बुधवार, 14 सितंबर 2016

sharing some inner thoughts

 हिंदी में एक विद्वान् हैं ,अरविन्द कुमार जी। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर हिंदी को एक विशालकाय थिसारस दिया है। उनके ब्लॉग पर एक दिन मैं पढ़ रही थी कि जब उनके दिमाग में यह आइडिया आया ,तो काफी समय गुजरने के बाद आखिर में उन्हें रियलाइज़ हुआ कि हिंदी में यह काम उनके हाथों होना नियत है। शायद भगवान  को यही मंजूर है। और उन्होंने यह काम स्वयं करने का बीड़ा उठाया। वे सफल भी हुए।
इसी तरह ,मैं सोचती हूँ की ,हिंदी साहित्य का पाठक बढे ;बेशक यह प्रेरणा मुझे हिंदी के एक और विद्वान् ,प्रो सुधीश पचौरी के लेखन से मिली ;पर अगर मेरे दिमाग में यह बात आयी है की यह काम हो सकता है  ,यह काम होना चाहिए ; तो इसके पीछे  जरूर कोई बात होगी। आखिरी क्यों यह बात सिर्फ मुझे समझ में आयी ?
आखिर क्यों कोई बात किसी को समझ में आती है , किसी को नहीं। जब शेखर कपूर अपने ट्वीट्स में कहते हैं की आप सिर्फ माध्यम हो ,किसी काम के पूरा होने के  या कोई प्रतिभा का मालिक नहीं होता ,वह सबकी होती है ,सबके लिए होती है;तो मैं सोचती हूँ कि इस तरह की बातें मुझे क्यों समझ में आती है। अगर मुझे समझ में आती हैं तो जरूर कोई कारन होगा।
सच कहूँ , आपको बोस्टिंग लग रही होगी , पर हकीकत में अपने इस समझने से मैं अब दुखी हो गयी हूँ। इस समझने ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। न मैं घर की रही ना बाहर की। पति ,घरवाले समझा समझा कर परेशान हो गए हैं।
"घर गृहस्थी में मन लगाओ। कुछ नहीं रखा इन बेकार की फिलॉसफिकल बातों में। दुनियादारी सीखो। "
कितना वक्त भी गुजर गया है। आखिर कब तक लगी रहूंगी। तो सोच -समझ कर मैंने डिसाइड किया की अपने आपको ३१दिसम्बर तक का वक्त देती हूँ। तब तक कुछ हुआ तो ठीक ,नहीं तो अलविदा। शब्दों की इस दुनिया से।
मैं जानती हूँ ,मेरा एक हिस्सा  आउट ऑफ़ वर्ल्ड है और वो हमेशा ऐसे ही रहेगा। पर मैं इतनी इम्प्रैक्टिक्ल भी नहीं हूँ। मुझे नहीं होना चाहिए।


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