विशाखा का दाखिला दुर्गा भवन स्कूल में हुआ था। उसकी बुआ, ताई और गली के बच्चे वहीं जाते थे।
दोपहर में कभी बुआ, तो कभी मम्मी - सभी बच्चों को घर ले आते। यह स्कूल रेलवे स्टेशन के पास था। पहले उसका दाखिला घर के पास में एक पाठशाला में हुआ था। मैडम ने किसी बात पर विशाखा को कई चांटे मार दिए। पापा को यह बात पता चली तो उन्होंने वहाँ से उसका नाम कटवा दिया। अनुशासन के नाम पर अपनी बेटी की पिटाई वे नहीं सहेंगे।
नए स्कूल में और गली में , विशाखा को अपने मुकाबले में नीतू लगती थी। वह ओम बाबा की पोती थी। बाकी काके, काके का भाई सोनू, अपनी ताई के बच्चों में विशाखा श्रेष्ठ थी ।काके उसकी बुआ का बेटा था ।
पांच लाइनों की इंग्लिश की कॉपी में छोटी एबीसीडी लिखते हुए विशाखा ने नीतू के लेख से अपने लेख का मिलान किया तो उससे नीतू के अक्षरों में चैन महसूस हुआ । उसे अपने लेख में एक अनिश्चिंतता सी लगी ।
क्या कारण हो सकता है?उसने सोचा। तो उसने देखा नीतू तो अपनी पेंसिल शार्पनर से छिलती है। उसकी पेंसिल की नोंक लंबी ,बारीक, चिकनी निकलकर आती है।
वह अपनी पेन्सिल मम्मी से छिलवाती है। उसकी मम्मी पेन्सिल चाकू से घट कर देती है। पेंसिल की नोंक छोटी, मोटी और ऊबड़- खाबड़ दिखती है।
यही कारण हो सकता है , लिखाई में अंतर का। विशाखा का लेख भी सुंदर था। पर नीतू के मुकाबले वह कभी अपने लेख से संतुष्ट नहीं हुई।
......

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें