कैसी सुखद आश्चर्य की बात है ना कि जो बातें सब खुले में कहीं जा रही है, सबके सामने कही जा रही है, फिर भी उनमें से कुछ बातों का अर्थ कुछ ही लोग समझ पाते है।
विकास दिव्यकीर्ति ने जब अपने इंटरव्यू में कहा की यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी के दौरान उन्हें पढ़ने का सुख प्राप्त हुआ, तो यह बात मैं किस तरह लगभग- लगभग समझ गई।
एम ए -फाइनल ईयर की पढ़ाई के दौरान मैंने भी वैसा ही पढ़ने का असली मजा हासिल किया था। मैने बच्चों को भी कह रखा है कि अगर वे पढ़ने का मजा हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें कम से कम एमए तक की शिक्षा जरूर हासिल करनी चाहिए।
पढ़ने का मजा अर्थात परीक्षा की टेंशन से मुक्ति पाना। कैसे? टीचरों के अनुशासन और स्कूल की नियमित दिनचर्या के शासन से अलग, पहले ही दिमाग में एक क्लियर पिक्चर होना-
सिलेबस की
किताबों की
संभावित प्रश्नों की - यहाँ संभावित प्रश्नों से आशय नहीं कि कुंजी स्टाइल में गिने- चुने प्रश्नों को याद करना। इस बात से आशय ये है कि जब आप सिलेबस को पूरे मन से पढ़ कर तैयार करते हैं, तब आपको ये आइडिया अपने आप ही लग जाता की इस सिलेबस में से कौन कौन से प्रश्न बन सकते हैं। तब परीक्षा में ' कौन से प्रश्न कहीं से भी पूछ लिया जाएगा' का भूत अपने आप दिमाग से उतर जाता है ।
अपनी निजी अनुभव से प्राप्त इन महत्वपूर्ण बातों को , बाद में मैंने अपनी टीचिंग में भी शामिल किया था। अपने बच्चो को भी सिखाया। और धार्मिक शिक्षा शिविर में भी मैंने इन बातों का एप्लाई किया था।
आप कहोगे की क्या पहले जितनी भी शिक्षा प्राप्त की वहाँ क्या सिलेबस या किताबों का भी पता नहीं होता था? इतने मूर्ख थे क्या ?
तो यहाँ बात ना- पता होने की नहीं है, बल्कि बात है इन चीजों को कंट्रोल में लेने की।
पहले भी सारी बाते पता होती थी। लेकिन बहुत फर्क होता है रिक्शा में पीछे बैठ के चलना और रिक्शा में आगे बैठ कर चलने में । और ये फर्क ही होता है जब शिक्षा आपके लिए एक बोझ है , एक मजबूरी है। या फिर वह आनंद है।
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यहाँ तक बात हुई पढ़ने के विलक्षण आनंद की , जिसका स्वरूप केवल भोक्ता ही जानता है।
अब आगे बात करते हैं प्रकट और प्रकटीकरण की ।
पढ़ने का विलक्षण आनंद आपके भीतर प्रकट हुआ यह एक निजी बात है। बट दुनिया में इसका प्रकटीकरण किन तरीकों में होता है।
विकास दिव्यकीर्ति के संदर्भ में देखें, तो हम ये देखते हैं की वे कोई इस आनंद में विभोर होकर गीत नहीं गा रहे है , न ही वे इसका बखान करते फिर रहे हैं। उनके भीतर यह आनंद प्रकट हुआ और उन्होंने इसे अपने हृदय में ही छुपाकर रख लिया। फिर वह पढ़ाने के क्रम में उनकी उद्यमशीलता में प्रकट हुआ।
अपने संदर्भ में मैं ये कह सकती हूँ कि यह आनंद जैन शास्त्र पढ़नेे की तीव्र इच्छा के रूप में प्रकट हुआ।
आधुनिकता विषय पर सुधीश पचौरी का एक विस्तृत लेख है जिसमे वह शहर में हो रही एक गोष्ठी में एजाज़* का वक्तव्य सुनने के लिए लालयित हैं । और इसके मुख्य बिंदुओं को और अपनी आलोचना को उन्होंने उस लेख में समेटा है। अगर मैंने सही पहचाना है तो यह आनंद वही है। बट इनमें यह एक विकट बौद्धिक श्रमशील क्षमता के रूप में प्रकट हुआ है।
अगर मैं गलत नहीं हूँ तो सुशोभित में यह सोवियत पुस्तकों के अध्ययन के रूप में प्रकट हुआ है। और
मनीष सिंह में यह इतिहास के अध्ययन में प्रकट हुआ है। लेकिन उनमें इस आनंद का स्वरूप 'आनंदमय' नहीं है । पाठक उनकी पोस्ट बढ़कर इतिहास पढ़ने के आनंद से परिचित नहीं होता बल्कि उनकी प्रतिभा जितनी डाईसेक्टिंग मैनर में इतिहास पुरुषों की चीर फाड़ करती है तो वह कमजोर जिगर वालों के लिए तो खासा धक्का लगाने वाला होता है ।
व्यक्तित्व, क्षमता , परिस्थिति में यह अलग-अलग ढंग से दिखता है ।
हैरान हूं ।
*स्मृति के आधार पर
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