शास्त्र में ही इतने बेशुमार विषय हैं कि 3-4-5 जीवन भी कम पड़ जायेंगे समझने के लिए, फिर कहां फुर्सत है कुछ और सोचने के लिए।
मेरा समय तो ऐसे ही व्यतीत होता है ।यह सुख है ।
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