यह सही है कि मुझे आत्मज्ञान संबंधी चर्चा मे संतोष मिलता है ।इस दिशा मे अन्य की रूचि और प्रगति देखकर वास्तव मे मुझे आनन्द मिलता है ।
मेरी स्वयं की धारणा जैन विज्ञप्ति अनुसार स्थिर हो गई है । वर्तमान मे मै श्रावक धर्म पे यथाशक्ति* अनुसार चल रही हूं । इससे आगे प्रगति की संभावना यही है कि मै अपने व्रतों मे और शुद्धता लाऊं ।
बस।
.....
मोस्टली मै मन की प्रेरणा से ही कार्य कर पाती हूं ।
प्राकृत गोष्ठी पिछले साल हमारे यहां रोहिणी मे ही गुरूदेव के सानिध्य मे हुई थी । तब मै जुड़ नही पाई थी । पहले असमंजस रहा ,कि क्या बौद्धिक तरीकों से इस तरह की चर्चा को समझा जा सकता है ।
बाद मे कुछ मन हुआ तो , व्यवस्थाएं बन चुकी थी । उनमे परिवर्तन संभव नही था ।
अब मेरी धारणा यह है कि बौद्धिक गतिविधियां प्रज्ञा पर जमी धूल को हटाने का काम करती हैं । बाकी तो जिसने जो ग्रहण करना है , वह व्यक्तिगत ही होता है ।
तो इस तरह अब मै इस गतिविधि से जुड़ी।
यहां भी कुछ पक्का नही है । मुझे मन से सही लगेगा तो मै जुड़ूंगी । समय की उपलब्धता की बातें भी होती है । एटसेटरा
...
*यह लिखना अति आवश्यक है । क्योंकि भारत देश मे दूसरों के आचरण में छेद ढूंढने वाले भरे पडे हैं ।
सही बात है । आचार पालन की कोई अंतिम सीमा भी नही है ।
इसलिए हमने तो पहले ही अपनी शक्ति की सीमा को स्वीकार करते हुए,यथाशक्ति, कह दिया है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें