रविवार, 30 अप्रैल 2023

महावीर वाणी -4 यात्रा और अन्तर्यात्रा

मन मे कोई बात है ।कोई नी ।चलते चले चलने दो ।यह मेरा बुनियादी नजरिया है ,जीवन के प्रति ।

मै किसी से पूछती नही । आम जन या घर वालों को तो जाने ही दो , जो इन विषयो के  जानकार होने के प्रसिद्ध है ,उनसे भी नही ।हरेक इंसान की अपनी जीवन गति है ।वह उसमे उलझा है । कोई वक्त लगाकर कुछ कहे भी , मुझे संतोष न हो ।

इस तरह अन्तर्मन की गति स्लो से स्लो मोशन मे चुपचाप बहती रहती है ।ये तो लिखने के क्रम मे बाते आ रही है वर्ना ऐसी यात्राएं सबकी निजी होती है ।  

....

एक बार यह सूत्र मन मे बैठने के बाद अगला प्रश्न प्रेम का था ।इसकी थोड़ी-बहुत चर्चा पहले भी आई है ।

मेरे धार्मिक विमर्शों मे प्रेम का विमर्श भी रहा है ।

क्यों नही ।

साहित्य और दर्शन के बीच पेंडुलम की तरह झूलते हुए, यह कैसे संभव था कि यह विषय विमर्श मे नही आता ।

14-15 तक मेरे मन मे बड़ी ग्लानि रहती थी । हम टीम बनाकर साहित्य का प्रसार करेंगे , एक तरफ यह उद्योग; दूसरी तरह शास्त्र पढ़ना ।

शास्त्रों मे तो सब तरफ काम-भोग को बुरा कहना एटसेटरा ।

मेरी श्रद्धा भी बहुत थी । 


दूसरी तरफ साहित्य की एबीसीडी से लेकर जेड तक प्यार,इश्क,मोहब्बत,प्रेम एटसेटरा के सिवाय कुछ हैई नही ।


तो इस वजह से मेरे मन मे बड़ी ग्लानि रहती थी । बट ।चलो चल रहा था ।


अच्छा!उस वक्त मेरे मन मे 'प्रेम बिना जीवन नही 'यह विश्वास बड़ा गहरा था ।


तोऽऽ ; मैं बताऊं आपको ! यह मनुष्य की जात की बात है ।वह अपनी पे आए तो देवताओं से ठान लेता है ,मनुष्य क्या चीज है ।


खैर ! मेरे साथ तो ऐसा नही हुआ। मै तो श्रद्धालू थी । इसलिए ठानना वगैरह तो कुछ नही ,बस ग्लानी का भार ही ढोती थी ।


खैर ! धीरे धीरे यह मसला खुद ही सुलझ गया ।  


उसके बाद जो मैने देखा वह ये कि ये कुछ ही लोगों की तकलीफ है कि वे ऐसा सोचते है कि प्रेम बिना जीवन नही ।अजी दुनिया तो प्रेम के बिना बड़े मजे से जीती है ,बल्कि कुछ ज्यादा ही मजे से जीती है ।


***


फिर विमर्श का अगला स्वाभाविक स्टेप ये था कि हे प्रभु ! तो क्या ये दुनिया मे जन्म जन्मांतरों से इतनी प्रेम की कहानियां सुनाई जा रही है ,सब झूठ हैं । 


जब चिंतन इस ओर चला तो फिर नए रिअलाईजेशन हुए । प्रेम से भी ज्यादा , प्रेम के श्रुत से (अर्थात किस्से , कहानियां एटसेटरा )बाहर आने मे समय लगता है ।


मुझे तो महावीर वाणी ने बचा लिया ।

***

पश्चात मेरी जिज्ञासा का स्वाभाविक अगला स्टेप था कि देखती हूं हमारे शास्त्रों मे प्रेम के बारे मे क्या कहा गया है ।


यह शब्द क्रिया के भेद बताते हुए आया है ।क्रिया दो प्रकार की होती प्रेम प्रत्यया और द्वेष प्रत्यया। 


प्रेम प्रत्यया क्रिया दो प्रकार की होती है - माया और लोभ।


द्वेष प्रत्यया क्रिया दो प्रकार की होती है - क्रोध और मान।

***

पाठक अभी समझेंगे नही । क्योकि यह थोड़ा टेक्निकल विषय है ।

****

पाठक यह जान ले कि मुझे बहुत निराशा हुई थी यह पढ़कर। प्रेम जितनी महान और पवित्र चीज को लोभ और माया जैसी तुच्छ प्रवृतियों से प्रेरित कहना । 

बट यही सच है । 

शब्द विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है । आचार्य शुक्ल ने ल-व की व्युत्पत्ति मे लो-भ का साथ कहा है ।

***

'मन क्या है' का संतोषजनक समाधान मुझे आगे जाकर बहुत सालो बाद वात्स्यायन की प्रसिद्ध किताब मे मिला ।

हमारे भीतर एक शक्ति है इच्छा रूप और दूसरी है ज्ञानरूप ।कोई इसे एक ही शक्ति कह देते है ।अर्थात जो इच्छा करती है ,वही जुगत भी लगाती है यह कार्य कैसे होगा ।

कोई इसे मन और बुद्धि कहकर दो बताते है । अस्तु 

..

भारतीय विचारकों के बारे मे यह भ्रम है कि वे वस्तुनिष्ठ नही है ।पर  यहां तक पहुँच पाना सबके बस की बात नही है ।

शनिवार, 29 अप्रैल 2023

महावीर वाणी -3 यात्रा और अन्तर्यात्रा

उत्तराध्ययन सूत्र के बाद जैन आगम पढ़ने की शुरुआत हो गई थी । बहुत पहले ही मैं रोज सामायिक  करने लगी थी । सामायिक हमारी पूजा पद्धति है । इसमें आसन बिछाकर जमीन पर या अशक्त हो तो मोढे पर या कुर्सी पर बैठ कर , मुंह पर सफेद मुँहपट्टी लगाकर 48 मिनट एक स्थान पर बैठना होता है । इस बीच कुछ खाना पीना नहीं । धार्मिक किताबें पढ़ सकते हैं या फिर माला फेर सकते हैं ।

