वे जब पहले पहल मुझे मिले थे तो बहुत आत्मविश्वास में थे |वे शुद्ध हिंदी भाषी थे |उनके सामने अपनी दिल्ली कि 'भ्रष्ट 'हिंदी बोलते हुए मैं अक्सर हकला जाती थी |बिहार की तरफ का होने के कारन भाषा पर उनका पूरा अधिकार था |धारा प्रवाह हिंदी भाषा बोलते थे |हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य के विषय में बोलते हुए पूरी रौ में आ जाते थे |लाल चेहरा उत्साह से तन जाता था ,लगता था कि हिंदी के हथियार से न जाने कौन सा किला जीत लेंगे |लेकिन उस समय भी उनकी आँखों में भूख बड़ी जबरदस्त थी ,स्पष्ट थी |उस समय मैं उनकी तुलना उस बच्चे से करती थी जो कुपोषण से ग्रस्त माँ की सूखी छातिओं में बेतहाशा दूध टटोल रहा है |
फिर पठन ,शोध,और अध्यापन के १०-१२ वर्षों के संघर्ष में चेहरे का तेज मंद पड़ता गया |उफने हुए नाले का पार ढीला होने पर वह अपनी गाद के बीच में बहता है |युवा उम्र का बेहतरीन हिस्सा बेस्वाद किताबों में बिताकर लगता है कि जैसे ठग लिए गए हैं |अब तो हालत यह हैं कि तल्खी और विषाद उनके चेहरे पर स्थायी रूप से चस्पां हो गए है |हिंदी भाषा और साहित्य का जिक्र आते ही प्राण हीनता का 'अटेक'सा पड जाता है | ऐसी मुर्दा आवाज में बोलते हैं कि सामने वाले के उत्साह पर सातों घड़े पानी फिर जाये |
हिंदी ने क्या दिया ?यह प्रश्न उनके जीवन का दर्शन बन गया है |
स्पष्ट है कि अब वे हिंदी- प्रेमी नहीं बल्कि हिंदी -पति हो गए हैं और भाषा की मर्यादा की रक्षा अब वे आजीवन प्राणप्रण निष्ठा से निभाते रहेंगे |