बुधवार, 7 सितंबर 2016

मार्केज को पढ़ते हुए

हिंदुस्तान अख़बार में कई बार पीछे के पेज पर ऐसी फोटोस छपती है कि दो युवाओं ने हवा में विवाह रचाया ,या समुद्र में शादी की ,या रस्सी पर शादी की |ऐसी ख़बरें देखकर मैं सोचा करती थी कि ये फोरनर तो निरे पागल होते हैं ,भला यह भी कोई तरीका हुआ शादी करने का |
मार्केज की कहानी 'बर्फ पर जमी तुम्हारे लहू की लकीर ' पढ़कर मुझे अहसास हुआ कि वहां ऐसा लोग क्यों करते हैं |दरअसल वहां की सभ्यता का सर्वोच्च मूल्य है -व्यक्तिगत स्वातंत्रय |इसलिए वहां के लोग अपना साथी चुनने के लिए स्वतंत्र है |जब वे चुनेंगे ,तो एक्सपेरिमेंट भी करेंगे |वहां इन बातों  को कोई पागलपन नहीं मानता ,बल्कि खुश होते है |
इस कहानी में नेना और विली भी ऐसा ही करते है |पर कहानी में उनका ऐसा करना अजीब नहीं लगा ,क्योंकि इन किरदारों से लेखक ने जान-पहचान करा दी थी |वे फोरनर नहीं रहे थे |सच्ची बात है कोई चीज तभी तक फोरनर है ,जब तक ना जानो |
तभी यह अहसास भी हुआ की शादी से जुड़ा मेरा नजरिया दरअसल मेरे देश के जातीय बोध का हिस्सा था |इस तरह की घटनाओं का उनके साहित्य में आना ,उनके जातीय बोध का हिस्सा है |दो अलग तरह के बोधों के बीच एक किताब एक पुल का काम करती है |
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इसी तरह मार्केज की कहानी  'ठीक छह बजे रेस्टोरेंट के भीतर कदम रखती कोई स्त्री ' में मैंने पढ़ ही रखा था की मर्डर करने के बाद उस स्त्री को क्या डर सता रहा था की वह ' गन्दी ,अज्ञात शक्लों से पटे  पड़े अंडरवर्ल्ड ' में जा डूबी है |
अभी हाल में मैंने दीपिका पादुकोन का इंटरव्यू पढ़ा |उनसे पूछा था कि वे पूर्व प्रेमी रणबीर के साथ काम करने में सहज कैसे हो पाती हैं ?
दीपू ने कहा क्योंकि इंसान से जान -पहचान होना उसके प्रति सारे डर को ख़त्म कर देता है |आप जानते हो की ये कैसा है ?क्या है ?इससे बहुत आसानी हो जाती है | तो दीपिका के मंतव्य को समझने में मुझे देर नहीं लगी |
सचमुच मैं कहूँगी कि फिल्म इंडस्ट्री के ग्लैमर का यह तीखा नशा ही है ,और कुछ इन युवाओं का छोटी उम्र का जोश कि ये इतनी कम उम्र में ऐसे प्रेशर झेलने के लिए तैयार हो जाते है |वरना ऐसे प्रेशर झेलना कोई हंसी -खेल नहीं है |


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query -i have  1-2 people on face book ,to whose wall  i want to comment  also .but i can not ,coz it doesnt show ,coz their friend limit is over .what can i do ?

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