बहन ! अगर तुम रोज सामायिक करती हो तो उसमें 15 मिनट शास्त्र की स्वाध्याय किया करो -  हमारे एक परिचित संत ने कहा था ।। मैंने वह नियम ले लिया। इतने छोटे से नियम ने हीं मेरे जीवन में चमत्कार भरना शुरू कर दिया । 

शायद पहले पहल यह नियम ही प्रेरणा बना था , शास्त्र पढ़ने के लिए। बाद में मेरी खुद की रुचि भी जाग  गई। अगला शास्त्र दशवैकालिक था । एफबी पर एक बार मैने शास्त्र पढ़ने के क्रम की सूची पोस्ट की थी।  इस सूची में 19 वें सूत्र पर तारीख और साल है ।उससे पहले के लगभग 15 साल के बीच पढ़े गए शास्त्रों की क्रम और साल के विषय में मैं निश्चित नहीं हूं ।इस तरह शास्त्रों के क्रम की सूची बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी इसका कारण बड़ा ही सरल है।

हमारे सेठ जी महाराज की आवाज बहुत महींन है । उनके आसपास का माहौल ही ऐसा है कि उनके सामने अधिक जोर से बार-बार बोलना अखरता  है । सब धीमी आवाज मे बात करते हैं । जैसे जैसे मैं शास्त्र पढ़ती गई, सूची बढ़ती गई।

 मैं गुरुदेव के पास जाकर पूछती- गुरुजी अगला शास्त्र कृपा कर दो । कौन-कौन से पढ़ लिए - गुरुजी पूछते । 

इस तरह बढ़ी हुई सूची में खुद मुझे याद रहे और गुरु जी स्वयं पढ़ कर देख ले - मैंने डायरी में सूची बनाई थी।

 जैसे ही गुरूदेव पूछते- कौन-कौन से पढ़ लिए , मैं तुरंत डायरी आगे कर देती थी ।बाद में ठाणांग सूत्र के बाद से मैंने इस सूची में तारीख और साल लिखना शुरू किया ।

***

मन ,बुद्धि, आत्मा -  जैन आगमों के विषय विविध है । मोटे तौर पर इनका विभाजन करना चाहे तो निवृत्ति मूलक और प्रवृत्ति मूलक -यह दो कैटेगरी बना सकते हैं । 

निवृत्ति मूलक विषयों मे संसार की असारता ,जीवन की अनित्यता,शरीर की अशुचिता  , मोह की भयंकरता, धर्म प्राप्ति की दुर्लभता, काम भोगों की क्षण भंगुरता आते है। 

प्रवृत्ति मूलक विषयों मे  ज्ञान, दर्शन, चरित्र का महत्व ,विनय का महत्व, पंच महाव्रत एवं अणुव्रत का पालन आदि है ।जैन कथाएं हैं। लोक के नक्शे  हैं ।भूगोल है ।गणित है ।

एक बार जैन आगम पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ तो वह आज तक बदस्तूर जारी है ।यह बात पहले भी आ चुकी है की शुरुआत से ही आगमों के प्रति रुचि दर्शन के कारण उतनी नहीं अन्य अनुशासन के कारण ज्यादा बनी थी ,जिनमें शब्द विज्ञान और साहित्य मुख्य हैं ।

दर्शन की मेरी रुचि एक दूसरे ट्रैक पर से होकर बनी जिसका उल्लेख आगे किया जा रहा है।

 यह मन क्या है?

 यह शरीर में कहां होता है?

क्या यह ह्रदय नामक उस अंग में स्थित होता है जिसे शरीर का विज्ञान बताता है कि वह बाएं तरफ होता है ?

ये कुछ प्रश्न थे जो मेरे मन में तीव्रता से उठते थे ।  मैं इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए बहुत लालायित थी ।

उस वक्त तक (अर्थात समझो 2008-9, अंदाजे से लिख रही हूं) मैंने जितने भी आगम पढे थे, इनमें संतोषजनक उत्तर नहीं मिला था। 25 बोल में-

आठवां बोल -योग 15 में- मन के चार योग बताए गए हैं -सत्य , मृषा , सत्यामृषा , नो सत्यामृषा । पर इससे भी कोई बात नहीं बनी । मुझे ज्यादा समझ नहीं आया ।

हमारे घर भगवत गीता आई थी। मेरी बड़ी बेटी सान्या स्कूल की ओर से पिकनिक पर लोटस टेंपल गई थी । वहां सब बच्चों को मुफ्त में यह किताब बांटी गई थी । बाद में छोटी बेटी को भी वहीं से यह किताब दोबारा मिली । धार्मिक लोग धार्मिक किताबों का वितरण धर्म समझकर करते है ।

बहुत दिनों तक यह घर में रखी थी । मैंने सोचा क्यों ना मैं यह किताब पढूं  । देखती हूं इसमें क्या लिखा है । इस तरह पूरे मनोयोग से ,आदर सहित मैंने इस किताब को पढ़ना शुरू किया । इस किताब की तीसरे चैप्टर में आखीर में कुछ श्लोक हैं जिनका भावार्थ यह है कि इन्द्रियों से बढ़कर मन की ताकत है । मन से बढ़कर बुद्धि की ताकत है और बुद्धि से बढ़कर आत्मा की ताकत है ।

तो इस तरह एक सूत्र मेरे मन में स्थापित हुआ ।मन<बुद्धि<‌ आत्मा ।मन काम के अधीन है। यह चिर अतृप्त है। इसे तृप्त नहीं किया जा सकता। इत्यादि 

इस तरह मुझे 'मन क्या है' का संतोषजनक समाधान तो नहीं मिला पर यह सूत्र बड़े काम का था ।मैंने इस सूत्र को अपने मन में बिठा लिया।


शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

महावीर वाणी -पूर्व पीठिका -2

 यह पुरानी पोस्ट है । ' गति ' शब्द से चेतना मे एक झटका लगने की बात पहले भी दर्ज की है ।उस समय के लिखने के लहजे में -

....

