संत के लिए दो उपमा आती हैं -नवनीतादपि कोमल ,वज्रादपि कठोर ।
जबकि कोमल पक्ष की जयकार है , कठोर पक्ष की गम्भीरता की सर्वत्र उपेक्षा है ।
यही संसार है ।
गुरुदेव सेठ जी महाराज अपने भाई और गुरुभाई की जाती हुई अर्थी को देखने के लिए भी नही उठे थे । ये दोनो सगे भाई भी थे और एक ही गुरु के पास दीक्षित होने के कारण गुरुभाई भी थे ।76 साल का साथ था ।
हैं न रोंगटे खड़े करने वाली बात।
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ज्ञान के प्रति समर्पण ऐसी ही चीज है ।
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हम तो क्या खाकर उन जैसा होने की सोच सकते हैं । पर इस आदर्श की सम्यकता को झुठला दें , यह गलत है ।
Ps : मुझे तो ऐसी बातें लिखते हुए भी डर लगता है । कहीं मैं ज्यादा ज्ञान तो नही झाड रही । लेकिन यह ठीक भी है कि आप पक्के तौर पर मेरे अलगपने को जान लो ।
दफा कर दो मुझे । I ll be most happy .🙂
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