गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

कुछ बातें इधर उधर की

कीर्ति ,यश ,ख्याति -ये चीजें अमूर्त होते हुए भी मूर्त चीजों से ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं |यह बात मैंने फिल्म स्टार्स के ट्वीट्स वगैरह पढ़कर रिअलाइज़ की |एक आम आदमी की नज़र में तो अमिताभ बच्चन ,शाहरुख़ खान ,सलमान वगैरह सभी पॉपुलर हैं |वो पॉपुलैरिटी को कम - ज्यादा में नहीं आंक सकता |
मगर मूर्त चीजों के माप-तोल की तरह कीर्ति ,यश ,ख्याति -इनका भी माप-तोल होता है | विज्ञ इस बात को समझते हैं |
अमिताभ जी के यहाँ हर संडे विजिटर्स आते हैं |35 साल से |कुली के हादसे के बाद  से | हैं न कमाल की बात |क्या यह बात ,अमिताभ की ओर से एक चुनौती नहीं की देखो 'तुम क्या पॉपुलर हो मेरे सामने |पॉपुलैरिटी तो इसे कहते है |"
इसी तरह साऊथ के स्टार रजनीकांत की पॉपुलैरिटी की 'गहराई ' की तारीफ अमिताभ भी करते हैं |
ख्याति के बारे में शेक्सपियर के नाटकों का एक संवाद है कि धन को लूटने वाला तो आखिर क्या लूट ले जाता है (अर्थात कुछ भी नहीं ),मगर नाम को लूटने वाला सब कुछ लूट ले जाता है |

 नहीं नहीं ,ऐसा नहीं करना |देखेंगे इस बात को भी |मेरे पास एक आइडिया है | 

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

# my team -my vision

एक फिल्म थी मोहनजोदड़ो |पता नहीं क्यों  नहीं चली ,जबकि सब कुछ ठीक था |ये तो सब कहते हैं कि क्या चलता है ,कोई नहीं जानता |
मुझे लगता है ,अब इस बात को  ,फ़िलहाल यहाँ ,  ख़त्म करते हैं |
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आज एक बात और याद आ गयी |एक बार मैंने एक क्लब बनाया था -नीरू नॉलेज क्लब ;वह अब भी है पर अब उसका नाम है - संबोध नॉलेज क्लब  |एक बार मैंने fb पर भी जिक्र किया था |इस क्लब को बनाने के पीछे मेरी भावना थी कि बच्चों को -ज्ञान अनंत है -इस सत्य तक पहुँचाया जाए | बाद में मैंने इसे क्लब की टैग लाइन भी बनाया |क्लब की तीन टैगलाइन थी -