जब मैंने रामप्रसाद जी म को बताया कि वीर स्तुति याद हो  गयी तो उन्होंने शाबासी दी ,कहा -वीरता का काम किया है |

फिर गुरुओं के जाने का दिन भी आया |चातुर्मास अधिकतर अक्तूबर -नवम्बर में ख़त्म होते हैं |सुन्दर मुनिजी उलटी गिनती का एक एक दिन गिनते थे |भक्त इमोशनल होते थे |बहने रोने लगती थी |पर  मेरे भीतर ज़रा भी उदासी नहीं थी |मैं प्रसन्न थी ,परम प्रसन्न |मुझे जो प्रसन्नता प्राप्त हुई थी वह इतनी सघन और ठोस थी कि दिल करता था ऐसी प्रसन्नता सब को मिले |ये सब को ऐसी प्रसन्नता देते चलें |
गुरुओं के विहार के दिन उन्हें छोड़ने गए |सड़क के ट्रेफिक से बचाने के लिए मानव-चेन बनाई |
फिर ...........................
फिर क्या हुआ ?.........
फिर विरह हुआ | 6 बजे पार्क में ,सर्दियों के कोहरे में   ,ऐसा लगता था की गुरूजी कोहरे में से निकल कर अभी सामने आ खड़े होंगे |
पाकिस्तान की रेशमा ने गाया है 'चार दिना दा  प्यार ओ रब्बा लम्बी जुदाई  '|यहाँ चार दिन का नहीं चार महीने का प्यार था |खैर ...
सर्दी बीतते विरह कुछ कम हुआ |(ऐसी चीजें ठंडे मौसम में ज्यादा असर करती है  ) मेरा एडमिशन MA हिंदी में हो गया था |पेपर आने वाले थे |मैं वहां लग गयी |मेरी लाइफ में ये  दो चीजें साईड बाई साईड चली हैं |
अब आते हैं जे डी की कहानी पर ,जो अब तक की कहानी में  एक परिचित पात्र तो रहा है ,पर अभी तक उसका ज्यादा रोल नहीं आया है |
पहले छुट -पुट परिचय और बाद में गुरूजी के यहाँ जे डी को देखकर मुझे यह तो पता लग ही गया था कि यह कोई महत्व्पूर्ण आदमी है |
यह उस दिन की बात होगी जब डेढ़ -दो घंटा अलग अलग ,लम्बी लम्बी लाइनों में लगकर आखिर मैंने अपना एडमिशन MA हिंदी में कराया था | सोल की उस पुरानी  बिल्डिंग को और वहां की गंदगी  देखकर मुझे यकीं नहीं हो रहा था कि मैं यहाँ !!!!!(@##%$$^&&*)से MA कर रही हूँ कि यहाँ !!!!!(@##%$$^&&*) से  भी  MA कराई जाती है |
पर क्या निदान था ? मन माने या नहीं पर  यह सच था |पर मुझे झटका बहुत बड़ा लगा था |इतना की ,कुछ देर मैं गुमसुम वहीँ खड़ी रह गयी थी |उस  दिन उमस थी |तभी -
पहले बोले गति चार - नीम के पेड़ के पीछे से एक महीन आवाज़ आई |
हैं ,यह कौन बोला -मैंने मुड़कर देखा तो जे डी वहाँ  खड़े थे| 'अरे आप ,आप यहाँ कैसे ?'
क्या तुम भूल गयी |पहले बोले गति चार |
जी ,क्या मतलब |(जे डी मेरी बातों  के जवाब नहीं देते थे ,बस अपनी बात बताते थे )
मतलब वही ,जो तुमने बचपन में याद किया था |25 बोल का थोकडा |उसका पहला बोल -पहले बोले गति चार |
हाँ वह तो मुझे याद है |पहले बोले गति चार -नरक गति ,तिर्यंच गति ,मनुष्य गति ,देव गति | तो ............?
तो .... आज तुम इतनी आश्चर्य चकित क्यों हो ?तुम गति करके यहाँ आई हो |यह बिल्डिंग तो जहाँ थी वहीँ है |
क्या  मतलब?
मतलब की मनुष्य गति करते हैं |सभी गतियों में जीव गति करता है |गति चार हैं |
..........................हैं !!!!........................हे राम ........हे भगवान .............मुझे उनकी बातें सुनकर चक्कर आ रहा था |उन्होंने मुझे सहारा देकर लाइब्रेरी की तरफ  पैडी पर बिठाया |और मुझ पर रुमाल से पंखा झलने लगे |
इसके बाद वे बहुत देर तक कुछ बोले नहीं |मैं भी नहीं बोली |मैं अभी भी सकते में थी |दो ढाई घंटे हम यूँ ही बैठे रहे |चुपचाप |गुमसुम |शाम हो रही थी |मैं बस लेकर घर आ गयी |यह थी जे डी से मेरी लम्बी दोस्ती की पहली मुलाकात |
थोकडा - जैन शास्त्रों में जो भी दार्शनिक विषय आये हैं ,आचार्यों ने उनका संग्रह करके संक्षिप्त में याद  करने योग्य थोकडो में बना दिया है |इन्हें  जैन दर्शन की ABCD समझिये |  
.....
आज उस बात को याद करती हूं तो मुझे लगता है गति शब्द ने मेरी चेतना को झटका दिया क्योंकि मैं रट तो ' गति ' रही थी पर मेरे मन में इसे ' स्थिति ' समझ रही थी । 
नरक स्थिति भी है । प्रवचनों में यह विषय आते हैं कि इस तरह सात नरक है ।इनमें पापी जीवो को इस तरह अपने पापों का दंड भुगतना पड़ता है इत्यादि
' हमने कौन सा जाना है' -  यह वर्णन सुनते हुए ऐसा विश्वास स्वभाविक ही  हम अपने मन में बना लेते हैं। अपने जीवन को धर्मविहित, लोक विहित आचरण के अनुसार जीते हुए यह 'गारंटी' भी तो धर्म ही देता है।
 बहरहाल उस झटके ने आत्मा की तरह तंद्रा तोड़ी थी और मुझे यह ख्याल हुआ था कि हमारे शास्त्रों में जो भी विषय आए हैं ,वे सच्चे हैं ।यह एक बहुत बड़ी बात है । 

महावीर वाणी - पूर्वपीठिका- 1

महावीर वाणी सीरीज के अंतर्गत वीडियो बनाते हुए मुझे ख्याल हुआ कि बेशक शास्त्र पढने की शुरुआत 2002 मे उत्तराध्ययन सूत्र से हुई पर धर्म से और महावीर वाणी से जुड़ने की एक पूर्वपीठिका भी है, वह भी मुझे दोस्तों के साथ शेयर करनी चाहिए। पूर्वपीठिका के अंतर्गत दो मुख्य बातों को दर्ज करना चाहती हूं -

