पहले - पहल देखने पर 12th फेल फैमिली के पात्र संदिग्ध लगते हैं। " ऐसा हो ही नहीं सकता कि इतने कठोर संघर्षों से गुजरते हुए लोग आपस में प्रेमपूर्ण रह जाएं । बहुधा तो वे आपस में ही कटखाने हो जाते हैं " -दिमाग सोचता है। ऐसा सोचना गलत भी नहीं है क्योंकि ऐसी फ़िल्में भी हैं, जिनमें लगभग ऐसी ही परिस्थितियों में फैमिली वैल्यूज डीकंस्ट्रक्ट हो चुकी हैं।
दर्शक के सोचने से कुछ नहीं होता। उसे तो देखना है और देखते हुए यकीन करना है। फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ती है तो एहसास होता है कि केवल पिता ही नहीं, दादी भी, माँ भी अपने-अपने ढंग के आदर्शवादी है। बल्कि आदर्शवाद इस फैमिली की परंपरा में रहा है। इनके दादा ने भी देश के लिए जान दी थी।( सूचना)
देखने की दृष्टियाँ हो सकती हैं और कोई इन पात्रो की वैल्यूज को थोथा आदर्शवाद , माँ के जीवन की फेमिनिस्ट दृष्टि से व्याख्या इत्यादि, कर सकता है। अपनी जगह वे भी गलत नहीं क्योंकि आखिरी बात इंसान के चुनाव की स्वतंत्रता की होती है।
मनोज के पास चुनाव नहीं है। वह जिस जगह पर, और जैसे लोगों में पैदा हो गया है, उसने अपने घर में जैसा माहौल देखा है, उसे तो उसके बीच में से ही अपनी राह निकालनी है। उसके पास एक ही पूंजी है - आदर्शवादी मूल्यों की पूंजी। पर इस पूंजी का वह करे क्या?, जो आत्मा को धनवान/ समृद्ध बनाने में तो सक्षम है पर बाहर दुनिया में इसके बल पर कुछ रुपए कमा पाना भी कितना कठिन है। वे दोनों भाई तो ड्राइवर - कंडक्टर बनकर भी खुश थे। पर व्यवस्था में मेहनत की सूखी रोटी पर भी दुष्टों की नजर लगी है। इसलिए मनोज परेशान -अवाक् है और यह एक्स्प्रेशन पूरी फ़िल्म में 'थ्रूआउट' उसके चेहरे पर चिपका हुआ है।
पहले पात्रो की असाधारणता को देख लेते हैं। पिताजी की 'तेजी' तो साधारण नहीं है। बताओ! उसे चप्पल मार आए । दादी के तेवर भी बाहुबली की शिवगामिनी से कम नहीं है। घर में ऐसे तूफानी किरदारों के बीच माँ की सहनशीलता और घर को चलाए रखने की चिंता ने घर को संभाला हुआ है । वह इस घर का न्यूक्लियस है। बड़ा भाई भी तेवरों में अपने खानदान पर गया है, पर घर चलाने की चिंता में अपनी गऊ माँ का बैलबुद्धि पुत्र प्रतीत होता है। कन्या जो मात्र एक बार ही दिखी है पूरी फ़िल्म में, एक स्नेह शील बहन एवं बेटी है। उसके हृदय में एक बार भी यह अविश्वास नहीं उभरता कि मनोज शहर में पढ़ लिखकर वहीं का हो रहेगा और वे गरीबी में धंसे रह जाएंगे। "घर का तेज लड़का शहर जाकर बदल गया" - यह कॉन्सेप्ट 70- 80 की फिल्मों में बड़ा पॉपुलर था।
बदलते हुए जमाने के तमाम विचलनों के बावजूद भारतीय संदर्भ में ऐसे पारिवारिक मूल्यों वाले लोग होना अभी भी नॉर्मल है। ऐसे लोग मानो असल जीवन में बताये गये किसी आदर्श का किरदार निभा रहे होते हैं। सुनने में ये बात विचित्र है। पर यह सच है। पाठक इस बात के सच को अपने अनुभवों में टटोलकर देखेंगे तो इस बात का प्रमाण वे स्वयं पा लेंगे।
ऐसे लोग किसी आदर्श की साधना में रत , अनवरत एक आचार व्यवस्था में जीते हैं। पति- पत्नी, माता- पिता, भाई- बहन, रिश्ते नातेदार की बनी आचार प्रणालियाँ, वफादारी, काम का विभाजन,समय की पाबन्दी , जल्दी उठना, मेहनत करना इत्यादि। गृहस्थों की यह आचार व्यवस्था, साधुओं की आचार व्यवस्था की अनुगामी है,जो चरित्र पालन के आधार पर चलती है।
भारत की भूमि पर मनुष्य जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में मोक्ष प्राप्ति का लक्ष्य सदियों से /अनंत काल से गड़ा हुआ है । तमाम धार्मिक परम्पराएं, विधि -विधान इसी के इर्द गिर्द बसे हुए है।
साधुओं की आचार व्यवस्था इस अनुत्तर लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है। इस व्यवस्था के अनुसार गृहस्थ जीवन भी मर्यादित रूप में इसे अनुत्तर लक्ष्य की ओर होना चाहिए।
