चार
गोल गप्पे
पापा ने विशाखा को मना किया था की भामनों के घर नही जाना । क्यों? कह दिया ना ! कह दिया ना ! बस। इसके आगे कोई जिरह या बहस की गुंजाइश नहीं थी। पापा की बहुत सारी 'नहीं' के पीछे, अनजाने -छुपे हुए डर , संदेह थे , जिनकी उलझी गाठों को वे आजीवन सुलझा नहीं सके। पर सिचुएशन , जगह और वक्त के हिसाब से अपने बच्चों के लिए सटीक निर्णय लेने में वे कभी नहीं चूके। इसके लिए उन्हें हरहराते समुद्र में भी कूदना पड़ा तो वे बेझिझक कूद गए। चाहे वे तैरना भी ना जानते थे। ये सब साहस के कार्य वे 'एकमात्र ' अपने बच्चों के प्रति अपार वात्सल्य भावना के कारण कर पाए।
पापा ने मना किया था, इसलिए विशाखा कभी भामनो के घर के अंदर नहीं गई। पर बाहर दरवाजे की दहलीज पर खड़े रहकर भामिनी को गोलगप्पे बनाते हुए देखने में क्या हर्ज था?
भामनी ऊंची -लंबी ,तीखे नैन नक्श की, पतले गात की महिला थीं। वह साड़ी सीधे पल्ले की बांधती थी। वह लकड़ी के फट्टे पर गूंथे हुए आटे की छोटी छोटी पेड़िया बेलन से बेलकर बड़ी कढ़ाई में छोड़ती जाती थी। गर्म तेल में छोटी छोटी पूरियां तुरंत फूल कर गोल गप्पे बनते जाते थे ।भामिनी उन्हें बड़ी झार में निथार कर लकड़ी के टोकरे में डालती जाती थी। विशाखा खड़ी हुई देखती जाती थी।
आ जा वीशू- भामनी कहती।
वह ना में सिर हिला देती।
यह नहीं आएगी- भामनी का युवा लड़का रामफल कहता।
विशाखा भागकर अपने घर में घुस जाती। घर में चर्चा थी कि रामफल बस अड्डे पे गोलगप्पे का ठेला लगाता है।
.......
दर्पण मांहि आग -तीन भाग में एक बाल पुस्तक श्रृंखला है । यह एक स्मृति चित्र कथा है , जिसमें एक बच्ची विशाखा का जीवन आया है ।
यहां मैने कुछ प्रसंग शेयर किए थे । अभी दूसरे और तीसरे भाग का कार्य बाकी है ।
....
रचना प्रक्रिया पर एक पूर्व पोस्ट-
श्रेष्ठ रचनात्मक कला का यह एक अनिवार्य प्रकार्य मैंने देखा है की वह आस्वादी के भीतर कुछ बदल देता है। बेशक फौरी तौर पर वह स्वयं उस तरह की रचना न कर सके, पर धीरे -धीरे परिपक्वता पूर्ण होने पर वह स्वयं भी इस तरह की रचना करने के काबिल बन जाता है।
खुद मेरे साथ यह हुआ है । अब तक , तीन बार। सुधा अरोड़ा जी की कहानी है- औरत : तीन बटा चार । यह कहानी मैंने कई बार पढ़ी है । पढ़ी,पढ़ी, पढ़ी । पता नही क्या ट्रिगर हुआ । पोशाक कहानी क्लिक हो गई।
जैन आगम 'उववाई ' के ' रिच' भावपूर्ण वर्णन पढ़ते हुए मुझे नाते मे बड़ी बहन की शादी के मंजर याद हो आए थे । मैने उन्हे एक कहानी मे लिखने की कोशिश की थी । बट सही फार्म नही मिली थी ।
ऐसा होता है ना! कि लाइफ मे एक मोमेंट पर आपने बातों को कैसे समझा-जिया , बाद मे परिवर्तित जानकारी मे उन पिछली बातों का भी स्वाद बदल गया ।तो चीजे काम्प्लेक्स हो गई। बट फिर भी आप पाते हो कि उस पिछले समय मे जिस तरह बाते देखी थी , उनका मजा विलक्षण था ।
तीसरी बार ऐसा हुआ। मैं पत्रकार रवीश कुमार* के एफबी को फॉलो करती हूँ। उन्होने अपनी टाइमलाइन पर सॉन्ग शेयर किया था ।यह एक अंग्रेजी गाने का लिंक था। वह गाना था- फ़िल्म साउन्ड ऑफ म्यूजिक का दीज़ आर् माई फ्यू फ़ेवरेट थिंग्स। इस गाने की एनर्जी इतनी जीवंत और तुरंत फैलने वाली थी कि मेरा मन बहुत खुश हो गया था। इस गाने की वजह से, मैं भी अपने बचपन में पहुँच गई थी।
बाद में मैंने उसे एक कहानी में ढालने की कोशिश की, पर वह बात नहीं बन पा रही थी। फिर वही समस्या। मनचाही फॉर्म नहीं मिल रही थी। मुझे लगता है , अब जाकर वह समस्या सॉल्व हुई है। देखो ! आगे क्या सामने आता है।
* लेखन में प्रसिद्ध लोगों का जिक्र करना अनुकूलता -प्रतिकूलता के पैमाने पर देखा जाता है।
अनुकूलता है तो, यह बात प्रसन्नता की लगती है।
प्रतिकूलता है तो , यह बात 'हमारी प्रसिद्धि में जबरन शेयर लेना चाह रहे हैं ' इस टाइप से निकल कर आती है।
मैं इस बात को तथ्य के तौर पर दर्ज करती हूँ। और इस तथ्य के द्वारा रचनात्मक अनुभव की प्रक्रिया पर भी कुछ रौशनी डल जाती है।
यहाँ ब्लाग पर प्राइवेटली इस बात को इस तरह लिखने में तो मुझे लगता है कि यह दोष नहीं लगेगा। अगर कभी इस बात को प्रकाशन में कहने का अवसर आया तो फिर यह बात कैसे कही जाएगी, जब की तब देखेंगे ।
....
किताब छपने का मुझे नही मालूम। सहृदयों ने यहां पढ़ लिया , मेरे लिए तो यही प्रकाशित होना है ।
....

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें