सोमवार, 30 जनवरी 2023

#  भारत जोड़ो यात्रा आज पूर्ण हुई । इतने बड़े लक्ष्य को लेकर चली इस यात्रा ने लोगों के दिलों मे एक अमिट छाप छोड़ी है । ये बहुत बड़ी बात है ।

आज गांधी जी का स्मृति दिवस भी है। fb पर वीडियो देखे । बारिश देखकर लगा आसमान रो रहा है ।....मगर यात्रा के सुखद, सकुशल समापन पर मन तो प्रसन्न था ।पर फंक्शन ऐसा था कि ....। 

अंय....ये क्या....

अगला वीडियो बर्फ का । कैप्शन थी -शीन मुबारक। गूगल किया ।कश्मीर मे बर्फ गिरने को लोग शुभ मानते हैं ।

...ओह ....कितनी अद्भुत बात है यह ।

हम मैदान वालों की सोच से भी परे।....

क्या यही उस निराकार शक्ति का रहस्यमय अवलोकन नही है । हम अपनी सीमित समझ में जिसे 'रंग में भंग होना समझते हैं , वह उस बात में भी शुभ का इशारा दे जाता है । 

बधाई ।

गुरुवार, 26 जनवरी 2023

Smile please . 😊 

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Two years ago I have written a story line which, I hope ,can be turned into a very good script . The story line provides the basic bone structure to the story to give a required shape and strength.

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Happy republic day and Basant panchmi .

बुधवार, 25 जनवरी 2023

कभी कभी मुझे लगता है ,हमारा प्रेम....प्रेम नही एक कैद है । ना जाने देते हैं ,ना जीने देते हैं ।.....पर क्या करे ,रूल ही ऐसे है  । 

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इस बात से मुझे याद आई वे मजेदार बातें जो मैने प्रवचनों में गुरुओं के मुख से सुनी । 

संयम जीवन को रेत के समान नीरस कहा गया है । 😊 सर्दी-गर्मी-भूख-प्यास-बीमारी-याचना-सदा विहारी जीवन-मच्छर (22 हैं ।शास्त्र की भाषा मे इन्हे 22 परीषह कहते हैं ।) 

ऐसे जीवन को अपनाने के पीछे एक गहरा जीवन दर्शन है ,ज्ञान है ।मगर जब तक साधक वहां तक नही पहुंचता , तब तक तो वह भी सामान्य व्यक्ति के समान उहापोहों का शिकार होता है ।

श्रद्धा का अवलंब ही एकमात्र वह रोशनी की लकीर है जो संशय के घटाटोप मे इंसान की जीवन-शक्ति को जी-लाए रखती है ।

संयम जीवन की नीरसता को गुरूदेव आत्मव्यंग्यात्मक रस से दूर करते थे ।

1 स्वयं धर्म गुरू होते हुए भी सुन्दर मुनि जी कहते है - दुनिया की सारी नही तो आधी समस्याओ का निपटारा हो जाए, अगर इन धर्म गुरुओं का मुँह बन्द कर दिया जाए। 

2 स्व गुरूदेव सुदर्शन लाल जी म के जीवन की यह घटना है कि वे एक बार एक घर मे आहार के लिए गए ।बहन प्रचंड अवस्था मे थी ।किसी बात पर अपने लड़के को कह रही थी -तू मर जाए तो अच्छा हो ।घर मे घुसते हुए गुरूदेव ने यह बात सुनी ।वे बोले -बहन इसे हमे दे दे ।हम साधु बना लेंगे। 

बहन गुरूदेव को देखकर सकपका गई। एकदम बोली -ना ये तो मुझे बहुत प्यारा है ।

क्यो अभी तो तू इसे मौत को दे रही थी ।हम क्या मौत से भी बुरे है ।😊

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दुनियावी जिन्दगी तो ऐसी अनेकानेक त्रासदियों से भरी हुई ही है कि अगर इंसान मे हँसने की क्षमता ना हो तो वह कब का परलोक की राह पकड़ ले ।

यह चुटकला मैने सुन्दर मुनि जी म के मुख से सुना है । 

एक बार एक ज्योतिष-पत्री देखने वाले महाराज के पास एक आदमी पहुँचा कि म शनि की दशा चल रही है ,कोई उपाय बता दो ।

म बोले -100 रुपए दक्षिणा लगेगी ।

आदमी बोला -इतने रुपए तो नही है ।

म बोले - कोई नही ,50 दे दो ।

आदमी बोला - म इतने रुपए भी नही है ।

म ने सोचा - आज तो लगता है मेरे ऊपर ही शनि की दशा है जो सुबह सुबह इस आदमी के दर्शन हो गए है ।पर कोई बात नही , मै भी हार नही मानूगा ।

प्रकट मे म बोले -है तो मुश्किल। मगर कोशिश करूंगा । 10 रुपए दे दो ।

आदमी बोला - म इतने रुपए भी नही है ।

अब महाराज का धैर्य चुक लिया ।म बोले- आप जाओ ।निश्चिंत रहो ।शनि भी तुम्हारा कुछ नही बिगाड़ सकता ।😂

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सोमवार, 23 जनवरी 2023

अटर-पटर--चटर- मटर

अबकी बार हमारे यहां जय मुनि जी म सा का चातुर्मास है ।एक तिहाई 😊

अर्थात चातुर्मास को तीन जगहो पे बांट दिया है । sector 7 ,3 और 11 में ।दिल्ली मे सेक्टर नजदीक है ।सब मे स्थानक बनी है । गुरूदेवों की चातुर्मास के दौरान 7(कन्फर्म नही )किलोमीटर के घेरे के भीतर  घूमने की मर्यादा होती है ।इसलिए अब संतो ने चातुर्मास के चार महीने बांटकर देने की व्यवस्था बना ली है ।

हमे तो शायद पिछला हिस्सा मिले । 

ये वही गुरूदेव है जिनके दर्शन करने हम पिछले साल इंदौर गए थे ।मेरे भाई के ग्रुप के संत ।

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एक दो साल से चातुर्मास मे जाने की जबरदस्त गैर हाजिरी हो रही है ।हम लेट सोते है ।लेट उठते है ।🙈 अबकी बार देखो क्या रहेगा । 

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बच्चों के पेपर चल रहे है ।फोन ही हाथ मे नही आता ।प्रोजेक्ट,असाइनमेंट, चैट का भयंकर मौसम है ।


शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

यह कई साल पुरानी पोस्ट है ।इसमे जिस बात का जिक्र है वह तो और भी पुरानी है ।
यह उस वक्त की बात है जब मैने गुरूधारणा ली थी । गुरुधारणा के  बदले मै हर साल गुरूदेव के दर्शन करूं,इतने  बंधन से  भी उन्होने मुक्त रखा था ।
यह हमारा शास्त्र लिखित-अनुमोदित आचरण है । भोजन तो मानव शरीर को चलाने के लिए कितना आवश्यक है ।उसके लिए भी इस आदर्श से समझौता न करे ,शास्त्रों मे यही कथन जगह जगह ,हर जगह कहे गए हैं ।एक विशुद्धतम आदर्श। 

जमीन पर कीचड़ मे धंसे नश्वरों के लिए मनमोहक चंद्रमा जैसा निर्मल । 

मै जानती हूं वास्तविक स्थिति ऐसी नही है ।मै अनभिज्ञ नही हूं ।
ना उस वक्त थी ।
"तुम कौन कहीं की लेफ्टिनेंट गवर्नर लग रही हो , जो कोई तुम्हे पूछेगा "। मेरे आत्म-आलोचनात्मक सेल्फ ने कहा था ।
यह बात अभिमान को बहुत चुभने वाली थी ।पाठक जानते है यह आत्म-आलोचनात्मक सेल्फ अकेले तो आती नही है ।साथ मे अपने से भी तेज-तर्रार,मुँह मे छुरी जैसी जबान वाली संगी-साथी ले कर आती है ।
" सचमुच मनुष्य होने पे धिक्कार है गर किसी की इतनी भी पूछ न हो ।इससे तो मौत भली ।"  सहेलियों ने छुरियां चलाकर अभिमान को छलनी कर दिया ।
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उस वक्त इससे जूझने का क्या उपाय था ।कुछ भी नही । एक सामान्य व्यक्ति को यह पता नही होता कि वह अपने सामान्य होने को किस प्रकार लांघे ।
वह तो इससे जूझता हुआ चल ही सकता है ।
खैर 
बाद मे जब मैने स्वयं शास्त्र पढे  ,तब इस शास्त्र लिखित-अनुमोदित  चन्द्रमा रुपी आचरण के दर्शन किए । 
अंय...
हे प्रभू ! हम कितने महान उहापोहों मे जीते हैं ।
अपने गुरुदेवों के अंतर्विरोधों पर मुझे कभी शंका नही हुई। हम जिन्हे  व्यक्ति के अंतर्विरोध कहते है ,वे इस समय के अंतर्विरोध है जिसमे हम रह रहे है । उनका जूझना भी मैने देखा है ।

बंधन से मुक्ति ,यही उनका आदर्श था । बहता पानी , हवा , आकाश की निरालम्बता -साधु जीवन के लिए ये उपमाएं कही जाती है । वे अधिकतम साधु मर्यादा के इसी आदर्श पे जिए ।
 17 Aug 2016 

