यहाँ 27जून 2022 से लेकर 6 जुलाई 2022 तक फेसबुक पर लिखी पोस्ट हैं । टीम को लेकर मेरा विजन क्या है,वह इन पोस्टों मे आ गया है ।
^ छ जीवनिकाय निकाय हिंसा ,जिसे जैनेत्तर लोग पर्यावरण की सुरक्षा के रूप मे समझते हैं ।
मै भी इसे भगवद् वचन कहने से जानती हूं । अपनी श्रद्धा के कारण मै अधिकतम इसका पालन करूं ,ऐसी भावना रखती हूं ।
^ मन की स्वतन्त्रता ......यह एक दुविधा थी /है ।सबसे ज्यादा कठिन है जिसे समझना/सुलझाना ।
..... पर हम यह भी देखते है कि बिना मन के किसी कार्य मे लगना ,अपना विनाश जैसा लगता है ।धर्म और संयम जैसी उत्तम चीज भी बिना मन के की जाए तो नारकीय कष्ट का अनुभव होता है ,यह आगम वचन प्रमाण है ।.....
हम लोग मिले तो ऐसे बात करने लगे जैसे जन्म भर की बाते/स्कोर सेटल करने पड़े हैं । पहले वे कर लें , बाकी बातें (काम ) तो बाद मे हो जाएगी।.....
पर्सनली मेरी आकांक्षा तो यह थी कि हम क्रिएटिव क्षमता का वह लेवल प्राप्त करते कि किसी बात की असंभवता हमारे लिए असंभव नही रह जाती ।....
ऐसा हो सकता है अगर हममे वह प्यार और आदर उत्पन्न होता ।पर यहां तो कुछ और ही...शुरु हो गया ।....
मेरे मन मे एक जबरदस्त भय है ।वह ये कि कहीं आप लोगों के साथ चलने मे मुझे अपने जैन धर्म के ज्ञान से तो समझौता नही करना पडेगा ।
मेरे मन मे आप लोगों की यह छवि है कि आप जीवन मे आनंद प्राप्त करने मे प्रयत्नशील,साहसी लोग हो । नए विचारों and acharan को अपनाने मे घबराते नही हो ।फिर वे चाहे आगम विरुद्ध ही क्यों न हों ।
साहस तो मैने भी किया है ।लेकिन मेरा दायरा स्ट्रिक्टली जैन धर्म का ज्ञान और श्रावक व्रत आचरण है ।इससे परे जाकर मुझे कुछ नही चाहिए।
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मैने कह दिया था ,और लोगों को शामिल करने का ।मै सीरीयस भी थी ।....लेकिन बात तो वहीं की वहीं है ।वो माॅडल क्या हो जिसमे ये दोनो लक्ष्य पूरे हों ।
अब आप टीम बनाओ।हो सके तो मुझे भी ले लेना ।
27 June 2022
lets talk one -two thing so that when we reach 3-4-5 thing ,we automatically understand 6-7 thing .
इस पोस्ट के लिए मैंने टॉपिकों की थोड़ी- बहुत सूची बनाई थी जो इस प्रकार हैं –उदासीनता< मैं ऐसी क्यों हूं <मेरे धार्मिक विमर्श< व्रतों का स्वरूप <टीम | लेकिन मैं इसका विश्लेषण टॉपिक वाइज नहीं कर रही | अभी बात शुरू करने के लिए मैं पहले मेरे धार्मिक विमर्श से शुरू कर रही हूँ |
एक बार मैंने पहले भी लिखा था कि मेरी लाइफ का ग्राफ ऐसा रहा है कि समुद्र की लहर की भांति एक लहर साहित्य की ऊपर की ओर ; और दूसरी लहर धार्मिक अध्ययन की नीचे की ओर. साथ साथ चली है |
धर्म मेरा प्रिय विषय है |मुझे उस पर बात करना हमेशा अच्छा लगता है और इस पर बात करने से बात शुरू हो जाएगी |क्योंकि अभी मन खराब है| इस पर बात करूंगी तो मन भी ठीक हो जाएगा |
< मेरे धार्मिक विमर्श से तात्पर्य है कि जैन आगम पढ़ते हुए मैंने जिन जिन बातों को जैसे समझा है यह मेरा नजरिया , बातों को समझने का मेरा वर्जन है |
