
दिखाई -
“क्या?कौन सा? अच्छा
अच्छा” -फिर दो- तीन सेकण्ड तक सोचते रहेऔर जवाब दिया – “यह एक प्रकार का समुद्री
कीड़ा होता है।“
सर की
तत्परता देखकर उमा विस्मित हुई पर हाव-भाव की एक भी चेष्टा से उसने यह उजागर नहीं
होने दिया कि यह इस शब्द का अर्थ नहीं है |एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसने सर की
बात को स्वीकार किया और किताब में सेक्स शब्द के सामने पेन्सिल
से लिखा -एक प्रकार का समुद्री कीड़ा।
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सर शिक्षण के तौर तरीकों –पीडागॉजी
-से कितने वाकिफ थे ,यह तो
नहीं कह सकते पर इंग्लिश ग्रामर करने का उनका तरीका मुहंजबानी था। पीडागॉजी में
इसे निगमनात्मक शैली कहते हैं। सर ग्रामर के सिद्धान्तों को समझाने में ज्यादा समय
नहीं गंवाते थे। बल्कि ग्रामर के सिद्धांतों को एक बार ब्लैकबोर्ड पर लिखकर ,बताकर ,वे तुरन्त प्रॉब्लम्स
करवाने लगते थे।
बायीं ओर से पहले बच्चे को
खड़ाकर वे क्रम से प्रॉब्लम्स कराते जाते और साथ ही साथ ग्रामर के नियमों को
पुनःपुनः दोहराते जाते। बच्चा जहाँ ,जिस जगह अटका ,उसे वहीँ
,हाथ की
हाथ ,उसकी
गलती सुधारकर दुरस्त कर देते थे। इस तरह एक टॉपिक के नियम लगभग 15 -20 बार क्लास
में दोहराये जाते थे। मसलन टेन्स करने का उनका स्टाइल देखिये। पाठक ज़रा कल्पना
करें -
जिंदल सर क्लास में आये ,आते ही उन्होंने ब्लैकबोर्ड
पर तीन लाइनें
खींचकर चार खाने
बनाये। टेन्स के तीन भेदों में से पहले भेद –present tense के चार प्रभेदों के नाम
उन चार खानों में लिखे।उनके नियम भी लिख दिए |अब बायीं ओर के पहले बच्चे को खड़ा करके उसे एक वाक्य दिया –
मसलन उन्होंने लिखा –sudha dances very well.
सर – इसका टेन्स
बताओ ?
बच्चा – सर ,present tense.
ठीक है ,इसे present continous में बदलो |
बच्चा बोर्ड पर लिखे
नियम को देखकर – sudha is
dancing very well.
गुड ,नेक्स्ट
- यहाँ एक सम्भावना यह हो सकती है कि बच्चे को
मालूम नहीं है कि टेन्स कौन सा है |तो वहां से आगे संवाद क्या होगा ,इसका नमूना
देखिये –
बच्चा – सर
!................. |बच्चा नीची नज़र किये खड़ा है |
सर – क्या हुआ ?
बताओ ?
बच्चे ने गर्दन हिला
दी कि उसे नहीं मालूम |
सर – verb देखो ,कौन
सी है ? dances....कौन सी verb हुई ?
बच्चा –पहली
तो कौन सा टेन्स हुआ
?
....................
Present tense
,कौन सा हुआ?
गुड !अब इसे present perfect में
बदलो |
बच्चा बोर्ड पर लिखे
नियम को देखकर –sudha has
been dancing very well.
वेरी गुड ,नेक्स्ट
- यहाँ यह भी
सम्भावना हो सकती है कि बच्चे को verb का न पता हो |तब सर verb भी बताते |क्लास
में 9-10 बच्चे ऐसे थे जो बहुत कमजोर थे |उनकी ग्रहण क्षमता भी कम थी |उन्हें
छोड़कर अधिकांश बच्चे ग्रामर के सभी टॉपिक्स बहुत अच्छे से सीख गए थे |
इसी तरीके से सर ने
direct-indirect , active- passive ,modals ,tense इत्यादि जो टॉपिक उस समय नौंवी
की ग्रामर में थे ,कराये थे |सर्वनामों (pronouns) को तो
–
i-my-me
you -your
-you
इत्यादि दोहरा –दोहरा
कर रटवा ही दिया था |सर खुद इन्हें पोयम की तरह लय में बोलते थे |बच्चों ने भी
वैसे ही याद कर लिया था|
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सर ने तो अपना काम
किया |
ये तो बच्चों को
बहुत बाद में जाकर पता चला –पता चला होगा कि-
उस समय नौंवी कक्षा
की ग्रामर में इंग्लिश के जिंदल सर ने उन्हें जो ग्रामर करा दी थी ,वह उन्हें
जिंदगी भर के लिए याद हो गयी थी |कि –
उस समय नौंवी कक्षा
में उन्होंने ग्रामर के जो टॉपिक पढ़ लिए थे ,वास्तव में अंग्रेजी भाषा की ग्रामर
के वे ही मुख्य टॉपिक थे | कि –
उस समय क्लास में
जिस भाषा की पढाई से उन्हें खौफ नहीं हुआ ,उस पढाई का पढना उनके देश में पढ़े-लिखे
होने का आत्मविश्वास पाने के लिए बेहद जरुरी था | कि –
मात्र इस
आत्मविश्वास के कारण उनके आगे ज्ञान-विज्ञान के कितने रास्ते खुल गए थे |कि -
देश के हजारों बच्चे
इंग्लिश से खौफ खाने के कारण पढाई छोड़ देते है |
बच्चों को उस समय ये सब बातें कहाँ पता थीं ?
रिसेस चल रही थी
|उमा और अनुराधा क्लास के बाहर चबूतरे पे बैठी पैर झुला रही थीं |सामने मैदान में
बच्चों के खेलने से धूल उड़ रही थी |यशा और प्रीती घुमती-घामती उन दोनों के पास आ
खड़ी हुईं |
“अच्छा दीदी ! ये
बताओ क्या जिंदल सर बहुत मारते हैं ?”- प्रीती ने उमा से पूछा |प्रीती अनुराधा की
छोटी बहन थी पर पढाई में होशियार होने के कारण वह अपनी बहन से ज्यादा उमा की बात
को मान देती थी |
“अरे नहीं ! जिंदल
सर तो बहुत अच्छे हैं |लड़कियों को तो कुछ भी नहीं कहते | हाँ! कभी –कभी लड़कों को
मार देते हैं | वैसे बहुत अच्छे हैं सर |”
“ मैंने सुना है
जिंदल सर को कोई कुछ भी नहीं कह सकता ..........................................................”
|
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