जैन दर्शन की कहानी के साथ गुरूजी की कहानी भी आ गयी है।
चातुर्मास पूरा होते होते मुझ पर गुरूजी का रंग चढ़ने लगा था। नित नए ख्याल आते थे।
एक दिन ख्याल आया की मुझे गुरु धारणा लेनी चाहिए। सब लेते हैं। तो पहुंच गयी सेठजी के पास।
 पर ये क्या। येल्लो ,हो गया बिस्मिल्ला ही गलत !
सेठजी बोले मैं तो किसी को गुरु धारणा देता नहीं।
अयं ,हमने तो गुरुधारणा दिलाने के लिए संतो को लोगों के पीछे पड़ते देखा है। ये कैसे गुरु हैं ?
खैर !मन मार के राम प्रसाद जी के पास गयी। वे बोले ' अरे मैं कहाँ ?ये तो सेठों के काम हैं। मैं तो छोटा मोटा आदमी हूँ ?' सुनकर बड़ी हंसी आयी। हाँ मोटे तो  आप हैं ही।
फिर सेठजी के पास गयी। उन्होंने फिर न कह दिया।
फिर राम प्रसाद जी के पास आयी। उन्होंने कहा मेरा नाम ले दियो ,दे देंगे।
फिर सेठजी के पास गयी। फिर ना हो गयी। इसी तरह यह खेल १५-२० मिनिट तक चलता रहा। आखिर राम प्रसाद जी का दिल पसीजा की क्यों बच्ची के चक्कर लगवाए।
तो पूछा -क्यों लेना चाहती हो ?
जी ,सब लेते है।इसलिए |
इससे पहले किसी की ली है।
नहीं
अच्छा कहकर समकित का पाठ सुना दिया। हो गयी गुरु धारणा।
हो गयी जी ?
हाँ
बस यही होती है ?
हाँ ,एक बात का ध्यान रखना। जीवन में कभी आत्महत्या नहीं करनी। (हैं जी ,मैं डर  गयी। कहीं गुरूजी को कुछ भविष्य तो नहीं दिख गया | यह तथ्य संत वचनों का आम जन मानस पर प्रभाव को बताता है |खैर )
क्यों जी ,ऐसा क्यों कह रह हो आप ?
कुछ नहीं गुरुधारना देते हुए हम यह नियम सभी को कराते हैं |(सुनकर जान में जान  आई ) अगर जीवन में कभी ऐसा मौका आये तो यह कदम नहीं उठाना ,पहले हमारे पास आना है |
जी
नियम करा दूँ
करा दो जी |जी मैंने सुना है साल में एक बार अपने गुरु के दर्शन जरुर करने पड़ते है |(भाषा देखिये ,कैसा बोझ भरा है इन शब्दों में )
 हाँ ,कई लोग कराते है यह नियम ,पर मैं नहीं कराता |मैं किसी को बांधता नहीं |
सुनकर गुरु की उस अकिंचन छवि से मन अपने आप बंध गया | मुझे संतुष्टि नहीं हो रही थी |जन्म -जन्मान्तरों को बदल देने वाली अलौकिक घटना इतनी छोटी सी कैसे  थी ?मैं कुछ और भी करना चाहती थी |कुछ बड़ा ,कुछ महान |
मैंने  अर्ज की 'जी और कोई नियम भी करा दीजिये '
ले ले जो तेरा मन हो |
कुछ ज्ञान तो था नहीं |सो आजीवन अरवी की सब्जी का त्याग  कर लिया |


बुधवार, 18 जनवरी 2023

इस साल मेरी दो किताबे आने की संभावना है । होपफुली। .....वैसे दोनो का आधा काम तो हो ही गया है ।

एक होगी -जैन आगमो मे आए कतिपय साहित्यिक स्थल। इनमे दो मुख्य आगम -ज्ञाता धर्म कथांग और उववाई पर लेखमालाएं पहले ही 'स्वाध्याय दर्शन पत्रिका 'मे छ्प चुकी है ।

दूसरी किताब कहानियों की होगी ।

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आजकल मौसम इतना खुशगवार चल रहा है कि इस वक्त दूसरी कोई बात करना लगभग क्राइम है । लिटरली। 

ऋतुओं मे मैं बसन्त हूं - गीता मे श्रीकृष्ण ने कहा है ।

बसन्त अभी आएगी । पर क्या हमे नही पता कि वह आएगी ही ।ये मेरी बहुत प्रिय पंक्तियाँ हैं ।मै हर साल लिखती हूं । मुझे इन पंक्तियों मे , इस मौसम का सौन्दर्य,भगवद् कृपा के रूप मे दिखलाई देता है ।

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आजकल लोग जिस बहुसंख्या मे रील बनाने मे लगे है ,मेरे अंदर एक छिपा हुआ भय घर कर रहा है कि कहीं बहू या दामाद ऐसे रील बनाने वाले दीवाने निकल गए तो मुझे भी कैमरे के आगे आडी- टेढ़ी शक्लें न बनानी पड़ जाएं ।🙂


गुरुवार, 12 जनवरी 2023

My vision

 यहाँ 27जून 2022 से लेकर 6 जुलाई 2022 तक फेसबुक पर लिखी पोस्ट हैं । टीम को लेकर मेरा विजन क्या है,वह इन पोस्टों मे आ गया है ।

 ^ छ जीवनिकाय निकाय हिंसा ,जिसे जैनेत्तर लोग पर्यावरण की सुरक्षा के रूप मे समझते हैं ।

मै भी इसे भगवद् वचन कहने से जानती हूं । अपनी श्रद्धा के कारण मै अधिकतम इसका पालन करूं ,ऐसी भावना रखती हूं ।

^ मन की स्वतन्त्रता ......यह एक दुविधा थी /है ।सबसे ज्यादा कठिन है जिसे समझना/सुलझाना ।

..... पर हम यह भी देखते है कि बिना मन के किसी कार्य मे लगना ,अपना विनाश जैसा लगता है ।धर्म और संयम जैसी उत्तम चीज भी बिना मन के की जाए तो नारकीय कष्ट का अनुभव होता है ,यह आगम वचन प्रमाण है ।.....

हम लोग मिले तो ऐसे बात करने लगे जैसे जन्म भर की बाते/स्कोर सेटल करने पड़े हैं । पहले वे कर लें , बाकी बातें (काम ) तो बाद मे हो जाएगी।.....

पर्सनली मेरी आकांक्षा तो यह थी कि हम क्रिएटिव क्षमता का वह लेवल प्राप्त करते कि किसी बात की असंभवता हमारे लिए असंभव नही रह जाती ।....

ऐसा हो सकता है अगर हममे वह प्यार और आदर उत्पन्न होता ।पर यहां तो कुछ और ही...शुरु हो गया ।....

मेरे मन मे एक जबरदस्त भय है ।वह ये कि कहीं आप लोगों के साथ चलने मे मुझे अपने जैन धर्म के ज्ञान से तो समझौता नही करना पडेगा । 

मेरे मन मे आप लोगों की यह छवि है कि आप जीवन मे आनंद प्राप्त करने मे प्रयत्नशील,साहसी लोग हो । नए विचारों and acharan को अपनाने मे घबराते नही हो ।फिर वे चाहे आगम विरुद्ध ही क्यों न हों ।

साहस तो मैने भी किया है ।लेकिन मेरा दायरा स्ट्रिक्टली जैन धर्म का ज्ञान और श्रावक व्रत आचरण है ।इससे परे जाकर मुझे कुछ नही चाहिए। 

मैने कह दिया था ,और लोगों को शामिल करने का ।मै सीरीयस भी थी ।....लेकिन बात तो वहीं की वहीं है ।वो माॅडल क्या हो जिसमे ये दोनो लक्ष्य पूरे हों ।

अब आप टीम बनाओ।हो सके तो मुझे भी ले लेना ।

27 June 2022

lets talk one -two thing so that when we reach 3-4-5 thing ,we automatically understand 6-7 thing .

इस पोस्ट के लिए मैंने टॉपिकों की थोड़ी- बहुत सूची बनाई थी जो इस प्रकार हैं –उदासीनता< मैं ऐसी क्यों हूं <मेरे धार्मिक विमर्श< व्रतों का स्वरूप <टीम | लेकिन मैं इसका विश्लेषण टॉपिक वाइज नहीं कर रही | अभी बात शुरू करने के लिए मैं पहले मेरे धार्मिक विमर्श से शुरू कर रही हूँ |

एक बार मैंने पहले भी लिखा था कि मेरी लाइफ का ग्राफ ऐसा रहा है कि समुद्र की लहर की भांति एक लहर साहित्य की ऊपर की ओर ; और दूसरी लहर धार्मिक अध्ययन की नीचे की ओर. साथ साथ चली है |

 धर्म मेरा प्रिय विषय है |मुझे उस पर बात करना हमेशा अच्छा लगता है और इस पर बात करने से बात शुरू हो जाएगी |क्योंकि अभी मन खराब है| इस पर बात करूंगी तो मन भी ठीक हो जाएगा |

< मेरे धार्मिक विमर्श से तात्पर्य है कि जैन आगम पढ़ते हुए मैंने जिन जिन बातों को जैसे समझा है यह मेरा नजरिया , बातों को समझने का मेरा वर्जन है | 

इसमें मैं हूं -नीरू जैन -जो हरियाणा में जन्म हुआ है |परिवार के बीच में रही है |उसके कुछ अनुभव हैं |अच्छे –बुरे |और एक हिंदी शेत्र में पले- बड़े होने के कारण उसके कुछ विश्वास है |जो सही है या गलत ,वह नहीं जानती| जब वह गुरुओं के संपर्क में आती है तो उनकी श्रद्धा की वजह से वह अध्ययन करती है | साथ ही साथ उसने साहित्य भी पढ़ा है | साहित्य की ट्रेनिंग की वजह से इन् धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन उसके लिए बहुत रसपूर्ण बन गया है और वह कौन-कौन से स्थल हैं जिसने उसकी सोच को बदला है| जिसकी पुरानी सोच जो हिंदी शेत्र में रहने के कारण बनी है ,हिंदी से बनी है वह कैसे नई जानकारी से टकराई और उससे उस में क्या परिवर्तन आया -यह मेरे धार्मिक विमर्श हैं |

मेरे धार्मिक विषयों के अंतर्गत यह टॉपिक हैं -

• परिवार का मिलना पुण्य होने की निशानी है |

• वह गुफा में चंपक लता की तरह बढ़ने लगा|

• एलक अध्ययन में मानों वह आदेश की प्रतीक्षा करता है |

• विशेषण में रानी धारिणी का प्रीतिमना होना 

• उववाई के रिच विशेषण 

• पाप रुचि -शब्द ने झटका दिया |

• राजा की अवधारणा |

• स्वार्थ शब्द का सुंदरतम अर्थ

 पहला- परिवार का मिलना पुण्य की निशानी है |उत्तराध्ययन सूत्र में एक अध्ययन है उसमें 10 बोल आए हैं कि जीव को पिछले जन्म के पुण्य के फल स्वरुप 10 बोलों की प्राप्ति होती है जिसमें पहला बोल चार कामस्कन्ध –क्षेत्र,वस्तु ,सोना ,पशु-दास वर्ग है |शेष नौ अंग हैं –मित्र,ज्ञाति,उच्च गोत्र ,सुंदर वर्ण ,बीमार कमहोना,महाप्रज्ञाशाली,अभिजात,यशस्वी,बलवान है | 

क्योंकि हम हरियाणा के हैं और हरियाणा में बड़े- बड़े परिवार होते हैं |हमारा परिवार भी बहुत बड़ा है |जहां ज्यादा बर्तन होते हैं उनमें टकराते बहुत हैं| तो टकराव की वजह से यह था कि मुझे यह अच्छा नहीं लगता|

लेकिन जब मैंने पढ़ा कि बड़े परिवार का मिलना तो पुण्य की निशानी है तो मैंने अपने गुरु- गुरुदेव रामप्रसाद जी महाराज (गुरुदेव सेठजी महाराज के छोटे भाई )से पूछा भी था कि क्या बड़े परिवार का होना पुण्य की निशानी है| तो गुरुदेव ने हंसकर कहा था कि हां !अगर कोई इंसान अकेला है, तो अकेला क्या कर लेगा | 