 1 कर्म सिद्धांत को समझने की असमर्थता 

2  गति शब्द से चेतना में झटका

 1- यह हमारे पीतमपुरा में रहने के दौरान की बात है। हम वहां करीब 7-8 साल रहे थे। पहले 3 साल एक फ्लैट में दूसरे 4 साल जिंदल आंटी के यहां । उनकी बेटी रेखा गुप्ता अब राजनीति में है। उन्होंने मेयर का चुनाव भी लड़ा था ।

हमारे फ्लैट के सामने ही जैन स्थानक थी ।बिल्कुल सामने ।उस समय में छठी में पढ़ती थी। हम दोनों भाई बहन को स्थानक की लाइब्रेरी से लाकर धार्मिक नाॅवेल और कहानियां  पढ़ने का शौक लगा था। कॉमिक बुक्स भी पढ़ते थे। किताबें पढ़ने का शौक बाद जीवन में भी यूं ही चलता रहा।

 धार्मिक नाॅवेल में मुख्य रूप से केवल मुनि जी के लिखे हुए थे जिनमें अमर कुमार का चरित्र, भविष्यदत्त की कथा ,मैना सुंदरी-सुर सुंदरी की कथा, प्रद्युम्न चरित्र इत्यादि थे ।  इन नाॅवेल का पैटर्न लगभग एक सा था । नायक, नायिका का संघर्षपूर्ण जीवन ,बाद में मुनि प्रेरणा से इन्हें कर्म का फल बताकर धार्मिक संदेश के साथ समापन ।

 यह नाॅवेल पढ़कर मुझे कर्म सिद्धांत को समझने में अपनी असमर्थता स्पष्ट महसूस हुई। मसलन रानी देवकी के अपने पुत्र कृष्ण से वियोग को पूर्व जन्म में मोरनी के अंडे को 16 घड़ी तक छुपाने का फल कहना, यह मुझे बहुत लॉजिकल नहीं लगा था ।

 हे प्रभु !  इंसान तो कुतूहल वश अज्ञानता मे  ऐसी छोटी-छोटी भूलें कर ही देते है तो क्या ऐसे कर्मों की इतनी भयंकर सजा मिलती है कि एक रानी को उसके पुत्र से 16 साल तक बिछड़ना पड़ा ।

यह मेरा उस समय का चिंतन था । इसका परिणाम यह हुआ कि जैन दर्शन को सीखने- समझने के क्रम में कर्म सिद्धांत को समझने में मेरी तत्परता कभी नहीं बनी । मैं इस विषय से बचती भागती थी । 

शास्त्र पढ़ने की रुचि दूसरे अनुशासनों  के अभ्यास से बढ़ी । शब्द विज्ञान और साहित्य इनमें प्रमुख है । शास्त्रों का मूल विषय दर्शन उस तरह कभी मेरे चिंतन का विषय नहीं बना । दर्शन तक मैं अपने स्वयं के चिंतन की वीथी को पार करके पहुँची ।

 2  यह भी पीतमपुरा की बात है । स्थानक मे एक संत संघाटक कई वर्षों से  स्थिरवास मे थे ।  बुजुर्ग संत जब विहार की स्थिति में नहीं रहते तो वे  एक जगह स्थिरवास कर लेते हैं । फिर उनकी आयु पूर्ण  होने पर बाकी संत बिहार करते हैं । उनके यहां मैंने सामायिक के 9 पाठ और 25 बोल का थोकडा सीखे थे । जैसे माएँ  बेटियों को दाल -चावल , रोटी बनाना सिखा देती है कि आगे चलकर काम आएगा ।उसी तरह पहले के संत बच्चों को 9 पाठ सिखा देते थी कि  सामायिक करने में काम आएंगे। 

 जैन परंपरा में सामायिक हमारी पूजा पद्धति है ।  बचपन में तो कोई करता नहीं । जब बड़े होंगे , घर गृहस्थी के दुखों में दुखी होकर चिंघाडेंगे; तब जाकर धर्म की ओर  , सामायिक करने की इनकी बुद्धि जागृत होगी तब ये पाठ काम आएंगे । इस सोच के साथ पहले के संतों का जोर सामायिक के नौ पाठ याद कराने पर रहता था ।  9 पाठ याद हो गए तो फिर 25 बोल की ओर बढ़ो ।

यह हमारे हरियाणा के संत- श्रावक समाज के बीच ज्ञान का बुनियादी ढांचा था । हमारे मम्मी-पापा की पीढ़ी मे सामायिक लेने - खोलने का पाठ या 1-2 भजन । उससे भी पहले हमारे बाबा - दादी की पीढ़ी में स्त्रियों में तो शायद वह भी नहीं , पुरुष जानते होंगे । हमारी पीढ़ी तक यह जमाना था । अब तो हमारे यहां स्वाध्याय की क्रांति की आई हुई है । चातुर्मास में चार पुस्तकों का स्वाध्याय पेपर देने के माध्यम से हो जाता है । यह सब शिक्षा के कारण हुआ है ।

 25 बोल का थोकड़ा संख्यात्मक शैली में शास्त्रीय विषयों से परिचय कराने का अभ्यास है । यह सबसे छोटा थोकड़ा है । इसमें एक से लेकर 25 की संख्या तक विभिन्न विषय आए हैं । जैसे - 

पहले बोले -गति 4 - नरक गति , तिर्यंच गति, मनुष्य गति , देव गति ।

दूसरे बोले -जाति 5- एकेंद्रीय , बेंद्रीय , तेंद्रीय ,चौंद्रीय , पंचेद्रीय।

इत्यादि। 

इस थोकडे में गति जाति इंद्रिया काय प्राण योग उपयोग इस तरह 25 विषयों का परिचय हो गया ।  यह सब विषय जैन  दर्शन की आरंभिक वर्णमाला है । मैं और मेरा भाई और अन्य बच्चे तो उस समय रट लेते थे ।  इनाम मिलने के लालच में जल्दी-जल्दी रटकर संतो को पाठ सुनाने की होड रहती थी ।

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मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

पता नही सब कैसे होगा । एकबार लगता है कि सब हो चुका है ,बस एक्जीक्यूट करना रह गया है।बट ।फिर  भी नर्वसनेस है ।

