आचारांग (दिसम्बर 2020) पढने के बाद पृथ्वी , जल आदि के प्रति सचेत भाव बढ़ा है । पहले नही था ।
कहने का अर्थ यह है पहले विचार के तौर पर तो था मगर हमे आचरण मे ढ़ालना है , बल्कि आचार को इस तरह चुनाव करना है कि यह विचार सामने रहे , यह सचेतनता बिल्कुल नही थी ।
शुरुआत मे तो मन की आकांक्षाए ऊंची थी । ब्रांड बनाएंगे टाइप
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अब मन के वे अंहकार मन्द पड़ गए हैं । अच्छी बात है । यही गुरु कृपा की बात है । 😊
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