दूसरी बात -ज्ञाता धर्म कथा में मेघ कुमार जी के जन्म के वर्णन में यह शब्द आया कि वह गुफा में चंपक लता की तरह बढ़ने लगा |इसने भी मेरी सोच को बहुत बदला था |

अभी जैसे परिवार मे हमारे जो व्यक्तिगत अनुभव होते हैं वह थोड़े कुछ अच्छे बुरे होते हैं तो उसकी वजह से टीनएज लड़के -लड़कियों में इस तरह का गुस्सा बन जाता है |अपने माता-पिता के प्रति इतना गुस्सा बन जाता है कि हमें लगता है कि हम आजाद नहीं है |ऐसी बातें होती हैं |हम उनकी सुरक्षा मे घुटन महसूस करते हैं |पर यहाँ जब मैंने पढ़ा कि गुफा मे चंपक लता की तरह बढ़ने लगा ,तो इसमे तो मुझे कहीं घुटन नजर नहीं आई |अपनी सोच पर हैरानी हुई – अरे ! मैं तो कैसे (ना) समझती थी इस बात को | 

जैनागमों की विशिष्ट भाषिक अभिव्यक्ति ने भी मुझे बहुत चमत्कृत किया है | उदाहरण के लिए उत्तराध्ययन सूत्र में- औरभरीय अध्ययन में यह आया है कि मालिक ने बकरे को खिला पिला कर मोटा ताजा बना दिया है और अब वह बकरा मानो आदेश की प्रतीक्षा करता है |आदेश का अर्थ -अतिथि | तो यह भाषिक अभिव्यक्ति बड़ी चमत्कार पूर्ण थी क्योंकि मैंने समझा कि बकरा क्यों मृत्यु की प्रतीक्षा करेगा | लेकिन क्योंकि मालिक ने तो उसे इसीलिए खिला पिला कर मोटा ताजा बनाया है कि वह अतिथि के आने पर उसे काटकर खिलाएगा |तो अब क्योंकि वह खिला पिला कर मोटा ताजा बन गया है तो अब मालिक के साथ जैसे मानो वह भी अतिथि की प्रतीक्षा करता है| यह अभिव्यक्ति बहुत चमत्कारपूर्ण लगी थी मुझे |ऐसे बहुत उदाहरण हैं |

28 June 2022

विशेषणो की दृष्टि से अगर जैनागमों को पढ़ा जाए तो यह एक समृद्ध साहित्यक अनुभव है | शुरुआत में इन आगमों के प्रति मेरा आकर्षण इनकी साहित्यिक विशेषताओं के कारण ही बना| बल्कि मैंने ‘जैनागमों में आए कतिपय साहित्यिक स्थल’ के नाम से लेखों की एक श्रृंखला भी लिखी है जो स्वाध्याय दर्शन नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई है | उदाहरण के लिए- ज्ञाताधर्मकथा में राजा श्रेणिक की रानी धारिणी ने पूर्व रात्रि में एक स्वप्न देखा है कि एक विशालकाय हाथी लीला करता हुआ उसके मुख में समा गया| यह स्वप्न देख कर उसका मन प्रसंता से भर गया| वह अभी शैया पर ही बैठी है | उस समय की उसकी स्थिति को कितने सुंदर शब्दों में बताया गया है| इसी तरह उववाई मे राजा के, राजा की नगरी के , उद्यान के, वृक्षों के वर्णन और मंदिर के वर्णन विशेषण की दृष्टि से इतने रिच हैं कि यह अपने आप में एक है समृद्ध साहित्य का अनुभव है|

पाप रुचि –इस शब्द ने मुझे बहुत झटका दिया | शायद हिंसा के कारणों की व्याख्या में मैंने इस शब्द को पढ़ा था कि जहां यह बताया गया था कि संसार में हिंसा के क्या कारण होते हैं| पशुओं के प्रति हिंसा उनके नख ,केश, दूध, मांस, हड्डी ,दांत , खाल के लिए करते हैं |मनुष्य के प्रति हिंसा लालच में और धन के लिए करते हैं|

पता नहीं ,इस शब्द ने मुझे क्यों झटका दिया |कह नहीं सकती |

एक तो शायद इसलिए की संसार मे बहुत सी बातों के अडेप्ट होते हैं | हमारे जैसे लोग जो डायरेक्ट ऐसी हिंसा से आमने सामने नहीं है ,वह लोग इस बात को ऐसे समझते हैं कि यह उन लोगों का मजबूरी है क्योंकि उनके पास और कोई कार्य नहीं है करने के लिए जीवन यापन के लिए| एक तरह से संसार में यह हिंसा मान्य भी है |यह उनका काम है|

दूसरी बात इसमें यह है कि शुरुआत से ही हम समाज के ‘भले होने ‘और ‘बुरे होने’ के खांचों में बंटे होते हैं| और ‘हम तो भले ‘ -भले होने के नाते ,भले होते होते हम यह भूल जाते हैं कि मात्र हमारी भले होने से यह आवश्यक नहीं है कि सब लोग भले हो गए हैं | भला होना एक जड़ता भी है ऐसा व्यक्ति सभी को अपने जैसा समझता है| यह एक प्रकार की जड़ता भी होती है | ऐसे लोग अपने नियम खुद बना लेते हैं वह समझते हैं कि फलां से यह पाप हुआ है तो इसकी कोई मजबूरी रही होगी |इसने चोरी की है ,इसने झूठ बोला है ,तो इसकी कोई मजबूरी रही होगी | शायद इसीलिए इस शब्द ने मुझे इतना झटका दिया क्योंकि यह बात मेरी कल्पना के बाहर थी कि लोगों में पाप की रूचि भी हो सकती है|    

हिंदी क्षेत्र में राजा की अवधारणा बड़ी रंगीन और स्ट्रांग है| इसका बढ़ा चढ़ाकर अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन हिंदी भाषा के अंदर मिलता है| जैनागमों में राजा की अवधारणा से संबंधित अलग-अलग व्याख्या पढ़ी | एक जगह पढ़ा कि राजा दूसरे की वमन किए हुए धन को भी ग्रहण कर लेता है |एक जगह पढ़ा कि राजा दूसरे के धन के लुटेरे होते हैं | राजा कोनिक के वर्णन बहुत प्रभावशाली भाषा में बताए गए हैं| एक जगह आया कि राजा होना सब चाहते हैं ,सबकी इच्छा होती है कि वह एक बार राजा होने के स्तर और लेवल को पा ले | हिंदी में यह इच्छा बहुत तीव्र है |

स्वार्थी शब्द को हिंदी में नकारात्मक लहजे में प्रयोग किया जाता है कि स्वार्थी होना बुरा होना अनिवार्य रूप में| 

आगमों मे इसका प्रयोग इस तरह से देखा कि आचार्य भगवंत ने जब मोक्ष प्राप्त कर लिया तो अपने स्व-अर्थ को प्राप्त कर लिया |वहाँ इस शब्द का प्रयोग नकारात्मक से नहीं है | इस तरह से मुझे लगा कि उस समय उस सोसाइटी के लोग इतने अधिक जागरूक और बोधवान थे कि वह अलग -अलग व्यक्तित्व के अलगपन को सहजता से स्वीकार कर सकते थे |हो सकता है यह बात उस समय के जनसाधारण की बात नहीं हो, बल्कि यह उस समय की उच्च बौद्धिक ,ज्ञानी वर्ग की बात है |आजकल हम देखते हैं बहुत से लेखकों की बहुत सी ऊर्जा अपने को साबित करने में, अपनी तरह जीने में ही निकल जाती है | वह छोटी-छोटी मामूली बातों को अपनी तरह से करना चाहते हैं लेकिन सोसाइटी इतनी ज्यादा प्रेशर में रखती है कि उनकी बहुत सारी ऊर्जा ,बहुत सारा समय ,बहुत सारी मेहनत इसी में निकल जाती है कि वह अपनी तरह से जी ले |

29 June 2022

मेरे धार्मिक विमर्श-2

^भिक्षुक जीवन ^काम-भोग

शुरुआत मे यह सब सराहना तक था । बल्कि एक हद तक तो क्लांति भी थी ।जैनागमो के विषय ऐसे है कि ये बुद्धि को बहुत शक्तिशाली ढंग से चैलेंज करते है ।सहसा इनकी चुनौती से जीतना सरल नही है ।

बीच मे अनेक बार विषाद के क्षण आते थे ।मै खुद से शिकायत करती कि मै क्यों लगी हूं ।क्या हो जाएगा पढने से ।जीवन अलग है ।जीवन के सुख -दुख अलग है ।इस तरह की पढाई का जीवन की वास्तविक समस्याओं से क्या लेना देना ।

तो 'जीवन की वास्तविक समस्याओं ' को😊 सुलझाने का सिलसिला भी साथ चल रहा था ।

धीरे -धीरे इस तरह चलते हुए आगमो मे वर्णित विषय मेरे चिन्तन का विषय बनने लगे ।इनमे सबसे पहले जिस बात ने उद्वेलित किया ,वह थी साधक का भिक्षुक होना ।

भगवान ने साधको को भिक्षुक होने की आज्ञा दी है ।साधक आजीवन भिक्षुक रहे।मान-अपमान के दंश को त्याग दे ।स्वाद को त्याग दे । जोरदार फटकार के साथ ये बाते बार-बार जगह-जगह पर कही गई हैं ।

उफ!यह तो बहुत ही कठिन है ।अपने पेट की भूख के लिए दूसरे के घर मे जाना ,यह तो बहुत ही कठिन है ।आखिर इस आज्ञा मे क्या प्राज्ञता हो सकती है ?