इसमें मैं हूं -नीरू जैन -जो हरियाणा में जन्म हुआ है |परिवार के बीच में रही है |उसके कुछ अनुभव हैं |अच्छे –बुरे |और एक हिंदी शेत्र में पले- बड़े होने के कारण उसके कुछ विश्वास है |जो सही है या गलत ,वह नहीं जानती| जब वह गुरुओं के संपर्क में आती है तो उनकी श्रद्धा की वजह से वह अध्ययन करती है | साथ ही साथ उसने साहित्य भी पढ़ा है | साहित्य की ट्रेनिंग की वजह से इन् धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन उसके लिए बहुत रसपूर्ण बन गया है और वह कौन-कौन से स्थल हैं जिसने उसकी सोच को बदला है| जिसकी पुरानी सोच जो हिंदी शेत्र में रहने के कारण बनी है ,हिंदी से बनी है वह कैसे नई जानकारी से टकराई और उससे उस में क्या परिवर्तन आया -यह मेरे धार्मिक विमर्श हैं |
मेरे धार्मिक विषयों के अंतर्गत यह टॉपिक हैं -
• परिवार का मिलना पुण्य होने की निशानी है |
• वह गुफा में चंपक लता की तरह बढ़ने लगा|
• एलक अध्ययन में मानों वह आदेश की प्रतीक्षा करता है |
• विशेषण में रानी धारिणी का प्रीतिमना होना
• उववाई के रिच विशेषण
• पाप रुचि -शब्द ने झटका दिया |
• राजा की अवधारणा |
• स्वार्थ शब्द का सुंदरतम अर्थ
पहला- परिवार का मिलना पुण्य की निशानी है |उत्तराध्ययन सूत्र में एक अध्ययन है उसमें 10 बोल आए हैं कि जीव को पिछले जन्म के पुण्य के फल स्वरुप 10 बोलों की प्राप्ति होती है जिसमें पहला बोल चार कामस्कन्ध –क्षेत्र,वस्तु ,सोना ,पशु-दास वर्ग है |शेष नौ अंग हैं –मित्र,ज्ञाति,उच्च गोत्र ,सुंदर वर्ण ,बीमार कमहोना,महाप्रज्ञाशाली,अभिजात,यशस्वी,बलवान है |
क्योंकि हम हरियाणा के हैं और हरियाणा में बड़े- बड़े परिवार होते हैं |हमारा परिवार भी बहुत बड़ा है |जहां ज्यादा बर्तन होते हैं उनमें टकराते बहुत हैं| तो टकराव की वजह से यह था कि मुझे यह अच्छा नहीं लगता|
लेकिन जब मैंने पढ़ा कि बड़े परिवार का मिलना तो पुण्य की निशानी है तो मैंने अपने गुरु- गुरुदेव रामप्रसाद जी महाराज (गुरुदेव सेठजी महाराज के छोटे भाई )से पूछा भी था कि क्या बड़े परिवार का होना पुण्य की निशानी है| तो गुरुदेव ने हंसकर कहा था कि हां !अगर कोई इंसान अकेला है, तो अकेला क्या कर लेगा |
दूसरी बात -ज्ञाता धर्म कथा में मेघ कुमार जी के जन्म के वर्णन में यह शब्द आया कि वह गुफा में चंपक लता की तरह बढ़ने लगा |इसने भी मेरी सोच को बहुत बदला था |
अभी जैसे परिवार मे हमारे जो व्यक्तिगत अनुभव होते हैं वह थोड़े कुछ अच्छे बुरे होते हैं तो उसकी वजह से टीनएज लड़के -लड़कियों में इस तरह का गुस्सा बन जाता है |अपने माता-पिता के प्रति इतना गुस्सा बन जाता है कि हमें लगता है कि हम आजाद नहीं है |ऐसी बातें होती हैं |हम उनकी सुरक्षा मे घुटन महसूस करते हैं |पर यहाँ जब मैंने पढ़ा कि गुफा मे चंपक लता की तरह बढ़ने लगा ,तो इसमे तो मुझे कहीं घुटन नजर नहीं आई |अपनी सोच पर हैरानी हुई – अरे ! मैं तो कैसे (ना) समझती थी इस बात को |
