लॉकडाउन में मुगल शासकों के इतिहास पढ़ने की बातें मैंने पहले भी अपनी पोस्ट में लिखी हैं ।
- एक पहले की पोस्ट
शहजादे दारा शिकोह का आख्यान धार्मिक,सांसारिक,दार्शनिक सत्यों की विचित्रता को उजागर करने का एक करूण प्रसंग है।
बेगम जहाँआरा की आत्मकथा पढने के बाद शाहजहां के परिवार को जानने मे मेरी रूचि जागी और इस तरह मै कानूनगो की किताब तक पहुंची ।इसकी भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है ।
पहले मुझे दारा के जीवन मे दिलचस्पी थी ।शाहजहां की उस पर विशेष कृपा,उसकी धार्मिक रूचि ,परिवार, ओरंगजेब से उसका युद्ध और करूण अन्त।
सभी इतिहासों मे उसके करूण अन्त का वर्णन बड़ी करूणा से किया गया है ,अतः दिलचस्पी होनी तो स्वाभाविक थी कि ऐसी भी क्या बात हुई।
बाद मे इस किताब मे दिए गए एक चैप्टर ने मेरा ध्यान खींचा जो दारा की लिखी हुई किताबो पर है ।इससे उसकी धार्मिकता व आध्यात्मिकता पर प्रकाश पडता है ।
इस किताब ने दारा की ऐतिहासिक शख्सियत से पूरा न्याय किया है। ज्ञान ,श्रम, प्रतिभा का सुसंयोग है यह किताब ।जो कुछ भी किताब मे है ,उसके अलग अपनी रीडिंग और समझ के अनुसार कुछ बाते यहां लिखूंगी ।cont..
एटसेटरा
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दारा शिकोह के जीवन को पढ़कर , उसकी अध्ययन में रूचि देखकर मुझे ये रिअलाइज हुआ कि इस तरह की नॉलेज को आत्मज्ञान की नॉलेज कहते हैं। साथ ही उसके जीवन को देख कर मैंने ये अनुमान लगाया की ये अवश्य विनयवादी है। एक जगह वो कहता है कि मैं ईश्वर की कल्पना परमपिता, दयालु के रूप में करता हूं ।अगर वह मेरे प्रति दयालु और करुणामय नहीं है तो मैं उसे ईश्वर मानने से इनकार करता हूँ । टाइप
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विचार साम्यता के कारण दारा शिकोह की दार्शनिक टाइप को समझकर ही मैंने अपनी दार्शनिक टाइप भी समझी। की मैं भी विनय वादीे कैटेगरी की हूँ।
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अब बात पहली और दूसरी कैटेगरी की । क्रिया का विषय जैन दर्शन का एक महत्वपूर्ण विषय है । बहुत से शास्त्रों मे यह विषय आया है ।
हैरानी की बात है की जिन नौ तत्वों पर श्रद्धा करके एक श्रद्धालु क्रियावादी कहलाता है, उन्हीं (-2) तत्वों पर श्रद्धा करके एक दूसरा श्रद्धालु अक्रियावादी कहलाता है। यह इन दो वादों का सबसे पेंचीदा पॉइंट है ।
ज्यादा मैं भी नही समझी हूँ ।
ये विषय घनघोर स्लो मोशन के विषय है । इनमें प्रगति धीमी होती है ।
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आगे आप समझिए कि चारों ही तरह के दर्शन एकांतवादी कहलाते हैं अर्थात एक मत को पकड़कर चलने वाले । जैन दर्शन अनेकांतवादी है ।
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यह मेरा प्रिय विषय है । जब भी अवसर मिले तो , बातें साझा करके संतोष होता है ।
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