आत्मसंशय ,आत्मधिक्कार ,सद् मूल्यों पे अविश्वास , अपने पर ही अविश्वास- ये सब झेलते है आप जब आपका पाला एक रुग्ण किस्म की धृष्टता से पडता है ।
मै तो कब की खत्म हो जाती अगर मुझे गुरू और महावीर वाणी की शरण न मिलती तो ।
मै यूं ही नाम नही लेती हूं । उनकी कृपा को मैने हर कदम पर महसूस किया है ।
उन्हीं की कृपा से अब मेरे लिए सब ऋतुएं एक सी आनन्ददायी हो गई हैं ।
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हिन्दी मे जब कोई कहते हैं -गैस लाइटिंग, टॉक्सिक बिहेवियर , तो सुनकर हँसी आ जाती है ।मन मे कहती हूं - ये जानते ही क्या हैं ।
बट ! ठीक है ।सब की अपनी अपनी यात्रा है ।मंजिल के एक पडाव को पार करने वाला ,चलते हुओं को तो जज नही करता ।
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मैं भी चल ही रही हूं ।
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