जैनागमों की विशिष्ट भाषिक अभिव्यक्ति ने भी मुझे बहुत चमत्कृत किया है | उदाहरण के लिए उत्तराध्ययन सूत्र में- औरभरीय अध्ययन में यह आया है कि मालिक ने बकरे को खिला पिला कर मोटा ताजा बना दिया है और अब वह बकरा मानो आदेश की प्रतीक्षा करता है |आदेश का अर्थ -अतिथि | तो यह भाषिक अभिव्यक्ति बड़ी चमत्कार पूर्ण थी क्योंकि मैंने समझा कि बकरा क्यों मृत्यु की प्रतीक्षा करेगा | लेकिन क्योंकि मालिक ने तो उसे इसीलिए खिला पिला कर मोटा ताजा बनाया है कि वह अतिथि के आने पर उसे काटकर खिलाएगा |तो अब क्योंकि वह खिला पिला कर मोटा ताजा बन गया है तो अब मालिक के साथ जैसे मानो वह भी अतिथि की प्रतीक्षा करता है| यह अभिव्यक्ति बहुत चमत्कारपूर्ण लगी थी मुझे |ऐसे बहुत उदाहरण हैं |
28 June 2022
विशेषणो की दृष्टि से अगर जैनागमों को पढ़ा जाए तो यह एक समृद्ध साहित्यक अनुभव है | शुरुआत में इन आगमों के प्रति मेरा आकर्षण इनकी साहित्यिक विशेषताओं के कारण ही बना| बल्कि मैंने ‘जैनागमों में आए कतिपय साहित्यिक स्थल’ के नाम से लेखों की एक श्रृंखला भी लिखी है जो स्वाध्याय दर्शन नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई है | उदाहरण के लिए- ज्ञाताधर्मकथा में राजा श्रेणिक की रानी धारिणी ने पूर्व रात्रि में एक स्वप्न देखा है कि एक विशालकाय हाथी लीला करता हुआ उसके मुख में समा गया| यह स्वप्न देख कर उसका मन प्रसंता से भर गया| वह अभी शैया पर ही बैठी है | उस समय की उसकी स्थिति को कितने सुंदर शब्दों में बताया गया है| इसी तरह उववाई मे राजा के, राजा की नगरी के , उद्यान के, वृक्षों के वर्णन और मंदिर के वर्णन विशेषण की दृष्टि से इतने रिच हैं कि यह अपने आप में एक है समृद्ध साहित्य का अनुभव है|
पाप रुचि –इस शब्द ने मुझे बहुत झटका दिया | शायद हिंसा के कारणों की व्याख्या में मैंने इस शब्द को पढ़ा था कि जहां यह बताया गया था कि संसार में हिंसा के क्या कारण होते हैं| पशुओं के प्रति हिंसा उनके नख ,केश, दूध, मांस, हड्डी ,दांत , खाल के लिए करते हैं |मनुष्य के प्रति हिंसा लालच में और धन के लिए करते हैं|
पता नहीं ,इस शब्द ने मुझे क्यों झटका दिया |कह नहीं सकती |
एक तो शायद इसलिए की संसार मे बहुत सी बातों के अडेप्ट होते हैं | हमारे जैसे लोग जो डायरेक्ट ऐसी हिंसा से आमने सामने नहीं है ,वह लोग इस बात को ऐसे समझते हैं कि यह उन लोगों का मजबूरी है क्योंकि उनके पास और कोई कार्य नहीं है करने के लिए जीवन यापन के लिए| एक तरह से संसार में यह हिंसा मान्य भी है |यह उनका काम है|
दूसरी बात इसमें यह है कि शुरुआत से ही हम समाज के ‘भले होने ‘और ‘बुरे होने’ के खांचों में बंटे होते हैं| और ‘हम तो भले ‘ -भले होने के नाते ,भले होते होते हम यह भूल जाते हैं कि मात्र हमारी भले होने से यह आवश्यक नहीं है कि सब लोग भले हो गए हैं | भला होना एक जड़ता भी है ऐसा व्यक्ति सभी को अपने जैसा समझता है| यह एक प्रकार की जड़ता भी होती है | ऐसे लोग अपने नियम खुद बना लेते हैं वह समझते हैं कि फलां से यह पाप हुआ है तो इसकी कोई मजबूरी रही होगी |इसने चोरी की है ,इसने झूठ बोला है ,तो इसकी कोई मजबूरी रही होगी | शायद इसीलिए इस शब्द ने मुझे इतना झटका दिया क्योंकि यह बात मेरी कल्पना के बाहर थी कि लोगों में पाप की रूचि भी हो सकती है|