****

अध्यात्म मे अहंकार को बुरा कहा गया है । सच है । बट दुनिया मे जीने के लिए ये खोल जरूरी भी है । 

इस खोल के भीतर ही होता है आदमी का सारा बल ,बुद्धिे , शक्ति पराक्रम, ज्ञान-अज्ञान। फिर वह चाहे चींटी की खोल जैसी नगण्य ही क्यो न हो । 

सोचती हूं कि छोटे -बड़े जिसके जैसे भी अहंकार हो वे सब महावीर वाणी मे मिल जाएं ।

एक वे ही है जो सबके घमंड सम्हाल सकते है ।

यह मेरी दिली कामना है सबके लिए। 

***

रीसेन्टली मुझे लग रहा है मै पेस मिस कर रही हूं ।मुझे समझ नही आ रही बातें ।

***

अभी तो हम सबकी गालियां खा रहे है ।जिन्हे लिया है उनकी भी जिन्हे नही लिया उनकी भी ।

गुरुवार, 20 अप्रैल 2023

 प्रेम का एक रूप ऐसा है जिसमे सती शिव और शिव सती हो जाते है । उत्कर्षता में यह रूप भक्ति,पूजा के समकक्ष हो जाता है ।

निश्चित रूप से इसमे शक्ति है अलौकिक से भी लड़ जाने की ।

....यह दृष्टि की बात है ।

संसार विरत दृष्टि मे करूणा महत्वपूर्ण हो जाती है ।

....

बुधवार, 19 अप्रैल 2023

धर्म के खिलाफ लिखने वाले बहुत से बौद्धिक-लेखक हुए है । अब समय आ गया है कि लेखकों को अपनी कलम प्रेम के खिलाफ उठानी चाहिए और दुनिया को बताना चाहिए कि प्रेम के नाम पर क्या क्या होता है ।

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मेरे धार्मिक विमर्शों मे प्रेम का विमर्श भी रहा है ।

क्यों नही ।

साहित्य और दर्शन के बीच पेंडुलम की तरह झूलते हुए, यह कैसे संभव था कि यह विषय विमर्श मे नही आता ।

14-15 तक मेरे मन मे बड़ी ग्लानि रहती थी । हम टीम बनाकर साहित्य का प्रसार करेंगे , एक तरफ यह उद्योग; दूसरी तरह शास्त्र पढ़ना ।

शास्त्रों मे तो सब तरफ काम-भोग को बुरा कहना एटसेटरा ।

मेरी श्रद्धा भी बहुत थी । 

दूसरी तरफ साहित्य की एबीसीडी से लेकर जेड तक प्यार,इश्क,मोहब्बत,प्रेम एटसेटरा के सिवाय कुछ हैई नही ।

तो इस वजह से मेरे मन मे बड़ी ग्लानि रहती थी । बट ।चलो चल रहा था ।

अच्छा!उस वक्त मेरे मन मे 'प्रेम बिना जीवन नही 'यह विश्वास बड़ा गहरा था ।

तोऽऽ ; मैं बताऊं आपको ! यह मनुष्य की जात की बात है ।वह अपनी पे आए तो देवताओं से ठान लेता है ,मनुष्य क्या चीज है ।

खैर ! मेरे साथ तो ऐसा नही हुआ। मै तो श्रद्धालू थी । इसलिए ठानना वगैरह तो कुछ नही ,बस ग्लानी का भार ही ढोती थी ।

खैर ! धीरे धीरे यह मसला खुद ही सुलझ गया ।  

उसके बाद जो मैने देखा वह ये कि ये कुछ ही लोगों की तकलीफ है कि वे ऐसा सोचते है कि प्रेम बिना जीवन नही ।अजी दुनिया तो प्रेम के बिना बड़े मजे से जीती है ,बल्कि कुछ ज्यादा ही मजे से जीती है ।

***

फिर विमर्श का अगला स्वाभाविक स्टेप ये था कि हे प्रभु ! तो क्या ये दुनिया मे जन्म जन्मांतरों से इतनी प्रेम की कहानियां सुनाई जा रही है ,सब झूठ हैं । 

जब चिंतन इस ओर चला तो फिर नए रिअलाईजेशन हुए । प्रेम से भी ज्यादा , प्रेम के श्रुत से (अर्थात किस्से , कहानियां एटसेटरा )बाहर आने मे समय लगता है ।

मुझे तो महावीर वाणी ने बचा लिया ।

***

पश्चात मेरी जिज्ञासा का स्वाभाविक अगला स्टेप था कि देखती हूं हमारे शास्त्रों मे प्रेम के बारे मे क्या कहा गया है ।

यह शब्द क्रिया के भेद बताते हुए आया है ।क्रिया दो प्रकार की होती प्रेम प्रत्यया और द्वेष प्रत्यया। 

प्रेम प्रत्यया क्रिया दो प्रकार की होती है - माया और लोभ।

द्वेष प्रत्यया क्रिया दो प्रकार की होती है - क्रोध और मान।

***

पाठक अभी समझेंगे नही । क्योकि यह थोड़ा टेक्निकल विषय है ।

****

पाठक यह जान ले कि मुझे बहुत निराशा हुई थी यह पढ़कर। प्रेम जितनी महान और पवित्र चीज को लोभ और माया जैसी तुच्छ प्रवृतियों से प्रेरित कहना । 

बट यही सच है । 

शब्द विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है । आचार्य शुक्ल ने ल-व की व्युत्पत्ति मे लो-भ का साथ कहा है ।cont...

***


बडे ग्रुप मे खाने या घूमने जाओ तो ऑप्शन हाँ या ना के ही नही होते । बंदा ये भी कह सकता है हम बाद मे ज्वाइन कर लेंगे , अभी रेडी नही है । 

यह बात समझने मे भी हम भाई-बहनों को तो बहुत साल लग गए थे ।....

***

 

सोमवार, 17 अप्रैल 2023

 Mk की वाॅल पर जो गाँव की फोटोज़ है वो तो ऐसी लगती है पेन्टिंग हों ।सही में .....