बहुत समय तक यह बात मेरे चिन्तन मे चलती रही ।मै इसे साॅल्व नही कर पा रही थी ।फिर इस बात को मैने दूसरे तरीके से समझा ।

हिन्दी साहित्य की वजह से मै हिन्दी लेखन संसार से जुड़ी थी ,मगर दूर दूर से ।इसमे जैसे सब लोग लिखते है वह इस संसार का एक ' बर्ड्स आई व्यू ' दिखता है ।

एक तत्व है -साहित्य तत्व ।उसके इर्द-गिर्द लेखक ,पाठक,आलोचक,संपादक,प्रकाशक , मुद्रक,वितरक ,स्टाफ का संसार है ।यह वस्तु स्थिति है ।

आदर्श स्थिति यह है कि' इर्द-गिर्द संसार ' तत्व की रक्षा करे ,शुद्धि-विशुदधि का ध्यान करे ।एक आन्तरिक प्रक्रिया मे यह होता भी है ।पर इस प्रक्रिया को बाधित करने के कारण क्या है ।गठजोड ,बैठकी,बैठकी का स्वाद,सत्ता ,आसक्ति ।

एक छोटी कमजोरी भी ऐसे कठिनतम प्रपंचों को प्रश्रय देती है कि भावुक ह्रदय लोग अगर गलती से लपेटे मे आ जाएं तो जन्म भर का अवसाद साथ ले जाएं। इस तरह तत्व दूषित होता है ।

यही व्याख्या हम पत्रकारिता,शिक्षा ,चिकित्सा आदि क्षेत्रो के विषय मे भी समझ सकते है ।

धर्म तत्व को इन कमजोरियों से बचाने के लिए भिक्षा को साधक के लिए उत्तम बताया गया है ।यह पराए टुकडो पर पलना नही है ।यह साधक जीवन की शोभा है ।

1 july 2022

हिन्दी मे काम-भोग का एक ही रूढ अर्थ समझा जाता है ।आगमों मे यह आया है कि पांच इन्द्रिय के विषयों मे काम के विषय श्रोत और चक्षु हैं ।भोग के विषय है -घ्राण,रसना,स्पर्श। काम के विषय तीव्र,चपल होते है।भोग के विषय धीमे,मन्द होते है ।

यह जानकारी है ।आप इस पर गहन चिंतन करें ।आप हिन्दी क्षेत्र मे स्त्री के खिलाफ हिंसा के पीछे की एक बडी वजह की अज्ञानता तक पहुँच जायेंगे।

Ps: see u on Monday.

4 July 2022

धार्मिक विमर्शों की इस कड़ी में अगला विमर्श था जो मेरे चिंतन का विषय बना - काम भोगों की निंदा | यह बात थी जो मेरे चिंतन में आई कि हमारे ग्रंथों मे काम भोगों की इतनी निंदा क्यों की गई है |हर कोई यह चाहता है कि वह अच्छा खाए , अच्छा पीए, अच्छा पहने ,अच्छी तरह रहे और अच्छी तरह जीए ,फिर यह हमारे समाज का स्वीकृत ,घोषित मूल्य क्यों नहीं है |क्यों सब लोग दबे-छुपे, अंदर मन मे तो यही चाहते हैं; पर बाहर त्याग की ,निस्पृहता की ,अकिंचनता की प्रशंसा करते हैं | 

दूसरे अगर हम काम-भोग का अर्थ उस अर्थ में भी ले जैसे हिंदी क्षेत्र में समझा जाता है ,तो भी संबंधों की दृष्टि से और स्त्री-पुरुष संबंधों की दृष्टि से, इसमें क्या बुराई है | यह तो जीवन का आधार है| इन माता –पिता ,भाई-बहन आदि संबंधों का प्रेम तो मनुष्य जीवन का आधार है| यह एक बात थी ,यह एक सवाल था जो मेरे अंदर बहुत सालों तक, बहुत गहराई से चलता रहा|

ये सब 2014-15 के आसपास की बातें हैं |उस समय मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानती थी |आज मुझे इसका उत्तर पता है |

लेकिन यह समझने से पहले हमें विशुद्ध धार्मिक विमर्श समझने होंगे |

विशुद्ध धार्मिक विमर्श ;

• जीवन की अनित्यता 

• जीवन की क्षणभंगुरता/ अल्पता 

• शरीर की नश्वरता 

• जीव का एकत्व/ अकेलापन 

• नातेदार ओर परिवार की अशरणता 

यह सब जो बातें हैं वह इंद्रिय प्रत्यक्ष हैं अर्थात यह बातें ऐसी नहीं है कि मैंने अपनी परंपरा से सीखी है |किसी धार्मिक परंपरा ने मुझे सिखाई हैं ,मैं मानती हूं इसलिए ऐसा है |यह हर कोई देखता है|

अधिकतर धर्म के विषय में यह भ्रांति है कि आप तो फला धर्म में जन्म हुए हो इसलिए आप इन बातों को मानते हो| हम क्यों माने |लेकिन यह जो विमर्श है यह किसी के मानने या ना मानने की चीज नहीं है |यह बिल्कुल इंद्रिय प्रत्यक्ष हैं |सबकी आंखों के सामने है | 

इन बातों का ज्ञान वह मेधावीपन है जो इस पथ पर निकले हुए साधक को आरंभ से ही होता है | तब पूर्ण सत्य की खोज में वह निकलता है (उठा हुआ) और तब उसकी राह में जो भी चुनौतियां आती हैं ,उन को पार करते हुए वह आखिरी सोपान तक पहुंचता है जिसे मोक्ष कहते हैं| यह एक फुल- फ्लैश , होल टाइम खोज है जिसमें एक जीवन, दो जीवन, जितने भी जीवन लग सकते हैं |

5 july 2022

इस यात्रा में जो सबसे बड़ी बाधा है वह है काम-भोग अर्थात खाने ,पीने. रहने और और स्त्री संबंधी शक्तियां ही मनुष्य को इस राह पर आगे बढ़ने में रुकावट पैदा करती है |यह कारण है कि इसकी इतनी अधिक निंदा की गई है |पहली शंका समाप्त |

दूसरे परिवारिक संबंधों के संदर्भ में यह शंका बरकरार थी |इसका समाधान होने में बहुत समय लगा| बल्कि मैं कहूंगी कि यह मेरे लिए एक चमत्कार से कम नहीं है |महावीर स्वामी जी की कृपा है| यह कैसे हुआ ,मेरे लिए यह जानना तो ,इसका आकलन करना संभव नहीं है | पर मैं इतना अवश्य कह सकती हूं कि यह उस प्रक्रिया का ही फल है जो शास्त्र पढ़ने से और अलग-अलग तरह की आलोचनात्मक किताबें पढ़ने से और गुरुओं के संपर्क से और मेरे परिवार के संपर्क से हुई |

इस तरह संबंधों के संदर्भ में मेरी इस शंका का समाधान इस तरह हुआ कि काम -गुण अपनी प्रकृति में ही अस्थिर ,चंचल और सदा अतृप्ति के कारण हैं |इन्हें महाभय का कारण कहा गया है|

पाठक इन पंक्तियों में साहित्य और दर्शन का संबंध भी देख सकते हैं| दर्शन में जिसे काम गुणों की अस्थिरता और चंचलता कहा गया है ,साहित्य में उसी द्वंद्व को नायिका यह कहकर गीतों में पिरोती है कि तुम भूल ना जाना , भंवरा ना बनना आदि

got diabetes.

6 July 2022

मैंने तो साहित्य और दर्शन साथ-साथ पढ़े और मेरी रुचि दोनों में ही है |लेकिन धीरे-धीरे जैसे- जैसे समय बीता मेरी रुचि साहित्य से ज्यादा दर्शन में होती चली गई |

साहित्य और दर्शन के बीच इस तरह पेंडुलम की भांति झूलने को मैं एक संयोग नहीं मानती| मैं यह मानती हूं कि यह मेरे भीतर चल रहे किन्ही द्वन्द्वों की ही स्वाभाविक परिणति हुई है |खैर 

मोटा मोटी अब 12 साल हो गए हैं मुझे फेसबुक पर आए हुए |कभी लिखती हूं कभी नहीं |ज्यादातर पढ़ती हूं|

इतने सालों में अब मुझ में भी बहुत बदलाव आए हैं | जब मैंने पहले पहल फेसबुक पर दूसरे लेखकों को पढ़ना शुरू किया था उस समय मैं विचारों की समानता को बहुत महत्व देती थी बल्कि कहना चाहिए कि विचारों की समानता भी नहीं बल्कि विचारों का पसंदगी |एक लेवल | विचारों की लेवल का मिलना एक अलग तरह के आनंद की अनुभूति है| विचार इंसान के स्व की अभिव्यक्ति है | उसकी क्षमता ,पराक्रम, बुद्धि की ,बल की |ऐसे लगता है जैसे अपने जैसे ही किसी को पा लिया है |

अब तो बहुत लोग हैं |पहले फेसबुक पर मुझे एमपी और अनुराधा का लेखन बहुत पसंद आया | और जब कि मैं बात कर रही हूं विचारों की| और एमपी तो उस समय ज्यादातर पू के कार्टून और ऑफिस से आने के बाद थकावट के कार्टून या इसी तरह पहले दिन की पोस्ट में फेमिनिज्म की बातें और 2 दिन के बाद यह कहना कि फेमिनिज्म भी पॉलिटिकल विचार है | इस तरह स्वयं ही अपनी बातों को कोन्टराडिक्ट करना| ऐसा लेखन था इनका और लेकिन फिर भी उस समय मुझे यह पसंद आया था | अनुराधा के लेखन में पितृसत्ता के बारे में ठोस बोध हुआ था | 35 साल की उम्र तक हिंदी साहित्य में एमए ,पीएचडी करने के बाद करने के बाद भी अगर मुझे पितृसत्ता अर्थ भी नहीं पता था तो यह बात निश्चित है कि यह विचार कभी मेरे चित् में प्रवेश ही नहीं किया था | मैं दूसरे लोगों को पढ़ती थी तो आश्चर्य होता था कि यह किसे कहते हैं |अगर ये पिता की सत्ता को पितृसत्ता कहते हैं तो मैं तो बहुत खुश हूं अपने पिता की सत्ता मे रहकर |

जैसे जैसे समय बीता ,मैंने कुछ बातें अनुभव की |साहित्य का क्षेत्र खुला क्षेत्र है |यहां पर तरह तरह के विचार चलते हैं और अब वह केवल विचार ही हैं या उनके प्रति कोई कमिटमेंट भी है यह भी अपने आप में एक प्रश्न है | इस क्षेत्र के पोलेपन पर मैं क्या कहूँ | इस पर तो पहले ही बहुत कुछ लिखा जा चुका है /लिखा जा रहा है| मैंने तो यह सब पढ़कर ही जाना है और उसी से मेरा पेट भर गया है |मुझे अलग से जानने की कोई जरूरत नहीं है|खैर 

यह सब बातें हैं जिन्होंने मुझे दुविधा में डाल दिया है |एक दुविधा और भी है| अभी मैंने आचारांग पढ़ा था और उसमें 6 जीवनिकाय की अहिंसा का वर्णन था |यह जैन धर्म की मौलिक विज्ञप्ति है | 6 जीव निकाय अर्थात पृथ्वी, जल ,वायु, वनस्पति और अग्नि और त्रस की अहिंसा के बारे में बताया गया है | मुझे बंधन में बंधने से बहुत डर लगता है | यही मेरी उदासीनता का कारण है| मेरी बुद्धि इसमे स्थिर हो चुकी है |

