कल संवत्सरी है ।सभी से संवत्सरी सम्बन्धी खिमत खिमावना 🙏🏻🙏🏻
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जब तक न शुरु करो तब तक पहाड़ सरीखी लगती है तपस्या। शुरु कर लो तो कब वक्त निकल जाता है पता ही नही लगता ।मेरा रिटायर्मेंट प्लान है कि मै आजीवन एकाशने किया करुँगी।
हमारे गुरूदेव श्री सुंदर मुनि जी महाराज तो 30 सालों से कर रहे हैं ।
पता नही कर पाऊंगी या नही ।भावना जरुर है ।
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संवत्सरी मनाने का थोड़ा सा इतिहास बता रही हूं । कुछ इन्टरनेट से यूज किया है । कुछ खुद लिखा है ।
जैन आगम के अनुसार अभी पंचम आरा चल रहा है ।यह 21000 वर्ष तक चलेगा। इसमें 2500 साल बीत चुके हैं । और 18500 साल बाकी हैं । उसके बाद छठा आएगा जो वह भी 21000 वर्ष का होगा। फिर उसके बाद (उत्सर्पिणी का )*पहला आरा आएगा । वो भी 21000 वर्ष का होगा ।इसका स्वभाव छठे आरे के समान होगा मगर शुभता के बढ़ते क्रम मे ।
अभी शुभता का घटता क्रम चल रहा है।
छठे आरे के 21000 वर्ष तक सिर्फ जलचर, मछली वगैरह खाते रहने के बाद , क्योंकि धरती पर बिलकुल भी वनस्पति नहीं रहेगी , तब जलवायु परिवर्तन होगा । भीषण गर्मी से तप्त धरती पर मेघों की बरसात होती है। 49वें दिन तक यह बरसात धरती को हरा-भरा कर देती है। फलों वगैरह की पैदाइश होगी । वे लोग उनके देवोपम स्वाद को चखेंगे तब उस समय के लोग यह निर्णय करेंगे कि वे आगे से मांस आहार का त्याग कर देंगे।
इस दिन को अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह संवत्सरी मनाने का कारण है।
इस पर्व को मनाने का विशेष महत्त्व है क्योंकि इस पर्व को मनाने में पर्व को मनाने के साथ साथ , तीर्थंकर की आज्ञा का लाभ भी मिलता है। अनंत तीर्थंकरों की आज्ञा का लाभ भी मिल जाता है ।
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* काल के अनुसार समय की सुई जैसे पहले नीचे की ओर और फिर उपर की और गति करती है उसी तरह से पर यहां काल को (अवसर्पिणी काल व उत्सर्पिणी काल) दो वर्गों में बांटा गया है।
अवसर्पिणी काल में जहां ऊपर से नीचे उतरते हुए धर्म की हानि हो रही होती है, वहीं उत्सर्पिणी काल में धर्म का उत्थान हो रहा होता है। मतलब अवसर्पिणी काल में प्रकृति और व्यक्ति दुख की ओर बढ़ रहा होता है और उत्सर्पिणी काल में सुख की ओर।
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