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(यह नोट बाद मे लिखा था ।पोस्ट नही किया ।)

एक अन्य अर्थ में मुझे पुष्पा जिज्जी चैनल का कार्य बहुत महत्वपूर्ण लगता है ।शायद यही वह वजह भी है कि मैने उन पर लिखना चुना है ।

अगर हम नारीवाद के सब नजरियों को मिलाकर इनके कार्य का आकलन करें तो हमे लगेगा कि एक विशाल भीमकाय पितृसत्ता की चट्टान को सोने की छैनी जैसे प्रहार से तोड़े जाने की विफल हास्यास्पद कोशिश मे लगी है ।

हो सकता है यह कहना सही हो ।

फिर भी मैं कहूंगी महिलाओं के लिए यही रास्ता उचित है ।

घर की दाह से दुखी होकर महिलाएं बाहर आती हैं । पर बाहर कौन बैठा है उन्हे सहारा देने के लिए। बाहर निकल कर वे पाती है कि यह दुनिया उतनी ही क्रूर और मतलबी है ।

...

मुझे सुरक्षित महिलाएं अच्छी लगती है ।

....

बेशक इसके लिए मुझे उस विशाल भीमकाय चट्टान जितना धैर्य ही क्यों न धारण करना पड़े । 

....

क्योकि पितृसत्ता के धोखे मे धर्म से लड़ाई मोल लेना वास्तव मे दूध के दांतो से लोहे के चने चबाने जैसा हास्यास्पद और विफल प्रयास है ।

हम देखते है धर्म शास्त्रों मे स्त्रियों के प्रति निन्दात्मक वाक्यावलियां कही गई है । सब सच हैं । 

बस बात उस दृष्टि के पकड़ मे आने की है जब ये बाते सच लगती है ,फिर वह चाहे पुरुष हो या स्त्री । 

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(यह नोट पहले लिखा था ।पोस्ट नही किया ।)

Rahul gandhi ji looks so peaceful these days .

😊

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*****


शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

आज सुशोभित की पोस्ट पढ़कर मुझे ये ख्याल हुआ कि कितना बढ़िया हो गर हमारे बौद्धिकों मे जीवन के श्रेष्ठ मूल्यो के प्रति सहमति हो ।

कल्पना करती हूं कि एक सभा मे सुशोभित ने आज की पोस्ट के उद्गार कहे है और सभा मे सन्नाटा खिंच गया है । सभी ने बात के सहीपन को पहचाना है ।

साथ ही ये कल्पना भी कर रही हूं कि इस पोस्ट मे व्यक्त हो रहे अपार हाहाकार से सुशोभित भी बाहर आए । कोई एक इंसान इतना दर्द नही ले सकता है । हम यही करके संतोष पा सकते है कि हम बचे हुए हैं ।

इंसान के चेतना परिवर्तन की तीन स्टेजिज बताई गई है जो आगे से आगे दुर्लभतम होती जाती है - सुनना ,श्रद्धा, वीर्याकार पराक्रम ।

हम सु-श्रद्धा पा लें  यह भी बहुत बड़ी उपलब्धि है ।

एक साधक को अपने प्रयासो मे अनवरत गतिमान होते हुए भी यह तथ्य याद रखना चाहिए कि " यह संसार ऐसे ही चलता रहा था ,यह संसार ऐसे ही चल रहा है , यह संसार ऐसे ही चलता रहेगा "(महावीर वाणी )

यह वाणी ही संतप्त मन को शान्ति प्रदान करती है ।

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

कल मैने हंस fb public page पर अपनी पोस्ट पेस्ट की थी । 7 लाईक आ चुके हैं । यह मेरी ही नही इस पेज की भी उपलब्धि है ।क्योंकि शायद उनके यहाँ अब तक 4-5 मेक्सिमम आए हैं ।😂

......

जोक्स अपार्ट

मैने अपने लिए भी और सबके लिए भी ज्ञान-प्राप्ति की उपलब्धि को ही माना है ,चाहा है।

कोई हार हार नही होती ,कोई जीत भी जीत नही होती ।

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बुधवार, 12 अप्रैल 2023

😂🙃😊

वह बहुत देर से एक चीज को हाथ में पकड़कर बैठा था ।कुछ देर से उलट-पलट भी रहा था ।उसे समझ नही आ रहा था कि वह इस चीज का क्या करे ।

अभी कुछ देर पहले तक वह शीशे के आगे खड़ा होकर उस चीज को चेहरे पर लगाकर देख रहा था कि इसे लगाकर क्या उसके चेहरे मे ,चेहरे के प्रभाव मे किसी तरह का गुणात्मक परिवर्तन आया है ।

वह सैकडो बार यह कोशिश करके देख चुका था ।दरअसल आज के दिन की पूरी दोपहर वह इसी कार्य में लगा रहा था ।

इतना वक्त लगाकर और इतनी बार आज़माकर भी वह तय नही कर पा रहा था कि उस चीज को चेहरे पर लगाकर क्या उसके चेहरे मे ,चेहरे के प्रभाव मे किसी तरह का गुणात्मक परिवर्तन आया है ।

इस बीच वह दो काॅफी पी चुका था ।

अब वह सोफे पर बैठा था ।उसे समझ मे नही आ रहा था कि वह इस चीज का क्या करे ।

वह एक प्लास्टिक की नाक थी ।

वह सोच रहा था ।

वह एक प्लास्टिक की नाक थी ।

पर थी तो नाक ही ।🤥

रविवार, 9 अप्रैल 2023

पुष्पा जिज्जी का यू ट्यूब चैनल

डिजिटल कंटेंट के क्षेत्र में बहुत से कैटेगरी हैं जिनमें मनोरंजन, राजनीति ,धर्म ,पत्रकारिता ,साइंस, फिक्शन इत्यादि होता है। बहुत से यूट्यूबर अपनी रूचि और क्षमता के हिसाब से कंटेंट बनाकर अपने चैनल पर डालते हैं। वे लोकप्रिय भी होते हैं ।यह कमाई का साधन भी है ।

