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कल लिखने बैठी तो ऊपर पैरा की पहली लाइन लिखी , आगे कुछ सूझा नही.... तो.... लेटे हुए नींद लग गई।
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कल मन मे दुख/विषाद की द्रवशीलता सी थी । .....आज बैटर लग रहा है । पता है , मै तो हमेशा ही अपने मन मे 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ' वाला विषाद महसूस करती हूं । अपने लिए नही ।औरों के लिए। उनकी अज्ञानता का लेवल देखके । गुरूदेव और महावीर वाणी की कृपा ने मुझे तो बचा लिया ।
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चीजों के बारे मे सोचने बैठो तो कभी लगता है मसला विचार का नही आचार का है ..फिर लगता है ...यह भी नही ...संसार के साधनों को पाने की होड़ मे अपनी क्षमता आजमाने की बात है ....फिर.....जाने दो , अपने कार्य पे ध्यान रखो ।
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