हिंदी क्षेत्र में राजा की अवधारणा बड़ी रंगीन और स्ट्रांग है| इसका बढ़ा चढ़ाकर अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन हिंदी भाषा के अंदर मिलता है| जैनागमों में राजा की अवधारणा से संबंधित अलग-अलग व्याख्या पढ़ी | एक जगह पढ़ा कि राजा दूसरे की वमन किए हुए धन को भी ग्रहण कर लेता है |एक जगह पढ़ा कि राजा दूसरे के धन के लुटेरे होते हैं | राजा कोनिक के वर्णन बहुत प्रभावशाली भाषा में बताए गए हैं| एक जगह आया कि राजा होना सब चाहते हैं ,सबकी इच्छा होती है कि वह एक बार राजा होने के स्तर और लेवल को पा ले | हिंदी में यह इच्छा बहुत तीव्र है |
स्वार्थी शब्द को हिंदी में नकारात्मक लहजे में प्रयोग किया जाता है कि स्वार्थी होना बुरा होना अनिवार्य रूप में|
आगमों मे इसका प्रयोग इस तरह से देखा कि आचार्य भगवंत ने जब मोक्ष प्राप्त कर लिया तो अपने स्व-अर्थ को प्राप्त कर लिया |वहाँ इस शब्द का प्रयोग नकारात्मक से नहीं है | इस तरह से मुझे लगा कि उस समय उस सोसाइटी के लोग इतने अधिक जागरूक और बोधवान थे कि वह अलग -अलग व्यक्तित्व के अलगपन को सहजता से स्वीकार कर सकते थे |हो सकता है यह बात उस समय के जनसाधारण की बात नहीं हो, बल्कि यह उस समय की उच्च बौद्धिक ,ज्ञानी वर्ग की बात है |आजकल हम देखते हैं बहुत से लेखकों की बहुत सी ऊर्जा अपने को साबित करने में, अपनी तरह जीने में ही निकल जाती है | वह छोटी-छोटी मामूली बातों को अपनी तरह से करना चाहते हैं लेकिन सोसाइटी इतनी ज्यादा प्रेशर में रखती है कि उनकी बहुत सारी ऊर्जा ,बहुत सारा समय ,बहुत सारी मेहनत इसी में निकल जाती है कि वह अपनी तरह से जी ले |
29 June 2022
मेरे धार्मिक विमर्श-2
^भिक्षुक जीवन ^काम-भोग
शुरुआत मे यह सब सराहना तक था । बल्कि एक हद तक तो क्लांति भी थी ।जैनागमो के विषय ऐसे है कि ये बुद्धि को बहुत शक्तिशाली ढंग से चैलेंज करते है ।सहसा इनकी चुनौती से जीतना सरल नही है ।
बीच मे अनेक बार विषाद के क्षण आते थे ।मै खुद से शिकायत करती कि मै क्यों लगी हूं ।क्या हो जाएगा पढने से ।जीवन अलग है ।जीवन के सुख -दुख अलग है ।इस तरह की पढाई का जीवन की वास्तविक समस्याओं से क्या लेना देना ।
तो 'जीवन की वास्तविक समस्याओं ' को😊 सुलझाने का सिलसिला भी साथ चल रहा था ।
धीरे -धीरे इस तरह चलते हुए आगमो मे वर्णित विषय मेरे चिन्तन का विषय बनने लगे ।इनमे सबसे पहले जिस बात ने उद्वेलित किया ,वह थी साधक का भिक्षुक होना ।
भगवान ने साधको को भिक्षुक होने की आज्ञा दी है ।साधक आजीवन भिक्षुक रहे।मान-अपमान के दंश को त्याग दे ।स्वाद को त्याग दे । जोरदार फटकार के साथ ये बाते बार-बार जगह-जगह पर कही गई हैं ।
उफ!यह तो बहुत ही कठिन है ।अपने पेट की भूख के लिए दूसरे के घर मे जाना ,यह तो बहुत ही कठिन है ।आखिर इस आज्ञा मे क्या प्राज्ञता हो सकती है ?
