मन मे कोई बात है ।कोई नी ।चलते चले चलने दो ।यह मेरा बुनियादी नजरिया है ,जीवन के प्रति ।
मै किसी से पूछती नही । आम जन या घर वालों को तो जाने ही दो , जो इन विषयो के जानकार होने के प्रसिद्ध है ,उनसे भी नही ।हरेक इंसान की अपनी जीवन गति है ।वह उसमे उलझा है । कोई वक्त लगाकर कुछ कहे भी , मुझे संतोष न हो ।
इस तरह अन्तर्मन की गति स्लो से स्लो मोशन मे चुपचाप बहती रहती है ।ये तो लिखने के क्रम मे बाते आ रही है वर्ना ऐसी यात्राएं सबकी निजी होती है ।
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एक बार यह सूत्र मन मे बैठने के बाद अगला प्रश्न प्रेम का था ।इसकी थोड़ी-बहुत चर्चा पहले भी आई है ।
मेरे धार्मिक विमर्शों मे प्रेम का विमर्श भी रहा है ।
क्यों नही ।
साहित्य और दर्शन के बीच पेंडुलम की तरह झूलते हुए, यह कैसे संभव था कि यह विषय विमर्श मे नही आता ।
14-15 तक मेरे मन मे बड़ी ग्लानि रहती थी । हम टीम बनाकर साहित्य का प्रसार करेंगे , एक तरफ यह उद्योग; दूसरी तरह शास्त्र पढ़ना ।
शास्त्रों मे तो सब तरफ काम-भोग को बुरा कहना एटसेटरा ।
मेरी श्रद्धा भी बहुत थी ।
दूसरी तरफ साहित्य की एबीसीडी से लेकर जेड तक प्यार,इश्क,मोहब्बत,प्रेम एटसेटरा के सिवाय कुछ हैई नही ।
तो इस वजह से मेरे मन मे बड़ी ग्लानि रहती थी । बट ।चलो चल रहा था ।
अच्छा!उस वक्त मेरे मन मे 'प्रेम बिना जीवन नही 'यह विश्वास बड़ा गहरा था ।
तोऽऽ ; मैं बताऊं आपको ! यह मनुष्य की जात की बात है ।वह अपनी पे आए तो देवताओं से ठान लेता है ,मनुष्य क्या चीज है ।
खैर ! मेरे साथ तो ऐसा नही हुआ। मै तो श्रद्धालू थी । इसलिए ठानना वगैरह तो कुछ नही ,बस ग्लानी का भार ही ढोती थी ।
खैर ! धीरे धीरे यह मसला खुद ही सुलझ गया ।
उसके बाद जो मैने देखा वह ये कि ये कुछ ही लोगों की तकलीफ है कि वे ऐसा सोचते है कि प्रेम बिना जीवन नही ।अजी दुनिया तो प्रेम के बिना बड़े मजे से जीती है ,बल्कि कुछ ज्यादा ही मजे से जीती है ।
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फिर विमर्श का अगला स्वाभाविक स्टेप ये था कि हे प्रभु ! तो क्या ये दुनिया मे जन्म जन्मांतरों से इतनी प्रेम की कहानियां सुनाई जा रही है ,सब झूठ हैं ।
जब चिंतन इस ओर चला तो फिर नए रिअलाईजेशन हुए । प्रेम से भी ज्यादा , प्रेम के श्रुत से (अर्थात किस्से , कहानियां एटसेटरा )बाहर आने मे समय लगता है ।
मुझे तो महावीर वाणी ने बचा लिया ।
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पश्चात मेरी जिज्ञासा का स्वाभाविक अगला स्टेप था कि देखती हूं हमारे शास्त्रों मे प्रेम के बारे मे क्या कहा गया है ।
यह शब्द क्रिया के भेद बताते हुए आया है ।क्रिया दो प्रकार की होती प्रेम प्रत्यया और द्वेष प्रत्यया।
प्रेम प्रत्यया क्रिया दो प्रकार की होती है - माया और लोभ।
द्वेष प्रत्यया क्रिया दो प्रकार की होती है - क्रोध और मान।
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पाठक अभी समझेंगे नही । क्योकि यह थोड़ा टेक्निकल विषय है ।
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पाठक यह जान ले कि मुझे बहुत निराशा हुई थी यह पढ़कर। प्रेम जितनी महान और पवित्र चीज को लोभ और माया जैसी तुच्छ प्रवृतियों से प्रेरित कहना ।
बट यही सच है ।
शब्द विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है । आचार्य शुक्ल ने ल-व की व्युत्पत्ति मे लो-भ का साथ कहा है ।
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'मन क्या है' का संतोषजनक समाधान मुझे आगे जाकर बहुत सालो बाद वात्स्यायन की प्रसिद्ध किताब मे मिला ।
हमारे भीतर एक शक्ति है इच्छा रूप और दूसरी है ज्ञानरूप ।कोई इसे एक ही शक्ति कह देते है ।अर्थात जो इच्छा करती है ,वही जुगत भी लगाती है यह कार्य कैसे होगा ।
कोई इसे मन और बुद्धि कहकर दो बताते है । अस्तु
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भारतीय विचारकों के बारे मे यह भ्रम है कि वे वस्तुनिष्ठ नही है ।पर यहां तक पहुँच पाना सबके बस की बात नही है ।