जब एक पूर्ण विश्वसनीय मार्ग पर धीरे धीरे चलकर , अपने हर भय का सामना करते हुए हम इस ज्ञान तक पहुँचे हैं कि पृथ्वी, जल आदि मे जीवन है ,
तब मनुष्य के रूप मे हमारी महत्वाकांक्षाओं की सारहीनता बड़ी प्रत्यक्ष हो जाती है ।
मन की गति ऑटोमेटिकली स्लो हो जाती है ।
खुद को प्रूव करने का अंहकार भी मंदा पड़ जाता है । (और कितना प्रूव करें । कितने सफल होवें ! )
मुझे तो गुरुदेवों ने और महावीर वाणी ने बचा लिया !
(अरे !असली कार्य तो इनकी रक्षा का है । वह तो अपनी सीमा मे हम कर ही रहे हैं , जैसा हमारा आज का जीवन है ।फिर क्या घबराना !
एक कार्य विमर्श का है । वह भी जैसे तैसे चल ही रहा है ।)
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बाकी हम रूक नही गए हैं । हम चल रहे हैं । अपना काम , अपनी स्पीड मे कर रहे हैं ।
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देखते है आगे क्या दिशा रहती है ।
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