  1. ज्ञान अनंत है |
  2. हेल्थ इज वेल्थ 
  3. practice makes a man perfect .
  अब मान  लीजिये ,बच्चों को यह बताना है कि  -ज्ञान अनंत है - तो उन्हें यह लाईन  रोज़ रटवाकर तो कोई मकसद हासिल नहीं होगा |फिर बच्चे ऐसे टिकते भी नहीं है |तो मैंने एक तरीका निकाला ,कि उन्हें कुछ क्राफ्ट ,ड्राइंग एटसेट्रा की एक्टिविटीज़ में लगाया |हमने ५-6 एक्टिविटीज़ की थी -जिसमे हमने एक डेकोरेटिव ट्रे बनायीं थी ,चोकलेट बनाई थी एटसेट्रा
हम हर संडे इकठ्ठे होते थे |पहले प्रेयर गाते थे |वह मैंने महावीर स्तुति का एक पैरा चुना था |इस स्तुति में भगवान को  नमस्कार किया गया है ,जिनकी चेतना में समस्त ज्ञान प्रभासित होता है |संस्कृत में है -
यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिद्चित
सम भ्रान्ति ध्रौव्य वय जनि लसंतोतरहिता .......एटसेट्रा
...फिर हम क्लब की टैगलाइन दोहराते थे और फिर  एक्टिविटी शुरू करते थे |एक्टिविटी करने में बच्चों का मन भी लगता था ,उनका टाइम भी पास होता था ,वे कुछ नया सीखते थे ,और -ज्ञान अनंत है- यह मैसेज वे हर बार दोहराते थे |
इंग्लिश का एक शब्द है (मैंने अभी ऋतिक रोशन के संडे ब्रंच के इंटरव्यू में पढ़ा )-synapse अर्थात प्रक्रियाओं को धीरे धीरे एब्सोर्ब करने की  मस्तिष्क की क्षमता |
मैं बच्चों को यही ग्रहण करना चाहती थी ,कि हर चीज ज्ञान है -ड्राइंग बनाना ,चोकलेट बनाना ,हैयर स्टाइल बनाना ,कविता बनाना ,ड्रेस बनाना एटसेट्रा .............कि ज्ञान अनंत है |
एक बार वे ये सीख लें ,तो वे कभी लाइफ में परेशान  नहीं होंगे |बिकॉज़ उन्हें पता होगा की उनमे  कुछ भी सीखने की क्षमता है |  
क्लब में घर के ही बच्चे थे |दो-दो मेरी जेठानियों के ,तीन मेरे |
बाद में मैं बिजी हो गयी ...........बिजी तो क्या हो गयी ......बस थोडा यूँ ही .....
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दरअसल दुनियादार ,प्रक्टिकल लोगों को ऐसे काम फालतू के लगते है |आजकल ट्यूशन भेजना ज्यादा इम्पोर्टेन्ट समझा जाता है |
मैंने मेरी छोटी बहन से इसका जिक्र किया ,तो वो महारानी कौन सा कम है |फट से बोली कि हम तेरे क्लब में क्यों हाथ बटाये |बताओ ! बित्ते भर की  लड़की और ये गरूर !
उस दिन मैंने जाना कि  व्यक्तिवाचक नाम अहम् को ठेस पहुंचाते हैं  ....खैर ...मुझे तो अहम् का कोई इशू नहीं था ....मुझे तो काम होने से मतलब था ...तो इसलिए मैंने क्लब का नाम बदल कर संबोध कर दिया |संबोध -अर्थात ज्ञान में बराबर |
क्लब तो अब भी है |पर अभी भी चल नहीं रहा है | क्या बताऊँ ......दुनिया की नज़र में आपकी कीमत कागज के टुकड़ों से नापी जाती है |ये हमारे समय का सबसे क्रूर मजाक है |  

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

फ़िल्मी कहानियां -8

संजय लीला भंसाली का सिनेमा 'लार्जर देन लाइफ ' स्टाइल का है ,चाहे कहानी कोई भी हो |अब तो ज्यादातर राजाओं की प्रेम कहानियां दिखाते हैं , जो की उनके स्टाइल को परफेक्टली सूट करता  है ,पर जब विकलागों के ऊपर कहानियां भी दिखाईं हैं ,तो उन्हें भी उसी तरह दिखाया है |मुझे तो ज्यादा पसंद नहीं है ,इस तरह का सिनेमा |पर न हो तो न हो .क्या फर्क पड़ता है |पब्लिक तो  पसंद करती है |glitterati ,a treat to  eyes.

राजू हिरानी जो सिनेमा बनाते हैं ,मुझे लगता है ;वो बहुत हद तक मेरे टाइप का है(जानती हूँ !आपको तो बोस्टिंग लगेगी ) |  इनकी फिल्मो को मैं शांत-रस की फिल्मे कहती हूँ (जैसे की मेरा लेखन भी है -शांत रस का -कोई हड़बड़ी नहीं ,कोई जल्दीबाज़ी नहीं |सब कुछ धीरे धीरे ,अपनी ओर्गेनिक गति से सामने आता है  ) |इनकी फिल्मो में भी एक केरेक्टर ऐसा होता है ,जो एन्लाइटेनड (जागृत )है ,जो हमेशा सिचुएशन से बहुत ऊपर उठकर सोचता है| करण जौहर के साथ बातचीत में करण राजामौली को बोले की -आपके जैसी फिल्म बनाने की मैं सोच भी नहीं सकता |तो राजामौली जी बोले  -आप मेरे  जैसी फिल्म बनाने की नहीं  सोच सकते और मैं राजू हिरानी के जैसी फिल्म का एक सीन भी बनाने की  सोच नहीं सकता |देखिये ! एक जीनियस दूसरे जीनियस का किन शब्दों में सम्मान करता  है |तारीफ करने से अपना कुछ घटता नहीं है .बुराई करने से कुछ बढ़ता नहीं है |
इम्तिआज भी अच्छा सिनेमा बनाते है |मुझे उनकी एप्रोच अच्छी लगती है |
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अनुराग भी ठीक हैं |
राजामौली जी के अन्दर कहानी के प्रेसेंटेशन की समझ जबरदस्त है |