बहुत समय तक यह बात मेरे चिन्तन मे चलती रही ।मै इसे साॅल्व नही कर पा रही थी ।फिर इस बात को मैने दूसरे तरीके से समझा ।
हिन्दी साहित्य की वजह से मै हिन्दी लेखन संसार से जुड़ी थी ,मगर दूर दूर से ।इसमे जैसे सब लोग लिखते है वह इस संसार का एक ' बर्ड्स आई व्यू ' दिखता है ।
एक तत्व है -साहित्य तत्व ।उसके इर्द-गिर्द लेखक ,पाठक,आलोचक,संपादक,प्रकाशक , मुद्रक,वितरक ,स्टाफ का संसार है ।यह वस्तु स्थिति है ।
आदर्श स्थिति यह है कि' इर्द-गिर्द संसार ' तत्व की रक्षा करे ,शुद्धि-विशुदधि का ध्यान करे ।एक आन्तरिक प्रक्रिया मे यह होता भी है ।पर इस प्रक्रिया को बाधित करने के कारण क्या है ।गठजोड ,बैठकी,बैठकी का स्वाद,सत्ता ,आसक्ति ।
एक छोटी कमजोरी भी ऐसे कठिनतम प्रपंचों को प्रश्रय देती है कि भावुक ह्रदय लोग अगर गलती से लपेटे मे आ जाएं तो जन्म भर का अवसाद साथ ले जाएं। इस तरह तत्व दूषित होता है ।
यही व्याख्या हम पत्रकारिता,शिक्षा ,चिकित्सा आदि क्षेत्रो के विषय मे भी समझ सकते है ।
धर्म तत्व को इन कमजोरियों से बचाने के लिए भिक्षा को साधक के लिए उत्तम बताया गया है ।यह पराए टुकडो पर पलना नही है ।यह साधक जीवन की शोभा है ।
1 july 2022
हिन्दी मे काम-भोग का एक ही रूढ अर्थ समझा जाता है ।आगमों मे यह आया है कि पांच इन्द्रिय के विषयों मे काम के विषय श्रोत और चक्षु हैं ।भोग के विषय है -घ्राण,रसना,स्पर्श। काम के विषय तीव्र,चपल होते है।भोग के विषय धीमे,मन्द होते है ।
यह जानकारी है ।आप इस पर गहन चिंतन करें ।आप हिन्दी क्षेत्र मे स्त्री के खिलाफ हिंसा के पीछे की एक बडी वजह की अज्ञानता तक पहुँच जायेंगे।
Ps: see u on Monday.
4 July 2022
धार्मिक विमर्शों की इस कड़ी में अगला विमर्श था जो मेरे चिंतन का विषय बना - काम भोगों की निंदा | यह बात थी जो मेरे चिंतन में आई कि हमारे ग्रंथों मे काम भोगों की इतनी निंदा क्यों की गई है |हर कोई यह चाहता है कि वह अच्छा खाए , अच्छा पीए, अच्छा पहने ,अच्छी तरह रहे और अच्छी तरह जीए ,फिर यह हमारे समाज का स्वीकृत ,घोषित मूल्य क्यों नहीं है |क्यों सब लोग दबे-छुपे, अंदर मन मे तो यही चाहते हैं; पर बाहर त्याग की ,निस्पृहता की ,अकिंचनता की प्रशंसा करते हैं |
दूसरे अगर हम काम-भोग का अर्थ उस अर्थ में भी ले जैसे हिंदी क्षेत्र में समझा जाता है ,तो भी संबंधों की दृष्टि से और स्त्री-पुरुष संबंधों की दृष्टि से, इसमें क्या बुराई है | यह तो जीवन का आधार है| इन माता –पिता ,भाई-बहन आदि संबंधों का प्रेम तो मनुष्य जीवन का आधार है| यह एक बात थी ,यह एक सवाल था जो मेरे अंदर बहुत सालों तक, बहुत गहराई से चलता रहा|
