कल मनीष सिंह की पोस्ट पढ़कर बहुत खुशी हुई। क्या ही अच्छा हो ! सारे हिन्दुस्तान के लोगों मे ऐसी दृष्टि-समझ बने । how I wish! However Knowingly aware that it is only wishful thinking.
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कुछ समय पहले मैने एक फोटो देखी थी । बहुत सी डिस्पोजेबल प्लेट्स की ।
देखो तो , दिखे की- उल्टी रखी है । बट देखते देखते एक प्वाइंट पे सीधी दिखने लग जाती है ।
मजे की बात है कि जब सीधी दिखने लगी तो , अब चाहकर भी उल्टी दिखनी बंद हो गई।
कमेंटस मे पढा तो देखा कि सभी ने ये बात दर्ज की थी । इसका हल यह था कि वापिस स्क्रोल करके फिर देखो ।😊
आत्मज्ञान भी ऐसा ही है । एक प्वाइंट पर आकर चीजे सीधी दिखने लग जाती है ।फिर इसे वापिस उलटने की चाह ही नही रहती ।
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हसबैंड के मोबाइल मे देखी थी ।संभव हुआ तो यहां शेयर करूंगी ।
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Sometimes it feels so soothing to read these kind of things .
An extract frm an unfinished story .
कई बार कोई कहानी ऐसे दिख जाती है जैसे सामने टेबल पर रखी हुई कोई चीज़। हम उस कहानी को उठाकर अलटते पलटते हैं कि देखें तो सही यह क्या चीज़ है?
अरे?
यह है तो एक पुराने जमाने की चीज़ लगती सब परिवेश पुराना है। किरदार जीवन। जीवन की गति।
अब ये बातें कहाँ पसंद आएगी किसी को? कहानी का निरीक्षण करते हुए मन से एक आवाज़ आती है।
तो क्या हुआ? कहानी पुरानी है तो। मनुष्य के भाव और करतूतें तो वही है। कह दो - पुराने साहित्यानुरागी मन से आवाज आती है।
हम दिन भर में कितने ही शब्दों ,आवाजों और छवियों में से गुजरते हैं। एक बार कहीं पढ़ा था कि हमारे ऊपर रोजाना हजारों शब्द गिरते हैं।
गिरते हैं ! सीरियसली!
बम हैं क्या?
उस समय इन्कार में मैंने सोचा था।
पर धीरे धीरे मुझे उस बात की गहराई समझ में आयी। मीडिया के जरिए जिंस तेजी के साथ शब्दों, आवाजों और छवियों की रचना बदलती जाती है ,उसमें कब गुड़ को शौकीन व्यक्ति को बंगाल के रसगुल्ले भी फीके लगने लगते हैं, ये पता ही नहीं चलता।
ऐसे अति चंचल यथार्थ के समय में जब -
मन की गति "सो घोड़े दौड़ रहे हों , एक साथ "
बुद्धि की गति" अपनी दिनचर्या में धंसी हुई हो"
और शरीर की गति " टल जाये तो टाल दें, नहीं तो आ पड़े काम को किसी तरह निपटा लें बस ", यह हो ;
तब कौन सी बात आपको किस तरह सूझ जाएगी, यह समझना तो लगभग नामुमकिन सा है । फिर यह है कि आपका एक परिवेश ,सोच , रहन- सहन का ढांचा भी है। बेहतर यही है की आप कहानी का मज़ा लें।