Hv cm to mom's house for few days.
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समारोह पूर्वक बलि वध के लिए ले जा रहे एक पशु के साथ हुए विश्वासघात पर जब एक लेखक लिखता है ,तो वह उस पशु की चेतना मे हो रहे संघात से एकाकार हो चुका होता है ।
यह कोई मामूली परिवर्तन नही है ।
यह चार दुर्लभ अंगों -मनुष्य भव , जिनतत्व श्रवण,श्रद्धा , वीर्यकार पराक्रम - मे अंतिम अंग की भूमिका है ।
तत्व मे श्रद्धा करके जीव तदनुसार आचरण के उठता है वह द्विविध होता है -साधु और श्रावक।
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यह पराक्रम, सचमुच में बड़ी ही दुर्लभ चीज़ है। क्योंकि इसमें व्यक्ति स्वयं अपने प्रति ही बेहद निर्मम, कठोर हो जाता है।
स्वाद वृत्ति को जीतना , यह कोई मामूली बात नहीं है। स्वाद* के आगे ज्ञान कुछ काम नहीं आता। जितना मर्जी समझा लो। कोई फर्क नहीं पड़ता।
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यहां तक हुई इस पक्ष की एक बात
अब आगे च्वाइस की बात को देखते है ।
यह कहा गया कि मोक्ष मनुष्य जीवन का अंतिम डेस्टिनेशन है । इसके आगे फिर कुछ प्राप्त करना नही बचता ।
बट ऐसे महत्वपूर्ण ज्ञान को बताने के लिए भी भगवंतों ने फरमाया -पूछने पर ही जवाब दे ।इसलिए इसका नाम श्रुत परम्परा है । शिष्य के पूछने पर, गुरुमुख से सुने हुए ज्ञान की परम्परा।
क्यों?
क्योंकि जब व्यक्ति संयम जैसी उत्तम चीज को भी मन से स्वीकार नही करता ,तो उसके ज्ञान ग्रहण मे अन्तर आ जाता है । इसे ज्ञानान्तर कहते है ।
ज्ञानान्तर से भयानक दोष उत्पन्न हो जाते है ।
हम देखते है कि श्रेष्ठ धर्म परम्पराएं भी आगे जाकर विभाजित होती जाती है । विभाजित हुई परम्पराएं कभी दोबारा मिलती नही ।
मूल सत्य कही वीराने मे पड़ा रोता रहता है । उस तक पहुँचने का रास्ता कठिन होता जाता है
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आध्यात्म के क्षेत्र मे रखी गई ऐसी सूक्ष्म सावधानी का 'मांस खाने की च्वाइस कहना कुतर्क है ।
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अब मै एक और पहलू की चर्चा करना चाहती हूं।
जीवदया जैन विज्ञप्ति का मुख्य प्वाइंट है ,इसमे कोई शक की बात नही है ।
साथ ही इस विज्ञप्ति के अन्य मुख्य बिन्दु भी है । जिनमे से एक है मोहनीय कर्म । यह आठ कर्मो मे चौथे नम्बर का है । वैसे तो मोक्ष प्राप्त होने मे ज्ञानावरणीय कर्म की बाधा होती है , पर मोहनीय कर्म की प्रबलता के आगे सब कर्म फीके पड जाते है ।
मोहनीय कर्म =तीव्र राग -द्वेष। इसका बन्ध काल बहुत बहुत ज्यादा होता है ।
जैन दर्शन मे द्वेष को भी बन्ध का कारण माना गया है ।
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पशु अधिकार की पोस्ट के जवाब मे नाॅन वेज की पिक , द्वेष स्थान है ।
अपनी रक्षा करो वहां से ।
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सुशोभित स्वयं को एथिस्ट कहते है पर जीवदया के लिए उनके आग्रह श्रमण धर्म से मिलते जुलते है ।
श्रमण जैन धर्म भी ,एक प्रकार से , धर्म के नाम पर फैले देववाद ,बलिप्रथा आदि का घनघोर विरोधी है ।
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कल संगत पे सुधीश पचौरी का इंटरव्यू सुना था । शानदार।
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*इंडिया मे एक बहुत बड़े पक्षी विज्ञानी हुए है -सालिम अली । उनका पूरा जीवन पक्षियो के अध्ययन मे गुजरा । बट वे चिड़िया का मांस खाते थे । लोगो को अचरज हो कि एक ओर चिड़ियों की ऐसी जानकारी ,