ये सब 2014-15 के आसपास की बातें हैं |उस समय मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानती थी |आज मुझे इसका उत्तर पता है |
लेकिन यह समझने से पहले हमें विशुद्ध धार्मिक विमर्श समझने होंगे |
विशुद्ध धार्मिक विमर्श ;
• जीवन की अनित्यता
• जीवन की क्षणभंगुरता/ अल्पता
• शरीर की नश्वरता
• जीव का एकत्व/ अकेलापन
• नातेदार ओर परिवार की अशरणता
यह सब जो बातें हैं वह इंद्रिय प्रत्यक्ष हैं अर्थात यह बातें ऐसी नहीं है कि मैंने अपनी परंपरा से सीखी है |किसी धार्मिक परंपरा ने मुझे सिखाई हैं ,मैं मानती हूं इसलिए ऐसा है |यह हर कोई देखता है|
अधिकतर धर्म के विषय में यह भ्रांति है कि आप तो फला धर्म में जन्म हुए हो इसलिए आप इन बातों को मानते हो| हम क्यों माने |लेकिन यह जो विमर्श है यह किसी के मानने या ना मानने की चीज नहीं है |यह बिल्कुल इंद्रिय प्रत्यक्ष हैं |सबकी आंखों के सामने है |
इन बातों का ज्ञान वह मेधावीपन है जो इस पथ पर निकले हुए साधक को आरंभ से ही होता है | तब पूर्ण सत्य की खोज में वह निकलता है (उठा हुआ) और तब उसकी राह में जो भी चुनौतियां आती हैं ,उन को पार करते हुए वह आखिरी सोपान तक पहुंचता है जिसे मोक्ष कहते हैं| यह एक फुल- फ्लैश , होल टाइम खोज है जिसमें एक जीवन, दो जीवन, जितने भी जीवन लग सकते हैं |
5 july 2022
इस यात्रा में जो सबसे बड़ी बाधा है वह है काम-भोग अर्थात खाने ,पीने. रहने और और स्त्री संबंधी शक्तियां ही मनुष्य को इस राह पर आगे बढ़ने में रुकावट पैदा करती है |यह कारण है कि इसकी इतनी अधिक निंदा की गई है |पहली शंका समाप्त |
दूसरे परिवारिक संबंधों के संदर्भ में यह शंका बरकरार थी |इसका समाधान होने में बहुत समय लगा| बल्कि मैं कहूंगी कि यह मेरे लिए एक चमत्कार से कम नहीं है |महावीर स्वामी जी की कृपा है| यह कैसे हुआ ,मेरे लिए यह जानना तो ,इसका आकलन करना संभव नहीं है | पर मैं इतना अवश्य कह सकती हूं कि यह उस प्रक्रिया का ही फल है जो शास्त्र पढ़ने से और अलग-अलग तरह की आलोचनात्मक किताबें पढ़ने से और गुरुओं के संपर्क से और मेरे परिवार के संपर्क से हुई |
इस तरह संबंधों के संदर्भ में मेरी इस शंका का समाधान इस तरह हुआ कि काम -गुण अपनी प्रकृति में ही अस्थिर ,चंचल और सदा अतृप्ति के कारण हैं |इन्हें महाभय का कारण कहा गया है|
पाठक इन पंक्तियों में साहित्य और दर्शन का संबंध भी देख सकते हैं| दर्शन में जिसे काम गुणों की अस्थिरता और चंचलता कहा गया है ,साहित्य में उसी द्वंद्व को नायिका यह कहकर गीतों में पिरोती है कि तुम भूल ना जाना , भंवरा ना बनना आदि
got diabetes.
