शनिवार, 22 जून 2024

समारोह पूर्वक बलि वध के लिए ले जा रहे एक पशु के साथ हुए विश्वासघात पर जब एक लेखक लिखता है ,तो वह उस पशु की चेतना मे हो रहे संघात से एकाकार हो चुका होता है ।

यह कोई मामूली परिवर्तन नही है । 

यह चार दुर्लभ अंगों -मनुष्य भव , जिनतत्व श्रवण,श्रद्धा , वीर्यकार पराक्रम - मे अंतिम अंग की भूमिका है । 

तत्व मे श्रद्धा करके जीव तदनुसार आचरण के उठता है वह द्विविध होता है -साधु और श्रावक।

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यह पराक्रम, सचमुच में बड़ी ही दुर्लभ चीज़ है। क्योंकि इसमें व्यक्ति स्वयं अपने प्रति ही बेहद निर्मम,  कठोर हो जाता है।

 स्वाद वृत्ति को जीतना , यह कोई मामूली बात नहीं है। स्वाद* के आगे ज्ञान कुछ काम नहीं आता। जितना मर्जी समझा लो। कोई फर्क नहीं पड़ता। 

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यहां तक हुई इस पक्ष की एक बात

अब आगे च्वाइस की बात को देखते है । 

यह कहा गया कि मोक्ष मनुष्य जीवन का अंतिम डेस्टिनेशन है । इसके आगे फिर कुछ प्राप्त करना नही बचता ।

बट ऐसे महत्वपूर्ण ज्ञान को बताने के लिए भी भगवंतों ने फरमाया -पूछने पर ही जवाब दे ।इसलिए इसका नाम श्रुत परम्परा है । शिष्य के पूछने पर, गुरुमुख से सुने हुए ज्ञान की परम्परा।

क्यों?

क्योंकि जब व्यक्ति संयम जैसी उत्तम चीज को भी मन से स्वीकार नही करता ,तो उसके ज्ञान ग्रहण मे अन्तर आ जाता है । इसे ज्ञानान्तर कहते है ।

ज्ञानान्तर से भयानक दोष उत्पन्न हो जाते है ।

हम देखते है कि श्रेष्ठ धर्म परम्पराएं भी आगे जाकर विभाजित होती जाती है । विभाजित हुई परम्पराएं कभी दोबारा मिलती नही ।

मूल सत्य कही वीराने मे पड़ा रोता रहता है । उस तक पहुँचने का रास्ता कठिन होता जाता है 

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आध्यात्म के क्षेत्र मे रखी गई ऐसी सूक्ष्म सावधानी का 'मांस खाने की च्वाइस  कहना कुतर्क है  ।

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अब मै एक और पहलू की चर्चा करना चाहती हूं।

जीवदया जैन विज्ञप्ति का मुख्य प्वाइंट है ,इसमे कोई शक की बात नही है ।

साथ ही इस विज्ञप्ति के अन्य मुख्य बिन्दु भी है । जिनमे से एक है मोहनीय कर्म  । यह आठ कर्मो मे चौथे नम्बर का है । वैसे तो मोक्ष प्राप्त होने मे ज्ञानावरणीय कर्म की बाधा होती है , पर मोहनीय कर्म की प्रबलता के आगे सब कर्म फीके पड जाते है ।

मोहनीय कर्म =तीव्र राग -द्वेष।  इसका बन्ध काल बहुत बहुत ज्यादा होता है ।

जैन दर्शन मे द्वेष को भी बन्ध का कारण माना गया है ।

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पशु अधिकार की पोस्ट के जवाब मे नाॅन वेज की पिक , द्वेष स्थान है । 

अपनी रक्षा करो वहां से । 

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सुशोभित स्वयं को एथिस्ट कहते है पर जीवदया के लिए उनके आग्रह श्रमण धर्म से मिलते जुलते है ।

श्रमण जैन धर्म भी ,एक प्रकार से , धर्म के नाम पर फैले देववाद ,बलिप्रथा आदि का घनघोर विरोधी है ।

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कल संगत पे सुधीश पचौरी का इंटरव्यू सुना था । शानदार।

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*इंडिया मे एक बहुत बड़े पक्षी विज्ञानी हुए है -सालिम अली । उनका पूरा जीवन पक्षियो के अध्ययन मे गुजरा । बट वे चिड़िया का मांस खाते थे । लोगो को अचरज हो कि एक ओर चिड़ियों की ऐसी जानकारी ,

दूसरी ओर उनका भक्षण ।

यह द्वैत तो है , पर यह इंसान के अस्तित्व मे ही पैवस्त है । इसे कैटेगराइज़ नही कर सकते ।



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