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

फ़िल्मी कहानियां -7

उस दिन टी वी पर अक्षय कुमार की सिंग इज़ ब्लिंग आ रही थी (आती ही रहती है ) ,और इस फिल्म को देखकर मैंने सोचा कि इस तरह की फिल्मे मैं किस तरह कभी भी लिख पाऊंगी ,अक्षय कितने उम्दा एक्टर हैं  |मेरे लिए तो संभव ही नहीं है |कहाँ अक्षय पंजाब से ,कहाँ एनी रोमानिया की .......वो तो हिंदी भी नहीं समझती ...इसलिए ट्रांसलेटर का लारा का किरदार डाला .....इस किरदार के आने से .....ट्रांसलेशन के घुमावों से ही कितनी चटपटी ,मजेदार सिचुएशन बन  गयी ....मैं  तो इस तरह कभी सोच नहीं पाऊंगी .......मेरा तो दिमाग ही नहीं चलेगा ....एटसेट्रा एटसेट्रा |
मेरे मनोसंकल्प भग्न हो गए और मैं उदास हो गयी |
फिर सलमान की सुल्तान आ गयी |यह भी देखी |.......पर मेरा द्वंद्व ज्यों का त्यों था |मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था |
फिर ndtv की वेबसाईट पर मैंने सुल्तान फिल्म के राईटर अली (ये पूरा नाम नहीं है ) का इंटरव्यू पढ़ा |वे बताते हैं कि सुल्तान फिल्म का आइडिया उन्हें तब आया ,जब सुशील ने ओलंपिक्स  में मैडल जीता था | तब उन्हें लगा कि एक हरियाणवी पहलवान की सक्सेस स्टोरी (पाठक ध्यान दें ,कि ,यह कहानी आलरेडी सक्सेसफुल है )पर एक कहानी बनानी चाहिए |
तब  मैंने  इस पहेली को सुलझाया कि जब आपके पास  आलरेडी एक  सक्सेसफुल कहानी है ....तब लास्ट के सीन के ....इंडिया जीताओ ....पब्लिक खुश ....हीरो की हीरोपंती .....वीर -उदात्त पूर्ण रस परिकल्पना .....; यह सब तो हो ही गया ....बस अब तो सलमान के हिसाब से कुछ मजाक-वजाक ,गाने ,........ये सब डालने हैं|
अर्थात
यह सब उतना मुश्किल भी नहीं था जितना मैं समझ रही थी |...अभी हाल की रिलीज़ फिल्मो नीरजा ,एयर लिफ्ट ,रुस्तम ,सरबजीत ,दंगल ...इत्यादि फिल्मो को देखें ..तो ये फिल्मे उन सक्सेसफुल ऑपरेशंस पर आधारित है ,जो रियल लाइफ में कहीं न कहीं अंजाम होते हैं |
सुल्तान की कहानी लगभग ठीक थी |बाद में लेखक ने कहानी का .........सफलता का गरूर नहीं करना चाहिए ...में जो एक्सटेंशन किया ....तो वो भी हमारी चिंतन परंपरा से मेल खाता है .....पर आजकल ज़रा ओवर लगता है |
      

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

फ़िल्मी कहानिया -6

'ए दिल .........'में एक टिपिकल करण जौहर फिल्म के सारे मसाले हैं |फोरेन लोकेशन ,स्टाइलिश कपडे ,हीरोइन की काजल लगी आखें ,सुपर रिच केरेक्टर्स .........आजकल सारी  फिल्मे चमक धमक (glitterati ) वाली हो गयी है |(क्यों ? ......भई ! धन की आसक्ति इंसानों में जबरदस्त होती है )