इसी श्रृंखला में सुचेष्टा सिंह और उनकी सहयोगी का यूट्यूब चैनल ' पुष्पा जिज्जी ' के नाम से लोकप्रिय है ।इस चैनल का विषय हिंदू राजनीति पर व्यंग्य टिप्पणी है। भाषा बुंदेली है ।सुचेष्टा सिंह और उनकी सहयोगी दोनों घरेलू महिलाओं की भांति, दो बहनों के किरदार में, घर में बैठे हुए मजेदार बातचीत के द्वारा हिंदू राजनीति पर चुटीला व्यंग्य करती नजर आती है ।वे दोनों घरेलू महिलाओ की भांति ही साड़ी, सिर पर पल्लू, मेकअप के गेटअप में रहती हैं। बातचीत करने का स्टाइल बिल्कुल घरेलू महिलाओं के जैसा है ।इसमें पुष्पा थोड़ी शांत ,गंभीर, ठहरी हुई सोच की महिला दिखती है। पद्मा चंचल, बहुत बोलने वाली, अधीर की नजर आती है। यह 1:30- 2 मिनट की  रील्स बनाती हैं ,जिनके मुद्दे समकालीन रोजमर्रा की राजनीति से होते हैं। 

धर्म, राजनीति ,धर्म की राजनीति और हिंदू राजनीति पर लिखने या डिजिटल कंटेंट बनाने वालों की एक बड़ी जमात है । जिसमें गंभीर किस्म के अध्येताओं से लेकर,  लेखक, हल्की -गंभीर कविताएं  करने वाले कवि और कंटेंट क्रिएटर शामिल है। यह सभी किसी न किसी एक आधार को लेकर अपना काम करते हैं ।इस भीड़ में पुष्पा   जिज्जी की बतकही अपने अनूठेपन के कारण ध्यान खींचती है ।

दो -तीन  वजहों से मुझे इनके कंटेंट में अनूठापन नजर आता है।  इसमें पहली वजह है- इनके कंटेंट की भाषा का बुंदेली होना अर्थात एक क्षेत्र विशेष में बोली जाने वाली देसी बोली ।क्षेत्रीय बोली क्षेत्र विशेष के लोगों से जुड़ने का एक शक्तिशाली माध्यम है ।यह स्थानीय राग को व्यंजित करती है। एक अन्य अर्थ में बोली लोगों से जुड़ाव को, उन्हें चेतना संपन्न बनाने का जरिया भी है ।पुष्पा जिज्जी में यह दूसरी वजह अधिक बलवती प्रतीत होती है । शिक्षा तथा अपने परिवारिक माहौल के कारण उनमें जो राजनीतिक चेतना बनी , उसे बुंदेली के द्वारा उन लोगों में प्रसारित करना जिन्हें चेतना संपन्न होने के उतने अवसर नहीं  मिले।

हरिशंकर परसाई हिंदी के बहुत वरिष्ठ और सम्मानित व्यंग्यकार हुए हैं ।उन्होंने व्यंग्य को साहित्य की अहिंसक विधा कहा है। इस बात से क्या तात्पर्य है ? साहित्य की विधाओं  में कविता भाव क्षेत्र को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं  । इस विधा में गूढ़-गंभीर-जटिल भावों को व्यक्त करने वाली कविताएं मिलती हैं, साथ ही मंच पर कहे जाने योग्य ललकार- वीर रस पूर्ण रचनाएं लिखी जाती है। व्यंग्य विधा भाव - क्षेत्र को दूसरी तरह से स्पर्श करती है । आप जानते हैं कि आपके साथ के लोग इतने भाव संपन्न और चेतना संपन्न नहीं है। फिर भी आप झटक कर उन से परे हो जाए, राग भाव के कारण यह कार्य उनके प्रति हिंसा प्रतीत होता है । इसलिए आप ऐसी वाणी का प्रयोग करते हैं जो हँसी -हँसी में उनकी मूर्खता और अज्ञानता पर चोट भी करती है और व्यक्ति खिन्न भी नहीं होता। 

पुष्पा जिज्जी के टारगेट ऑडियंस है -घरेलू महिलाएं । मामूली पढ़ी-लिखी या अधिक से अधिक बीए की शिक्षा प्राप्त महिलाएं 35 वर्ष की उम्र के बाद घर गृहस्थी की दुनिया में इस कदर रम जाती है कि पिछले जीवन की पढ़ाई उन्हें पिछले जन्म की याद सरीखी लगती है । कपड़ों, बर्तनों ,खाना बनाने, सब्जी ,मसालों और रिश्तेदारों की दुनिया ही उनकी दुनिया हो जाती है । यह जीवन उनकी शरणगाह भी है और चेतना की दृष्टि से देखें तो कब्रगाह भी । वे अपने जीवन के निर्णय लेने में पति या घर के पुरुषों पर बुरी तरह निर्भर होती है ।दीन दुनिया की खबर उन्हें पुरुषों के नजरिए से सुनने को मिलती है ।इस बात मे उनके लिए भली -बुरी , दोनो संभावनाएं हैं । ऐसी स्त्रियों के कानों में जब राजनीति के रोजमर्रा के मुद्दे सुनाई देते हैं तो वे उन्हें किस प्रकार ग्रहण करेंगी ,उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी ,क्या वे ऐसे मुद्दों से स्वयं को जोड़ सकेंगी ,पुष्पा जिज्जी का चैनल इस चेतना का प्रसार करता है ।

पुष्पा और पद्मा दो बहनों या देवरानी जेठानी की भांति घरेलू बातचीत करती है। बहुधा वे हां में हां मिलाने के स्टाइल में कभी एक तो कभी दोनों व्यंग्य विषय की स्तुति करती हैं। पर पाठक को तुरंत ही समझ आ जाता है कि यह  स्तुति नहीं व्याज स्तुति हो रही है।  महिमागान के नाम पर टांग खिंचाई हो रही है । इस बात को व्यक्त करने में दोनों की विदग्धता , वाकपटुता और कौशल कमाल का है। हिन्दी की वरिष्ठ लेखिका और आलोचक अनामिका की भाषा में कहें तो यह स्त्रियों की भाषा का गुण ही है ।

दो उदाहरण देखिए जो हाल की घटनाओं से जुड़े हैं :

राष्ट्रपति के अभिभाषण के जवाब में विपक्ष के नेता राहुल गांधी जी ने एक भाषण दिया था जिसमें उन्होंने अडानी के भ्रष्टाचार पर कुछ सवाल पूछे थे । अगले दिन सबको मोदी जी के भाषण का इंतजार था । ।'पर मोदी जी बोले तो पर उस बात पर नहीं बोले' कहकर पुष्पा जिज्जी ने मोदी जी के भाषण की फिस्स निकाल दी ।

