बुधवार, 15 मई 2024

 दुर्लभ परिस्थितियों में ही ऐसा होता है कि बंधन बाजूबंद बन जाए।

 मेरे साथ ऐसा ही हुआ है।

 स्त्रियों का शास्त्र पढ़ना, ये कोई नॉर्मल बात नहीं है। इस तरह की नॉलेज के प्रति आकर्षण होना,

 पहला बंधन तो यही है कि क्या तुम्हें दीक्षा लेनी है ? क्या साध्वी बनोगी? और अपने तीखेपन में यह प्रश्न बहुत ही 'ऑब्वियस- सा' लगता है। सदा के लिए किसी का उत्साह तोड़ देने के लिए काफी है ।

 ये दुनिया कार्य- कारण और उसमें फायदा ढूंढने के वज्र सरीखे नियमों पर चलती है।

 दूसरा इस क्षेत्र की नॉलेज के प्रति आम गृहस्थियों में 'रहस्यात्मक  होने ' का भय होता है । यह भय आगे पारिवारिक सुख- शान्ति को बचाने  के लिहाज से बहुत उचित  दिखाई पड़ता है।

 तीसरी बात है प्रसिद्धि पाने की चाह  का बंधन भी बहुत मजबूत है। इस क्षेत्र में वास्तविक तरक्की के लिहाज से।  मुझे प्रवचनकार नहीं बनना था।  मुझे लेखक नहीं बनना था। यह आकांक्षा भी मेरे मन में नहीं थी ।


 तो इस तरह विशुद्ध पढ़ना और पढ़ने  के आनंद को प्राप्त करना , ये ही एक लक्ष्य था पढ़ने का।बाकी चीजें खुद-ब-खुद घटित होती चली  जाती हैं । 

 मैं इन सभी बंधनों को पार कर पाई, सिर्फ और अपने  गुरु की वजह से। गुरु के प्रति श्रद्धा होने के कारण मुझे कभी किसी बात का भय नहीं हुआ। 

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