6 July 2022
मैंने तो साहित्य और दर्शन साथ-साथ पढ़े और मेरी रुचि दोनों में ही है |लेकिन धीरे-धीरे जैसे- जैसे समय बीता मेरी रुचि साहित्य से ज्यादा दर्शन में होती चली गई |
साहित्य और दर्शन के बीच इस तरह पेंडुलम की भांति झूलने को मैं एक संयोग नहीं मानती| मैं यह मानती हूं कि यह मेरे भीतर चल रहे किन्ही द्वन्द्वों की ही स्वाभाविक परिणति हुई है |खैर
मोटा मोटी अब 12 साल हो गए हैं मुझे फेसबुक पर आए हुए |कभी लिखती हूं कभी नहीं |ज्यादातर पढ़ती हूं|
इतने सालों में अब मुझ में भी बहुत बदलाव आए हैं | जब मैंने पहले पहल फेसबुक पर दूसरे लेखकों को पढ़ना शुरू किया था उस समय मैं विचारों की समानता को बहुत महत्व देती थी बल्कि कहना चाहिए कि विचारों की समानता भी नहीं बल्कि विचारों का पसंदगी |एक लेवल | विचारों की लेवल का मिलना एक अलग तरह के आनंद की अनुभूति है| विचार इंसान के स्व की अभिव्यक्ति है | उसकी क्षमता ,पराक्रम, बुद्धि की ,बल की |ऐसे लगता है जैसे अपने जैसे ही किसी को पा लिया है |
अब तो बहुत लोग हैं |पहले फेसबुक पर मुझे एमपी और अनुराधा का लेखन बहुत पसंद आया | और जब कि मैं बात कर रही हूं विचारों की| और एमपी तो उस समय ज्यादातर पू के कार्टून और ऑफिस से आने के बाद थकावट के कार्टून या इसी तरह पहले दिन की पोस्ट में फेमिनिज्म की बातें और 2 दिन के बाद यह कहना कि फेमिनिज्म भी पॉलिटिकल विचार है | इस तरह स्वयं ही अपनी बातों को कोन्टराडिक्ट करना| ऐसा लेखन था इनका और लेकिन फिर भी उस समय मुझे यह पसंद आया था | अनुराधा के लेखन में पितृसत्ता के बारे में ठोस बोध हुआ था | 35 साल की उम्र तक हिंदी साहित्य में एमए ,पीएचडी करने के बाद करने के बाद भी अगर मुझे पितृसत्ता अर्थ भी नहीं पता था तो यह बात निश्चित है कि यह विचार कभी मेरे चित् में प्रवेश ही नहीं किया था | मैं दूसरे लोगों को पढ़ती थी तो आश्चर्य होता था कि यह किसे कहते हैं |अगर ये पिता की सत्ता को पितृसत्ता कहते हैं तो मैं तो बहुत खुश हूं अपने पिता की सत्ता मे रहकर |
जैसे जैसे समय बीता ,मैंने कुछ बातें अनुभव की |साहित्य का क्षेत्र खुला क्षेत्र है |यहां पर तरह तरह के विचार चलते हैं और अब वह केवल विचार ही हैं या उनके प्रति कोई कमिटमेंट भी है यह भी अपने आप में एक प्रश्न है | इस क्षेत्र के पोलेपन पर मैं क्या कहूँ | इस पर तो पहले ही बहुत कुछ लिखा जा चुका है /लिखा जा रहा है| मैंने तो यह सब पढ़कर ही जाना है और उसी से मेरा पेट भर गया है |मुझे अलग से जानने की कोई जरूरत नहीं है|खैर
यह सब बातें हैं जिन्होंने मुझे दुविधा में डाल दिया है |एक दुविधा और भी है| अभी मैंने आचारांग पढ़ा था और उसमें 6 जीवनिकाय की अहिंसा का वर्णन था |यह जैन धर्म की मौलिक विज्ञप्ति है | 6 जीव निकाय अर्थात पृथ्वी, जल ,वायु, वनस्पति और अग्नि और त्रस की अहिंसा के बारे में बताया गया है | मुझे बंधन में बंधने से बहुत डर लगता है | यही मेरी उदासीनता का कारण है| मेरी बुद्धि इसमे स्थिर हो चुकी है |
आधुनिक चिंतक इसे पर्यावरण की सुरक्षा से भी देख सकते हैं |लेकिन हमारी दृष्टि मे और पर्यावरण सुरक्षा वादियों की दृष्टि में यह अंतर है कि वे लोग इस सुरक्षा के लिए अपने मन की कामनाओं पर कितना संयम रख सकते हैं |
ऊपर लिखी हुई बातों का निचोड़ यह है कि इसमें दो परस्पर विरोधी विचार दो पर्वतों की भांति खड़े हैं | एक और छ जीवनिकाय की अहिंसा है और दूसरी और मन की स्वतंत्रता है |यह पेंच है जो अटका है | यह बात है|