ऐसा सुनते थे कि पॉलिटिशियन्स होने के लिए गैंडे की खाल होनी चाहिए , तभी आप सर्वाइव करते हो ।
विरोधियों के प्रहार का तो पता नहीं , बट लोगों की दर्दनाक बातें देखकर ये अवश्य लगता है कि उनका दिल भी जरूर गैंडे की खाल जैसा अति कड़ा होना चाहिए, नहीं तो आप कैसे सर्वाइव करते हो ।
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ब्रूटल आलोचना के समय में लोग कह देते हैं , एक्टिंग है । मैं कहती हूं आप भी कर लो । कम से कम लोगों का दर्द तो सुना जाएगा ।
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बेरोजगारी वाकई में भारत भर की कितनी बड़ी समस्या है , लेकिन इसके समाधान का कोई सिलसिलेवार सामूहिक चिंतन-प्रयास नही है ।
# राहुल गांधी जी के विडियोज़
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उपर्युक्त विडियो की मल्टीलेयर आलोचना -
आम आलोचना - भईया ! जो जिसकी समस्या है , वो उसकी समस्या है ।
पुरूष आलोचना (निन्दा -चुगली टाइप) - हाँ ! सब पता है । डाॅलर मे कमाणा चांवें सब ।
स्त्री आलोचना (निन्दा -चुगली टाइप) - सारी नए सूट पहन री थी ।राहुल जी से मिलने के उपलक्ष्य में ।
ब्रूटल स्त्री-पुरुष आलोचना (निन्दा -चुगली टाइप) - जब नही पलते तो इतने बालक पैदा करने जरूरी हैं ।
वस्तुवादी आलोचना - भारत मे समस्यायों को ऑब्जेक्टिवली देखने की व्यवस्था ही नही है ।
दार्शनिक आलोचना - (मुझे इस पर श्रद्धा है ) - जो जहर इंसानों के जीवन को महान दुखों से भर देता है , उसका नाम है - अनंत लोभ ।
इन्सानों का एकमात्र कर्तव्य है कि वे इससे छुटकारा पाएं ।
वस्तुवादी दार्शनिक आलोचना (matter of truth ) - अज्ञानता सबसे बड़ा पाप है ।
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ब्रूटल आलोचना दर्दनाक होने पर भी अंततः शुभ वस्तु है । क्योंकि इसमें अज्ञान को खत्म करने की शक्ति है ।
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