मंगलवार, 25 जुलाई 2023

 प्रसंगवश एक अवांतर चर्चा-

प्रिय पाठक! इन  पंक्तियों की लेखिका ने जैन आगमों का अध्ययन किया है इसलिए अपनी समझ के आधार पर मैं श्रद्धालु और अ-श्रद्धालू के द्वैत पर विचार प्रस्तुत कर रही हूं ।

यह दर्शनशास्त्र की बहुत शक्तिशाली और पेचीदा पहेली है ।

मै कभी इस प्रश्न के बारे मे अवेयर नही थी।

पहले पहल मैने यह चर्चा मजूमदार की किताब मे पढ़ी  थी ।शाहजहां के पुत्र दारा शिकोह संतो के साथ सोहबत मे इस बात की बौद्धिक पडताल कर रहे हैं। 

इस्लामी दर्शन एकेश्वरवाद को मानता है । अल्लाह एक है और उसी ने सबको बनाया है तो फिर प्रश्न उठता है काफिर (अ-श्रद्धालू) को किसने बनाया ?

इस प्रश्न से शुरू होकर आगे  एक कठोर बौद्धिक प्रक्रिया बताई गई है , जिसका अन्ततः यह निष्कर्ष निकलता है -

सच्चा विश्वासी वह अविश्वासी है जो ईश्वर को प्राप्त हो गया है ।जिसने उसका दर्शन प्राप्त कर लिया है , जिसे उसका ज्ञान है।

अविश्वासी वह है जो विश्वासी ( ईमानदार)है जो ईश्वर को प्राप्त नही है ।जिसने उसका दर्शन प्राप्त नही किया है , जिसे उसका ज्ञान नही है।

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जैन आगम मे यह पहेली कैसे सुलझाई गई है , इसकी बानगी देखिए। जैन दर्शन का आधार है- आत्मा की स्वतन्त्रता । 

आचारांग के पहले श्रुतस्कंध के पांचवें अध्ययन 'लोकसार' के पाँचवे उद्देशक में कुछ सूत्र आए हैं,  जिन्हे  हम इस पहेली के निष्कर्ष मान सकते हैं ।मूल भाषा प्राकृत है । उनकी हिन्दी इस प्रकार है ।

4  - श्रद्धालुओं में सम्यक अनुज्ञा में सम्प्रवर्जित -

सम्यक मानते हुए एकदा सम्यक होता है ।

असम्यक मानते हुए एकदा असम्यक होता है ।

असम्यक मानते हुए एकदा सम्यक होता है।

सम्यक मानते हुए एकदा असम्यक होता है।

5- सम्यक मानने वाले को सम्यक अथवा असम्यक अथवा सम्यक होती है उत्प्रेक्षा

 6 -असम्यक मानने वाले को सम्यक अथवा असम्यक अथवा असम्यक होती है उत्प्रेक्षा

पाठक इस चर्चा से क्या निष्कर्ष निकालेंगे , यह मै उन पर छोड़ती हूं ।

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यह विषय मुझे प्रिय है इसलिए मैने थोड़ा-बहुत लिख दिया अन्यथा मौन रहना सर्वोत्तम सुखद है ।




 

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