देर से लिखने के कई कारण हैं। कई बार फोन हाथ में नहीं रहता। टाइम भी कम मिलता है।
पछतावा इसलिए क्योंकि बहुत समय इंतजार करने के बाद जाकर तो , इस तरह की बातचीत का कोई मौका मिलता है। और तब भी आप उस बात को लिखने में देर लगा दो । खैर।
शोभित ने ईश्वर है या नहीं, इस तरह की एक पोस्ट लिखी थी।तब मैंने एक पोस्ट शेयर की थी - क्रियावादी एटसेटरा।
सुशोभित ने कहा - मैं बदसूरत, खूबसूरत एट्सेटरा।
सबसे पहले तो मैं कहूँगी विनय और सरलता, यह सर्वप्रथम अर्हता है, आत्मज्ञान के क्षेत्र में 'क' सीखने की भी ।
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पहले मैं जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी जी के जीवन का एक तथ्य शेयर करती हूँ की महावीर स्वामी जी दीक्षा लेने के बाद 12 वर्ष तक मौन रहे थे ।उनका यह संकल्प था कि जब तक मुझे केवल ज्ञान प्राप्त नहीं होगा तब तक मैं एक भी शब्द नहीं बोलूंगा। यह इस क्षेत्र की नॉलेज के प्रति गंभीरता और गहनता को समझने का एक बहुत बडा महत्वपूर्ण संकेत है।
दूसरी बात मै हमेशा कहती हूं कि जैन दर्शन की मेरी समझ मेरा version है , बातों को समझने का । यह अंतिम नही है ।
इस तरह का कथन कहना ,विनय -वचन व्यवहार भी है और जिन वाणी के अर्थ की बहुलता का संकेत भी है ।
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रेफरेंस के लिए वह पोस्ट दोबारा यहां लगाई है -
समवसरण
क्रियावादी = जीव अजीव पाप पुण्य आस्रव संवर बन्ध निर्जरा तप मोक्ष = 9 ×2 स्व-पर = 18×10 नित्य -अनित्य अर्थात काल, नियति ,ईश्वर, स्वभाव, आत्मा = 5×2 =10 । 18×10=180
अक्रियावादी
जीव अजीव आस्रव संवर बन्ध निर्जरा तप मोक्ष = 7 ×2 स्व-पर = 14×12 नित्य -अनित्य अर्थात काल, + यदृच्छा , नियति ,ईश्वर, स्वभाव, आत्मा = 6×2 =12 । 14×12= 84
अज्ञानवादी
9 ×7 =63
7=सद असत सदसत अवक्तव्य सद् -अवक्तव्य असद- अवक्तव्य, सद-असद-अवक्तव्य
विनयवादी
देव ,राजा ,यति ,ज्ञाति ,स्थविर ,अधम ,माता पिता =8 ×4 मन,वचन,काय,दान = 36
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यह विषय सूत्रकृतांग और भगवती सूत्र में आया है ।
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यहाँ से आगे मैं पोस्ट को थोड़ा क्लैरिफाइ करूंगी ।
- समवसरण का अर्थ है- मिलना । वर्तमान में विचार गोष्ठी टाइप ,जहां विभिन्न प्रकार के वादी मिलते है ।
यह शब्द तीर्थंकर की धर्म सभा के लिए भी प्रयोग मे लाते है ।अन्य किसी की सभा के लिए इस शब्द का प्रयोग नही लाते ।
- तत्व नौ हैं । जीव ,अजीव आदि । कोई सात भी कह देते है । वे पुण्य-पाप को जीव के साथ संलग्न मान लेते हैं ।
कह लो ,soul एटसेटरा ।बाकी तत्वो का विषय इस विषय से जुडा है ।
जैन दर्शन मे चार तरह के दार्शनिक बताए गए हैं। उन में तीसरे नंबर के दार्शनिक अज्ञानवादी कहलाते है ।ये 63 प्रकार के होते हैं।
नौ तत्वों को सत असत आदि 7 प्रकार से देखने पर 👀 इनके नतीजे 63 तरह के निकल सकते है ।
कोई कहते हैं कि नव तत्वादि सत हैं
कोई कहते हैं कि असत्य है ।
कोई कहते हैं कि सत्य-असत्य है । (अनिर्णय की अवस्था)
कोई कहते हैं कि अवक्तव्य है ।कह नही सकते ।
आगे इन्हीं तीनों की अवक्तव्यता वाले हैं ।
अभी जैसे कई पोस्टों में विकास दिव्यकीर्ति के इंटरव्यू की बात चल रही थी
उसी इंटरव्यू में विकास दिव्यकीर्ती ने यह कहा कि मैं पहले ऐथिस्ट था । अब नहीं हूं , क्योंकि मैं नही जानता था। जानता तो अब भी नही हूं, लेकिन जिस बात को हम नही जानते ,तो क्यों कहें कि वह नहीे है एटसेटरा ।लक्षण के हिसाब से यह अज्ञानवादी की कैटेगरी होनी चाहिए।😊
यहाँ तक के चिंतन में एक छोटा सा गैप मुझे दिखाई देता है।
कहते हैं कि अज्ञानी वह हैं जो यह जानता नहीं है कि वह अज्ञानी हैं। जो यह जानता है कि वह अज्ञानी है तो दरअसल वह ज्ञानी है।तो दरअसल दूसरे टाइप का अज्ञानी जिज्ञासु हैं।
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अब आते हैं चौथे नंबर के दार्शनिक पर - विनयवादी। ये 32 तरह के होते हैं ।इसमें आठ जन की मन वचन काया और दान से विनय करने में ये धर्म मानते है।
वैसे तो चारों ही कैटेगरीज़ का क्षेत्रफल बहुत ज्यादा है। फिर भी इस कैटेगरी के लोगों की संख्या(मेरी समझ में) बहुत ज्यादा होगी।
माता पिता ,गुरु, शिक्षक ,राजा आदि , एक तरह की आचार व्यवस्था में इनके प्रति विनय को ही धर्म माना गया है।
माता पिता के प्रति आदर पूर्ण रहना
शिक्षकों के प्रति आदर पूर्ण रहना
गुरु , साधु के प्रति आदरपूर्ण रहना। इत्यादि
बल्कि हम यह देखते हैं कि संसार मेें बताए जाने वाले धर्मों का एक बड़ा हिस्सा इनके प्रति सुआचरण से है । एक सामान्य लेवल तक इसमे कुछ गलत भी नही है ।
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लगभग 20 साल शास्त्र पढ़ने के बावजूद तथा उससे भी पहले प्रवचन और गुरु दर्शन के माध्यम से एक परंपरा से जुड़े होने के बावजूद , मैं ये कहूँगी कि मुझे यह कभी पता ही नहीं था कि यह नॉलेज आत्मज्ञान की नॉलेज कहलाती है । सचेत रुप में ।अपने जाने तो मैं अपने गुरु की आज्ञा लेकर शास्त्र पढ़ रही थी । मुझे रस आ रहा था । मुझे नई नई बातें पढने को मिल रही थी । बस ।
एक बहती हुई धारा में बहते आने के समान , ये सब चीजे मेरी लाइफ ऑटोमेटिकली आती गई और मैं उनको फॉलो करती गई ।जैन परिवार में पैदा होना , फिर जैन गुरुओं के दर्शन करना और शास्त्र पढ़ना एटसेटरा ।
Cont
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