इन सब पर मैं क्या कमेन्ट करु |सब अच्छा ही था |
मैं तो कहानी और केरेक्टर्स पर बात सकती हूँ |केरेक्टर्स के बारे में कहूँगी कि ऐसे ' केरेक्टर्स ' (थोडा फन्नी सेन्स में भी है )हो सकते है |मैं सहमत हूँ |
बॉलीवुड का असर 70-80  के बाद पैदा हुई पीढ़ी में साफ दिखता  है |पहले यह अन्ताक्षरी के रूप में दिखाते थे ,बाद में इसे हीरो के फौरी शौक के रूप में भी कई फिल्मो में दिखाया (किशन कन्हैया ),पर हीरो के ऊपर इसका जूनून ही है ........और यह हीरो -हिरोइन के बीच कनेक्ट का मुख्य कारण है .ऐसा शायद तमाशा में देखा था |(मैं बहुत ज्यादा फिल्मे नहीं देखती हूँ |इन बातों  को सिर्फ टिप्पणी समझा जाये )
अयान और अलिजेह भी ऐसे ही हैं |दोनों का कॉमन कनेक्शन बॉलीवुड है |इसके अलावा .............इसके अलावा है ....उनकी सुपर रिच क्लास की लग्ज़री , उनके दंभ ,उनके विखंडित मूल्य ,उनका अकेलापन ....जो की फिल्म में उस तरह से दिखाया नहीं गया है पर समझना मुश्किल भी नहीं है |   (ऑफकोर्स कोई आर्ट फिल्म तो नहीं बनानी थी न ).....और इन सबके बीच प्यार पाने की मासूम (जिद्दी )इच्छा|यह इच्छा मासूम है क्योंकि यह दूसरी पार्टी को नुकसान नहीं करती ;मगर जिद्दी भी है कि खुद के लिए कभी समझौता नहीं करती |
फिल्मो के जानकार (शेखर कपूर ,राजामौली ) कहते है कि एक फिल्म में आप दो-चार भावपूर्ण moments क्रिएट कर लो ,बस बहुत है |
इस फिल्म में मुझे रणबीर (2 बार ) और अनुष्का (1 बार )के ब्रेक डाऊन वाले क्षण बहुत प्रभावी लगे |रियल लगे बाकि मैं कहूँगी इस फिल्म में करण ने बहुत ग्रो किया है |वे कहानी कहने में थोड़े बोल्ड हुए हैं |नए इनपुट्स भी लाये हैं (फॉर एग्जाम्पल लास्ट में अलिजेह के एंड को न दिखाना ;वर्ना हिंदी फिल्मों के ड्रामेपन को देखते हुए ऐसी इच्छा रोक पाना बहुत कठिन है )|उनमे एक सर्ज दिखती है ,कहानी को ईमानदारी से  कहने की |
वे प्रयोग भी कर सकते हैं |उनके बफ़र्स भी  मजबूत हैं  |

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

फ़िल्मी कहानिया -5

हाँ ,तो बात चल रही थी फ़िल्मी कहानियों की |
बीच में कई टॉपिक चल पड़े ,तो बात कहाँ की कहाँ पहुंच गयी |खैर ...
अभी हाल ही में करण जौहर की ''ए दिल ...' देखी थी तो वहीँ से शुरू कर लेते है |
एक डाइरेक्टर के तौर पर मैंने करन को सिरियसली नहीं लिया था |इसलिए नहीं कि 'कुछ कुछ ..'',कभी ख़ुशी ., जैसी फिल्मे पसंद नहीं |नहीं |ये फिल्मे मुझे पसंद हैं-बल्कि मैं तो फैन हूँ ऐसी ब्लोकबस्टर फिल्मो की |बट ........the thing is, you  should grow with time .if you dont ,that ,ultimately stales you and  make you worthless.
करण की आरंभिक फिल्मे ,फिर ये जितना काम करते हैं ,जितना  ज्यादा बोलते हैं (he is everywhere) ,तो मेरा परसेप्शन ये था की ये बंदा डाई -हार्ड बिजनेसमैन है ,नथिंग एल्स |
पर ए दिल मुझे पसंद आई |...........contd
एक बात और -आगे से ना ,मैं साहित्य की जगह लिटरेचर कहा करुँगी |साहित्य कहने से  लद्धडपना सा लगता है |


