मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023

जब एक पूर्ण विश्वसनीय मार्ग पर धीरे धीरे चलकर , अपने हर भय का सामना करते हुए हम इस ज्ञान तक पहुँचे हैं कि पृथ्वी,  जल आदि मे जीवन है ,

तब मनुष्य के रूप मे हमारी महत्वाकांक्षाओं की सारहीनता बड़ी प्रत्यक्ष हो जाती है ।

मन की गति ऑटोमेटिकली स्लो हो जाती है । 

खुद को प्रूव करने का अंहकार भी मंदा पड़ जाता है । (और कितना प्रूव करें । कितने सफल होवें ! )

मुझे तो गुरुदेवों ने और महावीर वाणी ने बचा लिया !

(अरे !असली कार्य तो इनकी रक्षा का है । वह तो अपनी सीमा मे हम कर ही रहे हैं , जैसा हमारा आज का जीवन है ।फिर क्या घबराना !

एक कार्य विमर्श का है । वह भी जैसे तैसे चल ही रहा है ।)

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बाकी हम रूक नही गए हैं । हम चल रहे हैं । अपना काम , अपनी स्पीड मे कर रहे हैं ।

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देखते है आगे क्या दिशा रहती है ।

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