शनिवार, 26 अक्टूबर 2024

मेरे साथ तो बहुत बार ऐसा हुआ है कि कोई बात थी गंभीर टाइप  ,उसका महत्व है आज के लिए भी ,मतलब वह एक सर्वकालिक महत्व की ,ध्यान में रखे जाने योग्य बात थी /है ,
बट उसे कहने की फील ही गायब है ,मन के ऊपर से भी और मौसम के ऊपर से भी, मतलब त्यौहार का समय है ,सब इतने फेस्टिव मूड में है ,
तब ज्यादा गम्भीर बातों का क्या जिक्र करना ।😊
#धत तेरे की
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 आप सभी को महावीर निर्वाण दिवस और दीपावली की शुभकामनाएं
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रविवार, 20 अक्टूबर 2024

 

तृतीय प्राकृत गोष्ठी -गोहाना ,  में मेरे द्वारा पढ़े गए पेपर का एक विडिओ अंश ।

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एक कमी रह गई, गुरुदेव सेठ जी म आदि के दर्शन करने नही जा पाए। 
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गुरुवार, 17 अक्टूबर 2024

 

  

 प्राकृत गोष्टी कल से शुरु हो रही है । हम परसों , शनिवार को जायेंगे। fingers crossed. 

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बुधवार, 16 अक्टूबर 2024

सोमवार, 14 अक्टूबर 2024

विचारधाराएं स्थायी नही होती , सफल होने की कामना स्थायी होती है । फिर चाहे युग कोई भी  हो । विचारधारा का चोला तो रूख देखकर ओढ़ लिया जाता है ।

सफल होने की कामना में अ-बुद्धिमत्ता कुछ भी नही । 

असफल होने की कीमत पर विचारधारा को पकड़े रहना , यह बहुत बड़ा दांव है । 

दुनिया में कुछ ही दुर्लभ हैं ,जो इसे खेलने (झेलने 😊) में सक्षम हैं । 'वह '  अपने बच्चों की रक्षा करता है 

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अहिंसा की विचारधारा राग से वीतरागता की साधना है ।

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मैंने कई लेखकों के अनुभवों में उपहास , तल्खी, कड़वाहट,  और अवसाद को देखा है ,जो उन्हे सरस्वती शिशु मंदिर टाइप स्कूल संस्थानों में हुए।

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रविवार, 13 अक्टूबर 2024

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024

सम्यक दर्शन =2 शब्द

समकित = 1 शब्द  , दोनों सेम हैं । 

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दुनिया में  जैन धर्म की मुख्य पहचान तपस्या की है । जैनी तपस्या बहुत करते हैं , या प्याज-आलू के नही खाने की या दिन से खाने की । 

सही है ,ये सब बातें जैन धर्म  का अंग हैं ।

पर मैं बताऊं आपको , जैन दर्शन का मर्म समकित है । यह सबसे कीमती  चीज है । 

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संसार की सभी वस्तुओं में रत्नों को बहुत कीमती माना गया है । जैन दर्शन में रत्नों से भी ज्यादा कीमती हैं समकित  ,

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समकित है तो ज्ञान और चारित्र भी रत्न के समान कीमती हैं , ये तीनों त्रिरत्न हैं । 

#महावीर वाणी 



 शरद ऋतु का आगमन है । शाम के बाद हवा में नरगिस की महक है । प्रकृति कितनी मनभावन है ।😊

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गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

 सच्चा विश्वासी वह अविश्वासी है जो ईश्वर को प्राप्त हो गया है ।जिसने उसका दर्शन प्राप्त कर लिया है , जिसे उसका ज्ञान है।

अविश्वासी वह है जो विश्वासी ( ईमानदार)है जो ईश्वर को प्राप्त नही है ।जिसने उसका दर्शन प्राप्त नही किया है , जिसे उसका ज्ञान नही है।

दारा शिकोह - मजूमदार

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Whenever I see conflict between faith-non faith , I always remember these lines.

Being a faithful person I never doubted my faith. Nor do I doubt now . 

Bt Being a reader of various things , when I came to know Dara shikoh's quest in religion,  

I hv some glimpse of non -faithful ppl. May be .

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These are very powerful thoughts. One shd memorise it like a mantra, 

And ponder over these lines again and again, day n night, months ,years, 

May be then one can know it's meaning . If ,  HE is kind enough on him .

 जैन दर्शन में - 

5 ज्ञान हैं - मति ,श्रुत, अवधि,मनःपर्याय , केवल ज्ञान । 

4अज्ञान हैं - मति ,श्रुत, अवधि,मनःपर्याय  ।

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आम समझ में अनपढ़ता को अज्ञानता मानते हैं । 

सामान्यतः पढ़े -लिखों में ज्ञान के अभाव को अज्ञान कहते हैं ।

विशेष ज्ञानियों ने ज्ञान की सम्यकता को ज्ञान कहा है , उसकी असम्यकता को अज्ञान कहा है , फिर वह कितना ही बड़ा डिग्रीधारी हो । 

#महावीर वाणी

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बुधवार, 2 अक्टूबर 2024

बापू जी के जन्मदिन की शुभकामनाएँ ।

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ये विषाद ही है ,  कि जिसका ज्ञानपूर्ण बोध (महावीर वाणी की कृपा से ) उदासीनता की वजह है कि मैं होकर भी 'नही हूं ' दिखती हूं , करते हुए भी 'नही करती ' दिखती हूं । 

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बापू जी के जन्मदिन की पुनः शुभकामनाएँ ।

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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

लेखकों में धर्म के शुद्धतावादी नजरिए की बहुत आलोचना होती है ।अक्सर  साहित्य और कलाओं में यह व्यंग्य का विषय बन कर आता है । omg फिल्म में मिथुन* के स्त्रियों से बचकर चलने के स्टाइल को याद कीजिए, 

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यह सही है ,कि यह पाखंड भी हो सकता है ।

पर

धर्म के अपने क्षेत्र मे रहे हुए सत्य और झूठ के , पहाड़ - समुद्र जैसे तुलनात्मक अंतर को देखते हुए विशुद्धतम चारित्रिक शुद्धता के आग्रह अनुचित नही दिखते ।

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आप सोचकर देखिए,  कहां अहिसा -सत्य आदि आचार धर्म और कहां बलि आदि कु-आचार। 

दोनों प्रोडक्ट कामनाओं में विभाजित जनता में 'धर्म 'के लेबल से जाएंगे ,

तो उनमें 'ऑथेंटिक ' जज करने के तरीके को सख्त तो होना ही होगा । नहीं तो धोखाधड़ी की गुंजाइश कम कैसे होगी ।

यही कारण है कि धर्म के क्षेत्र मे चारित्र पर इतना बल दिया जाता है । जब तक साधक का मन अभ्यास में है , वह इसे एक 'आदेश'समझ कर पालन करता है ।

 परिपक्वता आने पर , जब वह इसके पीछे के ज्ञान की सतर्कता को जान लेता है , तो स्वयं ही इसमें दृढ़ हो जाता है ।

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सबसे घृणित किस्म की धोखेबाजी धर्म के क्षेत्र में होती है । यही धर्मपुरुषों के महान विषाद कारण भी हैं । धर्म को बचाने के लिए ही वे सतत संघर्ष के कठिन मार्ग पर चलना चुनते हैं ।

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*I wrote this post yesterday.  And surprisingly after some time saw mithun post on Manish singh's timeline. coincidence .

Earlier also . Chai.