दूसरी ओर उनका भक्षण ।
यह द्वैत तो है , पर यह इंसान के अस्तित्व मे ही पैवस्त है । इसे कैटेगराइज़ नही कर सकते ।
परसों जो मैंने पेंटिंग की पिक शेयर की थी, वह चित्रकार विजय बिस्वाल की बहुत सराही जाने वाली कृतियों में से एक है। वे खुद इसका कारण नहीं जानते कि एक साधारण चूल्हे की पेंटिंग को क्यों इतनी सराहना मिलती है।
सचमुच ही यह तो समझने की बात है कि घर का साधारण चूल्हा, हर घर में मिल जाता है ,अगर उसे रंगों से संवार दिया जाए, तो वह दर्शक के भीतर ऐसा क्या सम्मोहन जगाता है कि वे उसकी सराहना करते हैं।
मेरी समझ में तो इसका उत्तर यही हो सकता है। यह जीवन है।
अज्ञात कारणों से जब जीवन के ऊपर दबाव बढ़ता जाता है तो कलाकार की चेतना उन वस्तुओं में जीवन के आनंद को ढूंढती है जो बिल्कुल साधारण रूप में है।
जीवन के साधारण चित्रों में , छिपी हुई है - जीने की ,जीवित होने की अदम्य आदिम लालसा।
कुछ इसी तरह का भाव है' दर्पण मांही आग ' सीरीज की स्मृति चित्रमाला में।
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डायरी के नोट देखे तो, साल के हिसाब से 'उववाई ', यह शास्त्र 2017 से पहले पढ़ा गया है। 16 भी हो सकता है ।15 भी । उस समय इसको पढ़कर मुझे अपनी कजिन बहन की शादी के मंजर याद आए थे। मैंने उसे एक कहानी के रूप में लिखना चाहा था। लिखते -लिखते लगा कि यह तो एक लघु उपन्यास ही बन जाएगा। पर वह बात वहीं रह गई ।
आगे यह बात इस रूप में सामने आई है ।सही फार्म मिलने मे इतना समय लग गया ।
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My 2024 is done ✔️
अब तो पुराने पेंडिंग काम पूरे करने है ।
आगे की आगे देखेंगे।
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चार
गोल गप्पे
पापा ने विशाखा को मना किया था की भामनों के घर नही जाना । क्यों? कह दिया ना ! कह दिया ना ! बस। इसके आगे कोई जिरह या बहस की गुंजाइश नहीं थी। पापा की बहुत सारी 'नहीं' के पीछे, अनजाने -छुपे हुए डर , संदेह थे , जिनकी उलझी गाठों को वे आजीवन सुलझा नहीं सके। पर सिचुएशन , जगह और वक्त के हिसाब से अपने बच्चों के लिए सटीक निर्णय लेने में वे कभी नहीं चूके। इसके लिए उन्हें हरहराते समुद्र में भी कूदना पड़ा तो वे बेझिझक कूद गए। चाहे वे तैरना भी ना जानते थे। ये सब साहस के कार्य वे 'एकमात्र ' अपने बच्चों के प्रति अपार वात्सल्य भावना के कारण कर पाए।
पापा ने मना किया था, इसलिए विशाखा कभी भामनो के घर के अंदर नहीं गई। पर बाहर दरवाजे की दहलीज पर खड़े रहकर भामिनी को गोलगप्पे बनाते हुए देखने में क्या हर्ज था?
भामनी ऊंची -लंबी ,तीखे नैन नक्श की, पतले गात की महिला थीं। वह साड़ी सीधे पल्ले की बांधती थी। वह लकड़ी के फट्टे पर गूंथे हुए आटे की छोटी छोटी पेड़िया बेलन से बेलकर बड़ी कढ़ाई में छोड़ती जाती थी। गर्म तेल में छोटी छोटी पूरियां तुरंत फूल कर गोल गप्पे बनते जाते थे ।भामिनी उन्हें बड़ी झार में निथार कर लकड़ी के टोकरे में डालती जाती थी। विशाखा खड़ी हुई देखती जाती थी।
आ जा वीशू- भामनी कहती।
वह ना में सिर हिला देती।
यह नहीं आएगी- भामनी का युवा लड़का रामफल कहता।
विशाखा भागकर अपने घर में घुस जाती। घर में चर्चा थी कि रामफल बस अड्डे पे गोलगप्पे का ठेला लगाता है।
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दर्पण मांहि आग -तीन भाग में एक बाल पुस्तक श्रृंखला है । यह एक स्मृति चित्र कथा है , जिसमें एक बच्ची विशाखा का जीवन आया है ।