शनिवार, 10 दिसंबर 2016

# my team -my vision

जब आप इस मार्ग पर आते हो तो आपको पता चलता है कि आप पहले नहीं हो जो यहाँ आये हो ,न ही अंतिम होगे |आप से पहले अनंत लोग आये है |
ज्ञानियों ने निकलने के (अब इसे कह लें ,मुक्त होने के )चार राह बताई -ज्ञान ,दर्शन ,चरित्र और तप |और राहों का भी निषेध नहीं है |
इनमे से मेरा मन तो ज्ञान की प्राप्ति ,वर्धन ,प्रसार में रमता है |अभी छोटी  हूँ ,घर भी नहीं छूटा  है  ;पर मेरा ध्येय ,मेरा लक्ष्य यही है |
एक बार fb पर साहित्य के प्रसार के लिए  मैंने एक टीम की बात की थी | मेरे लिए यह ज्ञान की सेवा है | कहानियों में जिस तरह कल्पना की पन्नी में लपेट कर आधुनिक जीवन की सच्चाइयों को कह दिया जाता है वह अद्भुत और शक्तिशाली है |फ़िल्मी कहानियाँ भी ज्ञान हैं (मैं आऊंगी इस टॉपिक पर भी  )...इसके आगे शिक्षा के क्षेत्र में हम कुछ सॉलिड काम करें ,यह भी मेरे एजेंडे में है |अकेडमिक रिसर्च के काम भी हम करेंगे |हम सक्षम हैं ,पर अभी नहीं |अभी मेरा सारा ध्यान हम सफल कैसे हों?इस पर है |वैसे मुझे लगता है कि हमारी सफलता ही उनके लिए करारा जवाब होगी |    
  बाकि लोग भी अपने इनपुट्स दें |

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

फ़िल्मी कहानियां -4

जागृति शब्द गीता का है |जैन दर्शन में इसे समकित या सम्यक्त्व दर्शन कहते हैं |
जागृति  के बाद आप के अन्दर प्यास जगती है और जानने की |आपकी रूचि बदल जाती है |
मुझे तो मेरे बैकग्राउंड के कारण  ज्यादा प्रॉब्लम नहीं हुई | मेरे साथ तो ऐसा हुआ कि इधर मैंने सोचा हुबलाबुब्लाबू से निकलने का और उधर गुरूजी आ गए मेरे पास ,मेरी उंगली पकड़ ली और उस रास्ते पर ले आये |मैं बोली -अरे गुरूजी ,मेरा घर है ,परिवार है | इनके बिना मेरा जी कैसे लगेगा ?तो सेठजी तो इतने भोले हैं ,बोले अच्छा ,ऐसी बात है,  तो चल मैं  यहीं रुका हूँ ,तू मिल ले अपने लोगों से |तब से अब तक ,मैं हूँ तो अभी घर में पर बाहर निकल झांकती रहती हूँ ,कहीं सेठजी चले न जाए | मुझे लगता है -सेठजी जरुर कोई जादू मंतर जानते हैं |अपने जैसा कोई मेरे यहाँ बैठा दिया है ...और खुद गोहाना में जाने की तयारी कर ली है | 

