मैने 'मेरे धार्मिक विमर्श 'नाम से दो पोस्ट लिखी है । ये पोस्ट उन बौद्धिक असमंजसों के शमन को दिखाती हैं ,जो महावीर वाणी पढ़ने के दौरान हुए।
मै लिखने लगूं , तो ऐसी सैकड़ो बातें निकल आएंगी ।
बात बौद्धिक सुलझाव की है ,बट उससे पहले श्रद्धा की भी है ,जिसका स्रोत गुरु हैं ।
साथ ही स्वयं के यथाशक्ति तदनुसार आचरण की भी है । शायद तभी वह चित्त विश्रान्ति प्रकट होती है , जिसके बाद कुछ पाने की दौड़ मंद पड़ जाती है ।
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