बदलते हुए जमाने में, यह लक्ष्य शिफ्ट हो चुका है। जिस विपुल चारित्र बल का उपयोग मोक्ष प्राप्ति था, वह साधारण सांसारिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में उपयोग हो रहा है। यह समय और बदलते हुए जमाने पर आक्षेप नहीं है, बल्कि एक वस्तुपरक आलोचना है। (शब्द व्युत्पत्ति - लुच् धातु - अर्थ देखना)।
चान्स की बात है कि मनोज का इंटरव्यू निकल गया । पांडे जैसे दोस्तों के अनुभव अपनी जगह सही हो सकते हैं , मनोज को श्रद्धा का मिलना भी तो हकीकत है ।
देखने में मनोज लल्लू लगता है। शक्ल तो जैसी है वैसी है। सबके आगे ' हाँ जी भैया ,हाँ जी भैया ' करता हुआ, कुछ भी काम करने को तैयार इत्यादि। पर उसकी समझ वस्तुनिष्ठ है। पांडे द्वारा गलत फ़ोन करने के प्रसंग में वह पहले श्रद्धा के फ़ोन पर उसकी कॉल चेक करता है,पाण्डे की शुरुआती सहृदयता को वह कभी नहीं भूलता इत्यादि उसके व्यक्तित्व के पहलू है, जो उसे विशिष्ट बनाते हैं।
( यहीं तक लिखा गया है मुझसे । पता नही क्या हो रहा है । लिखते लिखते interest loose कर देती हूं . Don't know )
वैसे इससे आगे मैं- राहुल गाँधी जी के विडिओ-1, का यह हिस्सा जोडना चाहूंगी-
इस वीडियो में वे माॅरिस नगर, दिल्ली के ias aspirants से बातचीत कर रहे हैं । भारत की शिक्षा प्रणाली की यह खामी है वह अधिकांश बच्चों को टाॅप पाँच जॉब का लक्ष्य देती है । जो उनमे सफल हैं , वे सफल हो जाते हैं। बाकी असफल मान लिए जाते हैं ।
यही मुद्दा वे छात्रों के आगे रख रहे हैं । छात्रों के जवाब और राहुल गांधी जी के प्रतिप्रश्नों (counter question )से इस मुददे से जुड़े कई दिलचस्प पहलू दर्शकों के सामने खुलते हैं ।
आपने यह कैरियर क्यों चुना ? जवाब में अधिकांश छात्रों का जवाब था । इस नौकरी में इज्जत है , पैसा है ।
चलो! यहां तक तो ठीक है। मां -बाप अपने बच्चों के उत्कृष्ट भविष्य की सोचते है । प्रशासनिक सेवा का कैरियर सर्वोत्तम माना जाता है ।अगर ये छात्र मां-बाप या समाज के दवाब में भी आ गए तो यह कोई बुरी बात नहीं है।
बैकअप क्या ? अगर यहां सफल नहीं हुए तो आपका बैकअप क्या है ।आपका प्लान बी क्या है? पूछने पर सब चुप थे । एक छात्र ने कहा कि प्लान बी बनाना ही नहीं है ।
बस यही मुद्दा इस बातचीत का मुख्य मुद्दा है । अगर हम ias coaching कराने वालों या मोटिवेशनल स्पीच देने वालों के व्याख्यान सुने तो वे एकलक्ष्ता, फोकस रहना, एकाग्रता को सफल होने का मंत्र बताते हैं । अगर जीवन में सफल होना है तो प्लान बी ना बनाओ । इससे तुम्हारे प्रयास की एक निष्ठता टूटेगी । विकल्पों मे फँसकर तुम्हारे मन की एकाग्रता खंडित हो जाएगी।
मन की शक्ति को केंद्रित करने की यह बातें अपनी जगह सही हो सकती हैं। लेकिन इनसे परिक्षा का गणित तो नहीं बदल जाएगा । अगर 500 सीटों के लिए 10,000 बच्चे आ रहे हैं तो 9500 का असफल होना निश्चित है। तब वे क्यों जीवन भर अपने आपको असफल मानकर निराशा और फ्रस्ट्रेशन में जीएं ।
जिंदगी गणित है - राहुल गांधी जी छात्रों को यही गणित समझा रहे हैं ।आप कहेंगे - सर जी ! ऑलरेडी भी तो यही हो रहा है । जो असफल होते हैं वे कहीं ना कहीं दूसरी जगह पर चले जाते हैं । जिन्दगी अपने आप इंसान के प्लान बी सी डी ..... बनवा ही देती है ।
हम कहेंगे- हां जी! आपकी बात ठीक है । मगर इस तरह असफल होकर, मन मारकर, उल्टे सीधे गलत समझौते करके , आप एक फ्रस्ट्रेटेड जिंदगी गुजारोगे। खुद अपने पर ,परिवार पर और समाज पर निराशाओं का बोझ उतारोगे । अपने पूरे पोटेंशियल को जाने बिना एक कामचलाऊ नौकरी करोगे और यह सब इसलिए होगा क्योंकि आप इतना गणित नहीं समझ पाए, स्वीकार नही कर पाए कि अगर 500 सीटों के लिए 10, 000 बच्चे आ रहे हैं तो 9500 का असफल होना निश्चित है । इसका यह अर्थ यह नही है कि 9500 अयोग्य हैं ।
बस! एक इस बात से ही जिंदगी ने आपको चलाया या आपने जिंदगी को चलाया ; कर्ता कौन ? का मसला तय हो जाता है ।
मन के रहस्य गहन होते हैं । गलत जानकारी , गलत विश्वास दीर्घकाल तक मनुष्य को सालते रहते हैं । खुशी की बात है कि अंत में एक छात्रा ने इस बात को ज्यों का त्यों समझा ।
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