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

फ़िल्मी कहानियां-3

दरअसल आजीविका वाला प्वाइंट तो सभी पेशों पर लागू  है |
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भूख और स्वाद की बात चली ,तो मैं कहूँ कि एक आम इन्सान तो इसका फर्क बता ही नहीं सकता |खाना खाते हुए ये कैसे और कौन डिसाइड करे की क्या खाना भूख-शमन है और क्या खाना स्वाद -पोषण |रोटी के साथ नमक खाएं या अचार |एक सब्जी ठीक रहेगी या दो ले सकते है |तोरी खाना सादापन है या पनीर भी चल सकता है |
विचित्र पेंच हैं |
बहस थोड़ी फिलोस्फिकल हो चली है |दर्शन की बातें बहुत लोगों को हज़म नहीं होती |दीपा जी कहती थी -यह तो शेरनी का दूध है ,सोने के पात्र में ही टिक सकता है |इसे हर कोई पचा नहीं सकता |
.मुझे तो शौक है | सच के साथ सीधे दो दो हाथ करने में मजा आता है |चाहे कमजोर हूँ ,शक्ति के मामले में |शरीर से नहीं |वजन तो मेरा 78 होगा |सर्दियों  में और बढ़ जाएगा |खैर  ...............
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हमारे यहाँ की चिंतन परंपरा में भूख -शमन को तो अलाउ  किया गया है बल्कि भूखे को भोजन कराना पुण्य  का काम है |  पर स्वाद-पोषण की मनाही की गयी है |क्यों ?
फिर............
आखिर प्राब्लम क्या है ?
प्रॉब्लम कुछ भी नहीं -कहीं भी नहीं ......पर जब हम देखते हैं कि एक ओर  इतनी समृधि है और दूसरी ओर इतनी गरीबी , तो विषमता का अहसास मन को कचोटता है |
यह कचोट ,हम खुद देखें या पढ़ें ,जब हमारे भीतर गहरे में धंस जाती है तो self-realisation या आध्यात्मिक शब्दावली में कहूँ तो इन्सान जागृत हो जाता है |जागृति ;फ़िलहाल पाठक इस शब्द को याद रखें |
हम चिंतन के इस ऊँचे पर्वत पर ,बड़ी मुश्किल से ,पहुंचते ही हैं कि तभी फोन की घंटी बज जाती  है या और कुछ होता है कि हम फिर से अपनी दुनिया में वापस आ जाते हैं -अरे अभी तो खाना नहीं बनाया .........बेटे को जूते  दिलाने थे ....एटसेट्रा एटसेट्रा |पर यह जागृति आपका पीछा नहीं छोडती |आप अपने आपको को कोसते हैं कि क्यों मैं ही ऐसी हूँ ,क्यों मैं सब की तरह एन्जॉय नहीं कर पाती ,पर आपके भीतर की क्लान्ति का कोई निराकरण नहीं होता |
पाठक यह ध्यान रखें कि यह जागृति किसी भी प्रकार से आ सकती है |इसका धार्मिकता से कोई कनेक्शन नहीं है |
  अनुपम खेर शो में अनुपम ने  काजोल को एक किस्सा सुनाया की उनके पिताजी यह कहा करते कि यह ग्रीस (कलाकारों का मेकअप ) एक बार जिसके मुह पर लग जाये तो जिन्दगी भर नहीं उतरती | देखिये ! कैसी गहरी दार्शनिक बात है| खैर ........
जब  चिंतन के  ऊँचे पर्वत से आप  दोबारा अपनी दुनिया में लोटते हो ,तो आप पाते हो की भूख तो बड़ी दूर की बात है ,अभी तो स्वाद भी कहीं नहीं छूटा है |.....
एक बार हमारे स्कूल में एक ट्रेनी टीचर (पहले पढ़ाई के बाद , एक साल की ट्रेनिंग होती थी |) आये थे |नए नए थे |पढाने के जज्बे से भरे हुए |बाद में परमानेंट होने के बाद तो कहाँ जज्बे बचते हैं | वे साइंस के थे |सौर मंडल के बारे में समझाते हुए उन्होंने उपमा देकर  कहा कि पृथ्वी पर रहकर सौर मंडल को जानना ऐसा है कि आप बिस्कुट में बंद होकर बिस्कुट को बाहर से जानना चाहते हो |
जागृति की अवस्था ऐसी ही है |आप हुबलाबुब्लाबू (यह शब्द मैंने  गढ़ा है ,उस हजार उलझनों वाली स्थिति के लिए जिसमें आप हैं )के अन्दर हैं पर आप जानते हैं की मुझे इसमें से निकलना है ,कोई रास्ता निकालना है |
जब आप यहाँ तक पहुंच जाते हो ,तब वह क्षण है ,मेरे दोस्त , जब आपके जीवन में भूख और स्वाद के बीच की  फांक फट गयी है | ................contd

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

फ़िल्मी कहानिया -2

आजीविका के प्वाइंट ऑफ़ व्यू से देखें तो हर सफल फिल्म की कहानी अपने आप में पूर्ण उचित है |गुंडे भी क्या बुरी है |फिर मर्डर ,हेट स्टोरी एटसेट्रा बी ,सी ,डी ग्रेड की फिल्मे भी क्यों बुरी है ?< फिर ग्रेडिंग ही क्यों की जाए? <सेंसर क्यों ?............इत्यादि अनगिनत प्रश्न तैयार खड़े हैं ,आप को निगलने के लिए |
सचमुच कठिन है इस बहस में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना |
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पर कोशिश तो करनी है |
दरअसल आजीविका का मुद्दा वह ग्राऊंड है जहाँ से इस प्रकार की बहसें उठती हैं ,और यहीं आकर धडाम से गिरती भी है |
और दरअसल यहीं ,इस माध्यम की सीमा (साहित्यिक कहानी के बनिस्पत में ) भी तय हो जाती है |
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दरअसल बहुत बारीक़ फर्क है -भूख और स्वाद में ,आजीविका और लालच में |
जब एक बार आप इस राह पर आ जाते हो तो there is no going back .मकड़ी एक पतला सा तार छोडती है कि मैं पेट का गडहा  पार कर लूंगी ,पर फिर ,दूसरा -तीसरा बुनते बुनते खुद वह भूल जाती है |एक बड़ा जाल बना  डालती है जिसमे कभी खुद ही फंस कर मर जाती है |
इस प्वाइंट ऑफ़ व्यू से जब मैं श्रीदेवी या अन्य हीरोइनों के चमकदार  कपडे और स्टाइलिशपने  देखती हूँ ,तो ;
फर्स्ट -मैं अपने हिंदीपन को (हाँ ,हमें पता तो होना चाहिए कि हिंदीवाला होने की स्ट्रेंथ क्या है ?)धन्यवाद देती हूँ कि हम इन चीजों को पाने के लिए नहीं लपके |हमने शुरू से अपने आस पास सादा लोग देखे ,जिन्होंने अपने प्यार में जोड़े रखा |सदा यही सिखाया -झुक कर चलना चाहिए |अपनों से नीचे वालों को देखकर चलना चाहिए |एटसेट्रा एटसेट्रा
सेकेण्ड -मुझे उन पर दया आती है |मार्केट में बने रहने की इनकी तड़प -ओहोहोहो |इनके प्रमोशन , इनके इंटरव्यू ,इनके प्रोग्राम ...यूँ ही चलते रहेंगे ,,,जब तक है जान ....जब तक है जान |