आधुनिक चिंतक इसे पर्यावरण की सुरक्षा से भी देख सकते हैं |लेकिन हमारी दृष्टि मे और पर्यावरण सुरक्षा वादियों की दृष्टि में यह अंतर है कि वे लोग इस सुरक्षा के लिए अपने मन की कामनाओं पर कितना संयम रख सकते हैं | 

ऊपर लिखी हुई बातों का निचोड़ यह है कि इसमें दो परस्पर विरोधी विचार दो पर्वतों की भांति खड़े हैं | एक और छ जीवनिकाय की अहिंसा है और दूसरी और मन की स्वतंत्रता है |यह पेंच है जो अटका है | यह बात है|

सोमवार, 9 जनवरी 2023

भारत जोड़ो यात्रा के गहरे निहितार्थ -2

 भारत जोड़ो यात्रा सचेत चिन्तन के लिए जरूरी बहुत से मुद्दों पर विचार,पुनर्विचार के रास्ते खोलती है ।जिन्हें मैंने अपनी समझ और सामर्थ्य के अनुसार इस पोस्ट में लिखा है ।

> पोस्ट की शुरुआत उसी दुष्ट "मैं" के अनुभवों से शुरू होती है जिसे ऑब्जेक्टिव थिंकिंग की राह में सबसे बड़ा अवरोधक माना गया है ।  मैं समझती हूं हमारी चेतना विस्तार के अनुभव को प्राप्त करने से पहले इसी संकडे मैं  में से गुजरती है । 

> चिंतन के क्रम में आए आवश्यक संकेत शब्द का उल्लेख पैरा की शुरुआत में कर दिया गया है । 

धर्म ,गुरु परंपरा , श्रद्धा -अश्रद्धा  -   परंपरा से हम लोग श्वेतांबर स्थानकवासी जैन परंपरा के अनुयाई  हैं  । मुख्य रूप से ये सफेद मुख-वस्त्रिका(  8×6 अंगुल)सफेद वस्त्र पहने संत सतियों के प्रति श्रद्धालु होते हैं |साल में एक बार अपने धर्म स्थान पर चातुर्मास कराते हैं| बाकी साल संत -सतियाँ  विहार करते हैं |गुरु दर्शन करना ,प्रवचन सुनना, स्वयं  मुख वस्त्रिका लगाकर सामायिक करना ,व्रत करना  -इनके धार्मिक कर्तव्य में आते हैं  |यह परंपरा 22 टोले  के नाम से भी जानी जाती है |

मुख्यतः गुरु परंपरा आधारित होने के कारण श्रद्धालु धर्म का जो स्वरूप सुनते हैं वह दरअसल आलोचना की भी आलोचनात्मक व्याख्या होता है |यह परंपरा ढाई हजार साल से चली आ रही है तो सोचिए कि इस परंपरा में चिंतन का कितना नवनीत इकट्ठा होगा और कितना नि:सार तत्व खत्म हो गया होगा| मुख्य बातें वही है जो शास्त्रों में बताई गई हैं पर उनकी व्याख्या अलग-अलग होती है |इसी के अनुरूप आचार व्यवस्था में भी ढील या सख्ती के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं |एक इलाके की संत परंपरा के संत बहुत क्रियावादी,  दूसरे इलाके के संत ढीले - इस तरह यह खींचतान चलती है |इनमें काव्यात्मक पेंच भी देखने को मिलते हैं | "आलू पर तो बड़े दयालु इंसानों की खैर नहीं " यह पंक्ति उन पर कटाक्ष है जो आलू प्याज की हिंसा पर ज्यादा जोर देते हैं |

 इस तरह की हाई क्वालिटी  बौद्धिक गतिविधि मुख्यतः संत समाज की धरोहर है  | आम श्रद्धालुओं का इससे ज्यादा सरोकार नहीं होता |इसी के साथ बीच में लो क्वालिटी बुद्धि के नमूने भी घूमते रहते हैं |आम श्रद्धालुओं को उनसे भी ज्यादा सरोकार नहीं होता | पर इन नमूनों की निंदा रस में पगी हुई व्याख्याये  घरों में चलती रहती है | कुल मिलाकर यह एक सेचूरेशन  पॉइंट की स्थिति है जिसमें टॉप मोस्ट फ्लोर में तो कोई जाता नहीं | सब नीचे के फ्लोर की हलचल में रहते हैं  |ऊपर से श्रद्धालु का चोला ओढ़े हुए भी भीतर की  अश्रद्धा के कारण से उदासीन बने हुए यंत्रवत सब होता चले चलता है | अश्रद्धा  से घायल आत्मा को और अधिक खुजलाने का काम करते हैं संतो के भी आपसी अहंकार |  समवेत रूप में यह धर्म की हानि ही करते हैं |

एक बाग का क्षति ग्रस्त होना और दो तितलियों का अलग-अलग फूलों पर बैठना  - 1996 में मैं जब गुरुओं  से जुड़ी उस वर्ष वे अपने संघाटक (ग्रुप)  से अलग हुए थे | यह उनके लिए बहुत मुश्किल समय था |बड़े गुरुदेव अपने हाथों लगाए बाग को क्षतिग्रस्त होता देख रहे थे | वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे |यह स्वयं अपने आप में एक इतिहास है | मैं इसमें नहीं जाऊंगी |

मैंने और मेरे भाई ने उसी साल जाना शुरू किया था|| चांस  की बात थी कि मेरा सेठ जी महाराज  संघाटक के संतो से लगाव  हुआ  |वह आगे चलकर दूसरे ग्रुप के संतों से जुड़ा है | पूर्व मे ये एक ही गुरु के शिष्य हैं |अब इनमे कुछ विरोध है | विरोध के कारण भी बड़े गहरे  और सच्चे हैं | 

तो इस तरह गुरुओं के आपसी विरोध का मसला भी हम दो भाई- बहन में आपसी बहस का मुद्दा बनता रहा |वह अपने तर्क देता |मैं अपने तर्क देती |मानना तो किसी ने था नहीं |पर दूसरों को अर्थात घर के बाकी सदस्यों को गॉसिप का मसाला जरूर मिल जाता था|

 करीब 13- 14 साल यह सब इसी तरह चलता रहा |आरंभ में इसमें लड़कपन की खींचतान थी |धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि ये  मुद्दे सीरियस हैं | गॉसिप  के विषय नहीं हैं | फिर मैं इन मुद्दों  से बचने लगी |मिले हैं तो जरूरी तो नहीं कि विवाद के मुद्दे उठाए जाएं | जिन पर सहमति है उन पर बात कर लो |

 अकेले में मैं सोचती "देखो !हम दोनों भाई बहनों में कितना प्यार था / है  |पर धर्म ने हमें अलग कर दिया |रागात्मक जुड़ाव का यह पक्ष मेरे लिए हमेशा रहस्यमय ही रहा |

 सारी कहानी रागात्मक जुड़ाव  की है  | गृहस्थ तो दूर इसके प्रभाव से संत भी नहीं बच पाते  हैं | अलगाव के बाद बड़े गुरुदेव भी दुखी होकर प्रवचन में कहते थे "ना लगाव  होता ना अलगाव होता |" हम दोनों भाई -बहन धार्मिक जुड़ाव के दुष्प्रभाव से यूं बच  गए कि एक तो हमारा पर्सनल बांड अच्छा था | दूसरे श्रद्धालु के रूप में हम हमेशा सामान्य श्रद्धालु बने रहे |संतो के प्रति राग में हमने धर्म की सामान्य व्याख्या की सीमा रेखा को कभी नहीं लांघा | श्रद्धालु के तौर पर आचरण का जो सामान्य स्वरूप हमारे यहां प्रचलित है हम उसी तक सीमित रहे |उससे आगे नहीं गए  |बाद में हम इस प्रसंग की कलुषता से दूर ही हो गए |अब शांति हैं | हम समझ गए हैं कि यह उनका आपसी मामला है| वे स्वयं समर्थ हैं |स्वयं समझ लेंगे |

 जैसा मैंने देखा है मैं यह समझती हूं कि धार्मिक मतभेदों के कारण बड़े गहरे और सच्चे होते हैं |इसके उदाहरण एक परंपरा, एक गुरु परंपरा ,एक गुरु के शिष्यों में हैं तो अलग-अलग धर्मों की विभिनता के कारण तो निश्चित ही मजबूत होंगे |वहां तो दार्शनिक चिंतन के मतभेद होते हैं |एक ईश्वर वादी श्रद्धालु दूसरे अनीशवरवादी श्रद्धालुओं से  सहमत कैसे होगा ?

 लेकिन मैंने एक सच और भी देखा है | धार्मिक विभिनता के भेद का स्वरूप जो एक लेवल पर बिल्कुल सही और सच्चा प्रतीत होता है ,एक भावभूमि पर आकर यह भेद बिल्कुल तिरोहित हो जाता हैं  | ऐसे जैसे सारा झगड़ा नीचे के फ्लोरो का है | ऊपर पहुंचकर सब शांत हो जाता है | मैंने यह सच भी देखा है |

 धर्म के विभिन्न रूप  : मेरे पारिवारिक संदर्भ   -  मैंने मेरी दादी में धर्म का विह्वल रूप देखा था  | पाठक जानते हैं कि बच्चों को दादी कब मिलती है | जब वह 60 -70 साल का जीवन जी चुकी होती है | वह जिंदगी के सारे वसंत और पतझड़ , खुशी और गम देख  चुकी होती है | जिंदगी की हलचलो से स्थिर चित्त ,  उसकी गहराई से निष्कम्प |

जैन आगम ' उववाई ' मे नगरी के बाहर स्थित एक देवालय का वर्णन आया है | नगरी ,नगरी के बाहर उद्यान, देवालय ,वन होना  - यह प्राचीन भारत की नगर रचना के अंग है  | उस देवालय की विशेषताओं का वर्णन आया है - वह स्थान झंडों से सुसज्जित था, दीवारों पर हाथ की छापे लगे थे , वह अगर के धुए से गमगमाता था इत्यादि  | इन विशेषताओं में एक शब्द आया है -  आह्वानीय   , आह्वान करने योग्य  |संकट की घड़ी में पुकारे जाने योग्य  |

उववाई सूत्र मे इस देवालय का वर्णन पढ़कर और इस शब्द को पढ़कर मुझे मेरी दादी के धर्म का स्वरूप बिल्कुल क्लियर हो गया | मैं कहूंगी यह बात वाइस वर्सा ,उलट  रूप  में भी उतनी ही सच है  |दादी का जीवन देखकर मुझे यह वर्णन एकदम क्लियर हो गया  | 