यहां मैने कुछ प्रसंग शेयर किए थे । अभी दूसरे और तीसरे भाग का कार्य बाकी है ।
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रचना प्रक्रिया पर एक पूर्व पोस्ट-
श्रेष्ठ रचनात्मक कला का यह एक अनिवार्य प्रकार्य मैंने देखा है की वह आस्वादी के भीतर कुछ बदल देता है। बेशक फौरी तौर पर वह स्वयं उस तरह की रचना न कर सके, पर धीरे -धीरे परिपक्वता पूर्ण होने पर वह स्वयं भी इस तरह की रचना करने के काबिल बन जाता है।
खुद मेरे साथ यह हुआ है । अब तक , तीन बार। सुधा अरोड़ा जी की कहानी है- औरत : तीन बटा चार । यह कहानी मैंने कई बार पढ़ी है । पढ़ी,पढ़ी, पढ़ी । पता नही क्या ट्रिगर हुआ । पोशाक कहानी क्लिक हो गई।
जैन आगम 'उववाई ' के ' रिच' भावपूर्ण वर्णन पढ़ते हुए मुझे नाते मे बड़ी बहन की शादी के मंजर याद हो आए थे । मैने उन्हे एक कहानी मे लिखने की कोशिश की थी । बट सही फार्म नही मिली थी ।
ऐसा होता है ना! कि लाइफ मे एक मोमेंट पर आपने बातों को कैसे समझा-जिया , बाद मे परिवर्तित जानकारी मे उन पिछली बातों का भी स्वाद बदल गया ।तो चीजे काम्प्लेक्स हो गई। बट फिर भी आप पाते हो कि उस पिछले समय मे जिस तरह बाते देखी थी , उनका मजा विलक्षण था ।
तीसरी बार ऐसा हुआ। मैं पत्रकार रवीश कुमार* के एफबी को फॉलो करती हूँ। उन्होने अपनी टाइमलाइन पर सॉन्ग शेयर किया था ।यह एक अंग्रेजी गाने का लिंक था। वह गाना था- फ़िल्म साउन्ड ऑफ म्यूजिक का दीज़ आर् माई फ्यू फ़ेवरेट थिंग्स। इस गाने की एनर्जी इतनी जीवंत और तुरंत फैलने वाली थी कि मेरा मन बहुत खुश हो गया था। इस गाने की वजह से, मैं भी अपने बचपन में पहुँच गई थी।
बाद में मैंने उसे एक कहानी में ढालने की कोशिश की, पर वह बात नहीं बन पा रही थी। फिर वही समस्या। मनचाही फॉर्म नहीं मिल रही थी। मुझे लगता है , अब जाकर वह समस्या सॉल्व हुई है। देखो ! आगे क्या सामने आता है।
* लेखन में प्रसिद्ध लोगों का जिक्र करना अनुकूलता -प्रतिकूलता के पैमाने पर देखा जाता है।
अनुकूलता है तो, यह बात प्रसन्नता की लगती है।
प्रतिकूलता है तो , यह बात 'हमारी प्रसिद्धि में जबरन शेयर लेना चाह रहे हैं ' इस टाइप से निकल कर आती है।
मैं इस बात को तथ्य के तौर पर दर्ज करती हूँ। और इस तथ्य के द्वारा रचनात्मक अनुभव की प्रक्रिया पर भी कुछ रौशनी डल जाती है।
यहाँ ब्लाग पर प्राइवेटली इस बात को इस तरह लिखने में तो मुझे लगता है कि यह दोष नहीं लगेगा। अगर कभी इस बात को प्रकाशन में कहने का अवसर आया तो फिर यह बात कैसे कही जाएगी, जब की तब देखेंगे ।
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किताब छपने का मुझे नही मालूम। सहृदयों ने यहां पढ़ लिया , मेरे लिए तो यही प्रकाशित होना है ।
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विशाखा पहली क्लास में थर्ड आई थी। स्कूल से इनाम में एक लंच बॉक्स और एक लाल रंग की बड़ी गेंद मिली थी। वह खुशी के मारे सबको दिखाती हुए घूम रही थी । पहले दादी को दिखाई , मम्मी को, ताई के बच्चों को, फिर सामने गली में एक घर छोड़कर बुआ को दिखाने गई। बुआ उसे देखकर खुश हुई और कहा- अच्छी बात है। वह अड्डे पर दरी बना रही थी ।
विशाखा उछल- उछल कर सबको अपनी गेंद दिखा रही थी । उसकी खुशी संभल नहीं रही थी। कभी वह इस घर में घुसती, तो कभी उस घर में। उत्साह की मारी वह ओम बाबा के घर तक चली गई।