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

फ़िल्मी कहानियां -1

अब बात चल ही पड़ी है तो सोचा फ़िल्मी कहानियों पर कुछ लिखने की बात पेंडिंग थी ,वह भी कह लूँ |क्या पता फिर हम -
कल हो न हो (फ़िल्मी कहानियों की बात चली है तो इतना फिल्मिपन तो बनता है ) खैर .......जोक्स अपार्ट
यह बात तब की है जब हम गुंडे फिल्म देखने गए थे |18-२-१४ को (एक्चुअली उससे पहले गए होंगे ,इस तारीख की तो डायरी एंट्री है ) | पाठक याद करें कि ये ही दिन थे जब मैं कहानीपन के बारे में चिंतनरत थी |
वहां फिल्म देखते हुए लगा कि कितना पैसा बहाया (खर्चा नहीं )जाता है एक nonsensical स्टोरी को दिखाने के लिए |फिर सोचा मैं यहाँ (थिएटर में )क्यूँ हूँ ?<क्योंकि सान्या ,मेरी बड़ी बेटी ,ने जिद की <सान्या  ने जिद क्यों की <क्योंकि उसने इस फिल्म का 'टन टन 'वाला गाना टीवी पर देखा था <उसने यह गाना क्यों देखा था ?<क्योंकि टीवी तो बच्चे देखते ही हैं |
in short
फिल्म देखना is not a choice .it is a compulsion . एक्चुअली हमारी लाइफ में से ऑप्शन धीरे धीरे ख़त्म हो रहे हैं |और हम एक बहुत बड़ी धारा में बहे जा रहे हैं |यह हमारी मज़बूरी है |
उस दिन वहीँ बैठे हुए (क्योंकि फिल्म में मुझे ज़रा भी मज़ा नहीं आ रहा था )-
मेरे माइंड में एक ओर हिंदी के आलोचकों(क्योंकि  हिंदी से हूँ ) के  बाजारवाद के लानत-मलानत के लेख घूम गए (सचमुच वे कितनी मेहनत करते हैं इन सब चीजों को समझने-समझाने की ) और दूसरी ओर महानगरीय सभ्यता पर लिखे (क्योंकि मैंने इस विषय में पीएचडी जमा की है )उन विद्वानों की लिखी हुई किताबों के उद्धरण घूम गए जहाँ उन्होंने महानगर को एक विशालकाय पिंजरा बताया है |
और मैंने हॉल में बैठे हुए सचमुच अपने आप को पिंजरे में बंद किसी पक्षी के समान बेबस महसूस किया |(इन चीजों को इस तरह से सोचना सचमुच बहुत हैवी होता है )
.....
मगर लाइफ तो लाइफ है |वह तो रूकती नहीं | हम बेबस महसूस करें या नहीं आखिर रास्ता क्या है |क्या हो जाता है जानने से ,जब हम उसे बदल नहीं सकते  ?...मगर इन्सान और इन्सान की जात आखिर इस तरह निरुपाय होकर भी कैसे बैठे ? .........तब आखिर मैंने सोचा कि क्या हम ऐसी कहानियां नहीं लिख सकते जो meaningful हो |
तो इस तरह मैं फ़िल्मी कहानियों पर सोचने में प्रवृत हुई |
एक बार जो थोट प्रोसेस चला तो then i realize की फ़िल्मी कहानियों पर अब तक की मेरी समझ बौद्धिकतावाद से ग्रस्त बचकानी समझ थी जो  इधर उधर के बौद्धिकतावादी रिव्यूस पढ़कर बनी थी .ऐसे रिव्यूस एक खास प्रकार के बौद्धिकतावादी अहंकार से ग्रस्त होकर लिखे जाते है जिनका उद्देश्य अपने पाठकों को आतंकित करना होता है | पाठकों में भी वे इसी प्रकार की रूचि को प्रसारित करते हैं |मेरा इशारा आर्ट फिल्मो की ओर है ,जिन्हें मैं पहले ,अपने इंटेलिजेंट होने के दंभ में जबरन पसंद करती थी |पसंद तो मुझे मेन स्ट्रीम वाली फिल्मे भी थी पर लोगो को बताते हुए मैं आर्ट फिल्मो के नाम ज्यादा लेती थी |
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फ़िल्मी कहानियां भी कहानिया होती हैं ,पर वे सिर्फ कहानियां नहीं होती |
एक फिल्म में बहुत क्षेत्रों का टेलेंट यूज़ होता है |म्यूजिक ,कोस्ट्युम ,मेकअप ,एक्टिंग ,डांस एटसेट्रा एटसेट्रा
एक फिल्म की मेकिंग में  बहुत से लोग इन्वोल्व होते हैं |उनका जीवन -आजीविका उस पर निर्भर होती है |
एक साहित्यिक कहानी का लेखक अपने सरोकारों के लिए आजीवन लिख सकता है |इससे सिर्फ उसका जीवन या अधिक से अधिक उसके परिवार का जीवन प्रभावित होगा |
परन्तु एक फिल्म का निर्माता यह रिस्क नहीं उठा सकता |
फिल्म की कहानी के लिए -उसका चलना -सबसे पहली शर्त है |
.......
तो इस तरह सोचते हुए ,डिस्कशन यहाँ तक पहुंची कि कौन सी कहानियां चलती हैं <क्यूँ चलती हैं |
तो इस तरह ख्याल सलमान खान ,अक्षय कुमार वगैरह की फिल्मो की ओर गया और तब स्टारडम ,ब्लोकबस्टर ,ये शब्द दिमाग में आये | .............contd