अपनी दादी को तो मैंने बचपन से देखा ही था |वह गांव की महिला थी | वह मेरे लिए एकमात्र उदाहरण थी उन लोगों की पहचान का जिनके लिए हम कह सकते हैं -जगह से बंधे हुए लोग |वह अपने गांव (ससुराल-  गढ़ी  झझारा) से बंधी थी |जबकि वह कब का छूट गया था |बहुत साल ये लोग गनौर में रहे| फिर दिल्ली में रहने लगे पर उसका मन वही गांव में रहा -अंत समय तक | 

गढ़ी झझारा गांव के बाहर एक पीर बाबा की मजार है | खेतों के बीच में है | एक छोटी सी जगह है |एक मुस्लिम परिवार उसका रखरखाव करता है ,चढ़ावा लेता है | अब तो उस गांव में बहुत से मुसलमान आ बसे हैं  | उन्होंने उस मजार को हरे कपड़े और हरे झंडों से सजाकर 'अपना ' रूप दे दिया है | 

पहले वह सादा जगह थी |उस पर नीला कपड़ा ढका रहता था | हम भी गए हैं बहुत बार |गांव के सभी लोग होली दिवाली या बोला कबूला, मन्नतें पूरी होने पर जाते थे | उस जगह से मेरी दादी का भावनात्मक जुड़ाव था | यूं वह सामायिक  करना भी जानती थी  |नवकार मंत्र भी आता था | पर उसका मन उस जगह से जुड़ा था | परिवार में कोई भी संकट उपस्थित होने पर वह घबरा जाती , गला रूंध जाता और 'पीर बाबा सब ठीक कर देगा 'यह कहने लगती | आह्वानीय शब्द का अर्थ मुझे इस तरह  क्लियर हुआ |मैंने यह देखा था | 

यह  जो धर्म का स्वरूप है इसे आस्था का विह्वल रूप कह सकते हैं  | इसमें ज्ञान नहीं है। बस भावना का जुड़ाव  है | मेरी दादी सरल स्वभाव की ,परिवार -समाज में औरतों की बेदखली को सहती  हुई , एक कमजोर- अनपढ़ -बाहरी दुनिया से अनुभवहीन  ( लेकिन आंतरिक रूप से मजबूत ) औरत  थी |ऐसे लोग जीवन मे जो कुछ भी बेदखली सहते है तो वे अंतिम शरण के रूप मे धर्म के जिस भी रूप से जुडते हैं तो यह जुड़ाव उनके लिए अनक्वेश्चनेबल होता है | वे किसी की नहीं सुनते हैं  |पढ़े लिखो में यह जो कहा जाता है कि आस्था अंधी होती है वह इन्हीं लोगों की धार्मिक श्रद्धा के लिए कहा जाता है |वह सरासर गलत भी नहीं है |

धर्म का सामान्य रूप मैंने अपने मम्मी -पापा में देखा | इसे धर्म का बहुतायत रूप भी कह सकते हैं | आज के युग में अधिकांश जन इसी को फॉलो करते हैं | अपनी अपनी पद्धति के हिसाब से पूजा कर ली और अपने घर के जीवन में मस्त रहे |  ना धर्म से ज्यादा अपेक्षा ना संसार से |  बस यूं ही चलते चले गए |धर्म के इस रूप में भी कई वैरायटी संभव हैं |यह व्यक्ति के स्वयं के स्वभाव पर निर्भर है |

 पैरा दो में मैंने यह कहा कि अलग-अलग गुरुओं के प्रति राग का जुड़ाव भी हम भाई-बहन में वैमनस्य का कारण नहीं बना  | इसका कारण यही था कि परंपरागत रूप से हमने अपने घर में धर्म का सामान्य रूप देखा था |  किसी एक गुरु के पीछे लग कर बाकी संत सतियों की उपेक्षा करना ,अपने क्षेत्र में आए संत की उपेक्षा करके दूर क्षेत्र में रहे हुए के पीछे भागना -यह भी गुरु परंपरा का आलोच्य विषय है | संत- सतियां  इस विषय पर बोलते रहते हैं | मेरे विचार के अनुसार धर्म का सामान्य रूप जीवन के अंत तक सामान्य /कमजोर ही रहता है। उसमें कभी इतनी शक्ति नहीं आ पाती कि वह जीवन को बदल सके |

हमारे मम्मी पापा इस विषय में किसी गुरु विशेष के विशेष राग से दूर रहे | हम दोनों भाई बहन विशेष राग में पड़कर भी उसके कर्दम से दूर रहे ,निर्मलता में ही रहे | पाठक देखें  ! यह होती है एक जीवंत आलोचना परंपरा की शक्ति | एक तेज प्रवाह नदी की तरह इसमें खुद अपनी गंदगी साफ करने की कितनी महान शक्ति होती है | 

धर्म के विभिन्न रूप  : अन्य संदर्भ  - धर्म संबंधी अपनी मान्यताओं और विचारों को प्रकट करते हुए एक बात की वास्तविकता कि मैं अनदेखी नहीं कर पाती |वह बात है कि जैनेत्तर लोग  इन विचारों को किस तरह समझेंगे  |

मुझे उनकी चिंता नहीं जो इन विचारों को जैन लेबल लगाकर खारिज करना चाहें | कर दें | मुझे उनके आगे कुछ प्रूव नहीं करना |मुझे उनकी चिंता अवश्य है जो सचमुच सत्य के जिज्ञासु ,सदिच्छा से भरे है| इसमें मैं हिंदू धर्म संबंधी कुछ संदर्भों का उल्लेख कर रही हूं |

हजारी प्रसाद द्विवेदी का चिंतन  -  हिंदुओं में पूजा का स्वरूप व्यक्तिवादी है |समूह में आरती ,कीर्तन करते हुए भी एक साथ बोलने या ताली बजाने की बाध्यता नहीं है |बीच में जुड़ सकते हैं , छोड़कर भी जा सकते हैं,| ऐसा ही हमने हमारे यहां प्रवचनों में देखा है |मुस्लिमों में वे एक साथ प्रार्थना भी करते हैं , अलग-अलग भी करते हैं |समूह में वे एक साथ झुकते हैं एक साथ खड़े होते हैं | एकांत में भी अकेले कर लेते हैं|

 सुधीश पचौरी कृत उपन्यास ' मिस काऊ ए  लव स्टोरी ' | यह एक उपन्यास है |फिक्शन है |यह उपन्यास हाइपर रियलिटी और रियल्टी के बीच फंसे हुए एक बुद्धिजीवी के संत्रास की कहानी है |खासा पेचीदा उपन्यास है |बिल्कुल भी मनोरंजक नहीं है |सच कहूं तो यह उपन्यास पढ़कर खुद मुझे ही  दहशत सी हो गई | फिर मैंने इस बात को इस तरह समझा कि मैंने तो सिर्फ पढ़ा है तभी मुझे इतनी दहशत है और जिसने लिखा है तो उसने कितनी दहशत का सामना किया होगा | 

इस तरह 2008-9 तक धर्म के प्रति मेरा यह विचार पुष्ट हो गया था कि धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है।

अपने धर्म संबंधी चिंतन और अनुभवों के कारण में सैद्धांतिक रूप से धर्म की राजनीति के खिलाफ थी  |पाठक जानते हैं  सैद्धांतिक रुप से किसी बात के पक्ष या विपक्ष में होने का स्वरूप बहुत सख्त , अड़ियल किस्म का होता है | इसमें किंतु परंतु की गुंजाइश नहीं होती |जरा सी ढील ढुलमुलपन की निशानी मानी जाती है | उन्हें बिना रीढ़ का इत्यादि कहकर तिरस्कृत किया जाता है|

 राजनीति ,शास्त्रों का अध्ययन , धर्म की राजनीति  : उस समय तक राजनीति मेरे सचेत चिंतन का विषय नहीं थी | हम मात्र ट्रेडिशनल वोटर थे | पीहर में कांग्रेसी, ससुराल में अलग पार्टी । राजनीति मेरे सचेत दर्शन (अर्थात मीडिया के माध्यम से जो दिखने में आता है उस पर मैं ध्यान देने लगी |पहले तो वह ख्याल भी नहीं था |)का विषय 2012-13 के बाद ही बनी | कौन क्या कह रहा है |किस तरह की बातें हैं |

मेरा शास्त्र पढ़ना भी चल रहा था |शास्त्र पढ़ने से यह हुआ कि मुझे अपने धर्म की लिखित बातों को जानने का अवसर मिला | लिखित रूप में पढ़ने से धर्म संबंधी चिंतन दिमाग में ठहरता भी है | खाली सुनने से तो कभी किसी विषय को सुना तो कभी किसी को ; वह भी नियमित नहीं | फिर सभी संत एक जैसे ज्ञान दक्ष भी नहीं होते | सब कुछ बिखरा हुआ रहता है |कोई तारतम्यता नहीं बनती | इंसान जीवन भर कोरा का कोरा ही रह जाता है |

शास्त्र पढ़ने से मेरा स्वयं का धर्म संबंधी चिंतन भी बनना शुरू हुआ | इससे मेरी समझ और साफ हुई  |2019 के आसपास तक हिंदू धर्म और जैन धर्म की यही विभिनता मुझे समझ में आती थी कि ये लोग स्नान में धर्म मानते हैं | हम अपकाय की हिंसा को मानते हैं |एक विभिनता और भी है जो बाद में मैंने सूत्रकृतांग में पढ़ी | वह है  - अग्नि | हिंदू धर्म में अग्नि को पवित्र मानते हैं |हम तेउ काय की हिंसा को हिंसा मानते हैं | 

 इन दो धर्मों की मूलभूत विभिन्नता यही है | बाकी तीज त्योहार ,व्रत, उपवास ,सूतक ,पातक, श्राद्ध ,अमावस्या पूजन होली पूजन, हवन वगैरा हमारे यहां भी यथावत है |गृहस्थ के तौर पर ज्यादा फर्क नहीं है |

एक तटस्थ व्यक्ति के रूप में धर्म की राजनीति देखने के बाद सैद्धांतिक रूप से इसके विरोध में होते हुए भी, एक बड़ी जनसंख्या को इसकी प्रभावित करने की क्षमता को खारिज नहीं कर सकते |जो भी है  ,जैसी भी है -यह हमारे समय की सच्चाई है |इस तरह 2009 के मेरे दृष्टिकोण की कठोरता में यह बदलाव हुआ और मैं एक तटस्थ व्यावहारिक और मानवीय दृष्टिकोण से इस राजनीति को देखने लगी |