घरों में काम कर रही महिलाएं- कपड़े धोती हुई, कपड़े सुखाती हुई, झाड़ू से चौंक धोती हुई, सब्जी काटती हुई, सब्जी बनाती हुई , आटा गूंथती हुई, रोटी बनाती हुई - उसका उत्साह देखकर बहुत खुश थीं।
उसके पीछे सब बच्चे लगे थे। उनके हृदय ईर्ष्या की आग में जल रहे थे। वे बस पास हुए थे। उन्हें कोई इनाम नहीं मिला था।
आह ! कितनी बढ़िया गेंद है ! कैसा लाल रंग है ! काश वे भी ऐसी बॉल ले पाते ! - वे बड़ी हसरत से बॉल की ओर देख रहे थे। वे विशाखा के आगे इसरार भी कर रहे थे कि एक बार वह उन्हें भी बॉल हाथ में दे दे। बाॅल हाथ में लेकर देखने के बाद वे वापस दे देंगे।
क्यूं दूँ? मेरी हैं। मुझे इनाम में मिली है। मैं थर्ड आई हूँ। मैं नहीं दूंगी। - कहती हुई विशाखा इतरा रही थी।
तभी काके ने बॉल पे झपट्टा मारा। वह बॉल को लेकर अपने घर की ओर भागा। विशाखा चिल्लाई । वह भी काके के पीछे भागी।। सारे बच्चे भी भागे । भागते हुए काके अपने घर में गया और अड्डे में काम आने वाला एक लंबा सुंआ बॉल में ठोक दिया।
फटाक! - बॉल गुब्बारे की तरह फट गई।
ये ले अपनी बॉल - काके ने लाल प्लास्टिक विशाखा की ओर फेंक दी।
विशाखा ज़ोर से चिल्ला कर रो रही थी । उसे काके काला कौवा प्रतीत हुआ, जिसने सख्त चोंच से उसकी खुशी को नोच लिया था। काके का रंग काला था। वह ज़ोर ज़ोर से रो रही थी।
मेरी बाॅल तोड़ दी।
काके ने मेरी बाॅल तोड़ दी ।
बुआ कमरे में आयी। उसने उसे दुलारा -पुचकारा । काके को डांटकर भगाया। बुआ ने उसे आश्वासन दिया कि वह ऐसी बॉल दूसरी ला देगी । उसने उसे खाने की चीज़ दी। तब जाकर विशाखा का रोना कम हुआ।
रात को विशाखा ने पापा के आगे काके की शिकायत लगाई। पापा ने सारी बाते सुनी और कहा - बस ! तू थर्ड आयी है। फर्स्ट क्यों नहीं आयी।
एं - उसका रोना बंद हो गया।
यहाँ काके ने मेरी बॉल फोड़ दी। पापा को फर्स्ट आने की पड़ी है-विशाखा के मन में आया।
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सुबह
घर में सुबह होने की हलचल की आवाजें थी। विशाखा उठकर चौंक (आंगन ) में आई। अंगीठी पर छोटी पतीली में चाय बन रही थी। चाय का रंग हल्का भूरा था। उसकी भाप और खुशबू पूरे चौक में फैली थी। पापा 7:00 बजे की गाड़ी में काम पर जाने के लिए तैयार थे। मम्मी ने रोटियां बना दी थी। सब्जी भी। चाय गिलास में छान रही थी। दादी एक तरफ कमरे की डोली पे बैठी थी। ताई अपनी तरफ के आंगन की डोली पे खड़ी थी। उसकी लड़कियां स्कूल ड्रेस में तैयार थी।
वहाँ सर्दी की धुंध थी। सबके मुँह से भाप निकल रही थी। वे सब - बाबा , पापा गर्मी के लिए अंगीठी के आसपास खड़े थे। हाथों को जल्दी- जल्दी रगड़ रहे थे । उनकी बातें अलाने- फलाने लोगों की जिंदगी की आकस्मिकता से जुड़ी थी।
विशाखा भाग कर गली में गयी। वहाँ एक घर के आगे अंगीठी रखी थी। कोयला जले तो धुआं उठता है। धुआं घर में न फैले, इसलिए उसकी सीलन को खत्म होने तक, सब लोग अंगीठी गली में रख देते थे। यह सुबह शाम की नियमित दिनचर्या थी। ऐसा करने से एकबारगी तो पूरी गली धूँए से भर जाती थी। थोड़ा छंटने पर सब अपनी अंगीठियां अंदर ले आते थे।
विशाखा वापिस चौंक में आ गई।
इसका दूध बना दे - पापा ने मम्मी को कहा।
मम्मी ने एक गिलास में गर्म दूध डाला। चीनी मिलाई। विशाखा ने दूध पिया। उसे दूध का स्वाद बहुत अच्छा लगता था ।
आ जा चाचा ! - विनेश ने गली में से आवाज लगाई।
आया- कहकर पापा चले गए।
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