Younger siblings think themselves double smart and what choice elders have than to see them silently .
But all is well that ends well.
कुछ गलतफहमियां सही समय पर ही दूर होती हैं ।
एक पुरानी पोस्ट। इसमे मैने गुरु जी को भगवन कहाए जाने की आलोचना की है । पर साथ ही अपनी ऐसी आलोचनात्मक बुद्धि की भी आलोचना की है ।
गुरूदेवों के साथ मेरा सम्बन्ध आलोचना , भक्ति के बाद, वस्तुगत आलोचना को पार कर ,अब राग पूर्ण मौन ठहराव की दशा मे चल रहा है । आगे क्या, पता नही ।
Ekks - 3
1996 की बात है। जुलाई के आस पास मैं अपने घर के छज्जे में खड़ी थी।स्थानक की बिल्डिंग में झाड़ बुहार देखी तो मम्मी ने बताया कि सेक्टर -३ ,रोहिणी की स्थानक में सेठजी का चातुर्मास घोषित हुआ है। मैं बहुत खुश हुई। राम प्रसाद जी का नाम तो बचपन से ही सुनते आये थे। चलो अच्छा है। अब देखने का मौका भी मिलेगा। उस समय मैं थर्ड ईयर में थी।
चातुर्मास में क्रम बना। सुबह प्रार्थना में जाना ,फिर प्रवचन में जाना ,दिन में कुछ पाठ सीखने जाना। पहले पहल जब मैंने लोगो को राम प्रसाद जी महाराज को भगवन कहते सुना तो मेरे मन में आया कि इन लोगो को शरम नहीं आती ,खुद को भगवान कहलवाने में। कॉलेज की शिक्षा से शिक्षित उस समय मैं इतनी पठ्ठी तो हो ही गयी थी जो ऐसी बातें सोचती।
20 -25 दिन बीतते न बीतते ,मेरे भीतर गुरुओं के प्रति आकर्षण पैदा होने लगा। राम प्रसाद जी के प्रवचनों का जादू ऐसा था की इधर वर्षा की झड़ी लगती थी ,ठंडी हवाओं से तन शीतल होता ;उधर जिनवाणी से आत्म के संताप दूर होते नज़र आते थे। वे प्रवचन करने के महारथी थे। शास्त्र के मूल पाठ ,उद्धरण ,कहानी ,दृष्टांत ,ढाल ,भजन ,शेरो शायरी -माने हर प्रकार के श्रोता को रिझाने का पूरा सामान उनके पास था। भजनों को स्वयं इतने मधुर गले से गाते थे ,की जिस फ़िल्मी तर्ज पर वह भजन उठाया था ,वह तर्ज याद ही नहीं आती थी और श्रोता नयी तर्ज में डूब जाते थे।
उन्ही की प्रवचन सभा में मैंने जे डी को दोबारा देखा। आदमियों की तरफ बैठे एक पतले ,सांवले युवा को भगवन को निहारते देखा तो मुझे उस समय लगा तो जरूर था की यह जे डी(जैन दर्शन-बात को मानवीकरण शैली मे कहा गया है ।) ही है ,पर उस समय मैं कुछ बोली नहीं। बल्कि कभी ही नहीं बोली। मुझे क्या ?होगा। पर प्रवचन में बैठे हुए उन दिनों उसके चेहरे पर अपूर्व संतोष दीखता था। हो सकता है उसने भी मुझे देखा हो। खैर