सुबह
घर में सुबह होने की हलचल की आवाजें थी। विशाखा उठकर चौंक (आंगन ) में आई। अंगीठी पर छोटी पतीली में चाय बन रही थी। चाय का रंग हल्का भूरा था। उसकी भाप और खुशबू पूरे चौक में फैली थी। पापा 7:00 बजे की गाड़ी में काम पर जाने के लिए तैयार थे। मम्मी ने रोटियां बना दी थी। सब्जी भी। चाय गिलास में छान रही थी। दादी एक तरफ कमरे की डोली पे बैठी थी। ताई अपनी तरफ के आंगन की डोली पे खड़ी थी। उसकी लड़कियां स्कूल ड्रेस में तैयार थी।
वहाँ सर्दी की धुंध थी। सबके मुँह से भाप निकल रही थी। वे सब - बाबा , पापा गर्मी के लिए अंगीठी के आसपास खड़े थे। हाथों को जल्दी- जल्दी रगड़ रहे थे । उनकी बातें अलाने- फलाने लोगों की जिंदगी की आकस्मिकता से जुड़ी थी।
विशाखा भाग कर गली में गयी। वहाँ एक घर के आगे अंगीठी रखी थी। कोयला जले तो धुआं उठता है। धुआं घर में न फैले, इसलिए उसकी सीलन को खत्म होने तक, सब लोग अंगीठी गली में रख देते थे। यह सुबह शाम की नियमित दिनचर्या थी। ऐसा करने से एकबारगी तो पूरी गली धूँए से भर जाती थी। थोड़ा छंटने पर सब अपनी अंगीठियां अंदर ले आते थे।
विशाखा वापिस चौंक में आ गई।
इसका दूध बना दे - पापा ने मम्मी को कहा।
मम्मी ने एक गिलास में गर्म दूध डाला। चीनी मिलाई। विशाखा ने दूध पिया। उसे दूध का स्वाद बहुत अच्छा लगता था ।
आ जा चाचा ! - विनेश ने गली में से आवाज लगाई।
आया- कहकर पापा चले गए।
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