सोमवार, 5 दिसंबर 2016

काफी हैविनेस हो गयी है |थोडा लाइट करते हैं |
शाहरुख़ खान ने एक इंटरव्यू में कहा -the only way to move from a bad phase is to work more .actually you have no option either .
कितनी सुंदर बात है |
मुझे फ़िल्मी कलाकारों के इंटरव्यूस  वगैरह देखने का बहुत शौक है |बहुत शौक है |पर मैं देखती हूँ ज्यादातर स्तरीय इंटरव्यूस इंग्लिश में ही हैं | हिंदी में ढंग के हैं ही नहीं |1-२ को छोड़कर |बल्कि हिंदी में ,कई तो इतने बचकाने होते हैं कि देखकर हंसी आती है कि क्या पूछ रहे हैं |वे लोग भी हँसते हैं |
एक जगह मैंने देखा दिलवाले की प्रमोशन पर एक ने शाहरुख़ से पूछा की आप गौरी को भी टुकुर टुकुर देखते थे क्या ?साथ में गाने की क्लिप चला दी और ये सवाल दाग दिया |बेचारा शाहरुख़ ....वो बोला भी कि इतनी  पुरानी बात पर कहाँ से पहुंच गए ....पर नहीं .....फिल्म में टुकुर टुकुर गाना है तो पत्रकार जी को तो यही सवाल पूछना है ................. हिंदी वालों का गानों से ओबसेशन ..... कमाल है|
इंग्लिश में भी कई तो स्तरीय है ,कई तो इंग्लिश की आड़ में पर्सनल तांक -झाँक ज्यादा करते है |वे तो और भी ज्यादा बुरे लगते हैं |एटलीस्ट बेचारे हिंदी वालों में कुछ मासूमियत तो है |
इंग्लिश में जो स्तरीय है ,वे अच्छा काम कर रहे है |अनुपमा , tete-e -tete वाली ,ndtv वगैरह |
इन इंटरव्यूस से फिल्म मेकिंग ,कहानी ,इंडस्ट्री ,वर्क एथिक्स ,अप्स एंड डाऊन,बाज़ार  .......रिलेशनशिप्स ...........बहुत सी बातें पता चलती है | नॉलेज बढती है |मुझे तो देखने का बहुत शौक है |