इसी तरह राहुल गांधी जी की सदस्यता रद्द होने के बाद पद्मा का यह कटाक्ष की जिज्जी चोर को चोर नहीं कहना वरना तुम्हारी सदस्यता चली जाएगी ।चाहे किट्टी पार्टी की सदस्यता ही क्यों ना हो ।

अपनी रील्स के माध्यम से पुष्पा जिज्जी महिलाओं में जिन मूल्यों का प्रसार करती हैं वे है- निर्भीकता ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ,अपने हक के लिए खड़े होने का साहस । नारीवाद के बहुत से रूप हमारे बौद्धिक वर्ग में प्रचलित हैं । इनमें से कई गंभीर आक्रोश के स्वर में अपनी बात कहते हैं ।  पुष्पा जिज्जी  यह कार्य हँसी- हँसी में कर जाती है ।


टीम

मुझे लगता है कि अब तो सभी को लगता होगा -ये कहाँ फँस गए । मुझे तो 19 बाद से लग रहा है ।खैर 

पहले तो सबमें बहुत आपसदारी थी ।उस समय मैने एक दूसरे की वाॅल से ही पढ़कर जाना था । पसंद आया तो सोचा टीम बनाकर ट्राई करते है ।

मैने समझा था कि मै ही अजनबी हूं ।

इतने सालों मे बहुत कुछ बदल गया है।खैर 

...

अभी हालिया तो मैने यह सोचा था कि अब इन से परे ही रहती हूं ।इनके इशूज का ये खुद जाने ।ये कोई बच्चे तो नही है ।अपना भला बुरा ,हानि -लाभ खुद जानते है ।

बल्कि 5-2-23 को उत्साह मे डायरी मे नोट लिखा कि कम से कम मेरे तईं यह कार्य पूरा हो गया है । मै एक कन्विक्शन लेकर चली थी ।जिसे उस पे भरोसा हुआ,वह साथ है । बाकी अपनी खुद देखें ।

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 इस बीच मुझे भी लिखने से प्रेम हो गया है । ज्यादा तो नही लिखती । मन मुताबिक ही लिखती हूं ।

मैने सोच लिया है । अगर कुछ नही हुआ तो भी मै लिखती रहूंगी । दुनिया मे एकान्तसेवी चुप्पे लिखने वाले भी हुए है । यह मेरी नेचर को ज्यादा सूट करता है ।










शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

पेपर खत्म होने के बाद बच्चों की किताबें रखी थी ।मैने सोचा ओल्ड बुक बैंक में दे दूंगी । सर्च किया तो रिजल्ट पाकिस्तान का दिखाया ।

हे प्रभु! सीधा पाकिस्तान! 

इतने बड़े इंडिया में क्या किसी के मन मे यह आइडिया नही आया ।

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गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

शास्त्र पढ़ते हुए एक बात जो मैने बार-बार,हर बार,बारम्बार महसूस की है , वह यह है कि अज्ञानी होना कितना स्वाभाविक है ।ज्ञान होना कितना दुर्लभ है ।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

 गुरुदेव रामप्रसाद जी प्रसाद जी म फरमाते थे कि हमारे देश मे जयन्ती मनाने की रिवाज गांधी जयन्ती के बाद से शुरु हुई है ।

ऐसा मैने सुना है ।ऐतिहासिक तथ्यता कन्फर्म नही है ।

 परम्परा मे सम्वत्सरी श्वेतांबर स्थानकवासी समाज का धार्मिक पर्व है । बट ! अब सब मनाने लगे है ,तो यहाँ भी शुरु हो गई है ।🙂


रविवार, 2 अप्रैल 2023

क्या किसी ठीक-ठाक होश-हवास के आदमी के लिए यह मानना उचित है कि एक राजनीतिक रैली मे दिए गए भाषण मे वह अपने सरनेम का अपमान मान ले ।

जाहिर तौर पर इसका उत्तर होगा ना ।

पर भाव -क्षेत्र मे ऐसी संभावना सर्वथा असंभव नही है । जब लोगों को कास्ट,कलर ,जेंडर एटसेटरा के लिए बेवजह सतत प्रताड़ित होना पड़ता है ,तब वे आहत महसूस करते हैं ।

एक फिल्म बनाई गई है -my name is khan .उसमे यही इशू है ।बट ! मजेदार बात यह है कि कला को भी क्रेडिबल होने के लिए इस कल्पना का सहारा लेना पड़ा है कि हीरो असामान्य है ।वह बेदिमाग नही है ।बल्कि उसकी जानकारियां एक सामान्य मनुष्य से बढ़कर हैं ।बट वह जुनूनी,जिद्दी सा है ।क्योंकि ऐसा हीरो ही तो कहानी के संदेश के मुताबिक इतना जोखिम उठाएगा ।

#संसार के नियम#कला के नियम #धारणाओं के सच #सत्य की विचित्रता 

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असली दुनिया मे ऐसी संवेदनाएं बदलाव का कारण बनती हैं ।  पर वह प्रक्रिया धीमी है । वह जागरूकता-सामाजिक चेतना- आन्दोलन से होती हुई 'हिस्टोरिक प्रोसेसेस' के द्वारा कानून बनती है।


शनिवार, 1 अप्रैल 2023

 जब तक हमें खुद को सम्भालने के लिए सुदृढ़ सद्बुद्धि का आधार नही मिल जाता ,तब तक हमारे लिए उन असंख्य लेखकों की वाणी ही टिमटिमाते दीये के रूप मे सहारा देती है ,जिनके शब्द , संघर्ष,जीवनशैली हमें हमारे जैसा होने का आश्वासन देती है । इस रुप मे मै लेखकों के या साहित्य के अवदान का महत्व कम नही आंकती ।

एक समय था जब इस तरह की पंक्तियां मन को बहुत सहारा देती थी ।

मैने इस पोयम को उलट रुप मे समझा था अर्थात जब हृदय का विश्वास उभरता है तो संशयाकुल मस्तिष्क की टिमटिमाना खत्म हो जाता है ।इत्यादि 


The night has a thousand eyes,
And the day but one;
Yet the light of the bright world dies
With the dying sun.

The mind has a thousand eyes,
And the heart but one:
Yet the light of a whole life dies
When love is done.
Francis William Bourdillon