रचनात्मक कला का यह गुण होता है कि इसके आस्वाद के भीतर में सम्मोहन, विस्मय, आह्लाद , चमत्कृति का भाव पैदा होता है।
हाय! मैं तो देखकर , खड़ी की खड़ी रह गई/गया टाइप ।
चाहे कोई गीत हो, नृत्य हो, मूर्ति हो या लेखन। सुशोभित की नव-वधु पोस्ट ऐसी ही थी । आजकल इंडिया में तो क्रान्ति आई हुई है । इतना कन्टेन्ट बनाया जा रहा है , लिखा जा रहा है ,फैशन इंडस्ट्री में ।बेहिसाब ।
बहुत साल पहले की बात है । मसूरी के माल रोड पे, चौंक पर हमने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वालों स्त्री- पुरुषों की मूर्तियां लगी देखी थी । ।आम स्त्री-पुरुषों की । एक या दो स्त्री है और कुछ पुरुष हैं । वे हँस रहे हैं , खिलखिला रहे हैं।ऐसा लगता था कि वे अपनी पार्थिव देह के भीतर किसी अपार्थिव आनन्द का अनुभव कर रहे हैं । (इन्टरनेट पे मिल जाएगी )
बहुत ही अच्छा महसूस हुआ था उन्हें देखकर।
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पहले मै आश्चर्यचकित होती थी ,पेन्टिंग वगैरह की ऊंची कीमतें पढ़कर।
पर अब मुझे आश्चर्य नही होता । पेन्टिंग में दिखाया गया कोई रूप संयोजन किसी इन्सान के लिए उसकी भाव -अवस्था का बोध कराने का चिन्ह है । यह एक आश्वासन भी है कि उस तरह फील करने वाला , वह अकेला नहीं है ।
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रवीश सर का भोजपुरी गानों पर विडिओ अच्छा लगा।
मुझे इस तरह का कन्टेन्ट शायद इसलिए पसंद आता है कि मैने कस्बा लाइफ के बाद ,शहरी जिन्दगी से होते हुए , धर्म-दर्शन के परिचय की वजह से एक मुकम्मल भाव यात्रा सम्पन्न की है । इसलिए विभिन्न भाव बोध की गहराई को मै समझ पाती हूं ।
शायद कुछ लिखूं । अभी तो मेरा मन मुरझाया हुआ है ।
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