यह सच है की हिंदी भाषा के लिए मैं इतनी तो क्या उतनी भी चिंतित नहीं होती अगर मैंने हिंदी साहित्य में उच्च शिक्षा नहीं ली होती |उच्च शिक्षा में हिंदी साहित्य का चुनाव अन्य विषयों में विकल्प हीनता का स्वाभाविक विकल्प था |इसमें सारा दोष अकेले मेरा भी नहीं था |स्कूल के दिनों से अंग्रेजी का इतना शोर सुनते आये थे की हिंदी पढना/सीखना तो अपनी शान के खिलाफ लगता था |लेकिन भारत में सरकारी स्कूली शिक्षा किसी भी तरह एक एवरेज स्टुडेंट को विज्ञान जैसे विषयों में बेहतर प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं कर पाती|अब हालात बदलें हों तो कह नहीं सकती |
इसी का परिणाम था हिंदी में प्रवेश |लेकिन स्नातकोत्तर कक्षाओं में अपने सहपाठियों को देखा तो लगा की ये मैं कहाँ आ गई ?
इतना डिमोशन !!!!!!!
खैर !
लेकिन जब मैंने हिंदी काव्य और कथा साहित्य को गहराई से पढना शुरू किया तो मुझे लगा की मैं सही जगह आ गई हूँ |आज तक जो कुछ भी मेरे अन्दर अन्भिव्यक्त था उसे भाषा मिल रही थी |
यानि हिंदी तो मैं शुरू से ही थी लेकिन मेरे हिंदीपने को नाकारा जा रहा था |यहाँ हिंदी से मेरा तात्पर्य आत्मसंतोश्पूर्ण, समरसता पूर्ण मिली जुली भारतीयता से है जिसका प्रतिनिधत्व आम भारतीय जन आज भी करता है |हिंदी भाषा मेरे उस नकारे गए 'हिंदीपने' को सफलता से अभिव्यक्त कर पा रही थी |
मैं हिंदी भाषी हूँ ,यही मेरी पहचान है |हालाँकि आज मैं यह ही मानती हूँ की मेरे अन्दर अब कुछ ऐसा भी है जो शायद इंग्लिश में ही अभिव्यक्त हो सकता हो ,लकिन मेरा मूल आधार हिंदी का है और रहेगा |इससे आगे हिंदी प्रेमी होने और इन छोटे छोटे लेखों द्वारा हिंदी सेवी होने की ध्रिष्ट्ता को पाठक क्षमा करें |
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