राज्य और धर्म राज्य व्यवस्था का मूल लक्ष्य एक क्षेत्र विशेष के लोगों को शांति पूर्वक जीवन यापन करने के लिए नियम ,शासन में चलाना,है | प्रत्यक्षतः  इसका कोई धर्म नहीं होता |

धर्म सत्य की खोज का मार्ग है | ऐसे उदाहरण हैं कि महात्मा बुद्ध और महावीर जी अपने-अपने राज्यों के राजकुमार पद को छोड़ कर गए थे और सत्य की खोज की थी| हिंदू धर्म में विश्वामित्र आदि राजर्षि हुए हैं  |

प्रत्यक्षतः इन में कोई संबंध नहीं है |  एक त्याग का मार्ग है | एक भोग का मार्ग है |एक संसार को छोड़ने का मार्ग है| एक संसार को उत्कृष्ट संसाधनों के साथ "राज "करने/ भोगने का मार्ग है |सचमुच क्या साम्यता हो सकती है दोनों में | कुछ भी नहीं |

पर यह सच नहीं है  |इन दोनों मार्गों में प्रत्यक्षतः कोई समानता ना होने पर भी परोक्षतः  इनका संबंध आपस में इतना गुढ़ा  और गाढ़ा रहा  है रहा है कि ना केवल यह अटूट है , सुदूर  प्राचीनतम काल से चला आ रहा है बल्कि राज्य व्यवस्थाएं ( राजतंत्र व्यवस्था में ) धर्म सत्ता के आगे कहीं आक्रांत तो कहीं घुटने टिकाए हुए भी दिखाई देती है | इतिहास की पुस्तक इन तथ्यों से भरी पड़ी है |

 राजलक्ष्मी को चिरकाल तक भोगने की इच्छा वह कमजोरी है जो राजाओं को  सत्य जानने के लिए प्रेरित करती है जिनसे संसार चलता है |

धर्म जो पहले पहल (हमने लेख की शुरुआत में देखा )व्यक्तिगत आस्था ,विकास और उत्तरीकरण का मार्ग था , वह आगे जाकर ,एक अवस्था प्राप्त होने पर, लोक कल्याणकारी रूप धारण कर लेता है |साधक सोचता है कि मैंने जो आनंद प्राप्त किया है वह अधिकतम जन तक पहुंचे |इस प्रयास में (पुरानी राजतंत्र व्यवस्थाओं में )राजा को प्रभावित करने विभिन्न मत वादी आते हैं| वे जानते हैं कि अगर राजा उनके मत के अनुकूल हुआ तो बहुसंख्य प्रजा स्वयमेव राजा की अनुरागवश  उनके मत  की अनुयाई हो जाएगी  |राजा स्वयं एक अतिरिक्त ऊर्जा को खींचने वाला होता है| हम जिसे मुख्यधारा कहते हैं वह अधिकांश राजा अभिमुख होती है  |

एक अन्य कारण भी होता है जुड़ाव  का | वह है आकर्षण |राज स्थान सतत असमाधि का स्थान होता है |इनकी जान को कोई ना कोई क्लेश लगा ही रहता है | इसलिए संतो के यहां शांति ,प्रसन्नता और कल्याण का वातावरण इन्हें आकर्षित कर लेता है  | 

इस शीर्षक को यहां रखने का लक्ष्य यह है कि पाठक धर्म और राज्य  -इन दो सत्ताओं के आपसी संबंध के ताने-बाने के कुछ पहलुओं को समझे |

लॉकडाउन , उस अद्भुत किताब का पढ़ना   मार्च 2020 मे भारत मे लॉकडाउन लगा था | हमारी जिंदगी की सक्रियता खत्म हो गई |अचानक भीतर की गति धीमी हो गई | ब्रन्च करके हम शाम तक खाली रहते थे | टीवी देखते थे तो लगता था कि साल 2020 चल रहा है  |टीवी ,मीडिया का अविष्कार हो चुका है |फोन पर रिश्तेदारों से भी कितनी बातें करें |वही बातें थी रोज की |

उन दिनों में मैंने मुगल इतिहास पढ़ना शुरू किया था | यूं ही |बिना किसी योजना के | दोपहर को दो ढाई घंटे पढ़ने की रूटीन बनी थी |उन दो ढाई महीनों में मैंने बहुत सी किताबें पढ़ी थी |इसी क्रम में मुगल शहजादे दारा शिकोह पर लिखी हुई किताब पढ़ी और मुझे  17वीं शताब्दी में जन्मे इस अद्भुत व्यक्ति को जानने का मौका मिला |जो एक राजकुमार था ,दार्शनिक था | 

मजूमदार की इस किताब में एक चैप्टर है जो दारा  शिकोंह  की किताबों के ऊपर उनका सार , संक्षिप्त टिप्पणी ,आलोचना प्रस्तुत करता है | उस चैप्टर में दारा शिकोंह मुस्लिम धर्म के सिद्धांतों को क्रमवार रखते हुए ,चिंतन करते हुए ,कठोर बौद्धिक- तार्किक प्रक्रिया से गुजरते हुए यह ऐलान करता है कि वह खुदा परस्त नहीं है ,खुद परस्त  हो गया है |आगे इस चैप्टर में  एक वृत्त की 4 अवस्थाओं का जिक्र है ,जो हर धार्मिक को पार करनी होती है |

इस किताब का मुझ पर बहुत अद्भुत प्रभाव हुआ | मुख्यतः मुस्लिम धर्म की शब्दावली होने के कारण मैं ज्यादा तो नहीं समझी पर इस चैप्टर का "हिट  पॉइंट " मुझे समझ में आ गया  |वह  गिचपिच जो बहुत तरह की धार्मिक व्याख्या के कारण बन गई थी ,वह एकदम से मिट गई |

"अरे ! यह जो लोग अपनी अपनी व्याख्या को श्रेष्ठ बताने के लिए लड़ रहे हैं वास्तव में यह नहीं जानते कि यह सभी सही हैं, गलत कोई भी नहीं "अगर कुछ गलत है तो वह है स्वयं को सही कहना, दूसरे को गलत कहना | अन्यथा ध्यान से देखें तो सभी व्याख्याएं  मूल शास्त्रों के किसी न  किसी बात की पुष्टि करती है  |आलू प्याज में दोष देखने वाले भी सर्वथा गलत नहीं है |वनस्पति काय के वर्णन में जमीकंद की व्याख्या हमारे शास्त्रों में इस रूप में की गई है |

 पाठक यह भी ध्यान दें कि यूं तो मैंने इस लेख में जगह-जगह "मैंने चिंतन किया " शब्द प्रयोग किए हैं पर यहां मैं कहना चाहती हूं कि यह बात तो मेरे चिंतन में कभी नहीं आई थी|  ना मैंने कभी सुनी थी |

इस नई उद्भावना के आलोक मे मुझे लगा की धार्मिक व्याख्याताओं का लड़ना तो वैसी बात हुई कि एक बस में खड़े हुए लोग सीट के लिए  लड़ रहे हैं  | नए लोगों को भरे जा रहे हैं | अनंत काल तक वह लड़ते चले जाएं बिना यह जाने कि वह बस में क्यों बैठे थे  | उन्हें कहां जाना था | 

धर्म भावना का विषय है या बुद्धि का मुख्य रूप से धर्म रागात्मक जुड़ाव का विषय है  |अधिकांश जन जहां जन्म लेते हैं वही अपने माता-पिता ,अपने पारिवारिक धर्म, धर्म गुरु तथा स्थान से जुड़ जाते हैं तो आजीवन वही जुड़े रहते हैं |

 सामान्य जन बौद्धिक विमर्श में घुसते नहीं |अपने धर्म के धार्मिक विमर्श में घुसे भी तो तुलनात्मक धार्मिक विमर्श में तो बिल्कुल नहीं घुसते  |खुद मेरी यात्रा भी ऐसी ही रही है  | मैं भी एक चलती हुई समृद्ध धार्मिक विमर्श की परंपरा के कारण ही इसके लाभ को अनायास पा गई और आगे चलकर उससे भी अनायास ढंग से एक पुस्तक के जरिए मैं एक दूसरे धर्म के धार्मिक विमर्श के एक बड़े "  क्लू " को प्राप्त कर पाई| धार्मिक संसार में इसलिए भगवत कृपा की बड़ी महिमा बताई जाती है |मैं भी यही कहती हूं  |यह सब कृपा के द्वारा ही पाना संभव है |

 धर्म बुद्धि का विषय भी है |धर्म के विषय- आत्मा ,पाप ,पुण्य,ज्ञान ,दर्शन, चारित्र ,तप , योग ,उपयोग ,क्रिया ,गति आगति,  स्थिति इत्यादि बिना बुद्धि के तो इंसान जान नहीं सकता है  |इन विषयों में तर्क वितर्क, चिंतन मनन करने की क्षमता भी एक बुद्धि संपन्न व्यक्ति ही कर सकता है|

 एक विषय पर अलग-अलग मत होना बड़ी ही स्वाभाविक बात है |असली कहानी इसके बाद शुरू होती है क्योंकि यहां से अहंकार की यात्रा शुरू होती है |व्यक्ति झुकना नहीं चाहता है |वह संसार भर को अपने पक्ष का सहीपन मनवाना चाहता है | इसलिए वह अपना बल ,तप , संयम, विद्या सब कुछ आजमाता है |

 pov की लड़ाई ही मुख्य लड़ाई है | इसलिए  pov  की दृष्टि से देखूं तो शायद आज मैं अपने गुरुदेव के नजरिए की आलोचना भी कर सकती हूं, पर मैं करूंगी नहीं | उसकी जरूरत भी नहीं |अपने ऊपर गुरुदेव के महान उपकार तथा उनसे रागात्मक जुड़ाव के कारण  | साथ ही मुझ में यह बोध भी है कि हर एक मनुष्य अपने समय और साधनों की निर्मिती होता है | हर एक व्यक्ति अपनी सीमाओं और शक्ति का पुंज होता है | सीमाओं के रहते हुए भी अंत- अंत तक अपनी शक्ति के सहारे मेरे गुरुदेव का जीवन शानदार, चमकीला रहा है |

उपर्युक्त चिंतन का सार यह है कि धर्म एक संवेदनशील विषय है | इसकी आरंभिक शुरुआत बहुदा किसी घनघोर भावात्मक, रागात्मक जुड़ाव में होती है | यह व्यक्तिगत स्वतंत्र की पहला मौलिक अधिकार है  | राज्य के साथ इसका संबंध स्वतंत्रता के अधिकार के संरक्षण का ही होना उचित है  |भारत जोड़ो यात्रा इस अधिकार के राजनीतिक संरक्षण की यात्रा है |

