रविवार, 18 दिसंबर 2022

lit -song - ये नयन डरे डरे

https://fb.watch/hpgjxnRSBo/?mibextid=92R6eh 

 मुझे मालूम नहीं कि मैं यहां साहित्य की एक नई विधा का आगाज कर रही हूं या नहीं | किसी को पसंद आएगा या नहीं |पर मैंने ऐसे फील किया है इसलिए मैं लिख रही हूं  |

एफबी पर स्क्रोल करना तो अब हम सब की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है | कभी मतलब से तो, कभी बेमतलब | AI भी हमारी पसंद के रील्स , वीडियोस , सर्च रिजल्ट दिखाता रहता है |ऐसे ही यह गाना मेरी नजर में आया |मैं देखने लगी और मेरी कल्पना सक्रिय हो गई |

यह सत्यजीत रे की फिल्म चारुलता है  |यह फिल्म रविंद्रनाथ की कहानी नष्टनीड़  पर आधारित है |गाना लता मंगेशकर ने गाया है |यह गाना इस फिल्म का नहीं है |मूल फिल्म कोहरा ,संगीत हेमत कुमार है |यहाँ इनकी मिक्सिंग की गई है |

साहित्य और कलाओं के लिए क्लासिक -यह एक शब्द चलता है |कालजयी | विचित्र बात है न | काल के आगे जब मनुष्य भी नश्वर है तब मनुष्य द्वारा रचित कल्पनाएं कालजयी  होने का दर्जा पा लेती हैं |

मैंने यह फिल्म नहीं देखी |नष्टनीड  कहानी पढ़ी होगी पर अब याद नहीं  |फिर किसके पास समय है रविंद्र नाथ के धीर, गंभीर, कोमल मन स्त्री- पुरुष पात्रों की संवेदनाएं समझने का |वे सब हमारे समय से कितना पीछे छूट गए हैं| इस तरह इस गाने में दिखाए गए स्त्री पुरुष को मैंने स्वतंत्र रूप से देखा |उनके कथा संदर्भ से अलग |लता मंगेशकर की आवाज और गाने के बोल ने मुझे बांध लिया और मैंने अपनी कल्पना में यह रच दिया |

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 दो जन है |एक स्त्री  है  | एक पुरुष है |उनके चारों और समृद्धि ऐसे बिखरी है जैसे शरद ऋतु की चांदनी पूरे जगत में बिखरी रहती है |उन्हें परवाह ही नहीं है | उनके विरक्त हृदयों  के लिए यह समुद्र किनारे की रेत की भांति निःसार  ,रसहीन है|

स्त्री अबोध है , अनजान है |दुनिया की सैकड़ों ,हजारों, लाखों ,करोड़ों बातों का उसे कुछ भी ज्ञान नहीं | वह बस एक बात जानती है -मुझे पुरुष के साथ रहना  है |जैसे ये रहे ,जैसे ये कहें |

 पुरुष ज्ञानी है |दुनिया की सैकड़ों, हजारों ,लाखों, करोड़ों बातों का उसे ज्ञान है |वह चाहता है बंधनों से  निकलना पर अभी स्त्री के बंधन में हैं |वह अनुसंधानरत है कि संसार से मुक्ति का मार्ग इसके लिए भी बने| वह दिन-रात इसी उधेड़बुन में है |

स्त्री का रागी -वैरागी मन - आधा  संसार के आकर्षण में  ,आधा प्रिय की उधेड़बुन में |वह कहती कुछ नहीं| गूंगी बनी रहती है |मन की कल्पना को मन ही मन इस गाने में पिरो रही है |

ps - दो दिन लग गए मुझे इससे बाहर निकलने में| दुनिया में बहुत से नशे और नशे के प्रभाव पर बातें होती हैं  |मैं कहती हूं संगीत भी एक नशा है | कभी ना कभी इस पर भी पुस्तकें अवश्य लिखी जाएंगी कि इस नशे से बाहर कैसे आए| 

ps -2  you know , sometimes we are caught in situations like silence means not responding,responding means conflict of mind -what to respond .........then u choose to pause ......unable to control ur anger  .....and yet knowing  the inevitability of such situations.....and knowing ......we are all fighting the same thing.....knowingly or unknowingly. 

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