लेखकों में धर्म के शुद्धतावादी नजरिए की बहुत आलोचना होती है ।अक्सर साहित्य और कलाओं में यह व्यंग्य का विषय बन कर आता है । omg फिल्म में मिथुन* के स्त्रियों से बचकर चलने के स्टाइल को याद कीजिए,
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यह सही है ,कि यह पाखंड भी हो सकता है ।
पर
धर्म के अपने क्षेत्र मे रहे हुए सत्य और झूठ के , पहाड़ - समुद्र जैसे तुलनात्मक अंतर को देखते हुए विशुद्धतम चारित्रिक शुद्धता के आग्रह अनुचित नही दिखते ।
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आप सोचकर देखिए, कहां अहिसा -सत्य आदि आचार धर्म और कहां बलि आदि कु-आचार।
दोनों प्रोडक्ट कामनाओं में विभाजित जनता में 'धर्म 'के लेबल से जाएंगे ,
तो उनमें 'ऑथेंटिक ' जज करने के तरीके को सख्त तो होना ही होगा । नहीं तो धोखाधड़ी की गुंजाइश कम कैसे होगी ।
यही कारण है कि धर्म के क्षेत्र मे चारित्र पर इतना बल दिया जाता है । जब तक साधक का मन अभ्यास में है , वह इसे एक 'आदेश'समझ कर पालन करता है ।
परिपक्वता आने पर , जब वह इसके पीछे के ज्ञान की सतर्कता को जान लेता है , तो स्वयं ही इसमें दृढ़ हो जाता है ।
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सबसे घृणित किस्म की धोखेबाजी धर्म के क्षेत्र में होती है । यही धर्मपुरुषों के महान विषाद कारण भी हैं । धर्म को बचाने के लिए ही वे सतत संघर्ष के कठिन मार्ग पर चलना चुनते हैं ।
...
*I wrote this post yesterday. And surprisingly after some time saw mithun post on Manish singh's timeline. coincidence .
Earlier also . Chai.
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