यह दिन एक जरूरी मुद्दे के विभिन्न पहलुओं पर चिंतन करते हुए बीता | गोवा फेस्टिवल में कश्मीर फ़ाइल्स को ज्यूरी के एक सदस्य ने प्रोपेगेंडा और वल्गर फिल्म कहा था | 28. 11 .22 को एफबी पर मनीष सिंह की एक पोस्ट पढ़ी थी -पल्लवी जोशी पर |इस मुद्दे पर यह एक टिप्पणी थी , उनके अपने अंदाज मे | फिर अगले दिन डाॅ कुमार विश्वास की एफबी पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पोस्ट पढ़ी | इस पोस्ट ने मुझे इस मुद्दे पर सोचने को प्रेरित किया |
इस फिल्म के मुद्दे ,टारगेट ऑडियंस ,फिर उसके बाद राजनीति के शीर्ष के लोगों द्वारा इसका प्रोत्साहन : यह तो चलो है ही |इस पर मुझे कुछ नहीं कहना | यह फिल्म कमर्शियल भी सफल हुई है |यह अवश्य सोचने की बात है |
क्या यह फिल्म की अपनी अपील की वजह से हुआ ? लगता तो है |
आलोचना के कौन से सिद्धांत के द्वारा इस फिल्म की सफलता की जांच की जाए ? साहित्य और फिल्म का मीडिया अलग होता है |फिर भी मुझे लगता है कि भाव को समझने के नियम वही होते हैं |
क्लीयरली यह भाव परिष्कार तो नहीं है |फिर क्या इसे पाश्चात्य काव्य सिद्धांत- विरेचन के प्रोसेस से समझा जाए ?
क्या विराट जनरूचि को इस तरह नियंत्रित किया जा सकता है ? वैसे भक्त तो इस मामले में अति उत्साहित ,अति आत्मविश्वास से लबरेज नजर आते हैं |हर फिल्म को बायकॉट करते दिखते हैं |लेकिन यह सच नहीं है |अगर होता तो मोदी जी पर बनी फिल्में भी चलती |
इन सब बातों ने मुझे सहृदय कौन है ? इस प्रश्न पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया | इसकी काव्य रुचि किस प्रकार की होती है ?इस प्रकार की काव्य रूचि की विशेषता क्या है |क्या यह एक विशिष्ट आर्थिक वर्ग से संबंध रखता है ?आदि आदि |
बहुत देर तक काव्य सिद्धांतों पर लिखे लेख पढ़ती रही |प्राचीन काव्य सिद्धांतों में इसे एक काव्य रसिक , काव्य का ज्ञाता ,तदनुरूप अनुभूति को भावित करने वाला "समान हृदय " का कहा गया है |आलोचना पत्रिका में प्रकाशित काव्य निर्णय पर एक लंबा लेख पढ़ा | उसमें तो कुछ ज्यादा पल्ले नहीं पड़ा | इस तरह यह दिन ऐसे ही बिना किसी समाधान के गुजरा |इस संबंध में मेरी अपनी भी एक दृष्टि है | यह आलोचना का एक गंभीर विषय है | जिनकी रूचि हो उन्हें भी इस विषय पर उन्मुख होना चाहिए |
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