शनिवार, 7 जनवरी 2023

साहित्य शिक्षण : एक शब्द के पीछे भागता मन

सआदत हसन मंटो की एक कहानी में एक शब्द पढ़ा था -खलूस । मुख्य पात्र अपने खुद के बेटे को कह रही है- सूअर के बच्चे और सामने बैठा पति हंस रहा है । क्योंकि ,  कहानीकार ने खुलासा किया कि यह उसने ऐसे खलूस से कहा कि उसके मन में क्रोध उत्पन्न होने की बजाय गुदगुदी हुई। 

मुझे यह भाव समझ नहीं आया ।क्या होता होगा-  खलूस से कहना । फिर कई साल बाद मैंने यही बात संजू फिल्म मे देखी । नरगिस दत्त बनी मनीषा कोइराला संजू को -सूअर के बच्चे- कह रही है और सुनील दत्त बने परेश रावल हँस रहे है ।तब इस शब्द का अर्थ कुछ समझ में आया ।

स्त्री काबिलियत और क्षमता में पुरुष के बराबर की है । यह उसकी ताकत है कि पुरुष के सामने उसके पुत्र को कह सकती है सूअर का बच्चा ।लेकिन इस ताकत में अहंकार नहीं है (अगर है भी तो मीठे किस्म का |) बल्कि स्त्री और पुरुष होने की विभिन्नता के प्रति स्वभाविक विनय है। इसलिए उसके कहने में तिरस्कार की चोट नहीं है ,स्नेह घुला हुआ है ।

 क्या यह उच्च वर्ग के स्त्री-पुरुष की बात है । नहीं , यह स्त्री पुरुष के बीच प्रेम की बात है । वर्ग कोई भी हो ।जब स्त्री अपने प्रति पुरुष के प्रेम में आश्वस्त होती है तब यह खलूस उसके व्यवहार में अपने आप प्रकट होता है ।

आश्वस्ति का यह भाव प्रेम के अन्य रूपों की गहराई में भी दिखता है। भीष्म साहनी की एक कहानी है 'ओ हरामजादे !'। मुख्य पात्र लंदन जाकर अपने परिवार के साथ हुए वहां के नियम -कायदों वाली यंत्रवत्त जिंदगी जी रहा है।  ऊपरी तौर पर एक सभ्य,शालीन, सुविधापूर्ण जिंदगी जीते हुए भी वह पंजाब के पिंड की जिंदगी को भूल नहीं पाता ,जहां जान पहचान के लोगों के बीच कभी कोई भी पीछे से आवाज लगाकर टोक देता था 'ओ हरामजादे !उसकी आत्मा वैसी सहज आत्मीयता को तरस जाती है।

Ps : हाँ ।ठीक है । मैने भी यही सोचा था कि जिस तरह से बाकी लोग प्रेम मे हमसे आ जुड़े है ,इसे बहुमान न देना उनकी प्रतिभा और प्राज्ञता का अनादर होगा । 

गुरुवार, 5 जनवरी 2023

दया का कांसेप्ट

यह बात मैने पहले लिख रखी थी ।कुछ पेरेंट्स की हेल्थ इशू है । ...अभी ठीक है ।

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3- 4 साल पहले की बात है  । हम पति के बड़े भाई साहब के साथ आपनो घर ,बूढ़पुर पर गए थे । जाने से पहले हमारी घर में बहुत बहस हुई थी ।बहस का मुद्दा था- दया का कांसेप्ट ।

मेरी धर्म रूचि विख्यात है। इसलिए इसके वर्जन के लिए मैं जब तब सबके निशाने पर आती रहती हूं।  वह हमें आपनो घर ले जा रहे थे और उसका इतिहास भी बता रहे थे कि किस तरह एक डॉक्टर ने एक ऐसी दीन -दुखी- बेघर महिला को देखा जिसका सिर कीड़ों ने खा लिया था। उनके मन में दया आई। उन्होने उसका इलाज किया और इस तरह आपनो घर का विचार साकार हुआ ।

 तू अपना लक्ष्य बना कि तुझे भी उस डॉक्टर जैसा बनना है । बाकी सब छोड़ दे ।यह होता है असली धर्म - भाई साहब समझा रहे थे ।

मुझे तो स्थानक जाने और ज्ञान सीखने में मजा आता है- मैंने कहा । पति और घर के बाकी लोग हंस रहे थे ।

बस बता दिया तुझे। असली धर्म यह है बाकी सब तो यूं ही.....-  भाई साहब ने अपने मत पर जोर दिया  ।

उस समय उनके चेहरे पर आए भाव देखकर मुझे फील हुआ कि शायद वे जानते हैं स्थानक में कहे जा रहे धर्म के असलीपन को...... मगर कह नहीं पा रहे।  क्योंकि कहने का अर्थ अनिवार्य रूप से अपना पक्ष रखना होता है।  अपना पक्ष रखने का अर्थ है उस पर स्थित रहना, उसके प्रतिबद्ध होना।  यह अनिवार्य रूप से एक ऐसी लड़ाई है जिसकी गहराई में वे घुसने  नहीं चाहते ।शायद उनकी इतनी योग्यता - क्षमता नहीं है।

 देखो! जिस तरह तुम लोग मुझे बता रहे हो कि वहां इतनी दीन -मरी हालत की औरतें रहती हैं और इस तरह उनकी देखभाल की जाती है । अच्छी बात है।बहुत अच्छी बात है ।पर मुझे माफ कर दो। मैं नहीं देख सकती । बहुत ज्यादा मरी- गली हालत में लोगों को मैं नहीं देख सकती हूं । मुझे स्वस्थ, हंसते हुए, खुशदिल लोग अच्छे लगते हैं ।

मेरी बात से सब लोगों में एक घिन सी उपजी । देखो ! कैसी ढीठ है यह । कैसी लीक विरुद्ध बातें कह रही है। क्या समय का पता चलता है ।आज अच्छा चल रहा है। कल को खराब भी आ सकता है ।फिर क्या इंसान को ऐसे बड़े बोल बोलने चाहिए ।

 देखो !अभी मैं स्थानक में सामायिक करके ,गुरु दर्शन करके ,शास्त्र पढ़कर इत्यादि करके बहुत खुश हूं। तुम यह करना चाहते हो तो करो ।मैं तुम्हें नहीं रोक रही। तुम कह सकते हो मेरे भीतर की अहिंसा अभी कच्ची है ।वह अभी इतनी नहीं पकी है कि मैं खुद को तैयार कर सकूं ऐसे लोगों की मदद के लिए। मदद करना तो दूर मैं तो देख भी नहीं पाती ।

सब ढोंग है तेरे - भाई साहब ने कहा ।बाकी लोग बहस के मजे ले रहे थे ।

अच्छा यह तो मैं तुम लोगों के लिए भी कह सकती हूं ।तुम लोगों के लिए भी कह सकती हूं कि तुम लोगों की दया तभी उपजती है जब इंसान इतनी ज्यादा बुरी हालत में पहुंच जाए। क्यों तुम थोड़े स्वस्थ ठीक ठाक हालत में दिखने वाले की मदद नहीं करते। - अब की बार मैंने बैक प्ले किया ।

 उनकी क्या मदद करनी है।वे तो हटटे -कट्ठे होते हैं ।खुद कमा कर खा सकते हैं -पति ने उछल कर कहा ।

 अच्छा जी! तो इसका मतलब तुम तो कती कठोर किस्म के देवता हो। तुम्हारी दया पाने के लिए तो इंसान को लूला लंगड़ा होना होय। तब जाकर तुम्हारी कृपा की दृष्टि प्राप्त होगी- मैं हंसी।

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 हम वहाँ  गए। वहां ढाई सौ के करीब औरते थी । एक बड़े हॉल में जगह-जगह बैठी थी । 3-4 टीवी स्क्रीन लगे थे। बिल्डिंग भी ठीक थी ।ऑफिस में वहां के कर्मचारी ने हमें वहां की प्रमोशन फिल्म दिखाई । वही बातें थी जो भाई साहब घर पर बता चुके थे।

 जब हम आ रहे थे, एक औरत पीछे चीख रही थी- यह मुझे घर नहीं जाने देते -कह रही थी।

 वही होना था। जो मैंने एक्सपेक्ट किया था। मन विचलित हो गया ।हम सब स्वच्छता, सभ्यता और पुण्य - प्रकर्षता के जिस मजबूत भ्रम में रहते हैं वह छिन्न-भिन्न हो जाए, अगर एक दिन खाना ना मिले तो ,एक हफ्ता नहाना, अच्छे कपड़े, बाल ना बनाएं तो। कितना जतन लगता है इसे बनाए रखने के लिए। बहुत बार इंसान हिंसा पर उतारू हो जाता है।

 लेकिन मूर्ख मनुष्य यह नहीं जानता कि यह भ्रम कभी स्थिर नहीं रहने वाला ।यह अज्ञानता ही सबसे बड़ा भ्रम है । स्थानक में हमें हमारी इस अज्ञानता का ही तो ज्ञान कराया जाता है। लौटते हुए गाड़ी में मैं यह बातें कह रही थी कुछ अलग ढंग से। भाई साहब सुन रहे थे। सब हंस रहे थे ।

तेरी बात तू जान- शायद उनके चुप का यह मतलब था । 

2 दिन लगे बूढ़पुर के इफेक्ट से बाहर आने में। आखिरकार गुरु देव धन्ना मुनि जी के दर्शन करके मेरा मन पुनः प्रसन्न हुआ ।


मंगलवार, 3 जनवरी 2023

 मेरा मन बुझा हुआ था ।परसों गुरुजी के दर्शन किए तो कुछ जान आई है । अब थोड़ा बेहतर फील कर रही हूं ।

सब लोगों ने जाते साल पर अपने हिसाब से लिखा ।साल 2022 मेरे लिए इस कटु अहसास पे खत्म हुआ कि एक इन्सान एक छोटे कांटेक्स्ट में सही होकर भी बड़े कांटेक्स्ट मे गलत हो सकता है 

।तब उसे कितनी गहरी पराजय का अहसास होता है । .........और यह अहसास भी कि सही होना या गलत होना इंसान के हाथ मे नही होता ।

पिछले दिनों मे मैने इस अहसास की कटुता ही सही ।वैसे जब मै इस की कटुता सह रही थी ,तभी मैने इसका मधुर पक्ष भी देख लिया था । 

अब चुंकि गुरूदेव के दर्शन करके मेरा मन थोड़ा बेहतर है इसलिए बता देती हूं कि  मैने भी एक ऐसी पराजय झेली है । पर मै तो पराजित होकर भी खुश थी ।

क्योंकि......

तुम्हे पराजित करने वाला तुम्हारा  अपना हो तो फिर इनसान को शोक नही करना चाहिए। 

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