रविवार, 21 अगस्त 2016

ekks-7

भक्ति भावना के इस ऊँचे पायदान पर पहुंचकर भी ,संदेहों की या कहूँ अपनी जमीन  आसानी से न छोड़ने (मैं इसे जमीं न छोड़ना कह रही हूँ ,बल्कि सच तो यह है की उस समय मैं स्वयं अपनी जड़ों की तलाश में थी )की मेरी फितरत वैसी ही थी |
भगवन शब्द के प्रयोग पर मैंने सोचा 'गुरूजी का कोई कुसूर नहीं |यह तो भक्तो की मूर्खता है '|
धर्म के बारे में मैंने सोचा कि अहिंसा -ब्रह्मचर्य वगैरह यह जो बातें हैं ,वे धार्मिक बाना पहनकर निभानी तो आसान हैं क्योंकि एक बने बनाये समाज का इंफ्रास्ट्रक्चर आपकी मदद करता है (मैं सही भी थी ,गलत भी |पाठकों के आगे वह कहानी भी कभी आएगी ) पर असली सांसारिक लोगों के आगे इन सिध्दांतों की आजमाइश हो तो पता चले कि धर्म कितना दमदार है |यह थी मेरी साल 1997 की आलोचनात्मक सोच | .............................

उसके बाद ५-4-१६ ,यानि अभी अभी की , की पर्सनल डायरी की यह टिप्पणी देखिये | टिप्पणी तो यह बहुत बड़ी है ,सारी  लिखनी तो संभव नहीं |कुछ अंश देखिये -लेकिन जो धर्म तूने सीखा है ,जो तप तू कर रही है ,जो ज्ञान तू  सीख रही है -वह बिलकुल सही है ,उत्तम है ,परम उत्तम है ,मंगल है ,कल्याणकारी है -आज इस शुभ ,सफ़ेद ,स्फटिक  ,ठंडी ,चमकदार भावना  को मैंने फील किया |..................एक्चुअली धर्म के क्षेत्र में मेरी एंट्री ही इस डाउट के साथ हुई थी कि धार्मिक बाना पहने लोगों के लिए धर्म  की बात करना ,उपदेश देना सरल है |एक्चुअल संसारी टेढ़े लोगों के आगे धर्म निभाना कठिन होता होगा |वहां इसकी टेस्टिंग हो तो पता चले |
हो गया टैस्ट !हो गयी पास !धर्म भी पास हो गया !मैं भी पास हो गयी !  

दोस्तों !इन दो बातों  में लगभग २० साल का फासला है |इस बीच मैंने बहुत कुछ देखा ,जाना ,पढ़ा ,गुना |मैंने धर्म भी देखा और  धर्म के नाम पर गिलाजत को भी देखा |अब मैं दोनों को अलग अलग पहचान सकती हूँ |
 धर्म एक प्रकार का साहस है या कहें  साहस ही धर्म है जो इन्सान को हर प्रकार की नाइंसाफी ,अपमान ,अत्याचार ,गन्दगी .गिलाजत से लड़ने की शक्ति देता है |आज के युग में इसका चेहरा बदल गया है |अब यह सिर्फ धार्मिक बानों में सजकर नहीं आता ,बल्कि फेसबुक ,ट्विटर ,अख़बार ,पत्रिका - जहाँ कहीं भी कोई लड़ रहा है , वहां धर्म मौजूद है |बल्कि जो लड़ाइयाँ अनजाने में धर्म के खिलाफ समझ कर लड़ी जा रही हैं ,वे  लड़ाइयाँ भी धर्म में आई विकृतियों के खिलाफ हैं ,अतः धर्म हैं |
मैं लकी थी कि मुझे यह सहारा धर्मगुरुओं में मिल गया |लड़कियों के मासिक के खुलेपन की बातें , धर्म में आई विकृतियों की बातें ,जो आजकल फेसबुक पर चलती हैं ,हमने खुद गुरूजी के मुंह से सुनी |
सुन्दर मुनि जी कहते थे -दुनिया की सारी नहीं तो तीन चौथाई मुश्किलें हल हो जाएँ ,अगर इन धार्मिक गुरुओं का मुंह बंद हो जाए तो उनकी बात पर रामप्रसाद जी ऐसे हँसते थे जैसे बजते हुए सितार का तार समूचा झनझनाता है |(हाँ ,देखो न |यह शरीर की भाषा ही तो कहती है कि वे इस जोक पर पूरे सीरियस थे |नहीं तो सभा में लोगों को हंसाने का यह भी एक चुटकुला ही समझिये )
अपने प्रवचनों को कहते थे कि बंदरो को पीछे लगाये रखने की गोलियां हैं ,कई बार कहते तुम मे (गृहस्थियों में )और हम मे कोई फर्क नहीं ,सिवाय वेश के | हमारी इसलिए निभ गयी क्योंकि हमारा जमाना और था |मैं धार्मिक गुरु हूँ ,मेरा फर्ज है -धर्म का प्रचार करना ,पर आज के जो हालात हैं ,उनमे मैं किसी को साधू बनने के लिए नहीं कहूँगा |ये शब्द हैं एक गुरु के जिसका जीवन शास्त्रों पर टिका है |वह ऐसी बात कह रहा है |उसे ये बातें कहने में अपने भीतर कितना साहस लाया होगा | जहाँ हो ,वहीँ रहो |जितना पले  ,उतना पाल लो  इत्यादि बातें इशारा करती है कि धार्मिक बाना पहले लोगों के लिए भी धर्म का पालन करना सरल नहीं रहा |

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