रविवार, 4 फ़रवरी 2024

 श्रेष्ठ रचनात्मक कला का यह एक अनिवार्य प्रकार्य मैंने देखा है की वह आस्वादी के भीतर कुछ बदल देता है। बेशक फौरी तौर पर वह स्वयं उस तरह की रचना न कर सके, पर धीरे -धीरे परिपक्वता पूर्ण होने पर वह स्वयं भी इस तरह की रचना करने के काबिल बन जाता है।

 खुद मेरे साथ यह हुआ है । अब तक , तीन बार।  सुधा अरोड़ा जी की  कहानी है-  औरत : तीन बटा चार । यह कहानी मैंने कई बार पढ़ी है । पढ़ी,पढ़ी, पढ़ी । पता नही क्या ट्रिगर हुआ । पोशाक कहानी क्लिक हो गई।  

जैन आगम 'उववाई ' के ' रिच' भावपूर्ण वर्णन पढ़ते हुए मुझे नाते मे बड़ी बहन की शादी के मंजर याद हो आए थे । मैने उन्हे एक कहानी मे लिखने की कोशिश की थी । बट सही फार्म नही मिली थी । 

ऐसा होता है ना!  कि लाइफ मे एक मोमेंट पर आपने बातों को कैसे समझा-जिया , बाद मे परिवर्तित जानकारी मे उन पिछली बातों का भी स्वाद बदल गया ।तो चीजे काम्प्लेक्स हो गई। बट फिर भी आप पाते हो कि उस पिछले समय मे जिस तरह बाते देखी थी , उनका मजा विलक्षण था ।

तीसरी बार ऐसा हुआ। मैं पत्रकार रवीश कुमार* के एफबी को फॉलो करती हूँ। उन्होने अपनी टाइमलाइन पर सॉन्ग शेयर किया था ।यह  एक अंग्रेजी गाने का लिंक था। वह गाना था- फ़िल्म साउन्ड ऑफ म्यूजिक का दीज़ आर् माई फ्यू फ़ेवरेट थिंग्स। इस गाने की एनर्जी इतनी जीवंत और तुरंत फैलने वाली थी कि मेरा मन बहुत खुश हो गया था। इस गाने की वजह से, मैं भी अपने बचपन में पहुँच गई थी।

बाद में मैंने उसे एक कहानी में ढालने की कोशिश की, पर वह बात नहीं बन पा रही थी। फिर वही समस्या।  मनचाही फॉर्म नहीं मिल रही थी। मुझे लगता है , अब जाकर वह समस्या सॉल्व हुई है। देखो ! आगे क्या सामने आता है।

 *  लेखन में प्रसिद्ध लोगों का जिक्र करना अनुकूलता -प्रतिकूलता के पैमाने पर देखा जाता है।

अनुकूलता है तो, यह बात प्रसन्नता की लगती है।

प्रतिकूलता है तो , यह बात 'हमारी प्रसिद्धि में जबरन शेयर लेना चाह रहे हैं ' इस टाइप से निकल कर आती है। 

मैं इस बात को तथ्य के तौर पर दर्ज करती हूँ। और इस तथ्य के द्वारा रचनात्मक अनुभव की प्रक्रिया पर भी कुछ रौशनी डल जाती है।

यहाँ ब्लाग पर प्राइवेटली इस बात को इस तरह लिखने में तो मुझे लगता है कि यह दोष नहीं लगेगा। अगर कभी इस बात को प्रकाशन में कहने का अवसर आया तो फिर यह बात कैसे कही जाएगी,  जब की तब देखेंगे ।

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