मुझे लगता है , मै हमेशा से एक खुशमिजाज, मनमस्त बच्ची रही हूं ।मुझे सिर्फ एक ही टेन्शन रही है कि जिन लोगों ने मुझ पर भरोसा किया है ,वे निराश न हो ।
शायद यही कारण है कि बाद मे मै संत -धारा से जुड़ी।क्योंकि यह भी तो एक प्रसन्नता की बृहत्तर धारा है । वैराग्य को लोग नेगेटिव सेन्स मे समझते है ।
कुछ दुख होगा , जो उधर गए।
कुछ अभाव होगा ।इत्यादि
बहुत हद तक तो इन बातों मे सच्चाई भी है । आखिर बहुजन-समर्थित राग रंग रंजित संसार मार्ग को छोड़कर कोई यूं ही तो नही आ जाएगा ,एक रूखे -सूखे मार्ग पर ।क्या लड्डू -पेड़े बँट रहे है यहाँ ।
मै कहती भी थी यह बात कि इस मार्ग पर आने के लिए संसार का विकर्षन नही , मार्ग का आकर्षण होना चाहिए।
और देखिए! जिन खोजा , तिन पाइयां । मुझे गुरूदेव मिल गए।
-कल सुशोभित की पोस्ट पढ़कर
...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें